Thursday, January 6, 2022

ईश्वर की यह भी सच्ची भक्ति है

 *ईश्वर की यह भी सच्ची भक्ति है*

एक पुजारी थे. ईश्वर की भक्ति में लीन रहते. सबसे मीठा बोलते. सबका खूब सम्मान करते. जो जैसा देता है वैसा उसे मिलता है. लोग भी उन्हें अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान भाव से देखते थे.


पुजारी जी प्रतिदिन सुबह मंदिर आ जाते. दिन भर भजन-पूजन करते. लोगों को विश्वास हो गया था कि यदि हम अपनी समस्या पुजारी जी को बता दें तो वह हमारी बात बिहारी जी तक पहुंचा कर निदान करा देंगे.


एक तांगेवाले ने भी सवारियों से पुजारी जी की भक्ति के बारे में सुन रखा था. उसकी बड़ी इच्छा होती कि वह मंदिर आए लेकिन सुबह से शाम तक काम में लगा रहता क्योंकि उसके पीछे उसका बड़ा परिवार भी था.


उसे इस बात का हमेशा दुख रहता कि पेट पालने के चक्कर में वह मंदिर नहीं जा पा रहा. वह लगातार ईश्वर से दूर हो रहा है. उसके जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो.


यह सब सोचकर उसका मन ग्लानि से भर जाता था. इसी उधेड़बुन में फंसा उसका मन और शरीर इतना सुस्त हो जाता कि कई बार काम भी ठीक से नहीं कर पाता. घोड़ा बिदकने लगता, तांगा डगमगाने लगता और सवारियों की झिड़कियां भी सुननी पड़तीं.


तांगेवाले के मन का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब वह एक दिन मंदिर गया और पुजारी से अपनी बात कही- *"मैं सुबह से शाम तक तांगा चलाकर परिवार का पेट पालने में व्यस्त रहता हूं. मुझे मंदिर आने का भी समय नहीं मिलता. पूजा- अनुष्ठान तो बहुत दूर की बात है."*


पुजारी ने गाड़ीवान की आंखों में अपराध बोध और ईश्वर के कोप के भय का भाव पढ लिया. पुजारी ने कहा- *"तो इसमें दुखी होने की क्या बात है ?"*


तांगेवाला बोला- *"मुझे डर है कि इस कारण भगवान मुझे नरक की यातना सहने न भेज दें. मैंने कभी विधि-विधान से पूजा-पाठ किया ही नहीं, पता नहीं आगे कर पाउं भी या नहीं. क्या मैं तांगा चलाना छोड़कर रोज मंदिर में पूजा करना शुरू कर दूं ?"*


पुजारी ने गाड़ीवान से पूछा- *"तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गांव से दूसरे गांव पहुंचाते हो. क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि तुमने किसी बूढ़े, अपाहिज, बच्चों या जिनके पास पास पैसे न हों, उनसे बिना पैसे लिए तांगे में बिठा लिया हो ?"*


गाड़ीवान बोला- *"बिल्कुल ! अक्सर ऐसा करता हूं. यदि कोई पैदल चलने में असमर्थ दिखाई पड़ता है तो उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेता हूं और पैसे भी नहीं मांगता."*


पुजारी यह सुनकर खुश हुए. उन्होंने गाड़ीवान से कहा- *"तुम अपना काम बिलकुल मत छोड़ो. बूढ़ों, अपाहिजों, रोगियों और बच्चों और परेशान लोगों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है."*


*"जिसके मन में करुणा और सेवा की भावना हो, उनके लिए पूरा संसार मंदिर समान है."*


*"तुम्हें मंदिर आने की बिलकुल जरूरत नहीं है. परोपकार और दूसरों की सेवा करके मुझसे ज्यादा सच्ची भक्ति तुम कर रहे हो."*


*"ईमानदारी से परिवार के भरण-पोषण के साथ ही दूसरों के प्रति दया रखने वाले लोग प्रभु को सबसे ज्यादा प्रिय हैं. यदि अपना यह काम बंद कर दोगे तो ईश्वर को अच्छा नहीं लगेगा"*


*"पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन ये सब मन को शांति देते हैं. मंदिर में हम स्वयं को ईश्वर के आगे समर्पित कर देते हैं. संसार के जीव ईश्वर की संतान हैं."*


*"माता-पिता तब ज्यादा प्रसन्न होते हैं जब कोई उसकी संतान के प्रति अनुराग रखता है. यदि हम जीवों के प्रति दया और सेवा का भाव रखकर परोपकार पर बढ़ते रहें तो वह किसी भी भजन-कीर्तन से कम नहीं है."*


*"आप यह संकल्प लें कि आप जहां भी हैं, जो भी काम करते हैं वहां यदि कोई जरूरतमंद और परेशानहाल आए तो उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करके उसकी सहायता करेंगे."*


 *"ईश्वर की यह भी सच्ची भक्ति है."*


*"शुभ प्रभात। आज का दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।"*

Wednesday, January 5, 2022

ईश्वर और विज्ञान

 👉 ईश्वर और विज्ञान


1970 के समय तिरुवनंतपुरम में समुद्र के पास एक बुजुर्ग भगवद्गीता पढ़ रहे थे। तभी एक नास्तिक और होनहार नौजवान उनके पास आकर बैठा, उसने उन पर कटाक्ष किया कि लोग भी कितने मूर्ख है विज्ञान के युग मे गीता जैसी ओल्ड फैशन्ड बुक पढ़ रहे है। उसने उन सज्जन से कहा कि आप यदि यही समय विज्ञान को दे देते तो अब तक देश ना जाने कहाँ पहुँच चुका होता, उन सज्जन ने उस नौजवान से परिचय पूछा तो उसने बताया कि वो कोलकाता से है और विज्ञान की पढ़ाई की है अब यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान में अपना कैरियर बनाने आया है।


आगे उसने कहा कि आप भी थोड़ा ध्यान वैज्ञानिक कार्यो में लगाये भगवद्गीता पढ़ते रहने से आप कुछ हासिल नही कर सकोगे।


सज्जन मुस्कुराते हुए जाने के लिये उठे, उनका उठना था की 4 सुरक्षाकर्मी वहाँ उनके आसपास आ गए, आगे ड्राइवर ने कार लगा दी जिस पर लाल बत्ती लगी थी। लड़का घबराया और उसने उनसे पूछा "आप कौन है??"


उन सज्जन ने अपना नाम बताया 'विक्रम साराभाई' जिस भाभा परमाणु अनुसंधान में लड़का अपना कैरियर बनाने आया था उसके अध्यक्ष वही थे।


उस समय विक्रम साराभाई के नाम पर 13 अनुसंधान केंद्र थे, साथ ही साराभाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने परमाणु योजना का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।


अब शर्मसार होने की बारी लड़के की थी वो साराभाई के चरणों मे रोते हुए गिर पड़ा। तब साराभाई ने बहुत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा

"हर निर्माण के पीछे निर्माणकर्ता अवश्य है। इसलिए फर्क नही पड़ता ये महाभारत है या आज का भारत, ईश्वर को कभी मत भूलो।"


आज नास्तिक गण विज्ञान का नाम लेकर कितना नाच ले मगर इतिहास गवाह है कि विज्ञान ईश्वर को मानने वाले आस्तिकों ने ही रचा है, फिर चाहे वो किसी भी धर्म को मानने वाले क्यो ना हो।


ईश्वर ही सत्य है शेष सब मिथ्या।


         पं. माहेश्वर भारद्वाज

Motivational Speaker/Spiritual Orator.

Tuesday, January 4, 2022

अल्सर गायब हो गया

 अल्सर गायब हो गया

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श्री आर. पी. त्रिपाठी, उज्जैन

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1974 में अचानक मुझे पेट में भयंकर तकलीफ हुई। चैक कराने पर पता चला कि पेप्टिक अल्सर है और वह अल्सर इस स्थिति तक पहुँच चुका था कि कभी भी फूट सकता था। डॉक्टर ने कहा कि जितनी जल्दी हो सके आप्रेशन करा लो, यदि यह फूट गया तो आपकी जान भी जा सकती है। मुझे तकलीफ इतनी ज्यादा थी कि मैं दो घूँट पानी भी नहीं पी सकता था। कुछ ही दिनों में मेरा वजन 20 किलो कम हो गया था। कानपुर के एक अनुभवी डॉक्टर से ऑपरेशन का समय भी ले लिया था। गायत्री परिवार के समर्पित कार्यकर्ता श्री मोतीलाल जी मेरे अच्छे मित्र थे। उन्होंने कहा, ‘‘ऑपरेशन तो कराना ही है, पर क्योंकि हम गुरुजी से जुड़े हैं, तो ऑपरेशन के पहले गुरुदेव के दर्शन कर लें तो अच्छा रहेगा।’’ हम गुरुदेव के दर्शन करने शान्तिकुञ्ज पहुँचे। गुरुदेव ने देखते ही पूछा, ‘‘सब ठीक-ठाक है?’’ मैंने कुछ नहीं बताया, पर मेरी पत्नी ने सब हाल बताया और कहा, ‘‘गुरुदेव, ऑप्रेशन कराना है, आपका आशीर्वाद चाहिये।’’

सुनकर गुरुदेव ने कहा, ‘‘बेटा, मैं भी तो डॉक्टर हूँ। अब तुम यहाँ आ गये हो तो ऑपरेशन की कोई जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारा पूरा इलाज करता हूँ। यहाँ से रोज हरकी पौड़ी पर स्नान करने जाना और रोज खूब पानी पीना। रोज शाम को मेरे प्रवचन में भाग लेना और कल मनसा देवी के दर्शन करना।’’


उस समय मेरी स्थिति ऐसी थी कि मैं 10 कदम भी नहीं चल पाता था। दो घूँट पानी मुश्किल से पी पाता था। 1974 के समय में मनसा देवी के लिये पहाड़ पर चढ़ कर जाना स्वस्थ आदमी को भी कठिन जान पड़ता था। उस पर भी आश्चर्य की बात, गुरुजी बोले, ‘‘हर की पौड़ी पर दही-बड़े और गोलगप्पे खाना।’’ यह तो मेरे मन की बात थी, क्योंकि दोनों ही मुझे बहुत अच्छे लगते थे।


मैंने गुरुजी के कहे अनुसार किया। हर की पौड़ी नहाने के लिये गया। मन में सोचा, जब गुरुदेव ने दही-बड़े खाने के लिये कहा है तो खा ही लेता हूँ। मैंने छक कर दही-बड़े खाये। मुझे कुछ नहीं हुआ। दूसरे दिन हम मनसा देवी की चढ़ाई भी चढ़ गये। जैसा-जैसा गुरुजी ने कहा था, वैसा ही किया। 15 दिन का समय गुरुदेव ने दिया था। कहा था, कहीं अस्पताल जाने की जरूरत नहीं है, सब कैंसिल कर दो, बाद में जाना। 15 दिन बाद जब गुरुदेव के पास गये तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, अब तुम जाओ। डाक्टर के पास जाने की कोई जरूरत नहीं है। कभी पेट में दर्द हो तो चले जाना।’’ उस समय से आज तक मुझे पेप्टिक अल्सर नहीं है।


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Monday, January 3, 2022

बहुत सुन्दर कहानी

 बहुत सुन्दर कहानी

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एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़  गया।


खाने के भी लाले पड़ गए।


एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ।


कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।


बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया।


चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है।


थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे।


उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।


अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों, रत्नों की परख का काम सीखने लगा।


एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे।


एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है   

उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।


मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है।


वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।


चाचा ने पूछा, हार नहीं लाए?


उसने कहा, वह तो नकली था।


तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे, तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचाजी हमारी चीज़​ को भी नकली बताने लगे।


आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।


सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है।


और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार होकर रिश्ते बिगड़ते है।


ज़रा सी रंजिश पर, ना छोड़ो किसी अपने का दामन 


ज़िंदगी बीत जाती है अपनो को अपना बनाने में...


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Sunday, January 2, 2022

जीवात्मा के भीतर का प्रकाश जगाना होगा!

 जीवात्मा के भीतर का प्रकाश जगाना होगा!

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मित्रो! काम किससे बनता है? काम उससे बनता है जिस जीवात्मा के भीतर प्रकाश भरा हुआ है। ऐसे आदमी जहाँ कहीं भी गये हैं, खराब परिस्थितियों को भी अच्छा बनाते चले गये हैं। बुरे लोगों को अच्छा बनाते चले गये हैं। बुरी परिस्थितियों पर कब्जा करते चले गये हैं। अँधेरे में रोशनी पैदा करते हुए चले गये हैं। और जिनके दिल और दिमाग सो गये थे, उनको जगाते हुए चले गये हैं। कौन? जो स्वयं जगा हुआ है। आपको स्वयं जगा हुआ इंसान बनाने के लिए हमने इस शिविर में बुलाया है। न जाने क्यों एक पुरानी घटना हमको बार- बार याद आ जाती है। कुंभ का मेला लगा हुआ था, जैसे यहाँ कल से कुंभ मेला प्रारंभ होने वाला है। उसी तरह कुंभ मेले में एक स्वामी जी आये थे। स्वामी जी ने इसी तरीके से व्याख्यान दिया था, जैसे हम आपको यहाँ दे रहे हैं। हमको स्वामी जी का नाम याद आ रहा है। उनके जो गुरु थे, आँखों से अंधे थे। उन्होंने अपने विद्यार्थी से कहा कि बेटे! तू मुझे कुछ देगा क्या? मैंने तुझे विद्या दे दी, प्यार दे दिया, बल दे दिया। तू भी कुछ देगा क्या?


विद्यार्थी बोला- ‘गुरुदेव! मेरे पास क्या है? मैं क्या दे सकता हूँ।’ लौंग का एक जोड़ा लेकर गुरुदेव के पास गया और बोला कि गुरुदेव! दक्षिणा में बस यही है हमारे पास। बेटे, लौंग के जोड़े का मैं क्या करूँगा? यह मेरे किस काम आने वाला है? तो फिर क्या चीज दूँ? मेरे पास क्या है बताइये? मैं तो साल भर आपके पास पढ़ा हूँ और रोटी भी तो मैंने यहीं से खाई है। कपड़ा भी तो आपने ही पहनाया है। अब मेरे पास क्या चीज रह जाती है जो मैं आपको दूँ।


गुरुदेव बोले- बेटे तेरे पास इतनी कीमती चीज है, जो तुझे भी मालूम नहीं है। मेरे पास क्या चीज है? तेरे पास है तेरा वक्त, तेरा श्रम, तेरा पसीना, तेरा हृदय, तेरा मस्तिष्क, तेरी बुद्धि, तेरी भावनाएँ। तेरे पास यह इतनी बड़ी चीजें हैं कि उसका रुपये से कोई सम्बन्ध नहीं है। रुपया तो इसके सामने धूल के बराबर है, मिट्टी के बराबर है। रुपया किसी काम का नहीं है इसके आगे। तेरे पास ये चीजें है, उन्हें तू मुझे दे दे।


विद्यार्थी को उमंग आ गयी। उसने कसम खाकर कहा- ‘गुरुजी! कसम खाकर के कहता हूँ कि यह जिंदगी आपके लिए है और इसे आपके लिए ही खर्च करूँगा।’ बस, वह निहाल हो गया। आँखों से अंधे गुरु की आँखें चमक पड़ीं। कौन से गुरु की? स्वामी बिरजानन्द की। स्वामी बिरजानन्द की आँखें मथुरा में अंधी हो गयीं थीं। बाहर की आँखें तो अंधी बनी रहीं, लेकिन भीतर की आँखों में ऐसी रोशनी आई, कि चेहरा चमक पड़ा। खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने उस विद्यार्थी से, जिसका नाम था ‘दयानन्द’- से कहा कि ‘बच्चे! तू जा। पाखंड खंडिनी पताका लेकर जा। पहला काम तुझे लोगों के मस्तिष्क की सफाई का करना पड़ेगा। पहला काम लोगों को ज्ञान देना नहीं है, रामायण पढ़ाना नहीं है, गीता पढ़ाना नहीं है, मंत्र देना नहीं है।’


नहीं, गुरुजी! शंकरजी का मंत्र दे दीजिए। अरे बाबा! शंकर जी भी मरेंगे और तू भी मरेगा। पहले अपने को भीतर- बाहर से धोकर के साफ कर ले। धोया नहीं जायेगा तो बात कैसे बनेगी। पाखाने का कमोड लेकर के आप जाइये। गुरुजी! इसमें गंगा जल डाल दीजिए। बेटे, इसमें गंगा जल डालने की बजाय तो यह जैसी है वैसी ही पड़ी रहने दे। मित्रो! इन्सान को जब तक धोया नहीं जायेगा और उसमें आप राम का नाम डालेंगे, हनुमानजी का नाम डालेंगे, गणेश जी का नाम डालेंगे और रामायण का नाम डालेंगे, तो रामायण की मिट्टी पलीत हो जायेगी और कृष्ण जी की मिट्टी पलीत हो जायेगी और वह गंदगी जहाँ की तहाँ बनी पड़ी रहेगी।


मित्रो! आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के लिए क्या करना पड़ता है? इसमें पहला काम सफाई का होता है, चाहे वह समाज की सफाई हो, चाहे व्यक्ति की सफाई हो, चाहे किसी की सफाई हो। सफाई किये बिना अध्यात्म का रंग किसी पर चढ़ा ही नहीं है। कपड़ा रँगने से पहले आपने उसे धोया था न? अगर आपने धोया नहीं होगा, तो कपड़े का रंग कभी भी नहीं आ सकता। राम का नाम कपड़ा रँगने के बराबर है। इसके पहले हमको वह काम करना पड़ता है, जिसको हम संयम कहते हैं। जिसको हम तप कहते हैं। जिसको हम योगाभ्यास कहते हैं। तप क्या होता है? संयम क्या होता है? और योगाभ्यास क्या होता है? इनसे आपके शरीर और मन पर अर्थात् बहिरंग और अंतरंग में जो पाप और दुष्प्रवृत्तियाँ हावी हो गयी हैं, उनको साफ करना पड़ता है।

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Saturday, January 1, 2022

निराश रहने का कारण है- आत्मविश्वास का अभाव।

 निराश रहने का कारण है- आत्मविश्वास का अभाव।

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       उदास स्वभाव के मनुष्य को यदि एक तिनके की बराबर हानि हो जाय, तो वह समझता है कि मेरा सर्वस्व चला गया। मेरी सारी सम्पदा नष्ट हो गई। जब जरा-जरा सी बातों में इतना उद्वेग होता है, तो किसी महत्वपूर्ण विषय पर गम्भीरता के साथ विचार करने के लिए उनके मस्तिष्क में स्थान नहीं बच पाता।

        जैसे पहाड़ से नीचे बहने वाला पानी बर्फ को भी अपने साथ बहा लेता है, वैसे ही आँसू जब बहते हैं, तो चेहरे की सुन्दरता को भी बहा ले जाते हैं।

       तेजाब में पड़ा हुआ मोती पहले मैला होता है, फिर गल जाता है। उसी तरह निराशा पहले मनुष्य को निर्बल बनाती है, फिर उसे खा जाती है।

       कायरता हमारे हाथों को बाँध देती है और सद्गुणों पर आलस्य का पर्दा डाल देती है और जीवन के वास्तविक आनन्द का गला घोंटकर हत्या कर देती है।

       एक महापुरुष का कथन है कि - "आँधी के झोंके से टूट कर गिरे हुए वृक्ष में फिर उठने की शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार निराशा के भार से दबा हुआ मनुष्य अपाहिज बन जाता है।

       आत्मविश्वास का अभाव अन्य प्रकार के अभावों, अपने भाई-बन्धुओं को बुलाता है, जैसे कोई खाने की वस्तु मिलने पर कौंआ काँव-काँव करके अन्य कौओं को बुला लेता है।

       आत्मा को दुर्बल बनाने वाला, उत्साह को नष्ट करने वाला, सफलता के आसन पर विफलता को बिठाने वाला केवल एक ही शत्रु है, वह है आत्मविश्वास का अभाव।

       इस शत्रु से सावधान रहो! जब जरा सी उदासीनता या निराशा के भाव मन में उत्पन्न होने लगे, तो तुरन्त सावधान हो जाओ! अपने आत्मा को समझो! जैसे ही तुम अपनी महान शक्ति को पहचानते हो, वैसे ही कमजोरी के विचार स्वयमेव चले जाते हैं। 

       उस उदासीन मनुष्य को देखो! जड़ कटे हुए पौधे की तरह सिर झुकाये और आँखें नीची किये हुए खड़ा है। क्या अपने लिए तुम ऐसी ही स्थिति  पसन्द करोगे?

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मार्च 1941 पृष्ठ 23