Tuesday, August 31, 2021

सँगठित रहो सशक्त रहो और धर्म की रक्षा करो

 *🚩सँगठित रहो सशक्त रहो और धर्म की रक्षा करो

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*✍️अत्यंत प्रेरणादायक, अवश्य पढ़ें और विचार करें*

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*♦️एक आदमी था, जो हमेशा अपने संगठन में सक्रिय रहता था उसको सभी जानते थे बड़ा मान सम्मान मिलता था, अचानक किसी कारण वश वह निश्क्रिय रहने लगा , मिलना - जुलना बंद कर दिया ,और संगठन से दूर हो गया।*


*♦️कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया । मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक बोरसी में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था। उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।*


*♦️दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे। कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले, उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे उठाकर किनारे पर रख दिया। और फिर से शांत बैठ गया।*


*♦️मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है। लेकिन उसने देखा कि अलग की हुए लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है। कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा। उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।*


*♦️कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।*


*♦️इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया, कम से कम शब्द बोले। जानें से पहले मुखिया ने अलग की हुई बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया। वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी, और चारों ओर रोशनी और ताप बिखेरने लगी।*


*♦️जब आदमी, मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से कहा मेरे घर आकर मुलाकात करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है। कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता, संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी बिखेरता है संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।*


*✊मित्रों संगठन से ही हमारी पहचान बनती है इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए ।* 

*संगठन के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण किसी व्यक्ति के लिए नहीं, उससे जुड़े विचार के प्रति होनी चाहिए ।*

जीवन एक संग्राम है और खेल भी है।

 जीवन एक संग्राम है और खेल भी है।

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       जैसे संग्राम में थोड़ी सी असावधानी घातक होती है, उसी प्रकार जीवन में भी थोड़ी सी भी असावधानी घातक होती है। संग्राम में जैसे बहादुरी की आवश्यकता है, उसी प्रकार जीवन में भी बहादुरी की आवश्यकता है। 

       संग्राम में जैसे विपक्षी धोखा देने की कोशिश करता है, उसी प्रकार दुनियाँ में भी लोग धोखा देने की कोशिश करते हैं। इसलिए संग्राम में और जीवन में चौकन्ना रहने की जरूरत है। 

       संग्राम में जैसे संगठन और अनुशासन जरूरी है, उसी प्रकार जीवन में भी संगठन और अनुशासन बहुत जरूरी है। 

      इन या ऐसी ही बातों के कारण जीवन संग्राम है, पर जीवन की संग्रामता का यह मतलब नहीं है कि यह मनुष्य-मनुष्य का युद्ध है। वास्तव में यह मनुष्य और शैतान का युद्ध है।

जीवन एक खेल है।

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       खेल पराजय के लिए नहीं खेला जाता, प्रसन्नता के लिए खेला जाता है। जीवन भी प्रसन्नता के लिए है, इसमें हार जीत का कोई सवाल नहीं है। खिलाड़ी लड़ते हैं पर वे प्रेम नहीं तोड़ते। जीवन से लड़ो और प्रेम न तोड़ो। 

     खेल में बेईमानी करने से जो कुछ मिलता है उससे कई गुना गुम जाता है, खेल का प्राण ही निकल जाता है। जीवन में भी यही बात है। जो जीवन को खेल समझ सकते हैं। वही मुक्त हैं।

(संकलित व सम्पादित)

- अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 2

शक्ति के भंडार से स्वयं को जोडे!

 शक्ति के भंडार से स्वयं को जोडे!

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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।


देवियो, सज्जनो!


मनुष्य की सामान्य शक्ति सीमित है। प्रत्येक प्राणी को भगवान ने इतना ही सामान दिया है कि वह अपने जीवन का गुजारा कर ले। कीड़ों-मकोड़ों और पशु-पक्षियों को सिर्फ इतना ही ज्ञान, साधना, शक्ति और इंद्रियाँ मिली हैं, ताकि वे अपना पेट भर लें और प्रकृति की इच्छा पूरी करने के लिए अपनी औलाद पैदा करते रहें। इससे ज्यादा कुछ उनके पास है नहीं, लेकिन आपके पास है। अगर आपको इससे कुछ ज्यादा जानना और प्राप्त करना है, तो आपको वहाँ जाना पड़ेगा, जहाँ शक्तियों के भांडागार भरे पड़े हैं। एक जगह ऐसी भी है जहाँ बहुत शक्ति भरी पड़ी है, जहाँ संपत्तियों का कोई ठिकाना नहीं। जहाँ समृद्धि की अनंत शक्ति है। सारे विश्व का मालिक कौन है? भगवान। यह उसी का तो सामान है जिससे उन्होंने दुनिया को बना दिया। यहाँ जो कुछ भी वैभव आप देखते हैं, वह भगवान के भंडार का एक छोटा सा चमत्कार है। पृथ्वी के अलावा और भी लोक हैं। उन सबमें भी भगवान का भंडार भरा पड़ा हुआ है। बड़ा संपत्तिवान है भगवान। आपको यदि संपत्तियों की, सफलताओं की, विभूतियों की जरूरत है, तो अपना पुरुषार्थ इस काम में खरच करिए कि उस भगवान के साथ में अपना रिश्ता बना लीजिए। उसके साथ जुड़ने में अगर आप समर्थ हो सकें, तो यह सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा। आप भगवान के साथ में अपना रिश्ता बना लें तो मजा आ जाए।


मालदार आदमी से रिश्ता बना लेने पर क्या हो सकता है? लालबहादुर शास्त्री का नाम सुना है आपने, वे बिलकुल एक छोटे से आदमी थे, लेकिन पंडित नेहरू के साथ में उन्होंने अपने घनिष्ठ संबंध बना लिए जिसकी वजह से वे एम. पी. हो गए। उनकी सहायता से वे यूपी के मिनिस्टर भी हो गए और फिर मरने के पश्चात उनके उत्तराधिकारी भी हो गए। बहुत शानदार थे लालबहादुर शास्त्री, यह उनके अपने पुरुषार्थ का उतना फल नहीं था, जितना कि नेहरू जी के सहयोग का। उनकी निगाह में उनकी इज्जत जम गई थी। उन्होंने देख लिया था कि यह आदमी बड़ा उपयोगी है, उसकी सहायता करनी चाहिए। उसकी सहायता से उनने भी लाभ उठाया, इसलिए पंडित नेहरू ने उनकी भरपूर सहायता की। ठीक यही बात हर जगह लागू होती है। भगवान एक सर्वशक्तिमान सत्ता है। उसके साथ अगर आप अपना संबंध जोड़ लें, तब आपकी मालदारी का कोई ठिकाना न रहेगा, तब आप इतने संपन्न हो जाएँगे कि मैं आपसे क्या-क्या कहूँ? आप बापा जलाराम के तरीके से संपन्न हो सकते हैं, आप सुदामा के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं, विभीषण और सुग्रीव के तरीके से मुसीबतों से बचकर के फिर से अपना खोया हुआ राजपाट पा सकते हैं। नरसी मेहता के तरीके से हुंडी भी आप पर बरस सकती है। यहाँ कुछ कमी है क्या? यहाँ कोई कमी नहीं है। इसलिए यहाँ जो आपको बुलाया गया है, उसका एक कारण यह भी है कि आप से कहा जाए कि आप भगवान से रिश्ता जोड़ लें। आप जो पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, उसका मतलब यह है कि आप इन उपायों के माध्यम से अपना रिश्ता भगवान से जोड़ लें। एक गरीब घर की लड़की की यदि किसी मालदार पति के साथ में शादी हो जाए तो वह दूसरे ही दिन से उसकी मालकिन हो जाती है, क्योंकि उसने उससे रिश्ता मिला लिया।

Monday, August 30, 2021

गायत्री उपासना−एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

 गायत्री उपासना−एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

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सद्बुद्धिदायिनी, एकमुखी, प्रथम स्तरीय गायत्री उपासना को भारतीय धर्म में प्रत्येक मनुष्य का एक अत्यन्त आवश्यक अनिवार्य नित्य−कर्म माना गया है। जिस प्रकार शौच,स्नान,भोजन,शयन आदि नित्य−कर्म न करने से शारीरिक स्वास्थ्य सन्तुलन नष्ट होता है उसी प्रकार गायत्री उपासना के अभाव में उस सद्बुद्धि से भी वंचित रहना पड़ता है जो हमारे गुण कर्म और स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्यक है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति के दो पहियों की गाड़ी पर ही हमारा सर्वांगपूर्ण जीवन विकास निर्भर रहता है। इसमें से एक अंग की उपेक्षा करने पर हमारी वही स्थिति हो जाती है जो लंगड़े, काने एवं आधे शरीर में लकवा मारे हुए रोगी की होती है। मोटर का एक पहिया यदि चलते−चलते निकल पड़े तो उसके उलट जाने की दुर्घटना हो जायगी। हमारी भौतिक समृद्धि तो बढ़ती जा रही है पर आध्यात्मिक स्तर गिरी पड़ी स्थिति में ही बना हुआ है ऐसी दशा में मोटर उलटने जैसी दुर्घटनाओं का दुखद दृश्य हमें अपने जीवनों में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। किन्तु जब यह गलती सुधार ली जाती है तो बिगड़े काम को बना लेने वाले बुद्धिमानों की तरह हम पुनः एक सुव्यवस्थित जीवन क्रम को विकसित हुआ देखते हैं।


हमारा व्यक्तिगत अनुभव

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हमें अपने व्यक्तिगत जीवन का प्रायः सारे का सारा ही समय गायत्री की शोध, अन्वेषण और साधन करने में लगा देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस महाविद्या के संबन्ध में शास्त्रों में क्या लिखा है यह जानने के लिए प्रायः दो हजार प्रमुख धर्म ग्रन्थों को पढ़ा है। पढ़कर उनका सार−संग्रह किया है। सम्पूर्ण भारत के कोने−कोने में इस विद्या के ज्ञाता मनीषियों और साधना संलग्न तपस्वियों की खोज की है,उनके चरण धो−धोकर उनके अनुभव का सार एकत्रित किया है। स्वयं भी अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय एकनिष्ठ भाव से उसी उपासना में लगाया है। इतने प्रयास का निचोड़ यह निकाला है कि गायत्री उपासना में लगाये हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई न कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सान्निध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।


गायत्री उपासना का सीधा प्रभाव साधक की अन्तरात्मा पर सात्विकता की अभिवृद्धि के रूप में पड़ता है। उसके मनः क्षेत्र में समाया हुआ तमो−गुण,असुरत्व,तत्क्षण घटना आरम्भ हो जाता है। अपने दोष दुर्गुण देखने और समझने की क्षमता उसमें जागृत होती है, साथ ही कुकर्मों के प्रति घृणा करने और सत्कर्मों की ओर आकर्षित होने का स्वभाव भी अनायास ही बनने लगता है। बहुत पढ़ने और सुनने से भी जिन लोगों ने अपने ऊपर कोई प्रभाव ग्रहण नहीं किया था उनका मन इस उपासना के द्वारा स्वयं ही द्रवित हुआ है और उस आन्तरिक परिवर्तन के कारण बाहरी जीवन में आश्चर्यजनक हेर−फेर दिखाई देने लगा है। आत्म−सुधार की प्रक्रिया में गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व देखकर ही प्राचीन काल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्व साधारण के लिए एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य घोषित किया था।


अन्तः प्रेरणा का विकास और प्रकाश

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हमें अपने व्यक्तिगत सम्पर्क में आये हुए ऐसे हजारों व्यक्तियों का पता है जिन्होंने गायत्री उपासना आरम्भ करने के बाद अपने विचार और कार्यों में कायाकल्प जैसा परिवर्तन किया। जो लोग माँस खाते थे, नशेबाजी की लत जिन्हें बुरी तरह घेरे हुए थी, शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, चरस, तम्बाखू के जो गुलाम बने हुए थे, उनमें से किसी ने एक बारगी, किसी ने धीरे−धीरे इन्हें बिना किसी बाहरी दबाव या उपदेश के अपने आप ही छोड़ दिया। उनके भीतर से ही कुछ ऐसी प्रेरणा और घृणा उत्पन्न हुई जिसके कारण उन्हें इन सत्यानाशी दुर्व्यसनों को अनायास ही छोड़ देने का सुअवसर मिल गया। जुआ, सट्टा, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट आदि के द्वारा भारी कमाई करने वाले लोगों में से कितनों ने ही बुराइयों को सर्वांश में अथवा बहुत अंश में परित्याग कर दिया और गरीबी एवं सादगी का जीवन बिताते हुए कम खर्च में मितव्ययितापूर्वक हँसी खुशी एवं सन्तोष का जीवन बिताने लगे। गायत्री को माता−माता पुकारते रहने पर कितने ही व्यक्तियों की भावनाओं का ऐसा विकास हुआ कि उन्हें नारी मात्र में माता की प्रतिमा घूमती हुई दिखाई देने लगी और पहले जो व्यभिचार और दुराचार की दिशा में मन दौड़ा करता था वह मार्ग बिलकुल ही अवरुद्ध हो गया। अश्लील साहित्य पढ़ने, गंदे चित्र देखने, गंदी आदतों में अपना शरीर निचोड़ने की जिन्हें बुरी लतें लगी हुई थीं उनकी यह बुराइयाँ गायत्री उपासना के प्रभाव से बड़ी सरलतापूर्वक छूटती देखी गई हैं। चढ़ते खून के किशोर और नव युवकों में ऐसे विचार बहुत करके देखे जाते हैं। हमारा सुनिश्चित मत है कि उसकी मानसिक स्थिति स्वच्छ करने में गायत्री उपासना जादू जैसा काम करती है।


स्नेह सौजन्य की अभिवृद्धि

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जिन घरों में द्वेष, क्लेश, कलह और संघर्ष का वातावरण बना रहता था, परिवार के हर सदस्य को मन मुटाव की स्थिति में देखा जाता था, उन घरों में गायत्री का प्रवेश हुआ, सब लोग थोड़ी−थोड़ी उपासना करने लगे, तो कुछ ही दिनों में परिस्थितियाँ ही बदल गईं। द्वेष का स्थान प्रेम ने ले लिया और सब लोग स्नेह सहयोग पूर्वक मिल−जुल कर रहने लगे। कितने ही ऐसे लोगों को हम जानते हैं जो आये दिन बीमार रहते थे, कोई न कोई रोग उन्हें घेरे ही रहता था। शारीरिक कष्ट, अशक्तता, उपार्जन में असमर्थता और दवादारू में बढ़ते हुए खर्च के कारण उन्हें निरन्तर चिन्ता घेरे रहती थी, पर जब उन्होंने गायत्री उपासना आरंभ की तो यह दवा उन सबसे अधिक अचूक सिद्ध हुई जो उनने बहुत पैसा खर्च करके खरीदी थीं। किसी भी अनुभवी डाक्टर की अपेक्षा यह उपासना क्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। कारण स्पष्ट है, गायत्री की उपासना से व्यक्ति के अन्तःकरण में सात्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबन्ध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।


अभाव एवं आपदाओं का समाधान

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आर्थिक कठिनाई, सन्तान का अभाव, बीमारी, मुकदमा, शत्रुओं का प्रकोप, कुसमय, स्वजनों से मनोमालिन्य, प्रयत्नों में असफलता, आकस्मिक दुर्दैव, द्वेष, दुर्भाव, चिन्ता, निराशा, शोक संतापों में ग्रसित व्यक्तियों को गायत्री उपासना की सलाह मान लेने के लिए यदि कभी तैयार कर लिया गया है तो उसका परिणाम आशाजनक ही निकला है। प्रस्तुत कठिनाइयों का किसी न किसी मार्ग से आशाजनक समाधान हुआ है। श्रद्धा, भावना की दृष्टि से विचार करने वाले इसे मंत्र शक्तिया माता की कृपा मानते हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनके अपने विचार व्यवहार में ऐसा हेर-फेर हो गया होता है जिसके कारण गुत्थियों के सुलझने और कठिनाइयों के हल होने का उपाय सहज ही बन पड़ता है। अशान्त और उद्विग्न मन रहने पर अपने विचार और कार्य अस्त-व्यस्त रहते हैं, उत्तेजित और असंतुलित मन यह सोच नहीं पाता कि प्रस्तुत कठिनाइयों का सही हल क्या हो सकता है। गायत्री उपासना के प्रभाव से जब आत्मबल बढ़ता है, सद्बुद्धि का प्रकाश अन्तःकरण में उत्पन्न होता है तो कठिनाई को पार करने का उचित मार्ग सूझ पड़ता है, इतना ही नहीं उस पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है। उचित मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को पार कर सकता है, बड़ी से बड़ी उलझनें सुलझा सकता है फिर छोटी-माटी समस्याओं का हल होना तो कठिन ही क्या है?


दिव्य विभूति को दिव्य अनुभूति

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सद्बुद्धि को कल्पलता कहा गया है। जिस मस्तिष्क में उसे स्थान मिल जायेगा, वहाँ पुष्पवाटिका जैसी महक उठती रहेगी और चित्त को आह्लादित करने वाली धारा प्रवाहित होती रहेगी। चंदन का वृक्ष अपने आस-पास के पौधों को सुगन्धित बना लेता है। सन्तुलित मस्तिष्क चन्दन वृक्ष से बढ़ कर है वह स्वयं तो शान्ति की सुगन्ध प्राप्त करता ही है, अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य अगणित मस्तिष्कों को भी सन्मार्गगामी बना देता है। गायत्री उपासना का प्रभाव मनः क्षेत्र के शाँत, स्वस्थ और प्रगतिशील बनाने में वही काम करता है जो वनस्पतियों के लिए वर्षा का जल किया करता है। कहते हैं कि ‘नाग दमन’ बूटी की गन्ध पाकर वहाँ से साँप बहुत दूर भाग जाते हैं। कुविचारों और दुर्भावनाओं के साँपों को दूर भगाने के लिए गायत्री उपासना को एक उच्च कोटि की ‘नाग दमन’ बूटी कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। अनुपयुक्त कामनाओं को हटाकर चित्त को तृष्णा और वासना से रहित बना देना या सन्तोष उत्पन्न करने वाला वातावरण, जहाँ गायत्री उपासना उत्पन्न करती है वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती। गायत्री को कामधेनु इसीलिए कहा गया है। इसका श्रद्धा पूर्वक पयपान करने के उपरान्त कोई अतृप्ति शेष नहीं रह जाती।


आन्तरिक दुर्बलताओं और त्रूटियों के कारण ही मनुष्य का साँसारिक जीवन अभावग्रस्त, अविकसित एवं अशान्त रहता है। भीतर की कमजोरी ही बाहर दीनता और हीनता के रूप से दृष्टिगोचर होती है। आत्मघाती लोग ही इस संसार में तिरस्कृत अवांछित घृणित उपेक्षित और असफल रहते हैं। जिसके भीतर आत्मबल भरा होगा, जिसके अन्तर में प्रकाश उठ रहा होगा उसके बाह्य जीवन का प्रत्येक क्षेत्र, आशा उत्साह, स्फूर्ति, तेजस्विता और पुरुषार्थ से परिपूर्ण दिखाई देगा। भीतरी बल की आभा को बाहर प्रकट होने से कोई आवरण रोक नहीं सकता। गरीबी, अस्वस्थता एवं विपन्न परिस्थितियों में पड़े हुए होने पर भी मनस्वी व्यक्ति अपनी महानता की प्रभा फैलाते रहते हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा क्षणिक ही हो सकती है, चिरस्थायी नहीं। व्यक्ति का विकसित व्यक्तित्व ही वस्तुतः उसकी सच्ची सम्पत्ति सिद्ध होती है। यह सम्पत्ति जिसके पास मौजूद है उसे न तो दरिद्र कहा जा सकता है और न असफल। बादलों के टुकड़े चन्द्रमा को देर तक कहाँ छिपाये रहते हैं? विपन्नता किसी मनस्वी व्यक्ति को दुर्दशाग्रस्त स्थिति में देर तक कहाँ पड़ा रख सकती है? जहाँ आत्मबल होगा वहाँ कोई भी अभाव, चाहे वह व्यक्तिगत हो अथवा साँसारिक अधिक समय तक टिक नहीं सकेगा। गायत्री उपासना मनुष्य के व्यक्तित्व, आन्तरिक स्तर और आत्मबल को बढ़ाती है, जिससे उसकी सुख−शान्ति और समृद्धि का मार्ग हर दिशा में प्रशस्त होता है।


उपासना एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

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हमारे नित्य कर्म में जिस प्रकार स्नान, भोजन श्रम−विश्राम आवश्यक हैं उसी प्रकार गायत्री उपासना के लिए एक छोटा समय भाग नियत रहना चाहिये। सद्बुद्धि से बढ़कर और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं। जब कि साधारण मूल्य वाली वस्तुओं के उपार्जन के लिए हम इतना श्रम करते हैं तो क्या हमें इस धरती की सबसे श्रेष्ठ सम्पदा का उपार्जन करने के लिए कुछ भी समय न लगाने की हठ पर ही अड़ा रहना उचित है? गायत्री के प्रथम स्तर जिसमें जप, अनुष्ठानों, बीज मंत्रों और अमुक विधि−विधानों की आवश्यकता होती है, सर्व साधारण के लिए सरल है। इसमें कोई भूल रहने पर भी हानि की संभावना नहीं रहती। थोड़ा करने या विधि−विधान की पूरी जानकारी न होने पर लाभ भले ही थोड़ा मिले पर हानि या प्रतिकूल फल की तो किसी भी दशा में कोई आशंका नहीं रहती। मानव प्राणी में मानवता की विशेषता को बढ़ाने वाली इस आध्यात्म−विज्ञान सम्मत परम श्रेयस्कर प्रक्रिया को हममें से प्रत्येक को किसी न किसी रूप में अपनाना ही चाहिए। दैनिक जीवन का एक आवश्यक धर्म−कर्तव्य समझ कर उसे अपने नित्य−कर्म में उचित स्थान देना ही चाहिये।

भगवान आते है मगर हम उनको पहचान नहीं पाते !

 भगवान आते है मगर हम उनको पहचान नहीं पाते !

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एक ब्राह्मण था, कृष्ण के मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था। उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता। भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता। एक दिन घर में लड्डू बने। ब्राह्मण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। 

पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी,"कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। अबकी बार बिना खिलाए ना लौटना, देखती हूं, कैसे भगवान खाने आते हैं!"

बस, ब्राह्मण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। मंदिर में जाकर धूनि लगा ली। भगवान के सामने लड्डू रखकर विनती करने लगा। एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, ना तो भगवान आए ना ब्राह्मण हटा। आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई। सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है!

मक्खियां भिनभिनाने लगी, ब्राह्मण उन्हें उड़ाता रहा। मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं। ब्राह्मण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे। ब्राह्मण ने उनको भी खदेड़ा। लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। 

दिन ढल गया, शाम हो गई। ना भगवान आए, ना ब्राह्मण उठा। शाम से रात हो गई। लोगों ने सोचा, ब्राह्मण देवता पागल हो गए हैं, भगवान तो आने से रहे। 

धीरे-धीरे सब घर चले गए। ब्राह्मण को भी गुस्सा आ गया। लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। भिखारी, कुत्ते, चींटी, मक्खी तो दिनभर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े। उदास ब्राह्मण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। इतने सालों की सेवा बेकार चली गई। कोई फल नहीं मिला। ब्राह्मण पत्नी के ताने सुनकर सो गया। 

रात को सपने में भगवान आए। बोले-"तेरे लड्डू खाए थे मैंने। बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता। कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए। मक्खी, चींटी, कुत्ता, भिखारी। पर तूने हाथ नहीं धरने दिया। दिन भर इंतजार करना पड़ा। आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी। अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना।"

भगवान चले गए। 

ब्राह्मण की नींद खुल गई। उसे एहसास हो गया। भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया। बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।

मुझ में राम, तुझ में राम सब में है राम समाया,

सबसे कर लो प्रेम जगत में, कोई नहीं पराया।

प्रारब्ध

 प्रारब्ध

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    एक गुरूजी थे । हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करते थे । काफी बुजुर्ग हो गये थे । उनके कुछ शिष्य साथ मे ही पास के कमरे मे रहते थे ।


     जब भी गुरूजी को शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वे अपने शिष्यो को आवाज लगाते थे और शिष्य ले जाते थे ।


    धीरे धीरे कुछ दिन बाद शिष्य दो तीन बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आते कभी और भी देर से आते ।


    एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही गुरूजी आवाज लगाते है, तुरन्त एक बालक आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ गुरूजी को निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।


    एक दिन गुरूजी को शक हो जाता है कि, पहले तो शिष्यों को तीन चार बार आवाज लगाने पर भी देर से आते थे । लेकिन ये बालक तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है ।


    एक दिन गुरूजी उस बालक का हाथ पकड लेते है और पूछते कि सच बता तू कौन है ? मेरे शिष्य तो ऐसे नही हैं ।


    वो बालक के रूप में स्वयं ईश्वर थे; उन्होंने गुरूजी को स्वयं का वास्तविक रूप दिखाया।


     गुरूजी रोते हुये कहते है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना ।


     प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।


     गुरूजी कहते है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ।


     प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।


     ईश्वर कहते है: प्रारब्ध तीन तरह के होते है । मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम ।

मन्द प्रारब्ध मेरा नाम जपने से कट जाते है । तीव्र प्रारब्ध किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है । पर तीव्रतम प्रारब्ध भुगतने ही पडते है।

लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ ।


  *प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।*

  *तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर।।*

Sunday, August 29, 2021

ईश्वर की नहीं अपनी फिक्र करो

 👉 ईश्वर की नहीं अपनी फिक्र करो!

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🔵  ईश्वर को खोजते लोग मेरे पास आते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि ईश्वर तो प्रतिक्षण और प्रत्येक स्थान पर है। उसे खोजने कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं। जागो और देखो और जागकर जो भी देखा जाता है, वह सब परमात्मा ही है।


🔴  सूफी कवि हफीज अपने गुरु के आश्रम में था। और भी बहुत से शिष्य वहाँ थे। एक रात्रि गुरु ने सारे शिष्यों को शाँत ध्यानस्थ हो बैठने को कहा। आधी रात गए गुरु ने धीमे से बुलाया-’हफीज’! सुनते ही तत्क्षण हफीज उठ कर आया। गुरु ने जो उसे बताना था, बताया। फिर थोड़ी देर बाद उसने किसी और को बुलाया लेकिन आया हफीज ही। इस भाँति दस बार उसने बुलाया लेकिन बार-बार आया हफीज ही क्योंकि शेष सब तो सो रहे थे।


🔵  परमात्मा भी प्रतिक्षण प्रत्येक को बुला रहा है- सब दिशाओं से, सब मार्गों से उसकी आवाज आ रही है लेकिन हम तो सोए हुए हैं। जो जागता है, वह उसे सुनता और जागता है केवल वही उसे पाता है।


🔴  इसलिए मैं कहता हूँ कि ईश्वर की फिक्र मत करो। उसकी चिन्ता व्यर्थ है। चिन्ता करो स्वयं को लगाने की। निद्रा में जो हम जान रहे हैं वह ईश्वर का ही विकृत रूप है। यह विकृत अनुभव ही संसार है। जागते ही संसार नहीं पाया जाता है और जो पाता है वही सत्य है।


🌹 अखण्ड ज्योति 1967 फरवरी पृष्ठ 1

प्राणशक्ति एक-जीवंत ऊर्जा

 ऋषि चिंतन

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प्राणशक्ति एक-जीवंत ऊर्जा

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👉 पनडुब्बे गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं । बहुमूल्य खनिज प्राप्त करने के लिए धरती को गहराई तक खोदते जाने और उस विभीषिका के मुख में प्रवेश करने का साहस जुटाना पड़ता है । *अपनी प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने के लिए अन्तश्चेतना की गहरी परतों में उतरने के लिए "अद्भुत धैर्य" और "अविचल प्रयत्न" करने होते हैं ।* यह सब अनायास ही नहीं हो जाता, वरन् अग्निपरीक्षा में गुजरने पर ही सफलता का श्रेय प्राप्त होता है । 


👉 *सोते सर्प और सोते सिंह को जगाने में जितना पराक्रम चाहिए, उतना ही अन्तश्चेतना के सूक्ष्म संस्थानों को जगाते समय भी चाहिए ।* वन्य पशुओं को पालतू और प्रशिक्षित करना धैर्यवान लोगों का काम है । मरुथल को उर्वर बनाने के लिए दूरदर्शिता, अथक श्रमशीलता और साधन सामग्री जुटानी पड़ती है । अनगढ़ व्यक्ति को सुगढ़ और सुसंस्कृत बनाने के लिए कलाकारों जैसा कौशल विकसित करना पड़ता है । *शत्रु को मित्र बना लेने की प्रशंसा होती है ।* 


👉 अनर्थ में संलग्न विकृत कुसंस्कारों को आमूलचूल परिवर्तित कर श्रेय साधक बना देना विष से अमृत निकालने के समतुल्य है । *ऐसे मार्ग पर चलने के लिए अजस्र प्राण-शक्ति चाहिए ।* 


👉 *अध्यात्म साधनाओं में "प्राणमय कोश" को जाग्रत करके प्रचंड आत्मबल संचय करने की आवश्यकता इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बताई गई है ।*

सँगठित रहो सशक्त रहो और धर्म की रक्षा करो

 *🚩सँगठित रहो सशक्त रहो और धर्म की रक्षा करो

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*✍️अत्यंत प्रेरणादायक, अवश्य पढ़ें और विचार करें*

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*♦️एक आदमी था, जो हमेशा अपने संगठन में सक्रिय रहता था उसको सभी जानते थे बड़ा मान सम्मान मिलता था, अचानक किसी कारण वश वह निश्क्रिय रहने लगा , मिलना - जुलना बंद कर दिया ,और संगठन से दूर हो गया।*


*♦️कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया । मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक बोरसी में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था। उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।*


*♦️दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे। कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले, उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे उठाकर किनारे पर रख दिया। और फिर से शांत बैठ गया।*


*♦️मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है। लेकिन उसने देखा कि अलग की हुए लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है। कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा। उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।*


*♦️कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।*


*♦️इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया, कम से कम शब्द बोले। जानें से पहले मुखिया ने अलग की हुई बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया। वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी, और चारों ओर रोशनी और ताप बिखेरने लगी।*


*♦️जब आदमी, मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से कहा मेरे घर आकर मुलाकात करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है। कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता, संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी बिखेरता है संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।*


*✊मित्रों संगठन से ही हमारी पहचान बनती है इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए ।* 

*संगठन के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण किसी व्यक्ति के लिए नहीं, उससे जुड़े विचार के प्रति होनी चाहिए ।*

Saturday, August 28, 2021

आत्मा को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक परमाणु गतिशील हैं।

 आत्मा को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक परमाणु गतिशील हैं।

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🔴 मन के तीनों अंग-प्रवृत्त मानस, प्रबुद्घ मानस, आध्यात्मिक मानस भी अपने स्वतंत्र प्रवाह रखते हैं अर्थात् यों समझना चाहिए कि-


'नित्यः सर्वगतः स्थाणु रचलोऽयं सनातनः।' 


आत्मा को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक परमाणु गतिशील हैं। यह सब वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थानों को चलती रहती हैं। जिस प्रकार शरीर के पुराने तत्त्व आगे बढ़ते और नये आते रहते हैं, उसी प्रकार मानसिक पदार्थों के बारे में भी समझना चाहिए। उस दिन आपका निश्वय था कि आजीवन ब्रह्राचारी रहूँगा, आज विषय भोगों से नहीं अघाते। उस दिन निश्चय था अमुक व्यक्ति की जान लेकर अपना बदला चुकाऊँगा, आज उनके मित्र बने हुए हैं। उस दिन रो रहे थे कि किसी भी प्रकार धन कमाना चाहिए, आज सब कुछ त्याग कर सन्यासी हो रहे हैं। ऐसे असंख्य परिवर्तन होते रहते हैं। क्यों? इसलिए कि पुराने विचार चले गये और नये उनके स्थान पर आ गए।


🔵 विश्व की दृश्य-अदृश्य सभी वस्तुओं की गतिशीलता की धारणा, अनुभूति और निष्ठा यह विश्वास करा सकती है कि सम्पूर्ण संसार एक है। एकता के आधार पर उसका निर्माण है। मेरी अपनी वस्तु कुछ भी नहीं है या सम्पूर्ण वस्तुएँ मेरी हैं। तेज बहती हुई नदी के बीच धार में तुम्हें खड़ा कर दिया जाए और पूछा जाए कि पानी के कितने और कौन से परमाणु तुम्हारे हैं, तब क्या उत्तर दोगे? विचार करोगे कि पानी की धारा बराबर बह रही है। पानी के जो परमाणु इस समय मेरे शरीर को छू रहे हैं, पलक मारते-मारते बहुत दूर निकल जायेंगे। जल-धारा बराबर मुझसे छूकर चलती जा रही है, तब या तो सम्पूर्ण जल धारा को अपनी बनाऊँ या यह कहूँ कि मेरा कुछ भी नहीं है, यह विचार कर सकते हो।


🔴 संसार जीवन और शक्ति का समुद्र है। जीव इसमें होकर अपने विकास के लिए आगे को बढ़ता जाता है और अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ लेता और छोड़ता जाता है। प्रकृति मृतक नहीं है। जिसे हम भौतिक पदार्थ कहते हैं, उसके समस्त परमाणु जीवित हैं। वे सब शक्ति से उत्तेजित होकर लहलहा, चल, सोच और जी रहे हैं। इसी जीवित समुद्र की सत्ता के कारण हम सबकी गतिविधि चल रही है। एक ही तालाब की हम सब मछलियाँ हैं। विश्व व्यापी शक्ति, चेतना और जीवन के परमाणु विभिन्न अभिमानियों को झंकृत कर रहे हैं।


🌹 क्रमशः जारी

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

जीवन की सार्थकता और निरर्थकता

 👉 जीवन की सार्थकता और निरर्थकता

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🔵 शरीर की दृष्टि से मनुष्य की सत्ता नगण्य है। इस तुलना में तो वह पशु-पक्षियों से भी पिछड़ा हुआ है। अन्य जीवों में कितनी ही विशेषतायें ऐसी हैं जिन्हें मनुष्य ललचाई दृष्टि से ही देखता रह सकता है।


🔴 मानवीय महत्ता उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता में सन्निहित है। जिसकी आस्थाओं का स्तर ऊंचा है, जो दूरदर्शिता और विवेकशीलता के साथ हर समस्या को सोचता और समझता है वही सच्चे अर्थों में मनुष्य है। गुण, कर्म, स्वभाव की महानता ही व्यक्तित्व को ऊंचा उठाती है और उसी के आधार पर किसी को सफल एवं सार्थक जीवन व्यतीत करने का अवसर मिलता है।


🔵 जीवन उसी का धन्य है जिसने अपनी आस्थाओं को ऊंचा उठाया और सत्कर्मों में समय लगाया। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य इसीलिए बड़ा है कि वह अपने आन्तरिक बड़प्पन का परिचय दें। जो इस दृष्टि से पिछड़ा रहा-उसने नर-तन के सौभाग्य को निरर्थक ही गंवा दिया।


🌹 ~स्वामी विवेकानन्द

🌹 अखण्ड ज्योति 1967 मार्च पृष्ठ 1

विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक

 🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

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🔵  प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने के बराबर है। सभी मतवादी अपने मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानो उनका विश्वास ही एकमात्र सत्य है। इसका अर्थ हुआ कि अन्य मतावलम्बी झूठे हैं, जिस एक को सत्य माना जाय वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है। फिर परस्पर घोर विपरीतता लिए हुए प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता। वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था।


🔴  इस कहानी में यह बात नहीं है कि एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग-अलग प्रकार का बताया था, यहां तो यही होता देखा जा सकता है। पशुबलि को ही लें, एक सम्प्रदाय को तो उसके बिना धर्म-कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है। दोनों ही अपनी-अपनी मान्यताओं पर कट्टर हैं, एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है, दूसरा निराकार। अपने-अपने पक्ष की कट्टरता के कारण अब तक असंख्यों बार रक्त की नदियां बहती रही हैं और विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता जानी जाती रही है।


🔵  समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा, अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली-नकली का समन्वय बेतरह भरा है। किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है? यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जांय तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन-नवीन का भेद न किया जाये तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा। वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा, ऐसे सार-संग्रह में विवेक को—तर्क-तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा।


🔵  देश, काल, पात्र के अनुसार विधानों में परिवर्तन होता रहता है। भारत जैसे अन्य बहुत से देशों में शाकाहार ही मान्य है, पर उत्तरी ध्रुव के निवासी एस्किमो अन्न कहां पायें? उन्हें तो मांसाहार पर ही जीवित रहना है। सर्दी और गर्मी में एक जैसे वस्त्र नहीं पहने जा सकते। पहलवान और मरीज की खुराक एक जैसी नहीं हो सकती। देश, काल, पात्र की भिन्नता से बदलती हुई परिस्थितियां, विधि-व्यवस्था बदलती रहती हैं। स्मृतियां इसी कारण समय-समय पर नये ऋषियों द्वारा नई बदलती रही हैं। इनमें परस्पर भारी मतभेद है, यह मतभेद सत्य की दिशा में बढ़ते हुए कदमों ने उत्पन्न किये हैं।


🔴  आज जो सत्य समझा जाता है वही भविष्य में भी समझा जायेगा—ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए। क्रमिक विकास की दिशा में बढ़ते हुए हमारे कदम अनेकों प्राचीन मान्यताओं को झुठला चुके हैं। सत्यान्वेषी दृष्टि बिना किसी संकोच और दुराग्रह के सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार रही है। यदि ऐसा न होता तो विज्ञान के क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं को समर्थन न मिला होता। प्राचीनकाल के वैज्ञानिकों की मान्यताओं और आज की मान्यताओं में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। फिर भी भूतकाल के मनीषियों की कोई अवज्ञा नहीं करता।


🔵  मान्यताओं-प्रथाओं का प्रचलन समय के अनुरूप निर्धारित किया और बदला जाता रहा है। जब कृषि योग्य भूमि बहुत और जनसंख्या कम थी, हिंस्रपशुओं और जन्तुओं को जोर था तब अधिक उत्पादन और अधिक सुरक्षा की दृष्टि से बहुपत्नी प्रथा प्रचलित हुई थी और बहुत बच्चे उत्पन्न होना सौभाग्य का चिन्ह था।


🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

Friday, August 27, 2021

त्रिपदा गायत्री- तीन धाराओं का संगम

 त्रिपदा गायत्री- तीन धाराओं का संगम

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गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। उसके तीन चरण हैं। उद्गम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशाधाराएँ जुड़ती हैं।


(१) सविता के भर्ग-तेजस् का वरण अर्थात् जीवन में ऊर्जा एवं आभा का बाहुल्य। अवाँछनीयताओं में अंत:ऊर्जा का टकराव। परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य-साहस इसी का नाम है। गायत्री के नैष्ठिक साधक में यह प्रखर प्रतिभा इस स्तर की होनी चाहिए कि अनीति के आगे न सिर झुकाये और न झुककर कायरता के दबाव में कोई समझौता करे।


(२) दूसरा चरण है-देवत्व का वरण, शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना, लेने की अपेक्षा देने की प्रवृत्ति का परिपोषण करना। उस स्तर के व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव-गरिमा की अन्तराल में अवधारणा करना। यही है ‘‘देवस्य धीमहि।’’


(३) तीसरा सोपान है- ‘‘धियो यो न: प्रचोदयात् ’’ । मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज व संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना-मेधा प्रज्ञा, दूरदर्शी विवेकशीलता, नीर-क्षीर विवेक में निरत बुद्घिमत्ता।


यही है आध्यात्मिक त्रिवेणी-संगम जिसका अवगाहन करने पर मनुष्य असीम पुण्यफल का भागी बनता है। कौए से कोयल एवं बगुले से हंस बन जाने की उपमा जिस त्रिवेणी संगम के स्नान से दी जाती है, वह वस्तुत: आदर्शवादी साहसिकता, देवत्व की पक्षधर शालीनता एवं आदर्शवादिता को प्रमुखता देने वाली महाप्रज्ञा है। गायत्री का तत्त्वज्ञान समझने और स्वीकारने वाले में ये तीनों ही विशेषताएँ न केवल पाई जानी चाहिए वरन् उनका अनुपात निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए। इस आस्था को स्वीकारने के उपरान्त संकीर्णता, कृपणता से अनुबन्धित ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि उससे प्रभावित होकर कोई दूसरों के अधिकारों का हनन करके अपने लिए अनुचित स्तर का लाभ बटोर सके-अपराधी या आततायी कहलाने के पतन-पराभव अपना सके।


नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक, भौतिक और आत्मिक , दार्शनिक एवं व्यावहारिक, संवर्धन एवं उन्मूलनपरक-सभी विषयों पर गायत्री के चौबीस अक्षरों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है और उन सभी तथ्यों तथा रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, जिनके सहारे संकटों से उबरा और सुख-शान्ति के सरल मार्ग को उपलब्घ किया जा सकता है। जिन्हें इस सम्बन्ध में रुचि है, वे अक्षरों के वाक्यों के विवेचनात्मक प्रतिपादनों को ध्यानपूर्वक पढ़ लें और देखें कि इस छोटे से शब्द-समुच्चय में प्रगतिशीलता के अतिमहत्त्वपूर्ण तथ्यों का किस प्रकार समावेश किया गया है। इस आधार पर इसे ईश्वरीय निर्देश, शास्त्र-वचन एवं आप्तजन-कथन के रूप में अपनाया जा सकता है। गायत्री के विषय में गीता का वाक्य है-गायत्री छन्दसामहम्’’। भगवान् कृष्ण ने कहा है कि ‘‘छन्दों में गायत्री मैं स्वयं हूँ,’’ जो विद्या-विभूति के रूप में गायत्री की व्याख्या करते हुए विभूति योग में प्रकट हुई हैं।

गायत्री का तत्त्वदर्शन और भौतिक उपलब्धियाँ

 गायत्री का तत्त्वदर्शन और भौतिक उपलब्धियाँ

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गायत्री-उपासना का सहज स्वरूप है-व्याहृतियों वाली त्रिपदा गायत्री का जप। ‘ॐ भूर्भुवः स्व:-’ यह शीर्ष भाग है, जिसका तात्पर्य है कि आकाश, पाताल और धरातल के रूप में जाने जाने वाले तीनों लोकों में उस दिव्यसत्ता को समाविष्ट अनुभव करना। जिस प्रकार न्यायाधीश और पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति में अपराध करने का कोई साहस नहीं करता, उसी प्रकार सर्वदा, सर्वव्यापी, न्यायकारी सत्ता की उपस्थित अपनी सब ओर सदा-सर्वदा अनुभव करना और किसी भी स्तर की अनीति का आचरण न होने देना। ‘ॐ’ अर्थात् परमात्मा। उसे विराट् विश्वब्रह्माण्ड के रूप में व्यापक भी समझा जा सकता है। यदि उसे आत्मसत्ता में समाविष्ट भर देखना हो तो स्थूल-शरीर सूक्ष्म-शरीर और कारण-शरीर में परमात्म सत्ता की उपस्थिति अनुभव करनी पड़ती है और देखना पड़ता है कि इन तीनों ही क्षेत्रों में कहीं ऐसी मलीनता न जुटने पाए, जिसमें प्रवेश करते हुए परमात्म सत्ता को संकोच हो, साथ ही इन्हें इतना स्वस्थ, निर्मल एवं दिव्यताओं से सुसम्पन्न रखा जाए कि जिस प्रकार खिले गुलाब पर भौंरे अनायास ही आ जाते हैं, उसी प्रकार तीनों शरीरों में परमात्मा की उपस्थिति दीख पड़े और उनकी सहज सदाशयता की सुगंधि से समीपवर्ती समूचा वातावरण सुगन्धित हो उठे।


गायत्री मंत्र का अर्थ सरल और सर्वविदित है- सवितु:-तेजस्वी वरेण्यं-वरण करना,अपनाना। भर्गो-अनौचित्य को तेजस्विता के आधार पर दूर हटा फेंकना। देवस्य-देवत्व की पक्षधर विभूतियों को-धीमहि अर्थात् धारण करना। अन्त में ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि इन विशेषताओं से सम्पन्न परमेश्वर हम सबकी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, सद्बुद्धि का अनुदान प्रदान करे। कहना न होगा कि ऐसी सद्बुद्धि प्राप्त व्यक्ति, जिसकी सद्भावना जीवन्त हो, वह अपने दृष्टिकोण में स्वर्ग जैसी भरी-पूरी मन:स्थिति एवं भरी-पूरी परिस्थितियों का रसास्वादन करता है। वह जहाँ भी रहता है, वहाँ अपनी विशिष्टताओं के बलबूते स्वर्गीय वातावरण बना लेता है।


स्वर्ग-प्राप्ति के अतिरिक्त दैवी अनुकम्पा का दूसरा लाभ है-मोक्ष मोक्ष अर्थात् मुक्ति। कषाय-कल्मषों से मुक्ति, दोष-दुर्गुणों से मुक्ति, भव- बन्धनों से मुक्ति। यही भव-बन्धन है, जो स्वतंत्र अस्तित्व लेकर जन्मे मनुष्यों को लिप्साओं और कुत्साओं के रूप में अपने बन्धनों में बाँधता है। यदि आत्मशोधनपूर्वक इन्हें हटाया जा सके, तो समझना चाहिए कि जीवित रहते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति हो गई। इसके लिए मरणकाल आने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। गायत्री की पूजा-उपासना और जीवन-साधना यदि सच्चे अर्थों में की गई हो, तो उसकी दोनों आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियाँ स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरन्तर अनुभव में उभरती रहती हैं और उनके रसास्वादन से हर घड़ी कृत-कृत्य हो चलने का अनुभव होता है।


गायत्री-उपासना द्वारा अनेकों भौतिक सिद्धियों एवं उपलब्धियों के मिलने का भी इतिहास पुराणों में वर्णित है। वशिष्ठ के आश्रम में विद्यमान नंदिनी रूपी गायत्री ने राजा विश्वामित्र की सहस्रों सैनिकों वाली सेना की कुछ ही पलों में भोजन-व्यवस्था बनाकर, उन सबको चकित कर दिया था। गौतम मुनि को माता गायत्री ने उस सबको चकित कर दिया था। गौतम मुनि को माता गायत्री ने अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिसके माध्यम से उन दिनों की दुर्भिक्ष-पीड़ित जनता को आहार प्राप्त हुआ था। दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराने वाले शृंगी ऋषि को गायत्री का अनुग्रह ही प्राप्त था, जिसके सहारे चार देवपुत्र उन्हें प्राप्त हुए। ऐसी ही अनेकों कथा-गाथाओं से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है, जिनमें गायत्री-साधना के प्रतिफलों की चमत्कार भरी झलक मिलती है।

अंतर की गहराई में उतरें

 ऋषि चिंतन

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अंतर की गहराई में उतरें

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👉 *विपत्ति और अतृप्ति से भरा नीरस जीवन यह बताता है कि अंतःकरण की गरिमा सूखने और झुलसने लगी है ।* जड़ें मजबूत और गहरी हो तो जमीन में से पेड़ के लिए पर्याप्त जीवन-रस प्राप्त कर लेती हैं और वह हरा-भरा बना रहता है । आंतरिक श्रद्धा यदि मर न गई हो तो अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सरसता और प्रफुल्लता खोजी जा सकती है । *उल्लास सुख-साधनों पर नहीं, उत्कृष्ट दृष्टिकोण पर निर्भर है ।* 


👉 यदि आनंद की आवश्यकता हो तो उसे बिना किसी पदार्थ या व्यक्ति की सहायता से प्रचुर परिमाण में पाया जा सकता है । *उसके लिए अपनी ही अंतरात्मा का परिशोधन करना पड़ता है ।* *"आंतरिक पवित्रता"* में इतना सौंदर्य और मिठास भरा रहता है कि उसके दर्शन पाने, करने तथा रसास्वादन करने से वह मिलता है, *जिसके अभाव में जीव को निरंतर भटकना ही पड़ता है 


👉 बाहर दौड़ने में पुरुषार्थ है । पुरुषार्थ कई तरह की सफलताएँ प्रस्तुत करता है । बड़प्पन की प्यास हो तो जल-जंगल छानने ही पड़ेंगे, *पर यदि महानता का देवत्व अभीष्ट हो तो तो उसके लिए भीतर की खोज करनी पड़ेगी ।* तृप्ति किसी पदार्थ में नहीं, *दृष्टिकोण की गरिमा में उसका स्रोत है ।* 


👉 *जीवन का आनंद लेना हो तो उसके लिए अंतर की गहराई में उतरने का, समुद्र तल से मोती ढूँढ लाने वाले जैसा साहस संजोना पड़ेगा ।*

हमने जीवन भर बोया एवं काटा

 हमने जीवन भर बोया एवं काटा

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हिमालय यात्रा से हरिद्वार लौटकर आने के बाद जब आश्रम का प्रारंभिक ढाँचा बनकर तैयार हुआ तो विस्तार हेतु साधनों की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। समय की विषमता ऐसी थी कि जिससे जूझने के लिए हमें कितने ही साधनों, व्यक्तित्वों एवं पराक्रमों की आवश्यकता अपेक्षित थी। दो काम करते थे- एक संघर्ष, दूसरा सृजन संघर्ष। उन अवांछनीयताओं से, जो अब तक की संचित सभ्यता, प्रगति और संस्कृति को निगल जाने के लिए मुँह बाए खड़ी हैं। सृजन उसका जो भविष्य को उज्ज्वल एवं सुख- शांति से भरा पूरा बना सके।


निज के लिए हमें कुछ भी न करना था। पेट भरने के लिए जिस स्रष्टा ने कीट पतंगों तक के लिए व्यवस्था बना रखी है, वह हमें क्यों भूखा रहने देगा। भूखे उठते तो सब हैं, पर खाली पेट सोता कोई नहीं। इस विश्वास ने निजी कामनाओं का आरंभ में ही समापन कर दिया। न लोभ ने कभी सताया और न मोह ने। वासना, तृष्णा और अहंता में से कोई भी भव बंधन बँधकर पीछे न लग सकी। जो करना था, भगवान के लिए करना था, गुरुदेव के निर्देशन पर करना था। उन्होंने संघर्ष और सृजन के दो ही काम सौंपे थे, सो उन्हें करने में सदा उत्साह ही रहा। टाल- मटोल करने की न प्रवृत्ति थी और न कभी इच्छा हुई। जो करना, सो तत्परता और तन्मयता से करना, यह आदत जन्मजात दिव्य अनुदान के रूप में मिली और अद्यावधि यथावत बनी रही।


जिन साधनों की नवसृजन के लिए आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिलें, कहाँ से आएँ? इस प्रश्न के उत्तर में मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि 'बोओ और काटो'। मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने किसी संत को अपनी साड़ी फाड़कर दी थी, जिससे उन्होंने लंगोटी बनाकर अपना काम चलाया था। वही आड़े समय में इतनी लंबी बनी कि साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान को स्वयं भागकर आना पड़ा। "जो तुझे पाना है, उसे बोना आरंभ कर दे।" यही बीजमंत्र हमें बताया और अपनाया गया। प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया।


शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान सबको देते हैं। धन स्व- उपार्जित होता है। कोई हाथों- हाथ कमाते हैं तो कोई पूर्व संचित संपदा को उत्तराधिकार में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था, पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुंजाइश थी, सो बिना समय गँवाए उस प्रयोजन में अपने को लगा दिया। रात में भगवान का भजन कर लेना और दिन भर विराट ब्रह्म के लिए, विश्वमानव के लिए समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया। बुद्धि दिन भर जागने में ही नहीं, रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिए सुविधा- संपदा कमाने का ताना- बाना बुनने की कभी इच्छा ही नहीं हुईं। अपनी भावनाएँ सदा विराट के लिए लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं, आदर्शों से किया। गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत उमड़ती रहीं।


इस विराट ब्रह्म को ही हमने अपना भगवान माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ने इसी विराट के दर्शन किए थे। यशोदा ने कृष्ण के मुँह में स्रष्टा का यही स्वरूप देखा था। राम ने पालने में पड़े- पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काकभुशुण्डि इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुए थे।


हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट ब्रह्म को, विश्वमानव को सौंप दिया। बोने के लिए इससे उर्वर खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला- फूला। हमारे कोठे भर दिए गए। सौंपे गए दो कामों के लिए जितने साधनों की जरूरत थी, वे सभी उसी में जुट गए।


शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं, जीवनीशक्ति तो प्रचंड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के २४ वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और कृश हो गया था, पर जब बोने- काटने की विधा अपनाई तो पचहत्तर वर्ष की इस उम्र में वह इतना सुदृढ़ है कि कुछ ही दिन पूर्व उसने एक बिगड़ैल साँड़ को कंधे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और उससे भागते ही बना।


सर्वविदित है ही कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर एक किराये के हत्यारे ने एक वर्ष पूर्व पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किए और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गई। रिवाल्वर उससे भय के मारे वहीं गिर गई। अब की बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते भी। खून बहता रहा, पर भौंके गए सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गए। डॉक्टरों ने जख्म सी दिए और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों का त्यों हो गया।


इसे परीक्षा का एक घटनाक्रम ही कहना चाहिए कि पाँच छोर का लोडेड रिवाल्वर शातिर हाथों से भी काम न कर सके। जानवर काटने के छुरे के बारह प्रहार मात्र प्रमाण के निशान छोड़कर अच्छे हो गए। आक्रमणकारी अपने बम से स्वयं घायल होकर जेल जा बैठा। जिसके आदेश से उसने यह किया था, उसे फाँसी की सजा घोषित हुई। असुरता के आक्रमण असफल हुए। एक उच्चस्तरीय दैवी प्रयास को निष्फल कर देना संभव न हो सका। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा सिद्ध हुआ।


इन दिनों एक से पाँच करने की सूक्ष्मीकरण विधा चल रही है। इसलिए क्षीणता तो आई है तो भी बाहर से काया ऐसी है, जिसे जितने दिन चाहें जीवित रखा जा सकें, पर हम जान- बूझकर इसे इस स्थिति में रखेंगे नहीं। कारण कि सूक्ष्म शरीर से अधिक काम लिया जा सकता है और स्थूल शरीर उसमें किसी कदर बाधा ही डालता है।


शरीर की जीवनीशक्ति असाधारण रही है। उसके द्वारा दस गुना काम लिया गया है। शंकराचार्य, विवेकानन्द थोड़े से जीवन में ३५० वर्ष के बराबर काम कर सके। हमने ७५ वर्षों में विभिन्न स्तर के इतने काम किए हैं कि उनका लेखा- जोखा लेने पर ये ७५० वर्ष से कम में होते संभव प्रतीत नहीं होते। यह सारा समय नवसृजन की एक से एक सफल भूमिका बनाने में लगा है। निष्क्रिय, निष्प्रयोजन कभी खाली नहीं रहा।


बुद्धि को भगवान के खेत में बोया और वह असाधारण प्रतिभा बनकर प्रकटी। अभी तक लिखा हुआ साहित्य इतना है जिसे शरीर के वजन से तोला जा सके। यह सभी उच्चकोटि का है। आर्ष ग्रंथों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा युग की भावी पृष्ठभूमि बनाने वाला ही सब कुछ लिखा गया है।


अध्यात्म को विज्ञान से मिलाने की योजना- कल्पना तो कइयों के मन में थी, पर उसे कोई कार्यान्वित न कर सका। इस असंभव को संभव होते देखना हो तो ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान में आकर अपनी आँखों से स्वयं देखना चाहिए। जो संभावनाएँ सामने हैं उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले दिनों अध्यात्म की रूपरेखा विशुद्ध विज्ञान परक बनकर रहेगी।


छोटे- छोटे देश अपनी पंचवर्षीय योजनाएँ बनाने के लिए आकाश- पाताल के कुलावे मिलाते हैं, पर समस्त विश्व की कायाकल्प योजना का चिंतन और क्रियान्वयन जिस प्रकार शांतिकुंज के तत्वावधान में चल रहा है, उसे एक शब्द में अद्भुत एवं अनुपम ही कहा जा सकता है।


भावनाएँ हमने पिछड़ों के लिए समर्पित की हैं। शिव ने भी यही किया था। उनके साथ चित्र- विचित्र समुदाय रहता था और सर्पों तक को वे गले लगाते थे। उसी राह पर हमें भी चलते रहना पड़ा है। हम पर छुरा रिवाल्वर चलाने वाले को पकड़ने वाले जब दौड़ रहे थे, पुलिस भी लगी हुई थी।


सभी को हमने वापस बुला लिया और घातक को जल्दी ही भाग जाने का अवसर दिया। जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जब प्रतिपक्षी अपनी ओर से कुछ कमी न रहने देने पर भी मात्र हँसने और हँसाने के रूप में प्रतिदान पाते रहे हैं।


हमने जितना प्यार लोगों से किया है, उससे सौ गुनी संख्या और मात्रा में लोग हमारे ऊपर प्यार लुटाते रहे हैं। निर्देशों पर चलते रहे हैं और घाटा उठाने तथा कष्ट सहने में पीछे नहीं रहे हैं। कुछ दिन पूर्व प्रज्ञा संस्थान बनाने का स्वजनों को आदेश किया तो दो वर्ष के भीतर २४०० गायत्री शक्ति पीठों की भव्य इमारतें बनकर खड़ी हो गई और उसमें लाखों रुपयों की राशि रकम खप गई। बिना इमारत के १२ हजार प्रज्ञा संस्थान बने सो अलग। छुरा लगा तो सहानुभूति में इतनी बड़ी संख्या स्वजनों की उमड़ी, मानो मनुष्यों का आँधी- तूफान आया हो। इनमें से हर एक बदला लेने के लिए आतुरता व्यक्त कर रहा था। हमने (माताजी ने) सभी को दुलार कर दूसरी दिशा में मोड़ा। यह हमारे प्रति प्यार की, सघन आत्मीयता की ही अभिव्यक्ति तो है।


धन की हमें समय- समय पर भारी आवश्यकता पड़ती रही है। गायत्री तपोभूमि, शांतिकुंज और ब्रह्मवर्चस की इमारतें करोड़ों रुपये मूल्य की हैं। मनुष्य के आगे हाथ न पसारने का व्रत निभाते हुए अयाचक व्रत निभाते हुए ये सारी आवश्यकताएँ पूरी हुई हैं। पूरा समय काम करने वालों की संख्या एक हजार से ऊपर है। इनकी आजीविका की ब्राह्मणोचित व्यवस्था बराबर चलती रहती है। इनमें योग्यता की दृष्टि से इतने ऊँचे स्तर के लोग हैं कि अन्य किसी सामाजिक संस्था में कदाचित ही इस स्तर के और इतने लोग हों। इनमें अनेकों ऐसे हैं जो समाज की नहीं, अपनी ही जमा- पूँजी के ब्याज से अपना खरच चलाते व मिशन की सेवा करते हैं।


प्रेस, प्रकाशन, प्रचार में संलग्न गाड़ियाँ तथा अन्यान्य खरचे ऐसे हैं, जो समयानुसार बिना किसी कठिनाई के पूरे होते रहते हैं। यह वह फसल है जो अपने पास की एक एक पाई को भगवान के खेत में बो देने के उपरांत हमें मिली है। इस फसल पर हमें गर्व है। जमींदारी समाप्त होने पर जो धनराशि मिली, वह गायत्री तपोभूमि के निर्माण में दे दी। पूर्वजों की छोड़ी जमीन किसी कुटुंबी को न देकर जन्मभूमि में हाईस्कूल और अस्पताल बनाने में लगा दी। हम व्यक्तिगत रूप से खाली हाथ हैं, पर योजनाएँ ऐसी चलाते है जैसी लखपति करोड़पतियों के लिए भी संभव नहीं हैं। यह सब हमारे मार्गदर्शक के उस सूत्र के कारण संभव हो पाया है, जिसमें उन्होंने कहा था, "जमा मत करो, बिखेर दो। बोओ और काटो।" सत्प्रवृत्तियों का उद्यान जो प्रज्ञा परिवार के रूप में लहलहाता दृश्यमान होता है, उसकी पृष्ठभूमि, इसी सूत्र संकेत के आधार पर बनी है।

Thursday, August 26, 2021

किसी का बुरा मत सोचिए

 किसी का बुरा मत सोचिए।

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      किसी व्यक्ति की उसके सम्मुख उसकी बुराई करना उतना पाप नहीं, जितना अपने मन में उसके प्रति बुरा सोचना। क्योंकि बुराई तो उस व्यक्ति के अवगुणों को देख कर की जाती है, जिसकी आलोचना करना कोई अपराध अथवा पाप नहीं है, परन्तु उसके प्रति अपने मन में बुरे विचार रखना अथवा उसका अनिष्ट चाहना।

       किसी पर कुदृष्टि रखने का अर्थ यह होगा कि आपके मन में पाप है। आप उस व्यक्ति से अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं। आप अपनी आत्मा की पुकार के विरुद्ध कार्य करना चाहते हैं, जो उस परमपिता परमात्मा की दृष्टि में एक महान अपराध है।

       दूसरों का बुरा सोचने में उनका अनिष्ट चाहने में कुछ लाभ भी नहीं होता, अपितु अपनी ही हानि होती है। देखने में हमें कोई कुछ लाभ प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक महान क्षति पहुँचती है।

       किसी व्यक्ति के प्रति बुरी भावना रखने से अपनी ही हानि अधिक होती है। उस व्यक्ति को तो पता तक नहीं होता, कि कोई उसके बारे में बुरे विचार रखता है।

       किसी के प्रति ईर्ष्या भाव हो तो स्वयं ईर्ष्या करने वाले का ही रक्त जलता है तथा मानसिकता, विचारणा ही दूषित होती है। मन अशान्त रहने पर भी दिनचर्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

       दूसरों का अनिष्ट चाहने वाला पहले अपनी ही हानि करता है। कहावत भी है कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, पहले स्वयं ही उसमें गिर जाता है।

       जब हम जानते हैं कि दूसरों से द्वेष करने पर, उनका बुरा सोचने पर एवं उनका अनिष्ट चाहने पर हमको महान क्षति पहुँचेगी, हमारी आत्मा दूषित हो जाएगी, हम ईश्वर की दृष्टि में अपराधी बन जाएँगे, हमें कहीं भी शान्ति न मिलेगी, तो फिर हम दूसरों के प्रति कुविचार क्यों रखें? किसी से द्वेष क्यों करें और यदि हम यह सब जानते हुए भी दूसरों से द्वेष करते हैं उनका अनिष्ट चाहते हैं तो वह एक बड़ी मूर्खता की बात होगी।

       आग जहाँ रखी जाती है, पहले उस स्थान को गर्म करती है और जलाती है। तेजाब यदि साधारण धातु के बर्तन में रखा गया है तो पहले उसे ही नष्ट करेगा। इसी प्रकार द्वेष और दुर्भाव,पाप और कुविचार जिसके मन में रहते हैं, पहले उसी का अनिष्ट करते हैं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना अक्टूबर 2012 पृष्ठ 24

तुम सदा रहते साथ हमारे

 👉 तुम सदा रहते साथ हमारे

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🔴 आज से करीब आठ वर्ष पहले की बात है। मैं झारखण्ड राज्य के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की जिला संयोजक थी। भा.सं.ज्ञा.परीक्षा सम्पादित कराने हेतु मुझे अक्सर झारखण्ड के कई जिलों का दौरा करना पड़ता था। एक बार मैं झींकपानी चाईबासा होकर वापस जमशेदपुर आ रही थी। अचानक एक जगह आकर हमारी बस रुक गई। आगे का रास्ता जाम था। बस कण्डक्टर ने बताया गाड़ी आगे नहीं जाएगी। आप लोगों को जाना हो, तो निजी वाहन, ऑटो रिक्शा आदि से जा सकते हैं। पता चला आज सरहूल है। यह इस क्षेत्र का प्रसिद्ध त्योहार है, जिसमें हजारों- हजार नर- नारी इकट्ठे होकर नाचते- गाते, खुशियाँ मनाते हैं। देखा, सड़क के दोनों ओर लगभग पाँच- सात हजार लोग अपने पारम्परिक वेश- भूषा में पंक्तिबद्ध खड़े होकर एक दूसरे की कमर पकड़कर नृत्य कर रहे हैं। सभी का शरीर एक साथ एक ताल पर आगे- पीछे, दाएँ- बाएँ झुक रहे थे


🔵 झारखण्ड की संस्कृति की झाँकी को प्रस्तुत करता नृत्य- उत्सव का वह अपूर्व दृश्य भी मुझे बाँध न सका। बार- बार घिरती हुए साँझ की ओर देखती और मन कहता जल्दी घर पहुँचना है। बहुत लोग बस से उतर- उतर कर पैदल ही अपने रास्ते की ओर चल दिए। बस के कर्मचारी वहीं विश्राम की तैयारी करने लगे। हमें बता दिया गया कि यह कार्यक्रम अभी तीन- चार घण्टे तक चलेगा। मजबूर होकर मुझे भी उतर जाना पड़ा


🔴 मुझे उस स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि उस स्थान को हाता के नाम से जाना जाता है। मुझे किसी ने बताया जमशेदपुर जाने के लिए पश्चिम की ओर चलना होगा। इसी आधार पर मैं अपने गन्तव्य की ओर बढ़ने लगी। धीरे- धीरे अँधेरा घिर आया। सुनसान सड़क पर इक्के- दुक्के लोग ही चल रहे थे। सड़क के दोनों ओर क्या है, आगे वाले रास्ते में खाई है या खन्दक, रोड़ा है या कीचड़ यह भी नहीं दीखता। मैं अनायास कदम बढ़ाती जा रही थी। बगल की कँटीली झाड़ियों से कई बार पाँव भी जख्मी होते जा रहे थे, मगर मेरे मन में केवल एक बात आ रही थी कि समय रहते घर पहुँचना है। एक अनजाना सा भय मुझे दबाए जा रहा था। अकेली औरत, सुनसान सड़क, क्या कुछ नहीं हो सकता था। लेकिन मुझे घर पहुँचने की जल्दी 

 

🔵 अचानक मैंने ख्याल किया कि मेरे आगे- आगे सफेद धोती पहने लम्बे कद के कोई पुरुष चल रहे हैं। उनके कमर के ऊपर का हिस्सा नहीं दीख रहा। मुझे भय भी लग रहा था मगर उन्हीं के साथ- साथ कदम मिलाती हुई पीछे- पीछे चली जा रही थी। मुझे लग रहा था आगे वाले व्यक्ति के कदम तीन- तीन फीट पर पड़ रहे हैं। पता नहीं मैं कैसे उस गति से चल रही थी। उस समय यह सब सोचने के लिए भी समय नहीं था। जैसे मेरे कदम हवा में पड़ रहे थे। कष्ट की अनुभूति भी नहीं हो रही थी। करीब आधे- पौन घण्टे तक इसी तरह चलती गई। इसके बाद शहरी इलाका दीखने लगा। दुकानों की झिलमिल रोशनी देख मन में साहस आया। इसके बाद वह व्यक्ति भी न जाने कब आँखों से ओझल हो गया


🔴 एक टेलीफोन बूथ पर जाकर मैंने फोन किया। घर में सूचना दी। विलम्ब होने का कारण बताया। वहीं पूछने पर पता चला उस स्थान का नाम परसूडीह है। वहाँ से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बस स्टैण्ड गई, जहाँ से साकची की बस मिलने वाली थी


🔵 जब घर पहुँची और सब हाल बताया, तो सभी विस्मय से अवाक रह गए। कहा- हाता से परसूडीह तुम इतनी जल्दी पहुँची कैसे? वह तो २५- ३० किलोमीटर का रास्ता है। मुझे आगे- आगे चलने वाले उस मार्गदर्शक की याद आई। श्रद्धा से नतमस्तक हो गई मैं। गुरुदेव कई बार कहा करते थे- बेटा, तुम मेरे काम में एक कदम भर बढ़ाओ, मैं तुम्हें सफलता के रास्ते दस कदम बढ़ा दूँ


🌹 सुषमा पात्रो टाटानगर (झारखण्ड)  

🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से  गा।।। थी।।।*

समस्या हमारी- समाधान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के

 समस्या हमारी- समाधान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के

(भाग2)

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      कोई कार्य बहुत अच्छा हो, सफलता की सम्भावना भी हो, लेकिन उसमें कठिनाइयाँ अधिक हो, तो क्या ऐसे कार्य को हाथ में लेना चाहिए?

 समाधान:-

       किसी भी कठिन से कठिन कार्य को सफल बना लेने की एक वैज्ञानिक विधि यह है कि उसे शीघ्र ही प्रारम्भ कर दिया जाय।

       कोई कार्य तभी तक कठिन मालूम पड़ता है, जब तक कि इसे हाथ में नहीं लिया जाता। हाथ में आते ही उसकी कठिनता कम हो जाती है और वह वैसे ही सरल लगने लगता है, जैसे कोई अन्य काम।

       कठिनाई के भय से किसी काम को स्थगित कर देने का स्वभाव मनुष्य की कार्य क्षमता को नष्ट कर देता है, उसमें उत्साहहीनता और निराशा का भाव उत्पन्न कर देता है।

       ऐसे निराश और उत्साहहीन व्यक्ति को कठिनाइयाँ अपना शिकार बना कर समाप्त कर देती है, किन्तु जो उत्साहपूर्वक इनका सामना करने के लिए कटिबद्ध रहते हैं, उनके लिए कठिनाइयाँ उन्नति की ओर अग्रसर होने में सहायक बन कर बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

       कठिनाइयों की परवाह न करके जो व्यक्ति इस निश्चय से कार्य में जुटे रहते हैं, कि उन्हें अमुक कार्य पूरा करना ही है, उसके लिए कितना ही उद्योग एवं परिश्रम क्यों न करना पड़े, वे अपने निर्धारित लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेते हैं।

       जिसने काम को करने का दृढ़ संकल्प कर लिया होता है, उसके मार्ग में बाधाएँ उसी प्रकार नहीं ठहर पाती, जिस प्रकार वेगवती सरिता के प्रवाह में पड़कर बबूले के ढेर नहीं ठहर पाते।

       उद्योगहीन व्यक्ति ही कठिनाइयों को दुर्भाग्य अथवा विपत्ति मानकर उनके सामने परास्त हो जाते हैं।

       पुरुषार्थी व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ता है और उन्हें बलपूर्वक पीछे ढकेलता हुआ पहाड़ के बीच में भी रास्ता बना लेता है।

       सफलता के लिए उद्योग करने वाले वालों के सम्मुख कठिनाइयों का आना स्वाभाविक है। मनुष्य को चाहिए कि उससे घबराना छोड़कर अपने उद्यम-उद्योगशक्ति में अटूट विश्वास रखें।

       अडिग विश्वास और अदम्य साहस द्वारा ही लक्ष्य प्राप्त होता है तथा सुनियोजित कार्यक्रम के साथ काम करने से सृजन सम्भव होता है।

- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

(संकलित व सम्पादित)

 सरस, सफल जीवन का केन्द्र बिन्दु उत्कृष्ट चिन्तन पृष्ठ 48-49

Wednesday, August 25, 2021

हारिए न हिम्मत - धैर्य रखें

 हारिए न हिम्मत - धैर्य रखें!

( भाग 6)

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      उठो! जागो!! रुको मत!!! जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।

       कोई दूसरा तुम्हारे प्रति बुराई करे या निन्दा करे, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहज करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता।

      अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन। जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दूसरों के अवगुणों की खोज में नहीं रहता, उसे आन्तरिक प्रसन्नता रहती है।

      जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। हँसते रहो, मुस्कुराते रहो! ऐसा मुख किस काम का जो हँसे नहीं, मुस्कुराए नहीं।

       जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहते हैं, उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढ़ना नहीं चाहिए।

( संकलित व सम्पादित)

 हारिए न हिम्मत पृष्ठ 6

असम्भव को सम्भव

 पात्रता विकसित की जाय तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है।

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       गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अपने भीतर के संकल्प को अपनी पात्रता को परिष्कृत करने का पर्व है। प्रतिभा जिधर को मुड़ती है, उधर की परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लेती है।

       समय का व संसाधनों के अभाव का रोना कुपात्र रोते हैं। सुपात्र तो वे होते हैं, जो सब कुछ विपरीत होते हुए भी अपने लिए राहें बना ही लेते हैं।

      सच पूछा जाय तो सुपात्र होना, पात्रता का होना ही वह सम्पदा है जो व्यक्ति के जीवन में तेज,ओज व वर्चस के नाम से प्रकट होती है। 

    यदि इस पात्रता को विकसित किया जा सके तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है। इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा पर स्वयं के भीतर ही संकल्प को उभारने की जरूरत है।

     मन का संकल्प व दैवी संरक्षण पर भरोसा, उनके माध्यम से कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि जिसे देखकर दाँतो तले उँगली दबाने को विवश होना पड़ता है। यह प्राणवान संकल्प मात्र उनके व्यक्तित्व की शोभा बनता है जो सुपात्र होते हैं।

     गुरु यदि शिष्य से किसी एक गुण की अपेक्षा करते हैं तो वह पात्रता ही है। यही पात्रता आगे बढ़कर उत्कृष्टता जुटाने का कारण बनती है। जो कुपात्र होते हैं उन्हें पूर्वकृत कर्मवश कुछ उपलब्धि मिल भी जाए, परन्तु वह कभी भी दैवी सहयोग को पाने के उत्तराधिकारी नहीं बन पाते हैं।

     जो कुपात्र होते हैं उनके व्यक्तित्व के छिद्र, उनके व्यक्तित्व की दुर्बलताएँ उन्हें बार-बार तकलीफों-परेशानियों में डालते हैं।

      बरसात होने पर पानी गड्ढों में भरता है, चट्टानों पर तो बूँदें भी ढँग से नहीं टिक पाती। जो अपनी पात्रता विकसित कर लेते हैं वे भगवान के अनुग्रह को बरसाती गड्ढों में भरे पानी की तरह बटोर लेते हैं और जो अपनी अहन्ता की चट्टान बनकर पड़े रहते हैं, उनको भगवान की उपस्थिति भी महसूस नहीं हो पाती।

      भीष्म की प्रतिज्ञा के आगे भगवान सूर्य को झुकना पड़ा था। सत्यवान के प्राणों को वापस करने के सावित्री के संकल्प के आगे यमराज को झुकना ही पड़ा था। अर्जुन के तीर के आगे पाताल को गङ्गा का प्रवाह छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था। यह ताकत उनके व्यक्तित्व की ताकत का प्रमाण है।

    परिष्कार की प्रक्रिया में हमें आत्मनिरीक्षण, आत्मसमीक्षा, आत्म सुधार एवं आत्म विकास जैसे चरणों से गुजरना होता है। इन पदों से गुजरने वाले ही अपने व्यक्तित्व को उस योग्य बना पाते हैं कि जिनकी सहायता करने को भगवान सदा संकल्पित नजर आते हैं।

       फिर स्वयं के व्यक्तित्व को प्रामाणिक बना देने वाले स्वयं का ही कल्याण नहीं करते बल्कि अनेकों के लिए एक आदर्श उदाहरण बनकर प्रस्तुत होते हैं।

( संकलित व सम्पादित) अखण्ड ज्योति जुलाई 2019 पृष्ठ 85

बाह्य आकर्षण को छोड़कर आत्मिक पुरुषार्थ में शक्ति नियोजित करें।

 बाह्य आकर्षण को छोड़कर आत्मिक पुरुषार्थ में शक्ति नियोजित करें।

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      एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। कई दिन तक वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिए। इसी बीच उनकी भेंट एक विद्वान से हुई अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे ही दिन से कमाई-धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया।

       अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था, कि उसकी भेंट एक सङ्गीतज्ञ से हुई। उसे सङ्गीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया। अतः उस दिन से पढ़ाई बन्द कर दी और सङ्गीत सीखने लगा।

       काफी उम्र बीत गई, न वह धनी हो सका न विद्वान, न सङ्गीत सीख पाया न नेता बन सका। तब उसे बड़ा दुःख हुआ।

       एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई। उसने अपने दुःख का कारण बताया। महात्मा मुस्कुरा कर बोले - "बेटा! यह दुनियाँ बड़ी चिकनी है। जहाँ जाओगे कोई न कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जाएगी। बार-बार रूचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति नहीं कर पाओगे।"

       युवक समझ गया और अपना एक उद्देश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा। भौतिक जगत और आत्मिक जगत दोनों ही क्षेत्रों में समुचित समन्वय स्थापित कर मनुष्य आत्म उत्थान का पथ प्रशस्त कर सकता है। परन्तु ऐसे व्यक्ति जो बाह्य आकर्षणों से विरत हो अपने आप को आत्मिक पुरुषार्थ में नियोजित कर दें, कम ही होते हैं।

(संकलित व सम्पादित) 

प्रज्ञा पुराण, प्रथम खण्ड प्रथम अध्याय पृष्ठ 67

 वर्तमान निम्न स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान हैं।

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      किसके भाग्य में समृद्धि, प्रगति और प्रतिष्ठा बदी है, इसे जानने के लिए किसी के ग्रह-नक्षत्र देखने की आवश्यकता नहीं है और न किसी पंडित, ज्योतिषी से पूछने की आवश्यकता है।

       किसी का भी भला-बुरा भविष्य जानने के लिए इतनी जानकारी पर्याप्त है कि कौन अपने को अधिक सुयोग्य, सक्षम एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए किस सीमा तक प्रयत्न कर रहा है?

       आज का प्रयास ही कल परिणति बन कर सामने आता है। दूसरा कोई किसी को न ऊँचा उठाता है और न नीचे गिराता है। मनुष्य अपनी विचारणा और क्रिया पद्धति के सहारे ही अपने को उत्कृष्ट और निकृष्ट बनाता है।

       तदनुरूप ही उसके सामने परिस्थितियाँ विनिर्मित होती है और सामने आ खड़ी होती है। दूसरों के दिए हुए अनुदान सुरक्षित रखने तथा उनका सदुपयोग कर सकने की क्षमता अपने भीतर से उत्पन्न होती है।

       जिन्होंने अपने को शालीनता के ढाँचे में ढाला है, वे समर्थों और सज्जनों से सम्मान तथा सहयोग प्राप्त करते हैं और अपने क्रियाकलाप के आधार पर ऊँचे उड़ते रहते हैं।

       विश्वास कीजिए! वर्तमान निम्न स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। आप जो सोचते हैं, विचारते हैं, जिन बातों को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाते हैं, वे आन्तरिक शक्तियों के विकास से अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।

(संकलित व सम्पादित) 

विचार सार एवं सूक्तियाँ

 प्रथम खण्ड 25:13

Tuesday, August 24, 2021

धर्म और श्रम की कमाई

 👉 धर्म और श्रम की कमाई

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ईमानदारी और मेहनत से जो धर्म की कमाई की जाती है उसी से आदमी फलता−फूलता है, यह बात यदि मन में बैठ जाय तो हम सादगी और किफायतशारी का जीवन व्यतीत करते हुए सन्तोषपूर्वक अपना निर्वाह क्यों न करने लगेंगे? और फिर धर्म उपार्जित कमाई का अनीति से अछूता अन्न हमारी नस−नाड़ियों में रक्त बनकर घूमेगा तो हमारा आत्मसम्मान और आत्मगौरव क्यों आकाश को न चूमने लगेगा? क्यों हम हिमालय जैसा ऊँचा मस्तक न रख सकेंगे? और क्यों हमें हमारी महानता का—श्रेष्ठता का—उत्कृष्टता का अनुभव होने से अन्तःकरण में सन्तोष एवं गर्व भरा न दीखेगा?


प्यार, आत्मीयता, ममता की आँखों से जब हम दूसरों की देखेंगे तो वे हमें अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देखकर हमें आनन्द होता है। फिर यदि हम दूसरों को बाहर वालों को भी उसी आँख से देखने लगें तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। अपने कुटुम्बियों के जब अनेक दोष दुर्गुण हम बर्दाश्त करते हैं, उन्हें भूलते, छिपाते और क्षमा करते हैं तो बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नहीं किया जा सकता? उदारता, सेवा, सहयोग, स्नेह, नेकी और भलाई की प्रवृत्ति को यदि हम विकसित कर लें तो देवता की योनि प्राप्त होने का आनन्द हमें इसी मनुष्य जन्म में मिल सकता है। हो सकता है कि हमारी भलमनसाहत और सज्जनता का कोई थोड़ा दुरुपयोग कर ले, उससे अनुचित लाभ उठा ले, इतने पर भी उसके ठगने वाले के मन पर भी अपनी सज्जनता की छाप पड़ी रहेगी और वह कभी न कभी उसके लिए पश्चात्ताप करता हुआ सुधार की ओर चलेगा। अनेक सन्तों और सज्जनों के ऐसे उदाहरण हैं जिनने दुष्टता को अपनी सज्जनता से जीता है। फिर चालाक आदमी भी तो दूसरे अधिक चालाकों द्वारा ठग लिये जाते हैं, वे भी कहाँ सदा बिना ठगे रहते हैं। फिर यदि हमें अपनी भलमनसाहत के कारण कभी कुछ ठगा जाना पड़ा तो इसमें कौन बहुत बड़ी बात हो गई, जिसके लिए पछताया जाय। छोटा बच्चा जिसे हम अपना मानते हैं जन्म से लेकर वयस्क होने तक हमें ठगता ही तो रहता है। उस पर जब हम नहीं झुँझलाते तो प्रेम से परिपूर्ण हृदय हो जाने पर दूसरों पर भी क्यों झुँझलाहट आवेगी?


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

मदद और दया सबसे बड़ा धर्म

 👉 मदद और दया सबसे बड़ा धर्म

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कहा जाता है दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। मदद एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरुरत हर इंसान को पड़ती है, चाहे आप बूढ़े हों, बच्चे हों या जवान; सभी के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब हमें दूसरों की मदद की जरुरत पड़ती है। आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?


किशोर नाम का एक लड़का था जो बहुत गरीब था। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद जंगल से लकड़ियाँ काट के लाता और उन्हें जंगल में बेचा करता। एक दिन किशोर सर पे लकड़ियों का गट्ठर लिए जंगल से गुजर रहा था। अचानक उसने रास्ते में एक बूढ़े इंसान को देखा जो बहुत दुर्बल था उसको देखकर लगा कि जैसे उसने काफी दिनों खाना नहीं खाया है। किशोर का दिल पिघल गया, लेकिन वो क्या करता उसके पास खुद खाने को नहीं था वो उस बूढ़े व्यक्ति का पेट कैसे भरता? यही सोचकर दुःखी मन से किशोर आगे बढ़ गया।


आगे कुछ दूर चलने के बाद किशोर को एक औरत दिखाई दी जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था क्यूंकि जंगल में कहीं पानी नहीं था। बच्चे की हालत देखकर किशोर से रहा नहीं गया लेकिन क्या करता बेचारा उसके खुद के पास जंगल में पानी नहीं था। दुःखी मन से वो फिर आगे चल दिया। कुछ दूर जाकर किशोर को एक व्यक्ति दिखाई दिया जो तम्बू लगाने के लिए लकड़ियों की तलाश में था। किशोर ने उसे लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में उसने किशोर को कुछ खाना और पानी दिया। किशोर के मन में कुछ ख्याल आया और वो खाना, पानी लेकर वापस जंगल की ओर दौड़ा। और जाकर बूढ़े व्यक्ति को खाना खिलाया और उस औरत के बच्चे को भी पानी पीने को दिया। ऐसा करके किशोर बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।


इसके कुछ दिन बाद किशोर एक दिन एक पहाड़ी पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था अचानक उसका पैर फिसला और वो नीचे आ गिरा। उसके पैर में बुरी तरह चोट लग गयी और वो दर्द से चिल्लाने लगा। तभी वही बूढ़ा व्यक्ति भागा हुआ आया और उसने किशोर को उठाया। जब उस औरत को पता चला तो वो भी आई और उसने अपनी साड़ी का चीर फाड़ कर उसके पैर पे पट्टी कर दी। किशोर अब बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।


मित्रों दूसरों की मदद करके भी हम असल में खुद की ही मदद कर रहे होते हैं। जब हम दूसरों की मदद करेंगे तभी जरुरत पढ़ने पर कोई दूसरा हमारी भी मदद करेगा।


तो आज इस कहानी को पढ़ते हुए एक वादा करिये की रोज किसी की मदद जरूर करेंगे, रोज नहीं तो कम से कम सप्ताह एक बार, नहीं तो महीने में एक बार। जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये, आप किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा सकते हैं या किसी प्यासे को पानी पिला सकते हैं या किसी हताश इंसान को सलाह दे सकते हैं या किसी को खाना खिला सकते हैं। यकीन मानिये ऐसा करते हुए आपको बहुत ख़ुशी मिलेगी और लोग भी आपकी मदद जरूर करेंगे।

संन्यासी बड़ा या गृहस्थ

 👉 संन्यासी बड़ा या गृहस्थ

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किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि- ”भगवान! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास?” अनेक साधु अनेक प्रकार से इसको उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती।


इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा। संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।”


राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“


संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया।


घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। जिस राजकन्या का स्वयंवर था, वह अत्यन्त रूपवती थी और उसके पिता के कोई अन्य सन्तान न होने के कारण उस राजा के बाद सम्पूर्ण राज्य भी उसके दामाद को ही मिलने वाला था।


राजकन्या सौंदर्य को चाहने वाली थी, इसलिये उसकी इच्छा थी कि मेरा पति, अतुल सौंदर्यवान हो, हजारों प्रतिष्ठित व्यक्ति और देश-देश के राजकुमार इस स्वयंवर में जमा हुए थे। राज-कन्या उस सभा मण्डली में अपनी सखी के साथ घूमने लगी। अनेक राजा-पुत्रों तथा अन्य लोगों को उसने देखा पर उसे कोई पसन्द न आया। वे राजकुमार जो बड़ी आशा से एकत्रित हुए थे, बिल्कुल हताश हो गये। अन्त में ऐसा जान पड़ने लगा कि मानो अब यह स्वयंवर बिना किसी निर्णय के अधूरा ही समाप्त हो जायगा।


इसी समय एक संन्यासी वहाँ आया, सूर्य के समान उज्ज्वल काँति उसके मुख पर दमक रही थी। उसे देखते ही राजकन्या ने उसके गले में माला डाल दी। परन्तु संन्यासी ने तत्क्षण ही वह माला गले से निकाल कर फेंक दी और कहा- ”राजकन्ये। क्या तू नहीं देखती कि मैं संन्यासी हूँ? मुझे विवाह करके क्या करना है?”


यह सुन कर राजकन्या के पिता ने समझा कि यह संन्यासी कदाचित भिखारी होने के कारण, विवाह करने से डरता होगा, इसलिये उसने संन्यासी से कहा- ”मेरी कन्या के साथ ही आधे राज्य के स्वामी तो आप अभी हो जायेंगे और पश्चात् सम्पूर्ण राज्य आपको ही मिलेगा।“


राजा के इस प्रकार कहते ही राजकन्या ने फिर वह माला उस साधु के गले में डाल दी, किन्तु संन्यासी ने फिर उसे निकाल पर फेंक दिया और बोला- ”राजन्! विवाह करना मेरा धर्म नहीं है।“


ऐसा कह कर वह तत्काल वहाँ से चला गया, परन्तु उसे देखकर राजकन्या अत्यन्त मोहित हो गई थी, अतएव वह बोली- ”विवाह करूंगी तो उसी से करूंगी, नहीं तो मर जाऊँगी।” ऐसा कह कर वह उसके पीछे चलने लगी।


हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा- ”राजन्! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।”


राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी।


इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले- ”राजकन्ये! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।”


राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे।

उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये।


इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।” इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई।


परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-”ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण करता हूँ।”


इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी।


यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि- ”कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े।


यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया।


इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- ”राजन्!! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं।“


📖 अखण्ड ज्योति,जून-1941

Monday, August 23, 2021

गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है

 गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है।

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गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है। एक समय अकबर के महामंत्री मानसिंह को अकबर ने बुलाया एवं कहा कि हमारा प्रयाग का किला अठारह बार ढह गया उसका कोई उपाय करो ताकि वह सुरक्षित रह सके। अकबर के आदेश को पाकर मानसिंह निकले और गंगा तट पर भ्रमण करने लगे। उन्होंने देखा कि इस वीरान स्थान पर एक महात्मा तप कर रहे हैं। वे उनके पास पहुँचे। उस समय वे ध्यानावस्था में थे। उन्होंने देखा कि एक अजगर उधर से आया और उन्हें निगलने का प्रयास करने लगा, परन्तु वह तपस्वी को निगल न सका। थोड़ी देर में उस तपस्वी का ध्यान टूटा और उन्होंने अपने तपबल से उस अजगर से अपने को मुक्त कर लिया। यह सब तमाशा देखने के बाद मानसिंह वहाँ पहुँचे। थोड़ी देर बैठने के बाद महात्माजी, जिनका नाम देवमुरारी बाबा था, ने उनका कुशल समाचार पूछा। उन्होंने कहा कि मैं अकबर का महामंत्री मानसिंह हूँ और एक विकट समस्या के हल हेतु आपके पास आया हूँ। उस महात्मा ने पूछा कि आप निःसंकोच अपनी समस्या को बतलावें। हम उसके समाधान हेतु प्रयास करेंगे। मानसिंह ने बतलाया कि महात्मन! प्रयाग के किले का निर्माण महाराज ने 18 बार कराया, परन्तु पता नहीं किस कारण से या कोई देवी के अभिशाप के कारण वह बन नहीं पा रहा है तथा बार-बार वह ढह जाता है। महात्माजी थोड़ी देर मौन रहे और अपनी ध्यान अवस्था में चले गये। उसके बाद मानसिंह के हाथ पर कुछ रख दिया। उन्होंने कहा कि इसे आप नींव में डाल देंगे और उसके बाद निर्माण करेंगे तो किले का कुछ नहीं होगा। उन्होंने वैसा ही किया और किला तैयार हो गया। वह वस्तु जो मानसिंह की हथेली पर महात्माजी ने रखी थी, वह उन्होंने तुलसी की मंजरी दी थी। देवमुरारी बाबा गायत्री के बहुत बड़े उपासक उस जमाने में रहे हैं तथा उनका चमत्कार सर्वविदित था। सभी लोग उनके पास आते और वे सिद्ध की हुई मंजरी सबको दे देते थे।

सूक्ष्म शरीर से दिया आश्वासन

 👉 सूक्ष्म शरीर से दिया आश्वासन

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🔴 पति के रेल सेवा से मुक्त होने के बाद हमने अपना मकान लखनऊ में बनाया। गुरुदेव की कृपा से मकान बहुत शीघ्र ही बन गया। अपने द्वारा बनाए घर में रहने की इच्छा पूर्ण हुई। हम सब बहुत खुश थे। सारी व्यवस्था बन जाने के बाद गृह प्रवेश का कार्यक्रम गायत्री जयंती के दिन तय किया गया। गर्मी का मौसम था। तपिश काफी हो रही थी। दोपहर में लू भी काफी चल रही थी, लेकिन गायत्री जयंती का पर्व नजदीक था। इसलिए हम लोगों ने दिन रात मेहनत कर दिनांक २ जून १९९० को गृहप्रवेश का कार्यक्रम रखा। हम सभी लोग बहुत उत्साहित थे। गायत्री जयंती पर्व और गृहप्रवेश दोनों एक साथ होने से खुशी दोगुनी हो गई थी। कार्यक्रम यज्ञ संस्कार द्वारा बहुत ही अच्छे ढंग से हो गया था। आने जाने वाले परिचित व आस- पड़ोस के लोग जा चुके थे। सभी कार्य अच्छी तरह सम्पन्न होने के कारण हम बहुत प्रसन्न थे। गर्मी बहुत थी, किन्तु सभी के मन में खुशियों की ठण्डी- ठण्डी लहर दौड़ रही थी। शाम होते- होते हल्की- हल्की हवा भी बहने लगी। यज्ञीय ऊर्जा से वातावरण अभी भी सुगन्धित हो रहा था।


🔵 शाम के समाचार का समय था। रेडियो खोला गया। सभी लोग समाचार सुनने लगे। मुख्य समाचार में ही गुरु देव के ब्रह्मलीन होने का समाचार मिला। आनन्द का वह अवसर पलभर में शोक पूर्ण हो उठा। सभी के मन बहुत व्यथित और व्याकुल थे। मन में न जाने कितनी आशंकाएँ उठ रही थीं। आज गृहप्रवेश किया और हमारे गुरु देव नहीं रहे। पता नहीं यह घर भविष्य में क्या- क्या दिन दिखाएगा। दूसरी बात यह भी मन को रह- रह कर परेशान करती थी कि अब हमारी दुःख तकलीफ परेशानी कौन सुनेगा? जब- जब हमारे ऊपर मुसीबत आती थी, गुरु देव हम सबकी समस्या का समाधान करते थे। अब कहाँ जाएँगे समाधान के लिए? हजारों सवाल मन में उठ रहे थे। परेशान तो सभी लोग थे, लेकिन कोई भी किसी से बात नहीं कर रहा था। सभी शोक में डूबे थे। नींद नहीं आ रही थी। रात भी हो चुकी थी। सोचते- सोचते मुझे हल्की- सी झपकी आ गई।


🔴 मैंने स्वप्न देखा कि घर में जिस जगह पर यज्ञ हुआ था, उसी जगह पर यज्ञाग्नि प्रज्ज्वलित हो रही है। यज्ञ की लपटें ऊँची- ऊँची उठ रही हैं। परम पूज्य गुरु देव यज्ञ कुण्ड के चारों ओर धीरे- धीरे चक्कर लगा रहे हैं और मुझे समझा रहे हैं ‘‘तू इतनी चिन्ता क्यों कर रही है। मैं हूँ न तुम्हारे पास। मैं यहाँ हमेशा रहूँगा तू चिन्ता करना छोड़।’’ अचानक मेरी आँखें खुल गईं। आँखों के आगे बार- बार वही दृश्य आता रहा। मन में बहुत ग्लानि हुई कि मैं तो गुरु देव को केवल शरीर तक ही जानती थी। उसी दिन उनके विराट् स्वरूप का ज्ञान हुआ कि गुरु देव हर समय हर क्षण अपने बच्चों के साथ रहते हैं।


🔵 तब से अब तक कुछ भी परेशानी होती है तो गुरु देव का आश्वासन याद आता है कि कुछ अनिष्ट नहीं होगा। गुरु देव की सूक्ष्म सत्ता हमारी रक्षा कर रही है।


🌹 सरस्वती श्रीवास्तव, लखनऊ, (उत्तर प्रदेश)

🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

गुरुर्वाक्यं ब्रह्मवाक्यं

 👉 गुरुर्वाक्यं ब्रह्मवाक्यं

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🔵 मैं बचपन से ही बहुत तार्किक स्वभाव का था। ज्यादा पूजा पाठ या साधू बाबा आदि के आडम्बरों से बहुत दूर रहता था। मुझे समाज निर्माण से जुड़े नैतिक और सामाजिक कार्यों में रुचि थी। मुझे आर्यसमाज से जुड़ी हुई कुछ चीजें पसन्द थीं, विशेषकर गायत्री मंत्र। १९७६ की बात है। उन्हीं दिनों मैं पहली बार इस मिशन से परिचित हुआ। मेरे बड़े भाई के समान श्री मंगल प्रसाद लोहिया जी एक दिन मेरे पास आए और बोले कि आपको सोनी माता जी के यहाँ गायत्री यज्ञ में चलना है। चूँकि मेरी गायत्री मंत्र में श्रद्धा पूर्व से ही थी, मैं सहर्ष तैयार हो गया।


🔴 मैं सोनी माता जी के यहाँ यज्ञ में पहुँचा। यज्ञ श्री कोलेश्वर तिवारी जी करा रहे थे। मैंने प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ किया। यज्ञ के बाद तिवारी जी बोले अब कुछ दक्षिणा दो। मैं दक्षिणा का अर्थ ठीक से नहीं समझ पाया, तो उन्होंने बताया कि अपने अन्दर की कुछ बुराई यज्ञ भगवान की साक्षी में छोड़ दो। मैंने पान, नॉनवेज तथा आलस्य आदि छोड़ दिया और प्रतिदिन गायत्री मंत्र की उपासना करने लगा। लगभग १५ दिन के अन्दर ही मुझे हरिद्वार जाने की प्रेरणा हुई।


🔵 संयोग से मंगल जी शान्तिकुञ्ज जा रहे थे, मैं भी उनके साथ हो लिया। ट्रेन से सुबह ही पहुँच गया था। स्नान आदि के बाद मैं गुरुजी के प्रवचन में पहुँच गया। मुझे शान्तिकुञ्ज के वातावरण से लगा मैं स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। उसके बाद जब गुरुदेव का प्रवचन सुना तो लगा मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ, जो ऐसे भगवान स्वरूप गुरु के दर्शन हुए।


🔴 प्रवचन समाप्त होने के बाद मंगल जी ने मंच के पीछे मुझे गुरुदेव से मिलाया और मेरा परिचय दिया। गुरुदेव ने कुशल क्षेम पूछा। उनके सरल व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ। वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे मुझे बहुत पहले से जानते हों। उनका अपनापन देखकर मेरे हृदय में उनके प्रति अटूट श्रद्धा हो गई।


🔵 उसके पश्चात् मैं गुरुदेव से उनके कमरे में मिला। गुरुदेव ने मुझे अपने पास बिठाया। घर परिवार का हाल पूछा। मैं असमंजस में पड़ गया कि क्या उत्तर दूँ। मुझे निरुत्तर देख वे बोले ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’ तुम्हारी दुकानदारी, बीमारी, परेशानी सबकी जिम्मेदारी मेरी है। बस तुम मन लगाकर कार्य करना। इतना बड़ा आश्वासन पाकर मैं कृतार्थ हो गया। उस समय तो दो- तीन दिन वहाँ रहकर मैं घर वापस आ गया। लेकिन शान्तिकुञ्ज का आकर्षण बराबर अनुभव होता रहता। मैंने उस समय ३ शिविर १- १ महीने के कर डाले। इस तरह से मैं किसी न किसी रूप में शान्तिकुञ्ज हमेशा महीने- दूसरे महीने पहुँच ही जाता।


🔴 सन् १९८६ की घटना है। मुझे हार्ट में कुछ परेशानी मालूम पड़ने लगी। इधर- उधर कुछ दिखाया, लेकिन आराम नहीं मिला। मेरे मित्र अरविन्द निगम जी को इस बात का पता चला। वे तुरन्त मुझे लखनऊ मेडिकल कालेज लेकर गए। वहाँ डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट में प्रॉबलम है। चूँकि इसमें दवा काम नहीं करेगी इसलिए एक छोटा सा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन का खर्च लगभग ७० हजार रुपए बताया गया।


🔵 खर्च की राशि सुनते ही जैसे लगा कि पैरों के तले की धरती ही खिसक गई। मेरे पास ५ हजार रुपये भी नहीं हैं। ७० हजार कहाँ से लाऊँगा। मैं घर वापस चला गया। मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान था। मेरी इतनी बड़ी हैसियत भी नहीं थी कि उधार लेकर ऑपरेशन कराता। वापस करता भी तो कैसे? यह मेरे लिए उस समय असंभव ही था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। अचानक मुझे गुरुदेव के वे शब्द याद आये कि बेटा ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’


🔴 तुरन्त मैंने हरिद्वार जाने की व्यवस्था बनाई। शान्तिकुञ्ज पहुँचकर डॉ० प्रणव पण्ड्या जी भाई साहब को अपनी रिपोर्ट दिखाई। दवा आदि का पर्चा भी दिखाया। डॉ० साहब भी बोले, स्थिति तो ऑपरेशन की ही बन रही है। फिर मैं गुरुदेव के पास गया। उनसे सारी बातें बताई। रिपोर्ट और सारे पर्चे भी दिखाए। गुरुदेव बोले- तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम्हें कोई बीमारी नहीं है। जाओ मन लगाकर काम करो। खूब साइकिल चलाना। तुम्हें कुछ नहीं होगा।


🔵 कहते हैं, गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है। गुरुदेव का वह वाक्य सचमुच मेरे लिए ब्रह्मवाक्य बन गया। मैं आज तक पूरी तरह स्वस्थ हूँ। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। गुरुदेव की कृपा से मेरा जीवन संकट बड़ी आसानी से टल गया। मैं उस परमसत्ता का बहुत ऋणी हूँ, जिन्होंने मुझ अकिंचन पर अहैतुक कृपा की। मैं आज भी तन- मन से गुरु कार्य में संलग्न हूँ।


🌹 बिजलेश्वरी प्रसाद कसेरा चौक बाजार, बलरामपुर (उ.प्र.) 

🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

हमारे विचारों का अद्भुत प्रभाव

 हमारे विचारों का अद्भुत प्रभाव

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जीवन क्या है? और उसको धारण करने का क्या प्रयोजन है? एक परिपूर्ण सफल जीवन क्या होता हैं? उसके क्या साधन हो सकते हैं? इस प्रकार के अन्य और बहुत से विचार कुछ स्वभावतः ही मनुष्य के मन में उठा करते हैं।


  वास्तव में मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है वह तो एक ही है केवल ईश्वर प्राप्ति परन्तु यह तो सर्व श्रेष्ठ और घोर अन्तिम श्रेणी की बात है। जहाँ पर पहुँचने का सौभाग्य, महान् पुण्यात्मा योगी जनों को ही प्राप्त होता है।


   सर्व साधारण हम आप जैसे मनुष्यों का तो जीवन उद्देश्य कर्त्तव्य पालन ही है -अर्थात् कुशलता, निष्कपटता एवं सरलता पूर्वक सहज स्वभाव से अपना-2 कार्य करना और परिणाम स्वरूप संसार से जाते समय अधिक से अधिक खुशी का भण्डार संसार में छोड़ते हुए विशेष आनन्द और शान्ति को साथ ले जाना। यह है साँसारिक साधारण जीवन की सफल झाँकी।


  हमें ऐसा कर्त्तव्यनिष्ठ सरल जीवन बनाने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिये। इस प्रकार के जीवन का मूलाधार हमारे विचार ही होते हैं। एक आदर्श जीवन विचारों का ही तो संग्रह होता है।


  दूसरों की उन्नति अथवा पतन देखकर जब हम अशुद्ध मन से ईर्ष्या आदि बुरे भावों के शिकार होते हैं तो इस प्रकार दूसरों के कल्याण चाहने वाले बुरे विचारों का संग्रह होकर हमारा मन घोर कलुषित हो जाता है जिस कारण हम स्वयमेव दुःख सागर में डुबकियाँ लेने लगते हैं इस प्रकार हमारा आध्यात्मिक पतन होना शुरू हो जाता है।


  इसके विपरीत हम जितना अधिक स्वार्थ त्याग और पर उपकार के विचारों का केन्द्र अपने अन्दर बनाते जायेंगे, उतना ही अधिक हम आनन्द और शाँति को प्राप्त होंगे। जो लोग हमसे किसी प्रकार का फायदा उठाते हैं वह ही गुप्त और प्रकट रूप से हमारा कल्याण करने वाले होते हैं। हमें ऐसी तैयारी कर लेनी चाहिये कि हम मन, कर्म, वचन से हर समय दूसरों का भला ही सोचते रहें - ऐसा करने से निश्चय हमारे बुरा चाहने वालों की संख्या कम होकर हमारा भला चाहने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी और हम अपने चारों ओर सुखद और शान्तिपूर्ण वातावरण बना सकेंगे। जब मनुष्य का मन क्रोध ईर्ष्यादि बुरे विचारों से रहित हो जाता है तो वह असीम दैवी शक्ति को धारण कर लेता है- उस समय अनेक शत्रु होने पर भी वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।


   इस प्रकार का अद्भुत शान्तिपूर्ण जीवन बनाने में हमें उन घड़ियों में विशेष सतर्कता पूर्वक धैर्य से काम लेने की जरूरत है। जब कि किसी प्राणी द्वारा हमें हानि पहुँचाई जा रही हो। आध्यात्मिक जीवन में यह समय ही-परीक्षा का समय होता है। भरपूर साहस और दृढ़ता से हमें-ऐसे विचारों को हटाने में असीम शक्ति से काम लेना चाहिये जो उस समय में दूसरों का अकल्याण चाहने को हमारे मन में आते हैं। ऐसे समय में हम मन से उनका अकल्याण न चाहें, पर हाँ! कर्तव्य द्वारा उसका उत्तर देना कोई बुरा नहीं है।


  वास्तव में निष्कपट और सरल हृदय वाले व्यक्ति उत्तम लौकिक और पारलौकिक सुखों के स्वामी होते हैं। दगा फरेब, झूठ, ईर्ष्यादि बुरे विचारों से काम चलाने वाले अल्पकालीन तुच्छ सुखों को प्राप्त होते हैं।


   अतएव मन, कार्य, वाणी से सदैव दूसरों का हित ही विचारना और करना चाहिये और प्रातःकाल बिस्तर त्यागते समय प्रभु का नाम स्मरण करने के बाद इस मन्त्र को भी एक बार अवश्य उच्चारण कीजिये कि- “हे प्रभु! संसार के सभी प्राणियों का कल्याण हो।”


Saturday, August 21, 2021

गुरु गायत्री दोऊ खड़े प्रारब्ध करै पार

 👉 गुरु गायत्री दोऊ खड़े प्रारब्ध करै पार


🔴 यह उस समय की घटना है, जब मैं लखीमपुर में रहता था। मेरा पुश्तैनी मकान पलिया कला, लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) में है। क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा खान- पान सब उसी हिसाब से था। सन् १९७५ में मैंने जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानन्द जी महाराज से शिव मंत्र की दीक्षा ले ली थी। वे उस समय बहुत प्रसिद्ध थे। श्री राम जन्म भूमि का शिलान्यास उन्होंने ही किया था। मैं दीक्षा लेकर नियमित शिव मंत्र का जाप किया करता था। लेकिन मुझे अपने में कोई परिवर्तन महसूस नहीं हुआ था।


🔴 मेरे जीवन का स्वर्णिम समय तब आया जब लखनऊ अश्वमेध यज्ञ होने वाला था। रजवन्दन का कार्यक्रम चल रहा था। गाँव में प्रचार- प्रसार हो रहा था। मेरे परिचित एक डाक्टर साहब थे, उन्हीं के द्वारा मुझे इस कार्यक्रम की जानकारी मिली। मैंने पुनः गायत्री मंत्र से दीक्षा ली और घर में देव स्थापना भी कराई। इस प्रकार नियमित गायत्री मंत्र का जप करने लगा। धीरे- धीरे खुद- ब मेरा खान- पान सात्विक हो गया। अब मैंने धर्म के असली स्वरूप को देखा, धीरे- धीरे साधना की ओर रुचि बढ़ी। मगर पिछले दुष्कृत्यों का फल भोगना शेष था, जो शारीरिक रोग के रूप में प्रकट हुआ। मेरे पेट में पथरी जमा हो गयी थी, जिसका ऑपरेशन आवश्यक था। लखनऊ के डॉ० सन्दीप अग्रवाल से चेकअप कराने गया था। घर में किसी को नहीं बताया था, मगर डाक्टर की सलाह पर मैंने उसी समय ऑपरेशन कराना तय कर लिया और अगले दिन २ दिसम्बर १९९२ को वहाँ एडमिट हो गया।


🔵 ऑपरेशन तय हो जाने के बाद से मैं निरंतर पूज्य गुरुदेव का ध्यान करते हुए मानसिक गायत्री जप करता रहा। ऑपरेशन के पहले रोगी को बेहोश किया जाता है। मुझे भी बेहोशी की सूई दी गई, पर मैं बेहोश नहीं हुआ। चुपचाप आँखें बंद कर पड़ा रहा और सब कुछ सुनकर अनुभव करता रहा।


🔴 ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हुई पर आश्चर्य की बात है कि मुझे दर्द का अहसास बिल्कुल नहीं हो रहा था। डॉ० सन्दीप नर्स से कुछ बातें करने लगे। उनके हाथ ऑपरेशन की प्रक्रिया में संलग्र थे। ध्यान बँट जाने से अचानक हाथ गलत दिशा में चल गया। जिसके कारण मेरी आर्टरी (खून की नस) बीच में कट गई। वे बोल उठे- अरे! बहुत गलत हो गया, आर्टरी कट गई। नस कटने से खून का फव्वारा डॉ० संदीप के मुँह पर पड़ने लगा। उन्होंने जल्दी में कहा- ग्लुकोज की पूरी बोतल खोल दो। सभी अपनी- अपनी तरह से उपाय करने लगे। इतने में डॉ० संदीप बोले- ‘‘डॉ० राना हैड गॉन’’।


🔵 इसके बाद मैंने अपने आपको बिल्कुल दूसरी ही दुनिया में पाया। न अस्पताल, न चिकित्सक, न मुझे ऑपरेशन की कोई सुध। हरिद्वार के प्रसिद्ध चंडी मंदिर के नजदीक गंगा नदी में, एक छोटे से शिवालय के पास अथाह जल राशि का स्रोत फूट रहा था। चक्र सा भँवर बना हुआ था। उस भँवर से एक प्रकाशपुँज निकलकर आसमान में दृष्टि सीमा से परे तक गया हुआ था। मैं उस प्रकाश के रास्ते आकाश की ओर चला जा रहा था। उस समय मुझे चिन्ता, शोक, दुःख कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा था। मैं बहुत प्रसन्नचित्त था। इसी बीच अचानक मैंने देखा कि उसी रोशनी के रास्ते ऊपर से परम पूज्य गुरुदेव आ रहे हैं। वे पीले खद्दर का कुर्ता एव सफेद रंग की धोती पहने हुए हैं। उस प्रकाश मार्ग के बीच मुझे देख गुरु देव आश्चर्य से बोले ‘‘अरे! डॉ० राना, तुम यहाँ कैसे? जाओ, अभी तुम्हें बहुत काम करने हैं। उनके इतना कहते ही मैं पुनः लखनऊ के उस ऑपरेशन रूम में पहुँच गया।


🔴 शरीर में ऑपरेशन वाले स्थान पर बिजली के झटके सा अनुभव हुआ और पूरी तरह चेतना लौट आयी। पुनः ऑपरेशन रूम की सारी हलचलें स्पष्ट रूप से अनुभव होने लगीं। वहाँ असिस्टेंट और नर्स से डॉ० संदीप की बातचीत से ही पता चला कि मैं अचेत हो गया था। शायद उन्हें मेरे जीवित होने में भी संदेह था; और अभी- अभी वे आश्वस्त हुए कि मैं जीवित हूँ। ऑपरेशन की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई। अन्त में जब टाँका लगाकर पट्टी बाँधी गई तब तक मैं गायत्री मंत्र का मानसिक जप करता रहा।


🔵 ऑपरेशन के तीसरे दिन टाँका कटा। उस दिन बाबरी मस्जिद प्रकरण के कारण सभी जगह कर्फ्यू लगा हुआ था। मैं अपनी गाड़ी खुद चलाकर मन में गायत्री मंत्र जपता हुआ सकुशल अपने घर बलरामपुर पहुँच गया था।


🔴 अपनी पिछली करनी का फल तो असमय मौत ही थी, पर गुरुदेव ने कृपा कर हमें अपनाया और वह मार्ग दिखाया जिससे इस जीवन का सदुपयोग जान सकूँ। उनकी इस अहैतुकी कृपा से मैं आजीवन कृतार्थ हूँ।                     

    

🌹 डॉ० कृष्ण कुमार राना पहलवारा (उत्तरप्रदेश)

🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा

 ऋषि चिंतन

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धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा

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👉 *"धर्म" ही मनुष्य का आधार है, "धर्म" ही जीवन है और "धर्म" ही मरने पर साथ जाता है ।* मनु महाराज कहते हैं -- *"पिता", "माता", "पुत्र", "स्त्री"* और *"जाति वाले"* ये परलोक में सहायता नहीं करते, केवल एक *"धर्म"* ही सहायक होता है । प्राणी अकेला उत्पन्न होता है, अकेला ही मरता है और अकेला ही पुण्य-पाप का भोग करता है, भाई-बंधु तो मरे शरीर को काठ और मिट्टी के ढेले की तरह पृथ्वी पर छोड़कर वापस लौट आते हैं, *केवल "धर्म" ही प्राणी के पीछे-पीछे जाता है ।*


👉 जिस दिन संसार से *"धर्म"* सर्वथा मिटा दिया जाएगा, जिस दिन लोग आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक को मानना सर्वथा छोड़ देंगे, *जिस दिन कर्मफल के सिद्धांत में लोगों की आस्था न रहेगी,* जिस दिन परमात्मा की भक्ति द्वारा परमात्मा के गुणों को अपने भीतर धारण करने वाले धर्मात्मा लोग सर्वथा उत्पन्न होने बंद हो जाएँगे, *उस दिन संसार से सच्चरित्रता उठ जाएगी ।*


👉 नास्तिक लोगों में भी जो कुछ सच्चरित्रता दिखाई पड़ती है, *उसका मूल स्रोत भी "धर्म" ही है ।* *"धर्म"* द्वारा सिखाए गए परम्परा से चले आ रहे सच्चरित्रता के तत्वों को नास्तिक लोगों ने स्वीकार किया है । इसी आधार पर उनका समुदाय, सम्प्रदाय जीवित रह सकने में समर्थ हो रहा है । *वस्तुतः "धर्म" तत्व इतना सार्वभौम, सर्वकालीन और शाश्वत है कि उसे छोड़ देने से नास्तिक-आस्तिक किसी का भी काम नहीं चल सकता ।

देने वाला कौन

 देने वाला कौन?

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एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।


कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।


समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।


अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।


लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।


कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।


साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।


कथासार- 

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किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, 

वास्तविकता ये है कि सिर्फ परमात्मा ने हमें निमित्त मात्र बनाया हैं उन तक उनकी जरूरतों तक पहुचाने के लिये तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??

श्रम देवता की साधना

 श्रम देवता की साधना

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मनुष्य की छिपी सामर्थ्य और अजस्र गरिमा के प्रकटीकरण का एक ही उपाय है।अनवरत श्रम।श्रमनिष्ठा शरीर को थकाने वाली प्रक्रिया का नाम नहीं ।यह वह साधना है, जिसमें निराकार को साकार में परिणत किया जाता है और साकार को सुविकसित और सुसज्जित बनाया जाता है ।अगति को प्रगति में बदलने की सामर्थ्य केवल श्रम में है । पदार्थ का छोटे से छोटा परमाणु बिना विश्राम किए अनवरत गति से सक्रिय है । पवन को एक क्षण के लिए भी चैन नहीं । सूर्य और सितारे अपने नियत कर्मों में संलग्न हैं।धरती माँ का चिरंतन स्वप्न है कि उसका पुत्र उसे अधिक शोभायमान बनाने के लिए श्रम करे ।संसार की अपेक्षा है कि पुरुषार्थ का पूरा उपयोग हो और सुखद सम्भावनाओं से सारा वातावरण भर दिया जाए । जीवन की माँग है कि उसके प्रत्येक पक्ष को गौरवान्वित बनाने के लिए स्वेदबिंदु निरंतर झरते रहें । पसीने से पवित्र और कुछ नहीं ।जिस ललाट पर वह झलकता है, उसे समुन्नत बनाता चला जाता है । जिस भूमि पर गिरता है, उसे नंदनवन बना देता है ।अनगढ़ पत्थरों को देवप्रतिमा के रूप में पूजनीय बनाने का श्रेय, श्रम के देवता को ही दिया जा सकता है । कलाकारिता का सर्वोत्तम रहस्य अनवरत श्रम में सन्निहित है ।


पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

"हम स्वयं अपने स्वामी बनें"

 🔴 "हम स्वयं अपने स्वामी बनें"

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तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दुःखी करते हो और कहते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दुःख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ कह दिया, तुमने मान लिया। यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।


सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किंतु उसने दूसरों की राय न मानी।


दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना, मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।


स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्त्तव्य पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

Friday, August 20, 2021

निंदकोंकी परवाह किये बिना हम कर्तव्य पथ पर डटें रहें

 निंदकोंकी परवाह किये बिना हम कर्तव्य पथ पर डटें रहें

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एक थे सर्वनिंदक महाराज। काम-धाम कुछ आता नहीं था पर निंदा गजब की करते थे।हमेशा औरों के काम में टाँग फँसाते थे।

  

अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके सुस्ताने भी बैठता तो कहते, 'मूर्ख एक नम्बर का कामचोर है। अगर कोई काम करते हुए मिलता तो कहते, 'मूर्ख जिंदगी भर काम करते हुए मर जायेगा।'

   

कोई पूजा-पाठ में रुचि दिखाता तो कहते, 'पूजा के नाम पर देह चुरा रहा है। ये पूजा के नाम पर मस्ती करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।' अगर कोई व्यक्ति पूजा-पाठ नहीं करता तो कहते, 'मूर्ख नास्तिक है! भगवान से कोई मतलब ही नहीं है। मरने के बाद पक्का नर्क में जायेगा।'

   

माने निंदा के इतने पक्के खिलाड़ी बन गये कि आखिरकार नारदजी ने अपने स्वभाव अनुसार.. विष्णु जी के पास इसकी खबर पहुँचा ही दिया। विष्णु जी ने कहा 'उन्हें विष्णु लोक में भोजन पर आमंत्रित कीजिए।'

   

नारद तुरंत भगवान का न्योता लेकर सर्वनिंदक महाराज के पास पहुँचे और बिना कोई जोखिम लिए हुए उन्हें अपने साथ ही विष्णु लोक लेकर पहुँच गये कि पता नहीं कब महाराज पलटी मार दे।

   

उधर लक्ष्मी जी ने नाना प्रकार के व्यंजन अपने हाथों से तैयार कर सर्वनिंदक जी को परोसा। सर्वनिंदक जी ने जमकर हाथ साफ किया। वे बड़े प्रसन्न दिख रहे थे। विष्णु जी को पूरा विश्वास हो गया कि सर्वनिंदक जी लक्ष्मी जी के बनाये भोजन की निंदा कर ही नहीं सकते। फिर भी नारद जी को संतुष्ट करने के लिए पूछ लिया, 'और महाराज भोजन कैसा लगा?'

   

सर्वनिंदक जी बोले, 'महाराज भोजन का तो पूछिए मत, आत्मा तृप्त हो गयी। लेकिन... भोजन इतना भी अच्छा नहीं बनना चाहिए कि आदमी खाते-खाते प्राण ही त्याग दे।'

   

विष्णु जी ने माथा पीट लिया और बोले, 'हे वत्स, निंदा के प्रति आपका समर्पण देखकर मैं प्रसन्न हुआ। आपने तो लक्ष्मी जी को भी नहीं छोडा़, वर माँगो।'

   

सर्वनिंदक जी ने शर्माते हुए कहा -- 'हे प्रभु मेरे वंश में वृध्दि होनी चाहिए।' तभी से ऐसे निरर्थक सर्वनिंदक बहुतायत में पाए जाने लगे।


सार : हम चाहे कुछ भी कर लें.. इन सर्वनिंदकों की प्रजाति को संतुष्ट नहीं कर सकते! अतः ऐसे लोगों की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य पथ पर हमें अग्रसर रहना चाहिए।

*तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५१)*

 👉 *तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५१)*

*विचार से भी परे*


पर ब्रह्म को विचार इसलिये कहा गया कि वह सूक्ष्म है अन्यथा शास्त्रकारों ने उसे अचिंत्य, अगोचर और अगम्य कहा गया है। *उसकी व्याख्या विवेचना में तत्व वेत्ताओं ने कुछ चर्चा की है पर साथ ही नेति नेति कह कर अपने ज्ञान परिधि की स्वल्पता स्वीकार कर ली है।* वस्तुतः समग्र ब्रह्म का विवेचन बुद्धि विज्ञान एवं साधनों के माध्यम से सम्भव हो ही नहीं सकता। तब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ईश्वर प्राप्ति की—ईश्वर दर्शन की—जो चर्चाएं होती रहती हैं, वे क्या हैं? *यहां इतना ही कहा जा सकता है कि जीव और ब्रह्म की मिलन पृष्ठ भूमि के रूप में जिस ईश्वर की विवेचना होती है उसी का साक्षात्कार एवं अनुभव सम्भव है।*


*आकाश और धरती जहां मिलते हैं उसे अन्तरिक्ष कहते हैं।* अन्तरिक्ष का सुहावना दृश्य सूर्योदय और सूर्यास्त के समय प्रातः सायं देखा जा सकता है। दो रंगों के मिलने से एक तीसरा रंग बनता है। भूमि और बीज के समन्वय की प्रतिक्रिया अंकुर के रूप में फूटती है। *पति-पत्नी का मिलन अभिनव उल्लास के रूप में प्रकट होता है और प्रतिफल सन्तान के रूप में सामने आता है। जीव और ब्रह्म के मिलन की प्रतिक्रिया को ईश्वर कह सकते हैं।* गैस और गैस मिल कर पानी के रूप में परिणत हो जाती है। शरीर और प्राण का मिलन जीवन के रूप में दृष्टिगोचर होता है। *आग और जल के मिलने से भाप बनती है नैगेटिव और पौजिटिव धाराएं मिलने पर शक्तिशाली विद्युत प्रवाह गतिशील होता है।* हम उसी ईश्वर से परिचित होते हैं जो आत्मा से परमात्मा के मिलन की प्रतिक्रिया के रूप में अनुभव की जाती है।


*वेदान्त दर्शन में ईश्वर के रूप-स्वरूप की जितने तात्विक स्वरूप की विवेचना की गई है उतनी अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती।* ‘तत्वमसि’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’, ‘शिवोहम्’ सच्चिदानन्दोहम् सोहम्, आदि सूत्रों में यह रहस्योद्घाटन किया गया है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है। यहां आत्मा से तात्पर्य पवित्र और परिष्कृत चेतना से है। *अति मानस-सुपर ईगो—पूर्ण पुरुष—भगवान परमहंस—स्थिति प्रज्ञ-आदि शब्दों में व्यक्तित्व के उस उच्चस्तर का संकेत हैं जिसे देवात्मा एवं परमात्मा भी कहा जाता है।* इसी स्थिति को उपलब्ध कर लेना आत्म-साक्षात्कार—ईश्वर प्राप्ति आदि के नाम से निरूपित किया गया है। *बन्धन, मुक्ति या जीवन-मुक्ति इसी स्थिति को कहते हैं।*


.... *क्रमशः जारी*

✍🏻 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

📖 *तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८२*

*परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी*


https://awgpskj.blogspot.com/2021/08/blog-post_1.html

*भक्तिगाथा (भाग ५१)*

 👉 *भक्तिगाथा (भाग ५१)* 

*अद्भुत थी ब्रज गोपिकाओं की भक्ति*


*मैया ने बलदाऊ से कha कन्हैया तो नटखट और चपल है।* तुम अपने भाई और सखाओं का ध्यान रखना। दाऊ ने सिर हिलाकर हामी भरी और यतिं्कचित मुस्कराए भी, अरे यह मैया भी कितनी भोली है, जो समूची सृष्टि का ध्यान रखता है, भला उसका कौन ध्यान रखेगा पर उन्होंने कहा कुछ नहीं- सबके साथ चल पड़े। *रास्ते में मनसुखा ने कहा- कि कान्हा आज हम सब किधर चलेंगे। उत्तर में कन्हैया मुस्कराए और बोले मैं तो कहीं भी आता जाता नहीं। जो मुझे बुलाता है मैं उसी के पास जाता हूँ।*

लेकिन मनसुखा की समझ में यह सब नहीं आया। *वह कहने लगे, कि कान्हा! इन गोपियों के पास आज नहीं चलेंगे। ये सब मैया से हमारी शिकायत लगाती हैं। मनसुखा दादा! तुम जानते हो कि यदि कोई मुझे बुलाए तो मैं रूकता नहीं हूँ।* इधर कान्हा-मनसुखा की बातों से अनजान गोपियाँ अपने-अपने घरों में अपने हृदय धन के आने का इन्तजार कर रही थीं। *सुमुखि, सुनयना, त्रिशला, विशाखा, श्यामा और भी न जाने कितनी सखियों को इन्तजार था- अपने प्यारे कन्हाई के आने का। पर आज किसी को कृष्ण कहीं नहीं दिख रहे थे।*

*वे तो कहीं किसी अन्य भावलोक में नयी लीला के सूत्र रच रहे थे। उनकी प्रेरणा से भगवान् सदाशिव योगी वेश में ब्रज आए।* भगवती पूर्णमासी बनी योगमाया ने विहंस कर उनकी अगवानी की और कहने लगीं- आज यहाँ कैसे पधारे प्रभु! भगवान् भोलेनाथ हंसकर बोले- अरे देवी! मैं तो नटवरनागर की लीला का एक पात्र हूँ। *वे प्रभु जैसा चाहते हैं वैसा ही मैं कर लेता हूँ। यह कहकर भगवान् सदाशिव, योगी वेश में ब्रज की गलियों में विचरने लगे।* उनके मुख से निकलती- ‘अलख निरंजन’ की ध्वनि ब्रज के घरों, गलियों, चौबारों में गूंजने लगी।

.... *क्रमशः जारी*

✍🏻 *डॉ. प्रणव पण्ड्या*

📖 *भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९४*


https://awgpskj.blogspot.com/2021/08/blog-post_20.html