Wednesday, September 29, 2021

उठो ! हिम्मत करो


‼️उठो ! हिम्मत करो‼️

*******

       स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रुकावटें नहीं पडी़ं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बडी़-बडी़ कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।

       उठो ! उदासीनता त्यागो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दुःखमय दीखता है, जब तक हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं।

       सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक शक्तियों का विकास करेगा--


-------* अखण्ड ज्योति--

फरवरी 1940, पृष्ठ- 09 से साभार

क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है

 👉 क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है

**********************************

🔷 क्षमा उठाती है ऊँचा आप को: व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में वो खुद बहुत नीचे उतर जाता है।


🔶 एक बार एक धोबी नदी किनारे की सिला पर रोज की तरह कपडे धोने आया। उसी सिला पर कोई महाराज भी ध्यानस्थ थे। धोबी ने आवाज़ लगायी, उसने नहीं सुनी। धोबी को जल्दी थी, दूसरी आवाज़ लगायी वो भी नहीं सुनी तो धक्का मार दिया।


🔷 ध्यानस्थ की आँखें खुली, क्रोध की जवाला उठी दोनों के बीच में खूब मार -पिट और हाथा पायी हुयी। लूट पिट कर दोनों अलग अलग दिशा में बेठ गए। एक व्यक्ति दूर से ये सब बेठ कर देख रहा था। साधु के नजदीक आकर पूछा, महाराज आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी, उसने मारा बहुत आपको। महाराज ने कहा, उस समय आप छुडाने क्यों नहीं आए? व्यक्ति ने कहा, आप दोनों के बीच मे जब युद्ध हो रहा था उस समय में यह निर्णय नहीं कर पाया की धोबी कोन है और साधू कौन है?


🔶 प्रतिशोध और बदला साधू को भी धोबी के स्तर पर उतार लाता है। इसीलिए कहा जाता है की, बुरे के साथ बुरे मत बनो, नहीं तो साधू और शठ की क्या पहचान। दूसरी तरफ, क्षमा करके व्यक्ति अपने स्तर से काफी ऊँचा उठ जाता है। इस प्रकिर्या में वो सामने वाले को भी ऊँचा उठने और बदलने की गुप्त प्रेरणा या मार्गदर्शन देता है।


🔷 “प्रतिशोध और गुस्से से हम कभी कभार खुद को नुक्सान पहुचां बैठते हैं जिस से हमें बाद में खुद बहुत पछतावा होता है।


🔶 आईये हम कुछ बातें बताते हैं इस से जुडी हुयी.”

*****************************************

👉 1. दोस्तों गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर करके गलत ही साबित होता है, तो इसीलिए हमें खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है।


👉 2. क्षमा करने से सामने वाले व्यक्ति के नजर में हमारी इज्जत, सम्मान और बढ़ जाती है।


👉 3. गुस्सा करने वाला व्यक्ति हमेशा खुद का ही नुक्सान पंहुचाता है।


👉 4. गुस्से में हमेशा अक्सर करके वो काम हो जाता है जिस से हम दूसरों को और खुद को भी नुक्सान पहुचाने के साथ साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं।


👉 5. दोस्तों आपको जब भी गुस्सा आये या किसी के ऊपर गुस्सा हो तो हमें चाहिए की उस समय हम अपने दिमाग और मन को शांत रखें (नियंत्रण करना सीखें) या फिर हम वहां से कहीं दूसरी जगह पर चले जाएँ।

जीवन-साधना से लाभ?

  जीवन-साधना से लाभ?

**********************

🔷 मनुष्य विद्युत-शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि उसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है, किन्तु हम उसका सदुपयोग करना सीख जायें, तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का समुचित उपयोग करना, सीखना वैसा ही उपयोगी है, जैसे बैंक में जमा हुए रुपये को निकालने की जानकारी रखना। वे मनुष्य बड़े अभागे हैं, जिनकी विपुल सम्पत्ति बैंक में जमा है, किन्तु उसे निकालने की विधि नहीं जानते और पैसे-पैसे को मुहताज फिरते हैं। आध्यात्मिक साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाय।

  

🔶 दु:खों को दूर करने और सुख प्राप्त करने का हम सतत प्रयत्न करते हैं, सारा जीवन इन्हीं दोनों की उलट-पुलट में व्यतीत हो जाता है, किन्तु मनोकामना पूरी नहीं होती। यदि कोई ऐसा उद्ïगम प्राप्त हो जाय, जहाँ से सुख और दु:ख का उदय होता है और वहाँ अपनी इच्छानुसार चाहे जिसे ले लेने की सुविधा हो, तो क्या इसे मामूली चीज समझना चाहिए? विद्या, धन, स्वास्थ्य, स्त्री, सन्तान प्राप्त करने पर भी जिस सुख को हम नहीं प्राप्त कर सकते उसकी सच्ची स्थिति प्राप्ति का सच्चा मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।

  

🔷 अपनी शक्ति को विकसित करना यह कितना महान लाभ है। मानवीय अन्त:स्थल में ऐसे-ऐसे अस्त्र-शस्त्र छिपे पड़े हैं जो भौतिक विज्ञान द्वारा अब तक न तो बन सके हैं और न भविष्य में बनने की संभावना है। यह हथियार वाल्मीकि जैसे डाकुओं को ऋषि के रूप में परिणित करने की भी शक्ति रखते हैं। सुदामा और नरसी जैसे दरिद्रों के सामने क्षण भर में स्वर्ण सम्पदा के पर्वत खड़े कर सकते हैं, कोढिय़ों को स्वर्णकाय बना सकते हैं और डूबते दरिद्रों को पार कर सकते हैं। यह दिव्य शक्तियाँ भी आत्म-साधना द्वारा ही सम्भव हैं।

  

🔶 हम स्वयं क्या हैं? संसार क्या है? स्वर्ग और मुक्ति क्या है? इनका ठीक ज्ञान के बजाय साधना तत्व के बारे में जान लिया जाय। कारण हजारों मन सिद्धान्तों के ज्ञान से एक छटाक भर साधनों का आचरण अधिक लाभप्रद है। इसलिए अपने दैनिक जीवन में योग, धर्म एवं दर्शन शास्त्रों में बताए हुए साधनों का अभ्यास कीजिए, जिससे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य- ‘आत्म-साक्षात्कार’ की शीघ्र प्राप्ति हो।

  

🔷 इस साधनपट में उपरोक्त साधनों का तत्व एवं सनातन धर्म का विशुद्ध स्वरूप ३२ शिक्षाओं द्वारा दिया गया है। उनका अभ्यास वर्तमान काल के अत्यन्त कार्यग्रस्त स्त्री पुरुषों के लिए भी सुशक्य है। उनके समय और परिमाण में यथानुकूल परिवर्तन कर लीजिए और उनकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जाइये। आप अपने चरित्र या स्वभाव में एकाएक परिवर्तन नहीं कर सकेंगे, इसलिए आरम्भ में इनमें थोड़ी ऐसी शिक्षाओं के आचरण का संकल्प कीजिए, जिनसे आपके वर्तमान स्वभाव और चरित्र में थोड़ा निश्चित सुधार हो। क्रमश: इन साधनों का समय और परिमाण बढ़ाते जाइये। यदि किसी दिन बीमारी, सांसारिक कार्यों की अधिकता या किसी अनिवार्य कारणों से आप निश्चित साधनाओं को न कर सकें तो उनके बदले पूरे समय या यथासम्भव ईश्वर नाम स्मरण या जप कीजिए, जो चलते-फिरते या अपने सांसारिक कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Tuesday, September 28, 2021

पाँच अमानतें, जो ईश्वरीय प्रयोजनों में ही लगाई जाएँ!

 👉 पाँच अमानतें, जो ईश्वरीय प्रयोजनों में ही लगाई जाएँ!

*******************************************

🔷 गीता में भगवान ने विभूति योग का वर्णन करते हुए बताया है कि जहाँ कहीं विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं, वहाँ मेरा विशेष अंश देखा, समझा जाना चाहिए। सर्व साधारण को जो विशेषताएँ, विभूतियाँ नहीं मिली हैं और वे यदि कुछ ही लोगों को मिलती हैं, तो यही माना जायेगा कि यह विशुद्ध अमानत है और उन्हें अपने परम प्रिय उद्यान को सुरम्य, सुविकसित बनाने के लिए ही दिया है। यदि विशेष अनुदान को अपने पूर्व कृत पुण्यों के कारण उपलब्ध प्रारब्ध माना जाए, तो भी उसका प्रयोजन यही है कि हर जन्म में उस प्रक्रिया को अधिकाधिक प्रखर किया जाय और अधिक पुण्य करते हुए, अधिक उत्तम प्रतिफल प्राप्त करते हुए उस प्रगति चक्र को तीव्र किया जाय और जीवन लक्ष्य तक जल्दी से जल्दी पहुँचा जाए।


🔶 यह सन्देश हर विभूतिवान व्यक्ति तक पहुँचाना युग निर्माण योजना का महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। आग लगने पर फायर ब्रिगेड यूनिटों से अधिकाधिक तत्परता से काम करने की आशा की जाती है। यदि वे उपेक्षा बरतें तो उनकी भर्त्सना भी कठोरतापूर्वक की जाती है। जहाँ विभूतियाँ संग्रहीत हैं, वहाँ युग की पुकार पहुँचाई जा रही है कि उन विभूतियों के अधिकाधिक मात्रा में लोक-मंगल के लिए समर्पित करने का ठीक यही समय है। कहना न होगा कि भावनात्मक नवनिर्माण से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ सत्प्रयोजन हो नहीं सकता।


🔷 ईश्वर प्रदत्त यह पाँच विभूतियाँ हैं। भावना, विद्या, प्रतिभा, सम्पत्ति और कला। यह जहाँ भी हैं, जिनके पास भी हैं, उसे अनुभव करना चाहिए कि भगवान की कुछ अतिरिक्त कलाएँ, अतिरिक्त अनुकम्पाएँ उसे उपलब्ध हैं। इसमें उसे अपना सौभाग्य और भगवान का विशेष अनुग्रह मानना चाहिए कि जो सर्वसाधारण को नहीं मिला वह उन्हें विशेष अमानत और विशेष अनुग्रह के रूप में मिला है।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.30

आत्मशक्ति का अकूत भण्डार:गायत्री मंत्रानुष्ठान

 आत्मशक्ति का अकूत भण्डार:गायत्री मंत्रानुष्ठान

*************************************

यों गायत्री नित्य उपासना करने योग्य है। त्रिकाल सन्ध्या में प्रात:, मध्याह्न, सायं तीन बार उसी की उपासना करने का नित्यकर्म शास्त्रों में आवश्यक बतलाया गया है। जब भी जितनी अधिक मात्रा में गायत्री का जप, पूजन, चिन्तन, मनन किया जा सके, उतना ही अच्छा है, क्योंकि ‘अधिकस्य अधिकं फलम्।’


परन्तु किसी विशेष प्रयोजन के लिए जब विशेष शक्ति का सञ्चय करना पड़ता है, तो उसके लिए विशेष क्रिया की जाती है। इस क्रिया को अनुष्ठान के नाम से पुकारते हैं। जब कभी परदेश के लिए यात्रा की जाती है, तो रास्ते के लिए कुछ भोजन सामग्री तथा खर्च के लिए रुपये साथ रख लेना आवश्यक होता है। यदि यह मार्गव्यय साथ न हो, तो यात्रा बड़ी कष्टसाध्य हो जाती है। अनुष्ठान एक प्रकार का मार्गव्यय है। इस साधना को करने से जो पूँजी जमा हो जाती है, उसे साथ लेकर किसी भी भौतिक या आध्यात्मिक कार्य में जुटा जाए, तो यात्रा बड़ी सरल हो जाती है।


सिंह जब हिरन पर झपटता है, बिल्ली जब चूहे पर छापा मारती है, बगुला जब मछली पर आक्रमण करता है, तो उसे एक क्षण स्तब्ध होकर, साँस रोककर, जरा पीछे हटकर अपने अन्दर की छिपी हुई शक्तियों को जाग्रत् और सतेज करना पड़ता है, तब वह अचानक अपने शिकार पर पूरी शक्ति के साथ टूट पड़ते हैं और मनोवाँछित लाभ प्राप्त करते हैं। ऊँची या लम्बी छलाँग भरने से पहले खिलाड़ी लोग कुछ क्षण रुकते, ठहरते और पीछे हटते हैं, तदुपरान्त छलाँग भरते हैं। कुश्ती लडऩे वाले पहलवान ऐसे ही पैंतरे बदलते हैं। बन्दूक चलाने वाले को भी घोड़ा दबाने से पहले यही करना पड़ता है। अनुष्ठान द्वारा यही कार्य आध्यात्मिक आधार पर होता है। किसी विपत्ति को छलाँग कर पार करना है या कोई सफलता प्राप्त करनी है, तो उस लक्ष्य पर पडऩे के लिए जो शक्ति सञ्चय आवश्यक है, वह अनुष्ठान द्वारा प्राप्त होती है।


बच्चा दिन भर माँ- माँ पुकारता रहता है, माता भी दिन भर बेटा, लल्ला कहकर उसको उत्तर देती रहती है, यह लाड़- दुलार यों ही दिन भर चलता रहता है। पर जब कोई विशेष आवश्यकता पड़ती है, कष्ट होता है, कठिनाई आती है, आशंका होती है या साहस की जरूरत पड़ती है, तो बालक विशेष बलपूर्वक, विशेष स्वर से माता को पुकारता है। इस विशेष पुकार को सुनकर माता अपने अन्य कामों को छोडक़र बालक के पास दौड़ आती है और उसकी सहायता करती है। अनुष्ठान साधक की ऐसी ही पुकार है, जिसमें विशेष बल एवं विशेष आकर्षण होता है, उस आकर्षण से गायत्री- शक्ति विशेष रूप से साधक के समीप एकत्रित हो जाती है।


जब सांसारिक प्रयत्न असफल हो रहे हों, आपत्ति का निवारण होने का मार्ग न सूझ पड़ता हो, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ हो, भविष्य निराशाजनक दिखाई दे रहा हो, परिस्थितियाँ दिन- दिन बिगड़ती जाती हों, सीधा करते उलटा परिणाम निकलता हो, तो स्वभावत: मनुष्य के हाथ- पैर फूल जाते हैं। चिन्ताग्रस्त और उद्विग्र मनुष्य की बुद्धि ठीक काम नहीं करती। जाल में फँसे कबूतर की तरह वह जितना फडफ़ड़ाता है, उतना ही जाल में और फँसता जाता है। ऐसे अवसरों पर ‘हारे को हरिनाम’ बल होता है। गज, द्रौपदी, नरसी, प्रह्लाद आदि को उसी बल का आश्रय लेना पड़ा था। देखा गया है कि कई बार जब वह सांसारिक प्रयत्न विशेष कारगर नहीं होते, तो दैवी सहायता मिलने पर सारी स्थिति बदल जाती है और विपदाओं की रात्रि के घोर अन्धकार को चीरकर अचानक ऐसी बिजली कौंध जाती है, जिसके प्रकाश में पार होने का रास्ता मिल जाता है। अनुष्ठान ऐसी ही प्रक्रिया है। वह हारे हुए का चीत्कार है जिससे देवताओं का सिंहासन हिलता है। अनुष्ठान का विस्फोट हृदयाकाश में एक ऐसे प्रकाश के रूप में होता है, जिसके द्वारा विपत्तिग्रस्त को पार होने का रास्ता दिखाई दे जाता है।


सांसारिक कठिनाइयों में, मानसिक उलझनों में, आन्तरिक उद्वेगों में गायत्री अनुष्ठान से असाधारण सहायता मिलती है। यह ठीक है कि किसी को सोने का घड़ा भर कर अशर्फियाँ गायत्री नहीं दे जाती, पर यह भी ठीक है कि उसके प्रभाव से मनोभूमि में ऐसे मौलिक परिवर्तन होते हैं, जिनके कारण कठिनाई का उचित हल निकल आता है। उपासक में ऐसी बुद्धि, ऐसी प्रतिभा, ऐसी सूझ, ऐसी दूरदर्शिता पैदा हो जाती है, जिसके कारण वह ऐसा रास्ता प्राप्त कर लेता है, जो कठिनाई के निवारण में रामबाण की तरह फलप्रद सिद्ध होता है। भ्रान्त मस्तिष्क में कुछ असंगत, असम्भव और अनावश्यक विचारधाराएँ, कामनाएँ, मान्यताएँ घुस पड़ती हैं, जिनके कारण वह व्यक्ति अकारण दु:खी बना रहता है। गायत्री साधना से मस्तिष्क का ऐसा परिमार्जन हो जाता है, जिसमें कुछ समय पहले जो बातें अत्यन्त आवश्यक और महत्त्वपूर्ण लगती थीं, वे ही पीछे अनावश्यक और अनुपयुक्त लगने लगती हैं। वह उधर से मुँह मोड़ लेता है। इस प्रकार यह मानसिक परिवर्तन इतना आनन्दमय सिद्ध होता है, जितना कि पूर्वकल्पित कामनाओं के पूर्ण होने पर भी सुख न मिलता। अनुष्ठान द्वारा ऐसे ही ज्ञात और अज्ञात परिवर्तन होते हैं, जिनके कारण दु:खों और चिन्ताओं से ग्रस्त मनुष्य थोड़े ही समय में सुख- शान्ति का स्वर्गीय जीवन बिताने की स्थिति में पहुँच जाता है।


सवा लाख मन्त्रों के जप को अनुष्ठान कहते हैं। हर वस्तु के पकने की कुछ मर्यादा होती है। दाल, साग, ईंट, काँच आदि के पकने के लिए एक नियत श्रेणी का तापमान आवश्यक होता है। वृक्षों पर फल एक नियत अवधि में पकते हैं। अण्डे अपने पकने का समय पूरा कर लेते हैं, तब फूटते हैं। गर्भ में बालक जब अपना पूरा समय ले लेता है, तब जन्मता है। यदि उपर्युक्त क्रियाओं में नियत अवधि से पहले ही विक्षेप उत्पन्न हो जाय, तो उनकी सफलता की आशा नहीं रहती। अनुष्ठान की अवधि, मर्यादा, जप- मात्रा सवा लक्ष जप है। इतनी मात्रा में जब वह पक जाता है, तब स्वस्थ परिणाम उत्पन्न होता है। पकी हुई साधना ही मधुर फल देती है!

Monday, September 27, 2021

गायत्री मंत्रानुष्ठान की विधि

 गायत्री मंत्रानुष्ठान की विधि

*********************

अनुष्ठान किसी भी मास में किया जा सकता है। तिथियों में पन्चमी, एकादशी, पूर्णमासी शुभ मानी गयी हैं। पन्चमी को दुर्गा, एकादशी को सरस्वती, पूर्णमासी को लक्ष्मी तत्त्व की प्रधानता रहती है। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दोनों में से किसी का निषेध नहीं है, किन्तु कृष्णपक्ष की अपेक्षा शुक्लपक्ष अधिक शुभ है।


अनुष्ठान आरम्भ करते हुए नित्य गायत्री का आवाहन करें और अन्त करते हुए विसर्जन करना चाहिए। इस प्रतिष्ठा में भावना और निवेदन प्रधान है। श्रद्धापूर्वक ‘भगवती, जगज्जननी, भक्तवत्सला माँ गायत्री यहाँ प्रतिष्ठित होने का अनुग्रह कीजिए’ ऐसी प्रार्थना संस्कृत या मातृभाषा में करनी चाहिए। विश्वास करना चाहिए कि प्रार्थना को स्वीकार करके वे कृपापूर्वक पधार गयी हैं। विसर्जन करते समय प्रार्थना करनी चाहिए कि ‘आदिशक्ति, भयहारिणी, शक्तिदायिनी, तरणतारिणी मातृके! अब आप विसर्जित हों’। इस भावना को भी संस्कृत में या अपनी मातृभाषा में कह सकते हैं। इस प्रार्थना के साथ- साथ यह विश्वास करना चाहिए कि प्रार्थना स्वीकार करके वे विसर्जित हो गयी हैं।


कई ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि जप से दसवाँ भाग हवन, हवन से दसवाँ भाग तर्पण, तर्पण से दसवाँ भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। यह नियम तन्त्रोक्त रीति से किये गये पुरश्चरण के लिए है। इन पंक्तियों में वेदोक्त योगविधि की दक्षिणमार्गी साधना बताई जा रही है। इसके अनुसार तर्पण की आवश्यकता नहीं है। अनुष्ठान के अन्त में १०८ आहुति का हवन तो कम से कम होना आवश्यक है। अधिक सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार है। इसी प्रकार त्रिपदा गायत्री के लिए कम से कम तीन ब्राह्मणों का भोजन भी होना ही चाहिए। दान के लिए इस प्रकार की कोई मर्यादा नहीं बाँधी जा सकती। यह साधक की श्रद्धा का विषय है, पर अन्त में दान अवश्य करना चाहिए।


किसी छोटी चौकी, चबूतरी या आसन पर फूलों का एक छोटा सुन्दर- सा आसन बनाना चाहिए और उस पर गायत्री की प्रतिष्ठा होने की भावना करनी चाहिए। साकार उपासना के समर्थक भगवती का कोई सुन्दर- सा चित्र अथवा प्रतिमा को उन फूलों पर स्थापित कर सकते हैं। निराकार के उपासक निराकार भगवती की शक्ति पूजा का एक स्फुल्लिंग वहाँ प्रतिष्ठित होने की भावना कर सकते हैं। कोई- कोई साधक धूपबत्ती, दीपक की अग्रिशिखा में भगवती की चैतन्य ज्वाला का दर्शन करते हैं और उसी दीपक या धूपबत्ती को फूलों पर प्रतिष्ठित करके अपनी आराध्य शक्ति की उपस्थिति अनुभव करते हैं। विसर्जन के समय प्रतिमा को हटाकर शयन करा देना चाहिए, पुष्पों को जलाशय या पवित्र स्थान में विसर्जित कर देना चाहिए। अधजली धूपबत्ती या रुई बत्ती को बुझाकर उसे भी पुष्पों के साथ विसर्जित कर देना चाहिए। दूसरे दिन जली हुई बत्ती का प्रयोग फिर से न होना चाहिए।


गायत्री पूजन के लिए पाँच वस्तुएँ प्रधान रूप से मांगलिक मानी गयी हैं। इन पूजा पदार्थों में वह प्राण है, जो गायत्री के अनुकूल पड़ता है। इसलिए पुष्प आसन पर प्रतिष्ठित गायत्री के सम्मुख धूप जलाना, दीपक स्थापित करना, नैवेद्य चढ़ाना, चन्दन लगाना तथा अक्षतों की वृष्टि करनी चाहिए। अगर दीपक और धूप को गायत्री की स्थापना में रखा गया है, तो उसके स्थान पर जल का अघ्र्य देकर पाँचवें पूजा पदार्थ की पूर्ति करनी चाहिए।


पूर्व वर्णित विधि से प्रात:काल पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध भूमि पर शुद्ध होकर कुश के आसन पर बैठें। जल का पात्र समीप रख लें। धूप और दीपक जप के समय जलते रहने चाहिए। बूझ जाय तो उस बत्ती को हटाकर नई बत्ती डालकर पुन: जलाना चाहिए। दीपक या उसमें पड़े हुए घृत को हटाने की आवश्यकता नहीं है।


पुष्प आसन पर गायत्री की प्रतिष्ठा और पूजा के अनन्तर जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। नित्य यही क्रम रहे। प्रतिष्ठा और पूजा अनुष्ठान काल में नित्य होती रहनी चाहिए। मन चारों ओर न दौड़े, इसलिए पूर्व वर्णित ध्यान भावना के अनुसार गायत्री का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए। साधना के इस आवश्यक अङ्ग के ध्यान में मन लगा देने से वह एक कार्य में उलझा रहता है और जगह- जगह नहीं भागता। भागे तो उसे रोक- रोककर बार- बार ध्यान भावना पर लगाना चाहिए। इस विधि से एकाग्रता की दिन- दिन वृद्धि होती चलती है।


सवा लाख जप को चालीस दिन में पूरा करने का क्रम पूर्वकाल से चला आ रहा है। पर निर्बल अथवा कम समय तक साधना कर सकने वाले साधक उसे दो मास में भी समाप्त कर सकते हैं। प्रतिदिन जप की संख्या बराबर होनी चाहिए। किसी दिन ज्यादा, किसी दिन कम, ऐसा क्रम ठीक नहीं। यदि चालीस दिन में अनुष्ठान पूरा करना हो, तो १२५०००/४०=३१२५ मन्त्र नित्य जपने चाहिए। माला में १०८ दाने होते हैं, इतने मन्त्रों की ३१२५/१०८=२९, इस प्रकार उन्तीस मालाएँ नित्य जपनी चाहिए। यदि दो मास में जप करना हो तो १२५०००/६०=२०८० मन्त्र प्रतिदिन जपने चाहिए। इन मन्त्रों की मालाएँ २०८०/१०८=२० मालाएँ प्रतिदिन जपी जानी चाहिए। माला की गिनती याद रखने के लिए खडिय़ा मिट्टी को गंगाजल में सान कर छोटी- छोटी गोली बना लेनी चाहिए और एक माला जपने पर एक गोली एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख लेनी चाहिए। इस प्रकार जब सब गोलियाँ इधर से उधर हो जाएँ, तो जप समाप्त कर देना चाहिए। इस क्रम से जप- संख्या में भूल नहीं पड़ती।


गायत्री आवाहन का मन्त्र—

आयातु वरदे देवि! त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि।

गायत्रिच्छन्दसां मात: ब्रह्मयोने नमोऽस्तुते॥


गायत्री विसर्जन का मन्त्र—

उत्तमे शिखरे देवि! भूम्यां पर्वतमूर्धनि।

ब्राह्मणेभ्यो ह्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्॥


अनुष्ठान के अन्त में हवन करना चाहिए, तदनन्तर शक्ति के अनुसार दान और ब्रह्मभोज करना चाहिए। ब्रह्मभोज उन्हीं ब्राह्मणों को कराना चाहिए जो वास्तव में ब्राह्मण हैं, वास्तव में ब्रह्मपरायण हैं। कुपात्रों को दिया हुआ दान और कराया हुआ भोजन निष्फल जाता है, इसलिए निकटस्थ या दूरस्थ सच्चे ब्राह्मणों को ही भोजन कराना चाहिए।

क्रोध

 क्रोध

****

*एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं।*


*संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो। सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं?*


*संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि ने मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया।*


*ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसी बोल रहा है। सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया।*


*कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता।*


*क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है। अगर हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा। जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए। क्रोध को काबू करने के लिए रोज ध्यान करें। भगवान के मंत्रों का जाप करें।*


*कथा की सीख:*

***************

*इस प्रसंग का सार यह है कि घर-परिवार हो या कार्यस्थल हमें शांत रहना चाहिए। अगर कोई गुस्सा कर भी रहा है तो हमें उसका जवाब शांति से देना चाहिए। जैसे ही हमने शांति को छोड़ा और क्रोध किया तो छोटी सी बात भी बड़ा नुकसान कर सकती है।*


🌹जय महाकाल 🙏

Sunday, September 26, 2021

कर्म-शून्य संवेदना निरर्थक है

 जय गुरुदेव ।।


कर्म-शून्य संवेदना निरर्थक है-


 रूस के उक्रेन प्रान्त के प्रीलुका गाँव में एक तंनेबर का घर। पिता स्वयं ताँबे के बर्तनों को बनाने का काम करते थे। अतः इच्छा थी कि पुत्र बड़ा होकर औद्योगिक रसायनविद् बने। साधन तो अधिक थे नहीं।                   

                   

 तभी घर की कन्या बीमार पड़ी। डिप्थीरिया ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। मृत्यु का ग्रास बनी बहिन को देखकर भाई का अन्तःकरण पीड़ा से सिहर उठा। कल तक दोनों साथ खेलते, खाते, विनोद करते थे, आज वही बीन रोग के क्रोध का शिकार बन गई है। उसने विचार किया-पता नहीं कितनी बहिनें और कितने भाई इन्हीं रोगों के प्रबल थपेड़ों से असमय ही इस दुनिया से चले जाते हैं। परिजन असहाय देखते रहते हैं।                   

                   

 युवक के पुरुषार्थ को जैसे कोई चिनगारी छू गई। उसने संकल्प किया- मैं अपनी शक्ति भर लोगों को रोग के इस भयानक चंगुल से मुक्त करने-कराने का प्रयास करूँगा। औद्योगिक व्यवस्था में तकनीकी कार्य-कौशल से बहुत धन मिल सकता है। पर वह धन मुझे नहीं चाहिए। मैं तो मानवीय पीड़ा के विरुद्ध संघर्ष में ही अपनी सम्पूर्ण शक्ति झोंकूँ, इसी में सार्थकता है।’                   

                   

 डस संकल्पवान युवक का नाम था सैलमेन अब्राह्म वाक्समैन। 22 वर्ष की आयु में 1910 में वे संयुक्त राज्य अमरीका में जा बसे। अपनी प्रखर बुद्धि के कारण उन्हें रुटजर्स विश्वविद्यालय, न्यू बुन्सविक, न्यू जरसी में छात्रवृत्ति सहित प्रवेश मिल गया। फिर पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त कर प्राध्यापक बने।                   

                   

 उन्होंने अपना सारा जीवन रोगों के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। सूक्ष्मजीवियों तथा रोगाणुओं का विस्तृत अध्ययन किया। इन्हीं प्रोफेसर वाक्समैन ने स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज की। जो मिला प्राप्त धनराशि एवं स्ट्रेप्टोमाइसिन की सम्पूर्ण रॉयल्टी उन्होंने रुटजर्स विश्व-विद्यालय के नाम कर दी, जिससे इंस्टीट्यूट आफ माइक्रोवायलाजी” का निर्माण हुआ। स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज के लिए सम्पूर्ण मानव जाति प्रो वाक्समैन की ऋणी है।                    

                   

 संवेदन सच्ची, गहरी और व्यापक हो तो निश्चय ही वह कर्म और पुरुषार्थ में प्रतिफलित होती है। कर्म-शून्य सम्वेदना निरर्थक है।

हमारा व्यवहार ही हमें श्रेष्ठ बनाता है

 👉 हमारा व्यवहार ही हमें श्रेष्ठ बनाता है

*********************************

हमारे द्वारा किये गए कार्यों का फल हमें ज़रूर मिलता है। हमारे द्वारा किये गए अच्छे कार्य हमें दूसरे लोगो की नज़रो में श्रेष्ठ बनाते हैं। हमारा व्यवहार हमें लोगो की नज़रो में इस कदर सम्मानीय बना देता है कि ज़रूरत पड़ने पर लोग हमारे साथ खड़े होते है। हमें अपने सुख दुःख में शामिल करते है।


क्या आजकल की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में आप इस बात पर एक दम से यकीन कर सकते हैं कि हमारा व्यवहार या हमारा कोई छोटा सा काम कभी हमारी जान बचा सकता है।


एक व्यक्ति एक बर्फ की फैक्ट्री में काम करता था। एक दिन रोजाना की तरह शाम को वह घर जाने की तयारी में था। तभी फैक्ट्री में एक तकनीकी समस्या उत्पन्न हो गयी और वह उसे दूर करने में जुट गया।जब तक वह कार्य पूरा करता, तब तक अत्यधिक देर हो गयी। लाईटें बुझा दी गईं, दरवाजे सील हो गये और वह उसी प्लांट में बंद हो गया। बिना हवा व प्रकाश के पूरी रात बर्फ की फैक्ट्री में फंसे रहने के कारण उसकी मौत होना लगभग तय था।


लगभग आधा घण्टे का समय बीत गया। तभी उसने किसी को दरवाजा खोलते देखा। क्या यह एक चमत्कार था? उसने देखा कि दरवाजे पर सिक्योरिटी गार्ड टार्च लिए खड़ा है। उसने उसे बाहर निकलने में मदद की।


बाहर निकल कर उस व्यक्ति ने सिक्योरिटी से पूछा “आपको कैसे पता चला कि मै फैक्ट्री के अंदर हूँ?”


गार्ड ने उत्तर दिया – “सर, इस प्लांट में 100 लोग कार्य करते हैँ पर सिर्फ एक आप ही हैँ जो मुझे सुबह आने पर हैलो व शाम को जाते समय बाय कहते हैँ।आज सुबह आप ड्यूटी पर आये थे पर शाम को आप बाहर नहीं गए। इससे मुझे शंका हुई और मैं देखने चला आया।”


वह व्यक्ति नहीं जानता था कि उसका किसी को छोटा सा सम्मान देना कभी उसका जीवन बचाएगा। उसने प्रसन्न मन से उसका धन्यवाद किया और अपने घर चला गया।


तो मित्रों, जब भी आप किसी से मिले, गर्मजोशी से मिले और प्यारी से मुस्कान के साथ उसका सम्मान करे। कभी भी किसी से घमंड या अभिमान से बात न करें। चाहे कोई आपसे उम्र या पद में छोटा हो या बड़ा सबसे एक समान व्यवहार करे। सबका सम्मान करें।आपका ये व्यवहार लोगो कि नज़रो में आपको सबसे अलग बना देगा और लोग हर परिस्तिथि में आपके साथ रहेंगे।

Saturday, September 25, 2021

पीहर या ससुराल

 👉 पीहर या ससुराल

*****************

तीज का त्यौहार आने वाला था। तुलसी जी की दोनों बहुओं के पीहर से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के तुरंत बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी। आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के पीहर से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा। पीहर के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। जेठानियों को हंसी ठहाका करते देख उसे लगता शायद दोनों मिलकर उसका ही मजाक उड़ा रही हैं। आज उसे पहली बार मां बाप की सबसे ज्यादा कमी खल रही थी।

 

अगले दिन मीरा की सास तुलसी जी ने उसे आवाज लगाते हुए कहा, "मीरा बहू, जल्दी से नीचे आ जाओ, देखो तुम्हारे पीहर से तीज का शगुन आया है।" यह सुनकर मीरा भागी भागी नीचे उतरकर आँगन में आई और बोली, "चाचा चाची आए हैं क्या मम्मी जी? कहां हैं? मुझे बताया भी नहीं कि वे लोग आने वाले हैं!"मीरा एक सांस में बोलती चली गई। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके चाचा चाची भी कभी आ सकते हैं। तभी तुलसी जी बोलींं, "अरे नहीं, तुम्हारे चाचा चाची नहीं आए बल्कि भाई और भाभियां सब कुछ लेकर आए हैं।" मीरा चौंंककर बोली, "पर मम्मी जी मेरे तो कोई भाई नहीं हैं फिर...??"


"ड्रॉइंग रूम में जाकर देखो, वो लोग तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं"। तुलसी जी ने फिर आँखे चमकाते हुए कहा। मीरा कशमकश में उलझी धीरे धीरे कदम बढ़ाती हुई, ड्रॉइंग रूम में घुसी तो देखा उसके दोनों जेठ जेठानी वहां पर सारे सामान के साथ बैठे हुए थे। पीछे-पीछे तुलसी जी भी आ गईंं और बोलींं, "भई तुम्हारे पीहर वाले आए हैं, खातिरदारी नहीं करोगी क्या?" मीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो कभी सास को देखती तो कभी बाकी सभी लोगों को। उसके मासूम चेहरे को देख कर सबकी हंसी छूट पड़ी।

तुलसी जी बोलींं, "कल जब तुम्हारी जेठानियों के पीहर से शगुन आया था तो हम सबने ही तुम्हारी आंखों में वह नमी देख ली थी। जिसमें माता पिता के ना होने का गहरा दुःख समाया था। पीहर की महत्ता हम औरतों से ज्यादा कौन समझ सकता है भला! इसलिए हम सबने तभी तय कर लिया था कि आज हम सब एक नया रिश्ता कायम करेंगे और तुम्हें तुम्हारे पीहर का सुख जरूर देंगे। "मीरा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिन रिश्तोंं से उसे कल तक मजाक बनने का डर सता रहा था। उन्हीं रिश्तों ने आज उसे एक नई सोच अपनाकर उसका पीहर लौटा दिया था। मीरा की आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे।।


समाज में एक नई सोच को जन्म देने वाले उसके ससुराल वालों ने मीरा का कद बहुत ऊंचा कर दिया था। साथ ही साथ अपनी बहू के ससुराल को ही अपना पीहर बनाकर समाज में उनका कद बहुत ऊंचा उठ चूका था।

गायत्री मंत्र का बहुत बड़ा महत्व है।

 हमारे साथ मंत्र बोलें,


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


देवियो और भाइयो,


प्रातः मामूली-सी बातें हुई थीं। गायत्री उपासना आरम्भ करने की बात बतायी थी, परन्तु साधना के विधि-विधान के न होने से उपासना अधूरी रह जाती है। बिना विधि-विधान के उद्देश्य पूरे नहीं होते। बिना विधि ली हुई औषधि बीमारी को दूर करने में समर्थ नहीं होती। कई ऐसे भी होते हैं, जो दुनियां को विधि बताते हैं, पर स्वयं विधि का प्रयोग कर लाभ नहीं उठाते।


गायत्री मंत्र का बहुत बड़ा महत्व है। इस मंत्र में अपार शक्ति है। महर्षि विश्वामित्र ने इस मंत्र की शक्ति से नयी सृष्टि का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण जगत् में गायत्री मंत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं। सभी महापुरुषों ने गायत्री की साधना की। मुझे पुराना इतिहास सुनाने दीजिये और उस पुराने इतिहास में देखेंगे कि उसमें गायत्री मंत्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं।


इन पिछले दो हजार वर्षों में हमारी स्थिति बिगड़ गयी। हम संकीर्ण बन गये। मेढ़क की तरह अपने तालाब को संसार समझने लग गये। मुसलमान आज से करीब हजार वर्ष पहिले भारतवर्ष में आये थे। जब वे आये तब केवल वे 1500 की संख्या में थे और एक हजार वर्ष तक शासन करते रहे, यह समर्थता मुसलमानों की नहीं थी, यह कमजोरी हमारी मतिभ्रम की थी। हमारी आत्माएं कमजोर हो गयी थीं और यही वजह थी कि यहां जो भी आया शासन करता रहा। कोई भी कौम यहां से खाली हाथ नहीं गयी। जो भी आये, राज्य करते गये। एक देश जापान भी है, वह भी दस वर्ष गुलाम रहा, पर पुनः स्वतंत्र हो गया। जर्मन युद्ध में दो बार पराधीन हुआ, पर साधन सम्पन्न होकर पुनः स्वतंत्र और उन्नत हो गया। दुनियां का इतिहास बताता है कि जीवित कौमों पर विदेशी हुकूमत नहीं कर सकता। हम एक हजार वर्ष तक गुलाम रहे। ऐसा कलंक दुनियां में किसी भी जाति व देश को नहीं लगा। यह कलंक जयचन्द और मीर जाफरों की देन नहीं, यह आरोप उन पर नहीं कि वे दुश्मन के साथ मिल गये जिससे हमारी यह गति हो गयी। मित्रो! यह दोष केवल हमारे मति विभ्रम का है। आज हमारे समाज में आयी निराशा उसी मति विभ्रम का रूप है।


आज हम कहते हैं चीन का हमला क्यों हुआ? यह तो भगवान की इच्छा थी। पाकिस्तान का हमला क्यों हुआ? यह भी भगवान की इच्छा थी। हिन्दुस्तान में गौवध क्यों होता है? यह भी भगवान की इच्छा है, पाकिस्तान का निर्माण किसने करवाया? यह भी भगवान की मर्जी थी। ऐसी गन्दी फिलॉसफी हमें ले डूबी। क्या भगवान ऐसा गन्दा काम कर सकता है? मित्रो! कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। इस तरह के निराशा के विचार गुलामी आने के सौर वर्ष पहले यहां आये और हम गुलामी में जर्जरित हो गये। हमारे जीवन की क्रान्ति नष्ट हो गयी। मुसलमान आये, उन्होंने सोमनाथ, कृष्ण जन्मभूमि मथुरा, राम जन्मभूमि अयोध्या के मन्दिरों को रौंद डाला। हमारे कमजोर भाइयों को बलात् अपने धर्म में दीक्षित कर लिया और हम भगवान की इच्छा मानकर चुपचाप बैठे रहे। जो कौम अपने विचारों को खो बैठती है, उसका यही हाल होता है। लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे अध्यात्म की एक फिलॉसफी थी, पर एक अभागा समय ऐसा आया कि उसने अनेक सम्प्रदाय दिये, अनेक धर्म दिये, अनेक जातियां दीं फलस्वरूप हम मति विभ्रम हो गये।


मित्रो! मैं पुरानी कथा सुनाता जा रहा हूं। हम पहले क्या थे? कितने महान थे? आज जाति और मजहब के नाम पर हम बंटे बैठे हैं। हम आज एक एकादशी के व्रत का निर्णय नहीं कर सकते, हम आज कृष्ण जन्माष्टमी एक दिन नहीं मना सकते। कोई कहते हैं कि भगवान जिस रात्रि जन्मे उसी दिन जन्माष्टमी, कोई गोकुल पहुंचने वाले दिन को, तो कोई द्वारिका पहुंचने वाले दिन को उनका जन्म मानते हैं। शास्त्रों में जन्माष्टमी मनाने की अलग-अलग बातें लिखी जाती हैं। जैसा मन में आया, वैसा लिख दिया। ऐसी अतार्किक गन्दी परम्परा बनाकर हमें बर्बाद कर दिया।


एक जमाना था, जब एक महान राष्ट्र अपना था, एक महान धर्म अपना था, एक महान संस्कृति अपनी थी। तभी अपना देश जगद्गुरु के सिंहासन पर विराजमान था, एक महान आध्यात्मिक उपासना थी और वह थी—गायत्री उपासना।


गायत्री महामंत्र की उपासना ब्रह्मा से प्रारम्भ हुई। यह मंत्र उन्हें परमात्मा की वाणी से प्राप्त हुआ था। उन्होंने इस मंत्र को दो रूप में बनाया—एक सावित्री के रूप में और दूसरा गायत्री के रूप में। सावित्री को सांसारिक निर्माण के लिए प्रयोग किया और गायत्री को ज्ञान तत्व के रूप में बताया। इस ज्ञान तत्व रूपी गायत्री साधना को ही हमारे ऋषि-महर्षियों ने समझा और उपासना की। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि, दुर्वासा आदि सभी ऋषियों ने गायत्री उपासना की। हर महान व्यक्ति के साथ गायत्री उपासना जुड़ी रही। आप जानते ही हैं कि भगवान राम को महर्षि वशिष्ठ ने गुरु दीक्षा में गायत्री मंत्र दिया। महर्षि संदीपन ने भगवान कृष्ण को गायत्री उपासना करने का निर्देश किया। सारी महिमा गायत्री की ही है। गायत्री उपासना से मानव देवता बन सकता है। पर आप कहेंगे गुरुजी हम को लाभ क्यों नहीं मिला? गुरुजी हमें तीन माह जप करते हो गये, हमारे अन्दर विलक्षण शक्ति क्यों नहीं आती? मित्रो! मैं यही बात बताना चाहता हूं और वह बात यह है कि बिना विधि सफलता प्राप्त नहीं होती। ठीक उसी प्रकार जैसे बिना विधि औषधि स्वास्थ्य लाभ नहीं करती। दवा का अलग विधान है। हर गृहस्थी का अलग विधान है। समाज की सेवा संस्कृति का अलग विधान है। ठीक उसी प्रकार गायत्री उपासना का भी अलग विधान है, उसके अपने तौर-तरीके हैं।


गायत्री उपासना आरम्भ करने के दो विधान हैं। उनमें एक है—कर्मकाण्ड और दूसरा है भावना। कर्मकाण्ड की विधि यह है कि माला किस प्रकार से जपनी चाहिए, आसन कैसा होना चाहिए, मुख किधर रहना चाहिए, माला से कौन-सी उंगली लगनी चाहिए और मन्त्र कैसे बोलना चाहिए। यह कर्मकाण्ड उपासना का कलेवर है, प्राण नहीं। उपासना का प्राण भावना से आता है। वे अधिक सफल होते हैं, जो साधना के साथ भावना रखते हैं। बिना भावना के फल नहीं मिलता, केवल कर्मकाण्ड कुछ नहीं दिला सकता। बेचारे से पण्डित-पंडे सब कुछ कराते हैं, सब कुछ करते हैं, पर स्वयं भूखों मरते हैं। श्रीसूक्त का पाठ करने से सेठ के यहां लक्ष्मी आ जाती है और पण्डित उसके पाठ कर-कर के सेठ को लक्ष्मीपति बना देता है, पर वह स्वयं धनवान बनने के लिए श्रीसूक्त का पाठ नहीं करता। मित्रो! उसकी भावना नहीं है, वह विश्वास रखता तो दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए करता। मित्रो! यह दाल में काला है।


एक मच्छर था। उसने शहद की मक्खियों के छत्ते के पास जाकर कहा— हम आपको संगीत सिखाना चाहते हैं। सभी मधुमक्खियों ने कहा—हम जरूर सीखेंगे संगीत, पर हम अपनी रानी जी से पूछ आयें। मच्छर ने कहा—हां-हां जरूर। वे मक्खियां रानी जी के पास गयीं और रानी से सम्पूर्ण विवरण कहा। रानी ने सोचा, क्या कारण है यह संगीतज्ञ बिना बुलाये हमें संगीत सिखाने आया है तो उसने एक मक्खी को बुला कर कहा—जा मास्टर जी से पूछकर आ, महाराज आप हमें संगीत क्यों सिखाना चाहते हैं? मक्खी ने मच्छर से यही बात पूछी तो उसने उत्तर दिया—ऐ मक्खी तुम अपनी रानी से कह दो हम तुम्हें संगीत सिखायेंगे और तुम हमें शहद खिलाना। रानी ने जब यह सुना तो कहा— कोई संगीत नहीं सीखेगा। इस मास्टर के मस्तिष्क में संगीत के प्रति आस्था कहां? यह तो शहद का भूखा है। मित्रो! ठीक उसी तरह यह पण्डित उस श्रीसूक्त के उपासक नहीं यह तो इनकी दुकानदारी है। एक हजार वर्ष तक निरन्तर उपासना करने वाला भी बिना भावना के कुछ नहीं पा सकता और भावना युक्त होने से एक सेकेंड में सब कुछ पा सकता है।

Friday, September 24, 2021

गरीबों की गरीबी का मजाक न उडायें

 गरीबों की गरीबी का मजाक न उडायें!

******************************

एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुंचा। उन दोंनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा- आपके लिए क्या लाना है? 


उस व्यक्ति ने कहा- "मैंने मेरी बेटी को वादा किया था कि यदि तुम कक्षा दस में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हे शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा।

इसने वादा पूरा कर दिया। कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ।"वेटर ने पूछा- "आपके लिए क्या लाना है?" उसने कहा-"मेरे पास एक ही डोसे का पैसा है।"पूरी बात सुनकर वेटर मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा-"मैं इन दोनो को भर पेट नास्ता कराना चाहता हूँ।अभी मेरे पास पैसे नहीं है,इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलेरी से काट लेना।"मालिक ने कहा- "आज हम होटल की तरफ से इस होनहार बेटी की सफलता की पार्टी देंगे।" 


होटलवालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहको के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया।मालिक ने उन्हे एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी। इतना सम्मान पाकर आंखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए।      


समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की I.A.S.की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई।उसने सबसे पहले उसी होटल मे एक सिपाही भेज कर कहलाया कि कलेक्टर साहिबा नास्ता करने आयेंगी। होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया।यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया।


कलेक्टर रूपी वही लड़की होटल में मुस्कराती हुई अपने माता-पिता के साथ पहुंची।सभी उसके सम्मान में खड़े हो गए।होटल के मालिक ने उन्हे गुलदस्ता भेंट किया और आर्डर के लिए निवेदन किया।उस लड़की ने खड़े होकर होटल मालिक और उस बेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं।मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिसाल पेश करते हुए,मेरे पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी मिठाई पैक करके दी थी।

       🎈आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ।आप दोनो का एहसान में सदैव याद रखूंगी।आज यह पार्टी मेरी तरफ से है और उपस्थित सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल स्टाफ का बिल मैं दूंगी।कल आप दोनों को "" श्रेष्ठ नागरिक "" का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा।  

********************************************

 शिक्षा-- किसी भी गरीब की गरीबी का मजाक बनाने के वजाय उसकी प्रतिभा का उचित सम्मान करें।

एक हृदयस्पर्शी कहानी.

 एक हृदयस्पर्शी कहानी.....!


एक घर में एक बेटी ने जन्म लिया जन्म होते ही माँ का स्वर्गवास हो गया। बाप ने बेटी को गले से लगा लिया रिश्तेदारों ने लड़की के जन्म से ही ताने मारने शुरू कर दिए कि पैदा होते ही माँ को खा गयी।


मनहूस पर बाप ने कुछ नही कहा अपनी बेटी को, बेटी का पालन पोषण शुरू किया, खेत में काम करता और बेटी को भी खेत ले जाता, काम भी करता और भाग कर बेटी को भी संभालता।


रिश्तेदारों ने बहुत समझाया के दूसरा विवाह कर लो पर बाप ने किसी की नही सुनी और पूरा ध्यान बेटी की और रखा। बेटी बड़ी हुयी स्कूल गयी फिर कॉलेज।

हर क्लास में फर्स्ट आयी बाप बहुत खुश होता लोग बधाइयाँ देते।


बेटी अपने बाप के साथ खेत में काम करवाती, फसल अच्छी होने लगी, रिश्तेदार ये सब देख कर चिढ़ गए। जो उसको मनहूस कहते थे वो सब चिढ़ने लग गए।


लड़की एक दिन अच्छा पढ़ लिख कर पुलिस में SP बन गयी।


एक दिन किसी मंत्री ने उसको सम्मानित करने का फैसला लिया और समागम का बंदोबस्त करने के आदेश दिए। समागम उनके ही गाँव में रखा गया।


मंत्री ने समागम में लोगों को समझाया के बेटा बेटी में फर्क नही करना चाहिए, बेटी भी वो सब कर सकती है जो बेटा कर सकता है।


भाषण के बाद मंत्री ने लड़की को स्टेज पर बुलाया और कुछ कहने को कहा। लड़की ने माइक पकड़ा और कहा-


मैं आज जो भी हूं अपने बाबुल (पिता) की वजह से हूं जो लोगों के ताने सह कर भी मुझे यहाँ तक ले आये। मेरे पालन पोषण के लिए दिन रात एक कर दिया।


मैंने माँ नहीं देखी और न ही कभी पिता से कहा के माँ कैसी थी, क्योंकि अगर मैं पूंछती तो बाप को लगता के शायद मेरे पालन पोषण में कोई कमी रह गयी।


मेरे लिये मेरे पिता से बढ़ कर कुछ नही बाप सामने लोगों में बैठ कर आंसू बहा रहा था बेटी की भी बोलते बोलते आँखे भर आयी।


उसने मंत्री से पिता को स्टेज पर बुलाने की अनुमति ली। बाप स्टेज पर आया और बेटी को गले लगाकर बोला -


रोती क्यों है बेटी, तू तो मेरा शेर पुत्तर है, तू ही कमजोर पड़ गया तो मेरा क्या होगा, मैंने तुझको सारी उम्र हँसते देखना है।


बाप बेटी का प्यार देखकर सब की आँखें नम हो गयी। मंत्री ने बेटी के गले में सोने का मेडल डाला। लड़की ने मैडल उतार कर बाप के गले में डाल दिया।


मंत्री ने कहा- ये क्या किया, तो लड़की बोली- मैडल को उसकी सही जगह पहुँचा दिया। और कहा इसके असली हकदार मेरे पिता जी हैं।


समागम में तालियाँ बज उठी...!!


यह उन लोगों के लिए सबक है जो बेटियों को चार दीवारी में रखना पसंद करते हैं, पर ये फूल बाहर खिलेंगे अगर आप पानी लगाकर इन फूलों की देखभाल करोगे

Thursday, September 23, 2021

शोरगुल किसलिये

 शोरगुल किसलिये


मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की, और कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ 


हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना, तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। 


हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? 


वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, तू भी है,,,,, तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहती थी। हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता,,,,,,, दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। 


इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।


सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये,,,,, स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें,,,,,,, धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये,,,,,,,, दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण।


हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे,,,,,,,,


हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं,,, वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं। 


अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।


याद रखना चाहिए आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर,,, जब तक जीवन है सदभावना पूर्वक जीना चाहिए और सब का सम्मान करना चाहिए,,,, क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा है। 


https://awgpskj.blogspot.com/2021/09/blog-post_25.html

दीपक प्रकाशित करने का रहस्य

 दीपक प्रकाशित करने का रहस्य

**************************

मित्रो! हम दीपक जलाते हैं। दीपक जलाने का मतलब यह नहीं है कि भगवान की आँखों की रोशनी कम हो गई है। जब आदमी को कम दिखाई पड़ता है, तो माइनस और प्लस के चश्मे लगाने पड़ते हैं। भगवान जी को मोतियाबिंद हो गया, यह मतलब नहीं है। भगवान जी की आँखें सही हैं। भगवान जी के आँखों को धरती पर रखी किताब पढ़ने में और अख़बार पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आती। उनकी आँखें सही हैं। फिर दीपक जलाने से क्या मतलब है?


हमको तो दीपक जलाने की जरूरत होती है; क्योंकि दिन में जब अँधेरा हो जाता है और बादल छा जाते हैं और प्रकाश कम होता है, तो बत्ती जलानी पड़ती है। ठीक है आँखें कमजोर हैं, इसलिए बत्ती जलानी पड़ती है। लेकिन भगवान जी की आँखें कमजोर नहीं हैं। भगवान जी की आँखों के आगे दीपक जलाएँ या न जलाएँ, उन्हें कोई दिक्कत होने वाली नहीं है। फिर दीपक जलाने की आवश्यकता क्या है? दीपक जलाने की जरूरत केवल यह है कि हम अपने जीवन में एक तरह की भावना का विकास करें कि भगवान को दीपक प्यारा है। भगवान दीपक को मुहब्बत करते हैं।


दीपक वह, जिसके मन में जलने की तमन्ना है। दीपक के पेट में प्यार भरा हुआ है। प्यार स्नेह-सत्कार को कहते हैं और स्नेह का दूसरा अर्थ घी भी होता है, तेल भी होता है। जिसके पेट में स्नेह भरा हुआ पडा़ है, वह है दीपक और जिसने यह नीति अख्तियार कर ली है कि मैं दुनिया में उजाला फैलाऊँगा और अँधेरे में उजाला करूँगा। इसके लिए मैं जलने के लिए तैयार हूँ।


दीपक की तरह प्रकाश देने वाले बनें


जो आदमी उजाला करने के लिए जलना मंजूर करता है, वह आदमी उन सितारों के तरीके से है, जो रात के समय जब चारों ओर अँधेरा छाया रहता है और उस अँधेरे से जो मुसाफिर रास्ता भूल सकते थे, भटक सकते थे; उनको अपनी छोटी-सी समझदारी के द्वारा रास्ता दिखाता रहता है। बच्चे गाते रहते हैं—"ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार, हाऊ आई वंडर व्हाट यू आर।"


मित्रो! इस तरीके से छोटा वाला मनुष्य अपनी छोटी छोटी प्रवृत्तियों के कारण इस संसार में प्रकाश कैसे फैला सकता है। दूसरों को रास्ता दिखाने वाली जिंदगी कैसे जी सकता है। हम रास्ता दिखाने वाली जिंदगी जी सकते हैं। रास्ता दिखाने वाली जिंदगी गरीब आदमी भी जी सकते हैं और हजारों मनुष्यों को रास्ता दिखा सकते हैं।


काश! हमने ऐसी जिंदगी जी हो। ऐसी जिंदगी का जीना भगवान की भक्ति का, दूसरे कर्मकाण्डों, पूजा का उद्देश्य, भगवान का उद्देश्य पूरा कर सकता है। हमारे मन में केवल कर्मकाण्ड की क्रिया समझ में आए और उद्देश्य समझ में आए, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। तब हम अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएँगे कि नहीं, यह कहना मुश्किल है।


इसलिए मित्रो! मेरे गुरुदेव ने मुझे बताया कि हमको जो आध्यात्मिकता के सहारे, पूजा के सहारे, गायत्री महामंत्र के सहारे हमें अपने आप का, अपनी जीवात्मा का विकास करना चाहिए और अपनी विचारणाओं, अपनी भावनाओं का परिष्कार करना चाहिए।


भावनाओं और विचारणाओं का परिष्कार जहाँ कहीं भी जिन व्यक्तियों ने शुरू किया छोटे-छोटे, नगण्य-से-नगण्य, गरीब-से-गरीब मामूली आदमी महानतम व्यक्ति होते हुए चले गए। भगवान का अनुग्रह, कृपा और वरदान प्राप्त करने के लिए उन्हें इंतजार नहीं करना पड़ा। उन्होंने वह सब कुछ प्राप्त किया, जिसकी मामूली आदमी ख्वाब में कल्पना भी नहीं कर सकता। ऐसी चीजों का हकदार आप में से हर आदमी बन सकता है।


अगर आप लोगों को यह ख्याल आए कि आप लोगों को अपना मन, आपको अपनी नीयत, आपको अपना चाल-चलन, आपको अपनी रीति-नीति और आपको अपनी जिंदगी की गिरी हुई स्थिति ठीक कर लेनी चाहिए। इतनी छोटी-सी बात अगर आपकी समझ में आ जाए, तो मजा आ जाए। आपको भगवान का प्यार और भगवान की कृपा मिलती हुई चली जाए।

Wednesday, September 22, 2021

अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं

 अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं।

*********************

      मनुष्य का जीवन दुःखों से भरा दिखाई पड़ता है। इनसे निवृत्ति के लिए, जीवन में सुख की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य अनगिनत प्रयास करते भी दीखते हैं।

       विडम्बना यह है कि सुख, गिने-चुने लोगों को ही मिलता है, शेष की झोली तो अतृप्ति, असफलता, असन्तोष, अभाव व दुःखों से ही भरी मिलती है। 

      लोग भटकते सुख की प्राप्ति के लिए हैं, पर मिलता है दुःख। हर व्यक्ति की यही पीडा़ है, यही वेदना है। सुख की तलाश में भटकते लोग यह भूल जाते हैं कि दुःख कहीं बाहर से नहीं आता, बल्कि हमारे ही भीतर से आता है। 

      चाहे हम कितना भी दुःखों के कारण को कहीं बाहर ढूँढ़ना चाहें, किसी व्यक्ति में, किसी परिस्थिति में, किसी घटना में तलाशना चाहें, दुःखों का मूल, हमारे भीतर है। बाहर ढूँढ़ने से कारण तो पर्याप्त मिल सकते हैं, पर समाधान नहीं मिल सकता। 

      समाधान, परिस्थितियों को बदलने से नहीं, मनःस्थिति को बदलने से आता है। दुःखों से मुक्ति पाने के लिए इस दृष्टिकोण को गहरे में आत्मसात् करना होगा, कि इनके लिए मैं जिम्मेदार हूँ। बाहर जो घटता दीखता है, वो मात्र अन्दर की छाया है। 

      इसलिए स्वयं पर जिम्मेदारी लेते ही हम जीवन को समग्रता में स्वीकार लेते है़ं। दुःख हो या सुख, आनन्द हो या विषाद, सम्मान मिले या अपमान सबको समान रूप से स्वीकारने के लिए, अपनी परिस्थितियों की जिम्मेदारी हमें स्वयं पर लेनी होगी, क्योंकि वे हमारे ही द्वारा किए गए कर्मों का परिणाम हैं। 

      स्वयं पर जिम्मेदारी लेते ही न केवल हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि हमारे भीतर दुःखद परिस्थितियों से लोहा लेने की ताकत का भी उदय होता है। क्रान्ति उन्हीं के जीवन में घटती है, जो जिम्मेदारी लेना जानते हैं।

       दूसरों पर जिम्मा थोपने वाले, कभी स्वयं को बदलने की शुरुआत नहीं कर सकते। ये तो उन्हीं के द्वारा सम्भव है, जो दुःख का कारण बाहर नहीं, भीतर तलाशते हैं और परिस्थितियों को नहीं, मनःस्थिति को बदलने का प्रयास करते हैं।

      हमारा दृष्टिकोण बदलते ही जीवन, समाधान स्वयं प्रस्तुत कर देता है। 

(संकलित व सम्पादित)

अखण्ड ज्योति 

जनवरी 2018 पृष्ठ-3

महानता की पहचान है सादगी

 ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।


महानता की पहचान है सादगी

************************

सादगी में महानता छिपी होती है।सादा जीवन जीने वाले व्यक्तियों का रहन सहन भले ही सामान्य दीखता हो, लेकिन उनके कार्य विशेष होते हैं। जो व्यक्ति अपने रहन सहन एवं पहनावे में सादगी नहीं अपनाते,हर पल दूसरों को आकर्षित करने हेतु प्रयासरत रहते हैं, वे कभी भी विशेष कार्य नहीं कर पाते। देश में जो भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने सादगी को अपनाया है, सादा जीवन जीकर, सरल बने रहकर बड़े और महान कार्य किए हैं और महान बने हैं। सच ही है कि व्यक्ति की पहचान उसके वस्त्रों से नहीं, उसके कार्यों एवं आचार-विचार से होती है।


उन दिनों स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे। एक दिन वे पगड़ी बांधे, चादर डाले शिकागो की एक गली में घूम रहे थे। उनकी वेशभूषा को देखकर एक महिला ने अपने पुरुष मित्र से कहा- " जरा इन महाशय को देखो। कैसी अनोखी पोशाक है। " स्वामी जी ने हेय दृष्टि से देख रही उस महिला से कहा - " बहन! मैं जिस देश से आया हूं, वहां पर वस्त्र नहीं, चरित्र सज्जनता की कसौटी माना जाता है। " उनके इस उत्तर ने महिला को हतप्रभ कर दिया। ऐसी ही एक घटना उन दिनों की है, जब स्वामी जी की ख्याति न सिर्फ अमेरिका में, बल्कि पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। एक दिन स्वामी जी के एक अमेरिकी शिष्य ने उनसे कहा- " मैं आपके गुरु को देखना चाहता हूं। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर कैसा होगा वह व्यक्ति, जिसने आप जैसे शिष्य को तैयार किया ? " स्वामी जी ने उस अमेरिकी शिष्य को स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का फोटोग्राफ दिखाया।


स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के फोटोग्राफ को देख कर वह बोला-" मुझे ऐसा लगता था कि आपके गुरु अत्यंत विद्वान और सभ्य होंगे, परन्तु फोटोग्राफ से मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता है। " शिष्य की बात सुनकर स्वामी विवेकानंद बोले - " तुम्हारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण एक दरजी करता है, जबकि हमारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण आचार-विचार करते हैं।इस कसौटी पर कसकर बताओ कि तुम्हारे मुल्क के सूट-बूटधारी जेन्टलमैन सभ्य हैं या मेरे गुरु परमहंस? " वह अमेरिकी शिष्य स्वामी जी की इस व्याख्या को सुनकर निरुत्तर हो गया। उसने स्वीकार किया कि स्वामी जी के उदाहरण से उसे व्यक्तियों को परखने की नई दृष्टि मिली।


अक्सर हम लोगों की पहचान उनकी वेशभूषा, पहनावे के ढंग आदि से करते हैं, विशेष पहनावे वाले व्यक्ति को विशेष मानते हैं और सामान्य ढ़ंग के पहनावे वाले व्यक्ति को सामान्य व्यक्ति समझते हैं, लेकिन विशेष व्यक्ति वे होते हैं, जो पहनावे को महत्व न देकर कार्य को महत्व देते हैं, उनके सामने उनका कार्य इतना महत्वपूर्ण होता है कि वे अपने पहनावे पर ध्यान ही नहीं दे पाते, और सादा जीवन जीते हैं।


✍️ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

📖पृष्ठ संख्या-१२,अखण्ड ज्योति,नवंबर-२०१५

Tuesday, September 21, 2021

जब बादशाह अकबर को भी माननी पड़ी गायत्री मंत्र की महिमा

 जब बादशाह अकबर को भी माननी पड़ी गायत्री मंत्र की महिमा

*****************

एक बार अकबर ने एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोले - 'बीरबल ! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण !! जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है । ये तो भिखारी हैं ।*


*बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा । लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आया और उसने उस ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है ?*


*ब्राह्मण ने कहा - 'मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ । इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है ।*


*बीरबल ने पूछा - 'भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है ?*


*ब्राह्मण ने जवाब दिया - 'छह से आठ अशर्फियाँ ।*


*बीरबल ने कहा - 'आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?'*


*ब्राह्मण ने पूछा - 'मुझे क्या करना होगा ?'*


*बीरबल ने कहा - 'आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंट स्वरूप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी ।'*


 *बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया । अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया । उसने उस दिन से बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र का जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंट स्वरूप लेकर अपने घर लौट आता । ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लगन देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दी।*


*अब तो गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही । गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा । अब लोगों का ध्यान उस ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा । दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढ़ाने लगे । अब तो उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही । यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा । बस वह सदैव मन से गायत्री मंत्र जाप में लीन रहने लगा ।*


*ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी । दूरदराज से श्रद्धालु उसके दर्शन करने आने लगे । भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया । ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली । बादशाह ने भी दर्शन हेतु जाने का फैसला लिया और शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़े । वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया । ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए ।*


*तब बीरबल ने पूछा - 'क्या आप इस सन्त को जानते हैं ?'*


*अकबर ने कहा - 'नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ ।'*


*फिर बीरबल ने कहा - 'महाराज ! आप इसे अच्छी तरह से जानते हैं । यह वही भिखारी ब्राह्मण है, जिस पर आपने व्यंग्य कसकर कहा था कि ''ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?''*


*आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं । अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही । बीरबल से पूछा - 'लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?*


 *बीरबल ने कहा - 'महाराज ! वह मूल रूप में ब्राह्मण ही है । परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियोंं से दूर हो गया था । धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् 'ब्रह्म' बना दिया और कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया । 'यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है ।*


*यह नियम सभी सनातनी जन पर सामान रूप से लागू होता है, क्योंकि ब्राह्मण और सनातनी आसन और तप से दूर रहकर जी रहे हैं, इसीलिए पीड़ित हैं।* 


*वर्तमान में आवश्यकता है कि सभी ब्राह्मण एवं सनातनी पुनः अपने कर्म से जुड़ें, अपने संस्कारों को जानें और मानें । मूल ब्रह्मरूप में जो विलीन होने की क्षमता रखता है वही ब्राह्मण है । यदि व्यक्ति अपने कर्मपथ पर दृढ़ता से चले तो देव शक्तियाँ उसके साथ चल पड़ती हैं ।*


*🌺!!जय मां गायत्री!!🙏*

*शांतिकुंज के युग प्रहरी*

हमारी माता जी सब जानतीं हैं।

 हमारी माता जी सब जानतीं हैं।

************************

जिला बारां राजस्थान के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ फूलसिंह यादव के जीवन में घटी एक ऐसी घटना जिसने डॉ फूलसिंह यादव का नजरिया बदल दिया। बात उन दिनों की है जब अखिल विश्व गायत्री परिवार के जनक, संस्थापक, आराध्य वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी सूक्ष्मीकरण साधना हेतु एकांतवास में चले गए। पूज्य गुरुदेव के एकांतवास में चले जाने के उपरांत गायत्री परिवार की समस्त जिम्मेदारियां स्नेह सलिला वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी पर आ गयी। माता जी ने पहले भी पूज्यवर के हिमालय प्रवास एवं अन्य समय की अनुपस्थिति में गायत्री परिवार को संचालित संगठित एवं विस्तारित किया था।


1984 से माता जी के अनेक रूप दिखाई पड़ने लगे. वात्सल्यमयी माँ का रूप, ससक्त संगठनकर्ता का रूप, प्रकाण्ड विद्वान का रूप, प्रखर वक्ता, भविष्यद्रष्टा,  अनेकों रूपों में माता जी के दर्शन लोगों को होने लगे। साधारणतः तो माता जी को परिजन यही मानते रहे कि माता जी गुरुदेव की पत्नी हैं, गुरुमाता हैं, माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद माता जी को है, माता जी कभी किसी भी आगंतुक को बिना भोजन प्रसाद के जाने नहीं देतीं हैं आदि आदि। पूज्य गुरुदेव के एकांतवास में जाने के उपरांत जगत जननी माँ भगवती ने समस्त संगठन या यूँ कहें की समस्त चराचर जगत का सूत्र सञ्चालन अपने हाथों में ले लिया। उस समय वंदनीया माता जी अनायास ही अपने बच्चों पर कृपा कर अपने जगदम्बा अवतारी स्वरुप का आभास करा देती थीं।


ऐसी ही एक घटना डॉ फूलसिंह यादव के साथ घटी। डॉ फूलसिंह यादव चिकित्सा विभाग में कार्यरत थे, उनका प्रमोशन किन्हीं कारणों से रुका हुआ था। डॉ यादव जी का गुरुदेव के पास मार्गदर्शन, आशीर्वाद के लिए आना-जाना लगातार लगा रहता था। डॉ यादव ने अपने रुके हुए प्रमोशन को पाने के लिए गुरुदेव से प्रार्थना करने का सोचा और हरिद्वार की ओर प्रस्थान कर गए। डॉ यादव शांतिकुंज पहुंचे, दर्शन प्रणाम के क्रम में वंदनीया माता जी के पास पहुँच माता जी के चरणों में जैसे ही शीश झुकाया माता जी ने पुकार लगायी। कब आया फूलसिंह बेटा! तू ठीक तो है? तेरा सफ़र कैसा रहा कोई कठिनाई तो नहीं आई रास्ते में। फिर डॉ यादव की पत्नी और बच्चों का नाम लेकर माता जी ने उन सभी का समाचार पूछा। डॉ यादव अचंभित हो माता जी की ओर देखने लगे, सोचने लगे माता जी से तो कभी मैं इस प्रकार मिला नहीं, माता जी कैसे जानती हैं ये सब। दर असल डॉ फूलसिंह यादव जब भी शांतिकुंज पहुँचते गुरुदेव से ही आशीर्वाद परामर्श पाते थे। माता जी के पास तो भोजन प्रसाद और लड्डू ही पाते थे। इस दफ़ा माता जी को इस रूप में देखा, पहली ही मुलाकात में माता जी ने उनके बारे में, उनके परिवार के बारे सबकुछ नाम सहित पूछा। डॉ यादव सोचने लगे माता जी को मेरा परिचय किसने दिया? तभी माता जी की आवाज उनके कानों में टकराई जिससे उनकी विचार श्रृंखला टूटी। माता जी ने कहा बेटा माँ से उसके बच्चों की पहचान थोड़ी ही करानी पड़ती है, माँ अपने सभी बच्चों के विषय में सब कुछ जानती है। तू चिंता न कर तेरे प्रमोशन का ध्यान है मुझे, तेरा प्रमोशन हो जायेगा। तेरा प्रमोशन मैं कराऊँगी, तू इसके विषय में सोचना छोड़ दे।


डॉ फूलसिंह यादव का मुंह खुला का खुला रह गया। यह क्या, वंदनीया माता जी को किसने बताया कि मैं प्रमोशन के लिए आशीर्वाद मांगने आया हूँ। इसकी चर्चा तो मैंने किसी से करा ही नहीं। डॉ यादव के आँखों से आंसू बहने लगे, माँ को प्रणाम किया अंतस में उठ रहे भावों में उलझे मन के साथ सीढ़ियों से उतरते चले गए। ह्रदय में अनेकों भावों के उठते ज्वार भाटे की उलझन में कहीं खो गए। सोचने लगे, पूज्य गुरुदेव से तो अपने लिए भौतिक उपलब्धियां मांगना पड़ता है, माँ ने बिना मांगे ही दे दिया। पूज्य गुरुदेव के सामने अपनी आवश्यकतायें बताने पर गुरुदेव कृपा करते हैं, माँ ने पुत्र के ह्रदय की बात स्वयं ही जान लिया। मैंने पहले माता जी को क्यूँ नहीं पहचाना। माता जी सबकुछ जानती हैं। माता जी कोई योगमाया जानती हैं? कोई तपस्विनी हैं? डॉ फूलसिंह यादव के अंतस ने कहा नहीं, स्नेह सलिला परम वंदनीया माता जी जगदम्बा की अवतार हैं। मेरी माता जी जगदम्बा हैं। मेरी माता जी सब जानती हैं। माँ जगदम्बा अवतारी माता जी को समस्त रोम कूपों से बारम्बार प्रणाम बारम्बार नमन।

Monday, September 20, 2021

खुशियां बांटने से बढ़ती है।

 *खुशियां बांटने से बढ़ती है।*

 (दिल को छू लेने वाली एक लघुकथा)


हनुमान जी के मन्दिर में सवा मन का लड्डू चढ़ा कर लौटते हुए एक भक्त से उसके बेटे ने गुब्बारे दिलवाने की जिद की।


बच्चा पिट गया। 


वजह शायद बच्चे की जिद रही होगी या सवा मन लड्डू के पुण्य का दम्भ इतना बढ़ गया होगा कि भक्त सिर्फ उसी में बौराया था और उसका बच्चे की माँग से तारतम्य टूट गया हो।


गुब्बारे वाले के पास बहुत भीड थी, और भीड़ में से भी उसकी नजर पिटते बच्चे पर जा पड़ी। 


बच्चा रो रहा था और भक्त पिता बच्चे को डांटे जा रहा था। 


*गुब्बारे वाला उस बच्चे की ओर आया और एक गुब्बारा बच्चे के हाथ में पकड़ा दिया।*


भक्त गुस्से में तो था ही वह गुब्बारे वाले से उलझ पड़ा ।


*“तुम मौके की ताड मे रहा करो बस, कोई बच्चा तुम्हे जिद करता दिख जाए बस। झट से पीछे लग जाते हो। नही लेना गुब्बारा।”* 


इस तरह भक्त ने गुब्बारे वाले को बुरी तरह झिड़क दिया।


गुब्बारे वाला बच्चे के हाथ में गुब्बारा पकड़ाते हुए बोला-

*मैं यहाँ गुब्बारे बेचने नही आता, बाँटने आता हूँ कारण किसी दिन मुझे किसी ने बोध करवाया कि ईश्वर तो बच्चों मे है। इसलिये ही मैं हर मंगलवार सौ रूपये के गुब्बारे लाता हूँ। इनमे खुद ही हवा भरता हूँ। एक गुब्बारा मंदिर मे बाँध आता हूँ और बाकि सब यहाँ बच्चों मे बाँट देता हूँ। मेरा तो यही प्रसाद हैं। हनुमान जी स्वीकार करते होंगे ना।*


_*सवा मन लड्डू का बड़ा पुण्य भक्त को एकाएक छोटा लगने लगा।*_


_*खुशियां बांटने से ही बढ़ती है।*_


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलहारी हो।*

सभ्यता, संस्कार और अतिथि सेवा

 *सभ्यता, संस्कार और अतिथि सेवा*


वासु भाई और वीणा बेन, दोनों यात्रा की तैयारी कर रहे थे। तीन दिन का अवकाश था। वे पेशे से चिकित्सक थे।लंबा अवकाश नहीं ले सकते थे । परंतु जब भी दो-तीन दिन का अवकाश मिलता , छोटी यात्रा पर कहीं चले जाते हैं।


आज उनका इंदौर उज्जैन जाने का विचार था । दोनों साथ-साथ मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे । वहीं पर प्रेम अंकुरित हुआ , और बढ़ते बढ़ते वृक्ष बना। दोनों ने परिवार की स्वीकृति से विवाह किया। दो साल हो गए , संतान कोई थी नहीं , इसलिए यात्रा का आनंद लेते रहते थे ।


विवाह के बाद दोनों ने अपना निजी अस्पताल खोलने का फैसला किया, बैंक से लोन लिया । वीणा बेन स्त्री रोग विशेषज्ञ और वासु भाई डाक्टर आफ मेडिसिन थे । इसलिए दोनों की कुशलता के कारण अस्पताल अच्छा चल निकला था ।


आज इंदौर जाने का कार्यक्रम बनाया था । जब मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे पप्पू भाई से इंदौर के बारे में बहुत सुना था। वे नई नई वस्तु खाने के शौकीन थे। इंदौर के सराफा बाजार और 56 दुकान पर मिलने वाली मिठाईयां नमकीन के बारे में उन्होंने ‌सुना था। साथ ही महाकाल के दर्शन करने की इच्छा थी इसलिए उन्होंने इस बार इंदौर उज्जैन की यात्रा करने का विचार किया था ।


यात्रा पर रवाना हुए , आकाश में बादल घुमड़ रहे थे । मध्य प्रदेश की सीमा लगभग 200 किलोमीटर दूर थी । बारिश होने लगी थी।


म, प्र, सीमा से 40 किलोमीटर पहले छोटा शहर पार करने में समय लगा। कीचड़ और भारी यातायात में बड़ी कठिनाई से दोनों ने रास्ता पार किया।


भोजन तो मध्यप्रदेश में जाकर करने का विचार था परंतु चाय का समय हो गया था । उस छोटे शहर से चार - पांच किलोमीटर आगे निकले । सड़क के किनारे एक छोटा सा मकान दिखाई दिया ।जिसके आगे वेफर्स के पैकेट लटक रहे थे । उन्होंने विचार किया कि यह कोई होटल है वासु भाई ने वहां पर गाड़ी रोकी, दुकान पर गए , कोई नहीं था । आवाज लगाई , अंदर से एक महिला निकल कर के आई। 

उसने पूछा *क्या चाहिए ,भाई ।*


वासु भाई ने दो पैकेट वेफर्स के लिए ,और कहा *बेन दो कप चाय बना देना । थोड़ी जल्दी बना देना, हमको दूर जाना है ।*

 

पैकेट लेकर के गाड़ी में गए ।वीणा बेन और दोनों ने पैकेट के वैफर्स का नाश्ता किया ।

चाय अभी तक आई नहीं थी।


दोनों निकल कर के दुकान में रखी हुई कुर्सियों पर बैठे । वासु भाई ने फिर आवाज लगाई ।


थोड़ी देर में वह महिला अंदर से आई । बोली *भाई बाड़े में तुलसी लेने गई थी , तुलसी के पत्ते लेने में देर हो गई , अब चाय बन रही है ।"*


थोड़ी देर बाद एक प्लेट में दो मैले से कप। ले करके वह गरमा गरम चाय लाई। 


मैले कप को देखकर वासु भाई एकदम से अपसेट हो गए , और कुछ बोलना चाहते थे परंतु वीणाबेन ने हाथ पकड़कर उनको रोक दिया ।


चाय के कप उठाए । उसमें से अदरक और तुलसी की सुगंध निकल रही थी । दोनों ने चाय का एक सिप लिया । ऐसी स्वादिष्ट और सुगंधित चाय जीवन में पहली बार उन्होंने पी । उनके मन की हिचकिचाहट दूर हो गई ।

उन्होंने महिला को चाय पीने के बाद पूछा *"कितने पैसे हुए"*

  

महिला ने कहा *बीस रुपये*


वासु भाई ने सौ का नोट दिया ।


महिला ने कहा कि *भाई छुट्टा नहीं है । 20 छुट्टा दे दो।"*


वासुभाई ने बीस रु का नोट दिया। महिला ने सौ का नोट वापस किया। 


वासु भाई ने कहा कि *हमने तो वैफर्स के पैकेट भी लिए हैं*

 

महिला बोली *"यह पैसे उसी के हैं । चाय के पैसे नहीं लिए ।*


*अरे चाय के पैसे क्यों क्यों नहीं लिए ? ।*


जवाब मिला *"हम चाय नहीं बेंचते हैं। यह होटल नहीं है ।"*


*"फिर आपने चाय क्यों बना दी ।"*


*"आप अतिथि आए । आपने चाय मांगी, हमारे पास दूध भी नहीं था पर यह बच्चे के लिए दूध रखा था ,परंतु आपको मना कैसे करते इसलिए इसके दूध की चाय बना दी ।"*


*"अब बच्चे को क्या पिलाओगे ।"*


*एक दिन दूध नहीं पिएगा तो मर नहीं जाएगा । इसके पापा बीमार हैं वह शहर जा करके दूध ले आते , पर उनको कल से बुखार है। आज अगर ठीक हो जाएगा तो कल सुबह जाकर दूध ले आएंगे।"*

 

वासु भाई उसकी बात सुनकर सन्न रह गये। इस महिला ने होटल ना होते हुए भी अपने बच्चे के दूध से चाय बना दी और वह भी केवल इसलिए कि मैंने कहा था, अतिथि रूप में आकर के ।

संस्कार और सभ्यता में महिला मुझसे बहुत आगे हैं ।


उन्होंने कहा कि *हम दोनों डॉक्टर हैं , आपके पति कहां हैं बताएं ।*


हमको महिला भीतर ले गई।


अंदर गरीबी पसरी हुई थी ।एक खटिया पर सज्जन सोए हुए थे बहुत दुबले पतले थे ।


वसु भाई ने जाकर उनका मस्तक संभाला । माथा और हाथ गर्म हो रहे थे , और कांप रहे थे वासु भाई वापस गाड़ी में गए। दवाई का अपना बैग लेकर के आए ।उनको दो-तीन टेबलेट निकालकर के खिलाई । फिर कहा कि इन गोलियों से इनका रोग ठीक नहीं होगा । मैं पीछे शहर में जा कर के इंजेक्शन और इनके लिए बोतल ले आता हूं । वीणा बेन को उन्होंने मरीज के पास बैठने का कहा ।


गाड़ी लेकर के गए, आधे घंटे में शहर से बोतल, इंजेक्शन ले कर के आए और साथ में दूध की थैलीयां भी लेकर आगये। 


मरीज को इंजेक्शन लगाया , बोतल चढ़ाई , और जब तक बोतल लगी दोनों वहीं ही बैठे रहे ।


एक बार और तुलसी और अदरक की चाय बनी।

दोनों ने चाय पी और उसकी तारीफ की। 


जब मरीज 2 घंटे में थोड़े ठीक हुए, तब वह दोनों वहां से आगे बढ़े। 


तीन दिन इंदौर उज्जैन में रहकर , जब लौटे तो उनके बच्चे के लिए बहुत सारे खिलौने ,और दूध की थैली लेकर के आए ।

           

वापस उस दुकान के सामने रुके , महिला को आवाज लगाई , तो दोनों बाहर निकल कर उनको देख कर बहुत खुश हो गये। 

उन्होंने कहा कि ,*आप की दवाई से दूसरे दिन ही बिल्कुल स्वस्थ हो गया।*


वसु भाई ने बच्चे को खिलोने दिए । दूध के पैकेट दिए ।


फिर से चाय बनी, बातचीत हुई, अपनापन स्थापित हुआ। वसु भाई ने अपना एड्रेस कार्ड दिया और कहा, जब भी आओ जरूर मिले , और दोनों वहां से अपने शहर की ओर लौट गये ।


शहर पहुंचकर वसु भाई ने उस महिला की बात याद रखी। फिर एक फैसला लिया। 


अपने अस्पताल में रिसेप्शन पर बैठे हुए व्यक्ति से कहा कि, अब आगे से आप जो भी मरीज आयें, केवल उसका नाम लिखेंगे , फीस नहीं लेंगे। फीस मैं खुद लूंगा। 


और जब मरीज आते तो अगर वह गरीब मरीज होते तो उन्होंने उनसे फीस लेना बंद कर दिया । केवल संपन्न मरीज देखते तो ही उनसे फीस लेते।


धीरे धीरे शहर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई । दूसरे डाक्टरों ने सुना । उन्हें लगा कि इस कारण से हमारी प्रैक्टिस कम पड़ेगी, और लोग हमारी निंदा करेंगे । उन्होंने एसोसिएशन के अध्यक्ष से कहा। 

 

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ बसु भाई से मिलने आए , उन्होंने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो ।


तब वासु भाई ने जो जवाब दिया उसको सुनकर उनका मन भी उद्वेलित हो गए ।


वासु भाई ने कहा *"मेरे जीवन में हर परीक्षा में मेरिट में पहली पोजीशन पर आता रहा। एमबीबीएस में भी , एमडी में भी गोल्ड मेडलिस्ट बना ,परंतु सभ्यता, संस्कार और अतिथि सेवा में वह गांव की महिला जो बहुत गरीब है , वह मुझसे आगे निकल गयी। तो मैं अब पीछे कैसे रहूं । इसलिए मैं अतिथि सेवा में मानव सेवा में भी गोल्ड मेडलिस्ट बनूंगा । इसलिए मैंने यह सेवा प्रारंभ की और मैं यह कहता हूं कि हमारा व्यवसाय मानव सेवा का है। सारे चिकित्सकों से भी मेरी अपील है कि वह सेवा भावना से काम करें । गरीबों की निशुल्क सेवा करें , उपचार करें । यह् व्यवसाय धन कमाने का नहीं। परमात्मा ने मानव सेवा का अवसर प्रदान किया है*


*एसोसिएशन के अध्यक्ष ने वासु भाई को प्रणाम किया और धन्यवाद देकर उन्होंने कहा कि मैं भी आगे से ऐसी ही भावना रखकर के चिकित्सकीय सेवा करुंगा।*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

पितृ पक्ष के पूजा का विधि विधान

पितृ पक्ष के पूजा का विधि विधान 


आगामी २० तिथि से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है जिन जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष है उन्हे ये मंत्र जाप ओर स्तोत्र पाठ जरुर करना चाहिए।

क्यकी बिना पितरों को प्रसन्न किया कोई काम सिद्ध नहीं होते।बहुत बड़ा लेख ना लिखकर मै सिर्फ आपको जो महत्वपूर्ण जानकारी है वो ही दूंगी मेरे अनुसार ये मंत्र जाप हर किसी को करना चाहिए ताकि उसके ओर उसके परिवार पर पितरों की कृपा हमेशा बनी रहे।


पितृ स्मरण मंत्र 


ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च | 

नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमोऽस्तुते ||


इस मंत्र का रोज सुबह शाम लगातार तीन- तीन बार जाप करने से पितृ खुश होते है।इस मंत्र का जाप हर रोज जब पूजा करे तो देव - देवी के पूजन के बाद जरुर करे।


पितृ मंत्र 


ॐ सर्व पितृ मम मनः कामना सिद्ध कुरु कुरु स्वाहा।


इस मंत्र का आप पितृ पक्ष में अनुष्ठान कर सकते है इसमें आप संकल्प लेकर इस मंत्र का जाप शुरू करे ओर अमावस्या के दिन गाय के शुद्ध देसी घी, तिल,गुड की आहुति के द्वारा दशांश हवन ,तर्पण , मार्जन ओर ब्रह्मण भोज करवाए।अगर आप हवन नहीं कर सकते तो दशांश जाप भी कर सकते है।


रूचि कृत पितृ स्तोत्र


रुचिरुवाच 


अर्चितनाममूर्त्तानां पितृणां दीप्ततेजसां | 

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यतेजसां || 

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा | 

सप्तर्षीणां तथान्येषां ताँ नमस्यामि कामदान || 

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा | 

ताँ नमस्यामहं सर्वान पितृनप्सूदधावपि || 

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा | 

द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः || 

देवर्षीणां जनितॄंश्च सर्वलोकनमस्कृतान | 

अक्षय्यस्य सदा द्दातृन नमस्येहं कृताञ्जलिः || 

प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च | 

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः || 

नमोगणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु | 

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुसे || 

सोमाधारान पितृगणान योगमूर्त्तिधरांस्तथा | 

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जागतामहम || 

अग्निरूपांस्तथैवान्यान नमस्यामि पितॄनहम | 

अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः || 

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः | 

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरुपिणः || 

तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः | 

नमो नमो नमस्ते में प्रसीदन्तु स्वधाभुजः ||


हिंदी में अनुवाद ओर अर्थ


रूचि की इस स्तुति करने पर पितर दशो दिशाओ में से प्रकाशित पुंज में से बाहर निकलकर प्रसन्न हुए | रूचि ने जो चन्दन-पुष्प अर्पण किये थे उसी को धारणकर पितर प्रकट हुए | तब रुचिने फिर से पितरो को दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया | तब उसने पितरो को कहा की ब्रह्माजी ने मुझे सृष्टि के विस्तार करने को कहा है इसलिए आप मुझे उत्तम श्रेष्ठ पत्नी प्राप्त हो ऐसा आशीर्वाद दो | जिससे दिव्यसंतान की उत्पत्ति हो सके | 

तब पितरो ने कहा यही समय तुम्हे उत्तम पत्नी की प्राप्ति होगी | उसके गर्भ से तुम्हे मनु संज्ञक उत्तम पुत्र की प्राप्ति होगी | तीन्हो लोको में वे तुम्हारे ही नाम से रौच्य नाम से प्रसिद्द होगा | 


पितरो ने कहा : जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करेंगे हम उसे मनोवांछित भोग और उत्तम फल प्रदान करेंगे | जो निरोगी रहना चाहता हो-धन-पुत्रको प्राप्त करना चाहता हो वो सदैव इस स्तुति से हमें प्रसन्न करे | यह स्तोत्र हमें प्रसन्न करनेवाला है | जो श्राद्ध में भोजन करनेवाले ब्राह्मण के सामने खड़ेहोकर भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करेगा उसके वहा हम निश्चय ही उपस्थित हो कर हमारे लिए किये हुए श्राद्ध को हम ग्रहण करेंगे | 

जहा पर श्राद्ध में इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है वहा हम लोगो को बारह वर्षोतक बने रहनी वाली तृप्ति करने में समर्थ होता है | 

यह स्तोत्र हेमंत ऋतु में श्राद्ध के अवसर पर सुनाने से हमें बारह वर्षोतक तृप्ति प्रदान करता है,

इसी प्रकार शिशिर ऋतु में हमें चौबीस वर्षो तक तृप्ति प्रदान करता है 

वसंत ऋतु में हमें सोलह वर्षो तक तृप्ति प्रदान करता है 

ग्रीष्मऋतु में भी सोलह वर्षो तक तृप्ति प्रदान करता है 

वर्षाऋतु में किया हुआ यह स्तोत्र का पाठ हमे अक्षय तृप्ति प्रदान करता है 

शरत्काल में किया हुआ इसका पाठ हमें पंद्रह वर्षो तक तृप्ति प्रदान करता है 

जिस घर में यह स्तोत्र लिखकर रखा जाता है वहा हम श्राद्ध के समय में उपस्थित हो जाते है 

श्राद्ध में ब्राह्मणो को भोजन करवाते समय इस स्तोत्र को अवश्य पढ़ना चाहिए यह हमें पुष्टि प्रदान करता है |  


ये स्तोत्र आप नित्य पाठ करे १५ दिन तक पितृ जरुर खुश होने ओर आपको जरुर आशीर्वाद देंगे।


ओर अंत में एक साधारण सा उपाय दे रही है हर रोज सुबह चांदी के पात्र में जल ओर दोनों तरह के तिल मिश्रित करके पीपल जी को  पितृ गायत्री मंत्र का जाप करते हुए जल अर्पित करे।


ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्। 


आप सभी पर अपने पितरों का आशीर्वाद हमेशा बना रहे इसी प्राथना के साथ नमस्कार।

Sunday, September 19, 2021

परिवार ही नहीं, सबकी माताजी

 परिवार ही नहीं, सबकी माताजी

*************************

अखण्ड ज्योति संस्थान के आँगन में माता भगवती प्रायः सभी की माता जी बन गयीं। पास-पड़ोस के बच्चे ही नहीं, अखण्ड ज्योति कार्यालय में आने-जाने वाले लोग भी उन्हें ‘माताजी’ कहने लगे थे। यहाँ आते ही उन्होंने अनेकों जिम्मेदारियाँ एक साथ सम्भाल लीं। प्रेम, सदाशयता, सहिष्णुता और श्रमशीलता की प्रकाश-रश्मियों का पुञ्ज उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रकाशित करने लगा। यहाँ वह सबसे बाद में सोती और सबसे पहले जगती। उनके जगने का समय तो निश्चित था, पर सोने के समय के बारे में कोई ठिकाना नहीं था। क्योंकि हर दिन इतने तरह के नए-नए काम आ जाते थे, कि सोने में प्रायः देर हो ही जाती। और कुछ नहीं तो समय-कुसमय आने वाले आगन्तुकों के भोजन व्यवस्था में ही विलम्ब हो जाता। देर से सोने के के कारण व स्थिति कुछ भी हो, पर वह रात्रि 3 बजे बड़े ही नियम से जग जाया करती थीं।


जागरण के पश्चात् नित्यकर्म से निवृत्त होकर वह योग साधना के लिए बैठ जातीं। उनकी पूजावेदी पर सदा परम पूज्य गुरुदेव एवं गायत्री माता का चित्र प्रतिष्ठित रहता था। वही उनके जीवन सर्वस्व और आराध्य थे। अपने आराध्य में ही वे जगन्माता गायत्री की अनुभूति करती थीं। इस चित्र का पंचोपचार पूजन करके प्राणायाम की कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ सम्पन्न करतीं। इसी के साथ गायत्री महामंत्र का जप उनकी अन्तर्चेतना में होने लगता। उनकी कठिन साधना से जाग्रत् एवं चैतन्य गायत्री महामंत्र के प्रत्येक बीजाक्षर का स्फोट उनके अस्तित्त्व के विभिन्न गुह्य केन्द्रों में होता रहता। यह उनके द्वारा किए जाने वाले गायत्री जप की अद्भुत प्रणाली थी। जप के अनन्तर वह ध्यानस्थ हो जातीं। ध्यान की भावदशा में वह अपने महाशक्ति के स्वरूप में परिपूर्णता से निमग्न होतीं। साधना का यह क्रम प्रायः सूर्योदय तक चलता रहता।


इसके बाद घर और कार्यालय के अन्य काम-काज शुरू हो जाते। इन कामों को भी वह किसी भी तरह योग साधना से कम नहीं मानती थीं। वह कहा करती थीं कि काम चाहे छोटा हो या बड़ा, यदि सच्चे भाव से भगवान् को अर्पित करके किया जाय तो वह योग साधना बन जाता है। उससे ध्यान और समाधि की ही तरह योग-विभूतियाँ प्रकट होती हैं। माताजी की इन बातों में कोरा शब्द विस्तार नहीं अनुभूति का सत्य समाया था। अपने कामों के द्वारा वह हर पल-हर क्षण साधना किया करती थीं। उनका कहना था कि स्वार्थ और अहंकार के तत्त्वों की विषाक्तता से प्रायः सभी कर्म कलुषित होते रहते हैं। इनके रहते हुए किसी भी कर्म का योग बनना सम्भव नहीं हो पाता। इनकी जगह यदि अपने आराध्य के प्रति निष्ठ और समर्पण की भावनाएँ कर्म में समाविष्ट हो जाय तो सब-कुछ बदल जाता है। कोई माने या न माने, फिर बर्तन माँजना, झाड़ू-पोछा करने जैसे हीन समझे जाने वाले काम भी ध्यान साधना का रूप ले लेते हैं।


उनका यह अनुभव सत्य उनके जीवन में रोज ही प्रकट होता था। झाड़ू-पोछा और बर्तन माँजने जैसे कामों से ही उनके कामकाजी दिन की शुरुआत होती थी। खाना-पकाना भी एक बड़ा काम था। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त आने वालों की बड़ी संख्या हमेशा घर में बनी रहती। आने वालों की संख्या कोई ठीक-ठीक निश्चित नहीं थी। कभी तो ये पाँच-दस होते, तो कभी तीस-चालीस तक हो जाते। स्थिति जो भी होती, इन सभी के भोजन की उपयुक्त व्यवस्था माताजी को ही अन्नपूर्णा बनकर करनी पड़ती। अपने इस दायित्व को वह बड़े ही उत्साह के साथ निभातीं। भोजन करने वालों को, बनाए गए भोज्य पदार्थों के साथ माँ के प्यार का भी अलौकिक स्वाद मिलता। अथक परिश्रम वाले इस कार्य को करते हुए किसी ने कभी उनको चिड़चिड़ाते या परेशान होते हुए नहीं देखा। स्नेह स्मित बिखेरते हुए वह सदा काम में जुटी रहती थीं।


काम जब बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब परम पूज्य गुरुदेव ने घर के कामों के लिए एक सहयोगिनी महिला की व्यवस्था कर दी। यह मथुरा के ही बैरागपुरा मुहल्ले में रहने वाली एक गरीब विधवा थी। जो टूटी-फूटी कोठरी में एक छोटे से बालक के साथ बिना किसी सहारे, बिना किसी आर्थिक स्रोत के दिन काट रही थी। जिस समय उसे रखा गया उस समय उनकी उम्र 20-22 वर्ष रही होगी। लेकिन गरीबी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। लम्बे कद की यह साँवली महिला जली लकड़ी सी लगती थी। उसके दुर्बलता के कारण उसके गालों में गड्ढे उभर आये थे, आँखें बैठ गयी थीं। उसका नाम था ‘गुलाबो’। हर बात में उसकी ‘ए जू’ कहने की आदत के कारण अखण्ड ज्योति संस्थान में उसका नाम ही ‘ए जू’ हो गया था। सभी लोग उसे इसी नाम से बुलाने लगे।


‘ए जू’ कुछ ही दिनों में माता जी की प्रिय सहयोगी बन गयी। माताजी द्वारा उसके स्वास्थ्य व खान-पान पर विशेष ध्यान दिए जाने के कारण थोड़े ही दिनों में वह दीन-दुर्बल के स्थान पर स्वस्थ, सुपुष्ट एवं सुन्दर दिखने लगी। गली-गली में मारे-मारे फिरने वाले उसके लड़के को माताजी ने स्कूल में दाखिल कराया। वह और उसका बालक दोनों ही निहाल हो गए। ‘ए जू’ के सहयोग से काम की गति तो बढ़ी पर माताजी की श्रमशीलता में जरा भी कमी नहीं आयी। वह घर के सामान्य काम-काज के अलावा अखण्ड ज्योति कार्यालय के कामों में भी हाथ बंटाया करती थी। परिजनों को भेजी जाने वाली अखण्ड ज्योति पत्रिका के रैपरों में वह टिकट चिपकाती, उन्हें भेजने की व्यवस्था करती।


पाठकों एवं परिजनों के जो पत्र कार्यालय में आते थे, उनके उत्तर लिखने में गुरुदेव की सहायता करना माताजी का प्रिय कार्य था। गुरुदेव के पास बैठकर वह अपने पास पत्रों का ढेर जमा कर लेती। इसके बाद एक-एक पत्र पढ़कर गुरुदेव को सुनाती जातीं और वे उत्तर लिखते जाते। पत्रोत्तर देने का यह कार्य बड़ी ही तीव्र गति से सम्पन्न होता। जितनी देर में माताजी पत्र पढ़तीं, उतनी देर में गुरुदेव उत्तर लिख देते। एक बैठक में कम से कम सौ पत्रों के जवाब देने का कार्य सम्पन्न होता। उन दिनों की याद करके माताजी बाद में बताया करती थीं कि गुरुदेव तो सारे दिन अति व्यस्त रहते थे। उनका रात्रिकाल भी प्रायः साधना और समाधि में गुजरता था। बस पत्र लिखने का ही समय ऐसा था, जब मुझे उनका संग-साथ मिल पाता था। इन्हीं क्षणों में कभी-कदार एक-आध घर-परिवार की बातें हो जातीं।


वैसे सामान्यतया घर-परिवार की बातों की तरफ से उन्होंने गुरुदेव को पूरी तरह से निश्चिन्त कर रखा था। रिश्ते-नातेदार, परिवार-सगे सम्बन्धी सभी की देख-भाल, आव-भगत का जिम्मा वही अकेली निभाती थीं। उनके प्यार भरे बर्ताव से सभी सम्बन्धी एवं कुटुम्बी प्रायः अभिभूत बने रहते थे। अखण्ड ज्योति संस्थान के निवास के इन्हीं प्रारम्भिक वर्षों में वह दो सन्तानों की जननी बनीं। उनकी पवित्र कोख से पहले मृत्युञ्जय शर्मा तथा बाद में शैलबाला का जन्म हुआ। धन्य हैं ये विशिष्ट विभूतियाँ जिन्हें विश्व जननी ने अपनी कोख में रखा। अपने इन बच्चों को उन्होंने घर में सतीश और शैलो बुलाना शुरू किया। पारिवारिक सदस्यों के बीच सदा ही इनका यही नाम रहा। अपने इन बच्चों के भाव विकास के साथ उनकी दैनन्दिन गतिविधियाँ यथावत चलती रही।


उन दिनों उनके काम-काज को देखकर आने-जाने वाले आगन्तुक, सगे-सम्बन्धी परिवार के सदस्य सभी हतप्रभ व हैरान रहते थे। उन्हें यह अचरज होता था कि माताजी इतना काम करती हैं, उन्हें थकान क्यों नहीं लगती है? कई बार तो वे ऐसे काम कर डालतीं, जिन्हें करना कई व्यक्तियों के सामूहिक श्रम से सम्भव होता।


‘ए जू’ यदा-कदा उनके इस तरह दिन-रात काम में लगे रहने के रहस्य के बारे में पूछ लेती थी। उसके सवाल पर कभी-कभी तो वह हंस देतीं और कभी थोड़ा गम्भीर होकर कहतीं- “मन में समर्पण की तीव्रता हो तो वज्र भी फूल हो जाया करता है। मेरे लिए हर काम चाहे वह बर्तन माँजना, झाड़ू लगाना हो या फिर आचार्य जी के पास बैठकर पत्र लिखने में मदद करना, अपने को उनके चरणों में उड़ेलने, समर्पित करने का माध्यम है। मैं जितना ज्यादा काम करती हूँ, मुझे उतना ही ज्यादा लगता है कि मैं अपने आपको उन्हें दे रही हूँ।” इस तरह के अनेक काम-काज के बीच उनके मातृत्व का विस्तार भी तीव्र गति से हो रहा था। उनकी वात्सल्य संवेदना सतत अपना विकास करती जा रही थी।

माँ..

 माँ...

****

‘माँ’ के स्नेहिल स्मरण से हम सबके मन-प्राण अनोखी पुलक से भर जाते हैं। अनेकों अहसास, अगणित अनुभूतियाँ और असंख्य भावनाएँ अन्तःकरण के आँगन में बरबस बरस पड़ती हैं। यादों के सघन घन बार-बार अर्न्तगगन में उमड़ते हैं और माँ के प्यार का जीवन-जल मुरझाए प्यासे प्राणों पर उड़ेल देते हैं। ऐसा लगता है कि अपनी माँ सुदूर किसी लोक में नहीं, अपने पास है, एकदम पास। उसके आँचल का छोर हमें छू रहा है। उसके आशीषों की छाँव में अपना जीवन सुरक्षित है।


‘माँ’ तुम्हारे सिवा हम बच्चों का और है भी कौन? जब-तब, समय-कुसमय हम सब सिर्फ तुम्हें ही पुकारते हैं। जीवन की हर चोट, हर दुःख-दर्द में हे माँ! हमें केवल तुम्हारी याद आती है। आँसू भरी आँखों और पीड़ा से विकल हमारे जीवन के लिए तुम्हारी याद ही एकमात्र औषधि है। हमें अच्छी तरह से मालूम है कि हमारी कमियों-कमजोरियों, बेवकूफियों, नादानियों को एक तुम्हीं अनदेखा करके हमको अपना सकती हो।


‘माँ’ तुम्हारी क्षमा अपार है। इसकी न तो कोई सीमा है और न ही शर्तबन्दी। क्षमा ही तुम्हारा स्वभाव है। क्षमा तुमसे ऐसे बहती है जैसे फूल से गन्ध बहती है, दीए से रोशनी बहती है। जैसे पहाड़ों से जल उतरता है, मेघों से वर्षा होती है। हे क्षमास्वरूपिणी माँ! सृष्टि के हर स्थूल-सूक्ष्म विधान में प्रत्येक छोटी-बड़ी गलती या अपराध के लिए कोई न कोई सजा निश्चित है। सृजेता के कठोर कर्मफल विधान से सभी बँधे हैं। यहाँ तक कि स्वयं सृजेता भी कर्मफल की हस्तरेखाओं को स्वीकार करता है। परन्तु हे क्षमामयी! तुम्हारी क्षमा शक्ति से जीवन के महापातक भी पल में विनष्ट होते हैं। यह सृष्टि के समस्त विधानों से अनन्त गुना समर्थ है।


‘माँ’ यह एकाक्षरी महामंत्र ही हमारा प्राण है। माँ! माँ!! जपते हुए ही हमारे ऊपर तुम्हारी कृपा किरणों की वृष्टि हुई है। जीवन में अलौकिक अनुभूतियों के अनेकों सुअवसर आए हैं। तुम्हारी लीला-कथा का पुण्य स्मरण भी इन्हीं में से एक है। हे माँ! अब ऐसी कृपा करो कि यह पुण्य कथा तुम्हारे ही अमित प्रभाव से हम सब बच्चों को तुम्हारी अविरल भक्ति का वरदान देते हुए मातृ तत्त्व का बोध करा सके।

स्त्रियों की तपस्या का इतिहास पुरुषों से कम शानदार नहीं है

 

स्त्रियों की तपस्या का इतिहास पुरुषों से कम शानदार नहीं है

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्


प्राचीनकाल में सावित्री ने एक वर्ष तक गायत्री जप करके वह शक्ति प्राप्त की थी जिससे वह अपने मृत-पति सत्यवान के प्राणों को यमराज से लौटा सकी| दमयंती का तप ही था जिसके प्रभाव ने कुचेष्टा करने का प्रयत्न करने वाले व्याघ्र को भस्म कर दिया था| 


गांधारी आँखों से पट्टी बाँधकर ऐसा तप करती थी, जिससे उसके नेत्रों में वह शक्ति उत्पन्न हो गयी थी कि उसके द्रष्टिपात मात्र से दुर्योधन का शरीर अभेद्य हो गया था| जिस जंघा पर उसने लज्जावश कपड़ा डाल दिया, वही कच्ची रह गयी थी और उसी पर प्रहार करके भीम ने दुर्योधन को मारा था| 


अनसूया ने तप से ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नन्हें बालक बना दिया था| सती शाण्डिली के तपोबल ने सूर्य का रथ रोक दिया था| सुकन्या की तपस्या से जीर्ण-शीर्ण च्यवन ऋषि तरुण हो गये थे| स्त्रियों की तपस्या का इतिहास पुरुषों से कम शानदार नहीं है| यह स्पष्ट है कि स्त्री और पुरुष सभी के लिये तप का प्रमुख मार्ग गायत्री ही है|  


युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य - गायत्री महाविज्ञान

Saturday, September 18, 2021

देवत्व की अभिव्यक्ति है परोपकार

 🛑 🛑

*********************************

🛑परोपकार एक महान दैवीय व आध्यात्मिक गुण है। । यह कुछ और नहीं वरन देवत्व की अभिव्यक्ति है। । साथ ही यह करुणा,, प्रेम,, पवित्रता एवं संवेदना की परम अभिव्यक्ति भी है। । दूसरों की पीड़ा देखकर किसी पाषाण हृदय में भले ही कोई हलचल न हो पर करुणा,, प्रेम व संवेदना से भरे हृदय में कोई हलचल न हो ऐसा कदापि संभव नहीं। । परोपकार पावन हृदय की एक अलौकिक पुकार है,, एक आकुल पुकार है। । सच कहें तो ऐसी आकुल पुकार ईशकृपा से ही किसी के हृदय में उठती है। ।परसेवा,, परोपकार हेतु हृदय की आकुल पुकार सचमुच एक दिव्य अनुदान है,, वरदान है,, अनुग्रह है जो प्रभुकृपा से ही हम पर बरसती है। ।


🛑अपने संकल्प मात्र से कोटि कोटि ब्रह्माण्डों की रचना व संहार करने वाले प्रभु सर्वसमर्थ हैं,, शक्तिशाली हैं,, सर्वज्ञ हैं और सर्वव्यापी भी।। संसार में उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं पर उन करुणानिधान की जरा करुणा तो देखिए कि वे स्वयं किसी पर अपनी करुणा बरसाना चाह रहे हैं,, किसी की पीड़ा हरण करना चाह रहे हैं पर वे इस पुनीत कार्य को हमारे इन नन्हे हाथों से ही कराना चाह रहे हैं। । हमारे हाथों से ही किसी का भला कराना चाह रहे हैं। । परमात्मा किसी पर अपना अनुग्रह बरसाना चाह रहे हैं पर इस हेतु हमें अपना माध्यम बना वे यह श्रेय हमें देना चाहते हैं। ।


🛑जब भी हमें किसी की सेवा,, सहयोग का अवसर मिले तो इसे प्रभु इच्छा समझ हमें अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।। कौन जाने फिर यह अवसर अपने हाथ लगे न लगे।। कौन जाने किस वेश में स्वयं प्रभु हमारी सेवा पाने,, हमारे घर आन बैठें।। यदि हम सचमुच परोपकार के माध्यम से प्रभु की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपने हृदय की कोठरी तो साफ तो साफ करना जरूरी है। । स्नेहसलिला माता भगवती देवी शर्मा हमें पावन सीख देती हैं -- स्वार्थ में लेन देन तो सभी करते हैं,, बदले में कुछ पाने की इच्छा से सेवा सहयोग करने वालोँ की कहाँ कमी है?? पर परोपकार एक परमपवित्र भावना है। इसमें पाने,, पाने की नहीं,, सिर्फ देने,, देने की चाहत है। । परोपकार तो हृदय के प्रेम सिंधु,, करुणा सिंधु में उठ रही वे लहरें हैं जो नररूपी नारायण व जीवरूपी शिव का अभिषेक करना चाहती हैं। । ऐसे सहृदय लोग तो सृष्टि के कण कण में,, हर जीव में अपने शिव को देखते हैं,, आराध्य को देखते हैं। । अब तो सम्पूर्ण सृष्टि ही उनके लिए शिवालय है,, देवालय है और हर जीव शिव की प्रतिमाएं हैं। । अब तो वे इसी देवालय में,, शिवालय में बैठकर पर सेवा,, परोपकार कर अपने आराध्य की अभ्यर्थना,, आराधना करना चाहते हैं। । अब उनके द्वारा की गई औरों की हरेक सेवा ही ईश पूजा है,, ईश उपासना है पर ऐसी उपासना करने वाले विरले ही होते हैं इसलिए संत कबीर कह रहे हैं-- 


जो कोई परस्पर लेता देता है तो ये सब स्वार्थ है पर दूसरों से कुछ न पाने पर भी दूसरों की भलाई में जो तत्पर है वो ही वास्तव में शूरवीर है। । निस्संदेह परोपकार परमात्मा का साक्षात पूजन है। । यह स्वयं में बहुत बड़ी साधना है जिसे सच्चे व निष्काम भाव से करते रहने पर व्यक्ति को वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो बड़ी बड़ी दुर्लभ साधनाओं से ही प्राप्त कर पाना संभव है। । यहाँ तक कि मुक्ति का द्वार भी इसी माध्यम से खुल जाता है। । गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के माध्यम से जटायु को यही संदेश देते हैं-- जिनके मन में दूसरों का हित बसता है,, समाया रहता है उनके लिए जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है,, वे मेरे परमधाम के निवासी होते हैं। । सचमुच कितनी अद्भुत है परोपकार की महिमा। । इसलिए हमें इसी पथ का पथिक बनना चाहिए। ।

गायत्री_का_अर्थ_चिंतन

 #गायत्री_का_अर्थ_चिंतन 

*********************

"ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।"


ऊँ ब्रह्म भू:— प्राणस्वरूप

भुव:— दु:खनाशक

 स्व:— सुख स्वरूप

तत्— उस 

सवितु:— तेजस्वी, प्रकाशवान्

वरेण्यं— श्रेष्ठ 

भर्गो— पापनाशक

देवस्य— दिव्य को, देने वाले को 

धीमहि— धारण करें

धियो— बुद्धि को

 यो— जो

न — हमारी 

प्रचोदयात् - करे।


गायत्री मन्त्र के इस अर्थ पर मनन एवं चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्त्वों की वृद्धि होती है, जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। यह भाव बड़े ही शक्तिदायक, उत्साहप्रद, सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्यप्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।


1- ‘‘भू: लोक, भुव: लोक, स्व: लोक- इन तीनों लोकों में ऊँ परमात्मा समाया हुआ है। यह जितना भी विश्व ब्रह्माण्ड है, परमात्मा की साकार प्रतिमा है। कण- कण में भगवान् समाये हुए हैं। सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र देखते हुए मुझे कुविचारों और कुकर्मों से सदा दूर रहना चाहिए एवं संसार की सुख- शान्ति तथा शोभा बढ़ाने में सहयोग देकर प्रभु की सच्ची पूजा करनी चाहिए।’’


2- ‘‘तत् परमात्मा, सवितु:- तेजस्वी, वरेण्यं- श्रेष्ठ, भर्गो- पापरहित और देवस्य- दिव्य है, उसको अन्त:करण में- धीमहि करता हूँ। इन गुणवाले भगवान् मेरे अन्त:करण में प्रविष्ट होकर मुझे भी तेजस्वी, श्रेष्ठ, पापरहित एवं दिव्य बनाते हैं। मैं प्रतिक्षण इन गुणों से युक्त होता जाता हूँ। इन दोनों की मात्रा मेरे मस्तिष्क तथा शरीर के कण- कण में बढ़ती है। इन गुणों से ओत- प्रोत होता जाता हूँ।’’


3 - ‘‘वह परमात्मा, न:- हमारी, धियो- बुद्धि को, प्रचोदयात्- सन्मार्ग में प्रेरित करे। हम सबकी, हमारे परिजनों की बुद्धि सन्मार्गगामी हो। संसार की सबसे बड़ी विभूति, सुखों की आदि माता सद्बुद्धि को पाकर हम इस जीवन में ही स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करें, मानव जन्म को सफल बनाएँ।’’

उपर्युक्त तीनों चिन्तन- संकल्प धीरे- धीरे मनन करते जाना चाहिए। एक- एक शब्द पर कुछ क्षण रुकना चाहिए और उस शब्द का कल्पना चित्र मन में बनाना चाहिए।


जब यह शब्द पढ़े जा रहे हों कि परमात्मा भू: भुव: स्व: तीनों लोकों में व्याप्त है, तब ऐसी कल्पना करनी चाहिए, जैसे हम पाताल, पृथ्वी, स्वर्ग को भली प्रकार देख रहे हैं और उसमें गर्मी, प्रकाश, बिजली, शक्ति या प्राण की तरह परमात्मा सर्वत्र समाया हुआ है। यह विराट् ब्रह्माण्ड ईश्वर की जीवित- जाग्रत् साकार प्रतिमा है। गीता में अर्जुन को जिस प्रकार भगवान् ने अपना विराट् रूप दिखाया है, वैसे ही विराट् पुरुष के दर्शन अपने कल्पनालोक में मानस चक्षुओं से करने चाहिए। जी भरकर इस विराट् ब्रह्म के, विश्वपुरुष के दर्शन करने चाहिए कि मैं इस विश्वपुरुष के पेट में बैठा हूँ। मेरे चारों ओर परमात्मा ही परमात्मा है। ऐसी महाशक्ति की उपस्थिति में कुविचारों और कुकर्मों को मैं किस प्रकार अङ्गीकार कर सकता हूँ। इस विश्वपुरुष का कण- कण मेरे लिए पूजनीय है। उसकी सेवा, सुरक्षा एवं शोभा बढ़ाने में प्रवृत्त रहना ही मेरे लिए श्रेयस्कर है।


संकल्प के दूसरे भाग का चिन्तन करते हुए अपने हृदय को भगवान् का सिंहासन अनुभव करना चाहिए और तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, निर्विकार, दिव्य गुणों वाले परमात्मा को विराजमान देखना चाहिए। भगवान् की झाँकी तीन रूप में की जा सकती है- (1) विराट् पुरुष के रूप में (2) राम, कृष्ण, विष्णु, गायत्री, सरस्वती आदि के रूप में (3) दीपक की ज्योति के रूप में। यह अपनी भावना, इच्छा और रुचि के ऊपर है। परमात्मा का पुरुष रूप में, गायत्री का मातृ रूप में अपनी रुचि के अनुसार ध्यान किया जा सकता है। परमात्मा स्त्री भी है और पुरुष भी। गायत्री साधकों को माता गायत्री के रूप में ब्रह्म का ध्यान करना अधिक रुचता है। सुन्दर छवि का ध्यान करते हुए उसमें सूर्य के समान तेजस्विता, सर्वोपरि श्रेष्ठता, परम पवित्र निर्मलता और दिव्य सतोगुण की झाँकी करनी चाहिए। इस प्रकर गुण और रूप वाली ब्रह्मशक्ति को अपने हृदय में स्थायी रूप से बस जाने की, अपने रोम- रोम में रम जाने की भावना करनी चाहिए।


संकल्प के तीसरे भाग का चिन्तन करते हुए ऐसा अनुभव करना चाहिए कि वह गायत्री ब्रह्मशक्ति हमारे हृदय में निवास करने वाली भावना तथा मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि को पकडक़र सात्त्विकता के, धर्म- कर्त्तव्य के, सेवा के सत्पथ पर घसीटे लिए जा रही हैं। बुद्धि और भावना को इसी दिशा में चलाने का अभ्यास तथा प्रेम उत्पन्न कर रही है और वे दोनों बड़े आनन्द, उत्साह तथा सन्तोष का अनुभव करते हुए माता गायत्री के साथ- साथ चल रही हैं।

गायत्री के अर्थ चिन्तन में दी हुई यह तीनों भावनाएँ क्रमश: ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग की प्रतीक हैं। इन्हीं तीन भावनाओं का विस्तार होकर योग के ज्ञान, भक्ति और कर्म यह तीन आधार बने हैं। गायत्री का अर्थ चिन्तन, बीज रूप से अपनी अन्तरात्मा को तीनों योगों की त्रिवेणी में स्नान कराने के समान है।


इस प्रकार चिन्तन करने से गायत्री मन्त्र का अर्थ भली प्रकार हृदयंगम हो जाता है और उसकी प्रत्येक भावना मन पर अपनी छाप जमा लेती है, जिससे यह परिणाम कुछ ही दिनों में दिखाई पडऩे लगता है कि मन कुविचारों और कुकर्मों की ओर से हट गया है और मनुष्योचित सद्विचारों और सत्कर्मों में उत्साहपूर्वक रस लेने लगा है। यह प्रवृत्ति आरम्भ में चाहे कितनी ही मन्द क्यों न हो, यह निश्चित है कि यदि वह बनी रहे, बुझने न पाए, तो निश्चय ही आत्मा दिन- दिन समुन्नत होती जाती है और जीवन का परम लक्ष्य समीप खिसकता चला आता है।


 ✍🏻 पंडित श्री राम शर्मा आचार्य

Friday, September 17, 2021

अभागा राजा और भाग्यशाली दास

 👉अभागा राजा और भाग्यशाली दास

******************************

*एक बार एक गुरुदेव अपने शिष्य को अहंकार के ऊपर एक शिक्षाप्रद कहानी सुना रहे थे।* 


एक विशाल नदी जो की सदाबहार थी उसके दोनो तरफ दो सुन्दर नगर बसे हुये थे! नदी के उस पार महान और विशाल देव मन्दिर बना हुआ था! नदी के इधर एक राजा था राजा को बड़ा अहंकार था कुछ भी करता तो अहंकार का प्रदर्शन करता वहाँ एक दास भी था बहुत ही विनम्र और सज्जन!


*एक बार राजा और दास दोनो नदी के वहाँ गये राजा ने उस पार बने देव मंदिर को देखने की ईच्छा व्यक्त की दो नावें थी रात का समय था एक नाव मे राजा सवार हुआ और दुजि मे दास सवार हुआ दोनो नाव के बीच मे बड़ी दूरी थी!*


राजा रात भर चप्पू चलाता रहा पर नदी के उस पार न पहुँच पाया *सूर्योदय हो गया तो राजा ने देखा की दास नदी के उसपार से इधर आ रहा है! दास आया और देव मन्दिर का गुणगान करने लगा तो राजा ने कहा की तुम रातभर मन्दिर मे थे!* दास ने कहा की हाँ और राजाजी क्या मनोहर देव प्रतिमा थी पर आप क्यों नही आये!


अरे मेने तो रात भर चप्पू चलाया पर .....


*गुरुदेव ने शिष्य से पुछा वत्स बताओ की राजा रातभर चप्पू चलाता रहा पर फिर भी उसपार न पहुँचा? ऐसा क्यों हुआ? जब की उसपार पहुँचने मे एक घंटे का समय ही बहुत है!* 


शिष्य - हॆ नाथ मैं तो आपका अबोध सेवक हुं मैं क्या जानु आप ही बताने की कृपा करे देव!


*ऋषिवर - हॆ वत्स राजा ने चप्पू तो रातभर चलाया पर उसने खूंटे से बँधी रस्सी को नही खोला!*


और इसी तरह लोग जिन्दगी भर चप्पू चलाते रहते है पर जब तक अहंकार के खूंटे को उखाड़कर नही फेकेंगे आसक्ति की रस्सी को नही काटेंगे तब तक नाव देव मंदिर तक नही पहुंचेगी!


*हॆ वत्स जब तक जीव स्वयं को सामने रखेगा तब तक उसका भला नही हो पायेगा! ये न कहो की ये मैने किया ये न कहो की ये मेरा है ये कहो की जो कुछ भी है वो सद्गुरु और समर्थ सत्ता का है मेरा कुछ भी नही है जो कुछ भी है सब उसी का है!*


स्वयं को सामने मत रखो समर्थ सत्ता को सामने रखो! और समर्थ सत्ता या तो सद्गुरु है या फिर इष्टदेव है , यदि नारायण के दरबार मे राजा बनकर रहोगे तो काम नही चलेगा वहाँ तो दास बनकर रहोगे तभी कोई मतलब है! 


*जो अहंकार से ग्रसित है वो राजा बनकर चलता है और जो दास बनकर चलता है वो सदा लाभ मे ही रहता है!* 


इसलिये नारायण के दरबार मे राजा नही दास बनकर चलना!

सत्य को छिपाकर असत्य बोलने से उसके खुल जाने का भय बना रहता है।

 सत्य को छिपाकर असत्य बोलने से उसके खुल जाने का भय बना रहता है।

***********************

      कोई भी सत्य अपने में एक स्वाभाविक प्रवाह रखता है और अनायास ही अन्दर से बाहर को वह निकलना चाहता है। किन्तु असत्यवादी व्यक्ति उसे बाहर आने से रोकते हैं। 

      बलपूर्वक उसे अन्दर ही दबाये रहते हैं। यह अस्वाभाविक प्रयत्न बहुत कष्टकर होता है। इसमें मनुष्य शक्ति की बहुत बड़ी मात्रा नष्ट हो जाती है। एक मनगढ़ंत की रचना करने के लिए वह मस्तिष्क पर दूसरा दबाव डालता है। 

      वह मस्तिष्क से ऐसी दिशा में काम लेता है, जो उसे जरा भी सहन नहीं होता, लेकिन दबाव के कारण उसे विवश होकर वैसा करना पड़ता है।

       इस प्रकार सत्य के स्थान पर असत्य गढ़ देने के बाद एक दूसरा दायित्व शुरू होता है, वह यह कि- ऐसा प्रयत्न करते रह जाए, जिससे उसके मनगढ़ंत प्रसंग की पोल न खुलने पाये। 

      इस सजगता में झूठे व्यक्ति को निरन्तर सशंक और संत्रस्त रहना पड़ता है। संयोग सम्भावनाओं से निपटने के लिए असत्य अनुसत्य की परम्परा निर्माण करनी पड़ती है। 

      एक झूठ छिपाने के लिए सैकड़ों झूठ रचने पड़ते हैं। इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण वितर्कनाएँ मनुष्य को सनकी तक बना देती है। 

      सत्य को छिपाकर असत्य बोलने में न केवल उसके खुल जाने के भय का संत्रास रहता है, अपितु हमारी अन्तरात्मा में एक चोरवृत्ति का भी विकास हो जाता है। 

      असत्यवादी का स्वभाव इतना तस्कर हो जाता है, कि प्रायः यह अपने से भी सच्चाई को छिपाने लगता है। इसके अतिरिक्त उसकी सरल आत्मा से जब तक कि वह पूरी तरह मर नहीं जाती, उस चोरवृत्ति का संघर्ष चलता रहता है। 

      यह संघर्ष मनुष्य में अंतर्द्वन्द को जन्म देता है। अन्तर्द्वन्द वह अस्थाई ज्वाला होती है, जो मनुष्य की सारी शान्ति जलाकर भस्म कर देती है।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मई 1973 पृष्ठ 23

Thursday, September 16, 2021

बातचीत की कला हमें जीवनभर कुछ न कुछ सिखाती है।

 बातचीत की कला हमें जीवनभर कुछ न कुछ सिखाती है।

***********************

      जीवन में ऐसे कई क्षण आते हैं, जो हमें कुछ-न-कुछ सीख दे देकर जाते हैं। हम अपनी बोलचाल से जहाँ दूसरों के मन पर छा जाते हैं, तो वहीं अपनी बोलचाल से किन्ही लोगों के मन पर घाव भी कर देते हैं और ज्यादातर हम बातचीत से उन्हीं लोगों के दिलों को दुःखाते हैं जो हमारे अपने होते हैं और ऐसा होने पर हमारे रिश्तो में कड़ुआहट घुलने लगती है।

       छोटी-छोटी बातें ही बिगड़कर इतनी बड़ी बन जाती है, कि उनके कारण लड़ाइयाँ हो जाती है या फिर नाराजगी हो जाती है, बातचीत तक बन्द हो जाती है।

       बोलचाल की अच्छी आदतें जहाँ हमें उन्नति के शिखर पर पहुँचाने में मदद करती है, तो वही बोलचाल की बुरी आदतें हमारे उन्नति के शिखर पर पहुँचने में बाधा पहुँचाती है।

       बोलचाल हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है, हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न भाग है। बोलचाल के माध्यम से ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का स्तर प्रदर्शित करता है। कोई व्यक्ति कैसा है? उसके बातचीत के ढँग से ही बहुत कुछ पता चल जाता है।

       बोलचाल के माध्यम से जहाँ हम बिगड़ी हुई बातों को सुधार सकते हैं, तो वहीं बनी हुई बातों को बिगाड़ भी सकते हैं। बातचीत की कला ऐसी है, जो जीवन भर हमें कुछ न कुछ सिखाती है।

       हमारी बातचीत व व्यवहार हमेशा एक जैसे नहीं रहते, हमारी मनःस्थिति के अनुसार यह बदलते रहते हैं। सब लोगों के प्रति हमारा व्यवहार व नजरिया भी एक जैसे नहीं होता। इसीलिए सब के प्रति अलग दृष्टिकोण के कारण सबके प्रति हमारी बोलचाल भी भिन्न-भिन्न होती है।

       कभी-कभी हम बहुत अच्छे से बातचीत करते हैं, तो कभी-कभी हमारी बातचीत में नाराजगी घुली होती है। कभी हमारी वाणी में गुड़ की मिठास होती है, तो कभी मिर्ची सा तीखापन। कभी हमारे शब्दों से फूल बरसते हैं तो कभी उनसे काँटों की बौछार होती है।

       इसलिए किस तरह की वाणी का हमें कहाँ प्रयोग करना है? यह समझने की बेहद जरूरत है। यदि वाणी का गलत प्रयोग किया जाए तो वह लक्ष्य को न भेदकर अन्य किसी को आहत कर सकती है और हमारा नुकसान कर सकती है।

       इसीलिए हमें बातचीत करने की अच्छी आदतों को अपनाना चाहिए और हमें अच्छी बातचीत केवल बाहर वालों से ही नहीं बल्कि अपनों के साथ भी करनी चाहिए।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति फरवरी 2020 पृष्ठ 50

समय का पालन हमें ईश्वर प्रदत्त सुख सौभाग्य से लाभान्वित करती है।

 समय का पालन हमें ईश्वर प्रदत्त सुख सौभाग्य से लाभान्वित करती है।

*********************** 

      देर से सोकर उठने वाला एक व्यक्ति अपनी विद्या-बुद्धि की बहुत शेखी मार रहा था और अपनी चतुरता का वर्णन करते हुए उपस्थित मित्र के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनना चाहता था।

       लेकिन मित्र ने कहा:- "दोस्त! मैं तुमसे 4 घण्टे आगे हूँ। तुम आठ बजे सोकर उठते हो, जबकि मैं चार बजे ही उठकर अपने आवश्यक कार्यों में लग जाता हूँ। तुम बहुत चतुर होने पर भी जितना काम नहीं कर पाते, उससे अधिक मैं समय का सदुपयोग करके पूरा कर लेता हूँ, यद्यपि मैं विद्या-बुद्धि में तुम्हारे समान होने का दावा नहीं करता।"

       आलस्य का अर्थ है, अपने भाग्य का तिरस्कार करना। लापरवाही का अर्थ है, ईश्वर प्रदत्त स्वर्ण सुयोगों को ठुकराना। समय को टालने की आदत एक अभिशाप ही है, जिसका परिणाम अन्ततः बहुत ही दुःखद होता है।

       आलसी और लापरवाह लोग एक प्रकार के भाग्यहीन हैं, जो ईश्वर के द्वारा प्रति-क्षण बरसने वाली कृपा को समेटने में हिचकिचाते रहते हैं।

       जिन्हें हर घड़ी अपने समय की उपयोगिता का ध्यान रहता है, वे न तो आलस्य के गुलाम बनते हैं और न प्रमाद में अपना समय गुजारते हैं। आज का काम आज, अब का काम अब करने की आदत ही किसी मनुष्य को उसके ईश्वर प्रदत्त सुख सौभाग्य से लाभान्वित कर सकती है।

       समय का मूल्य संसार की प्रत्येक कीमती चीज से अधिक है। हर खोई हुई चीज मिल सकती है, पर समय गँवा देने के बाद उसका लौटना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।

       जो अवसर चूक गया उसके लिए पछताने और हाथ मलने के लिए सिवाय कुछ और शेष नहीं रहता।

( संकलित व सम्पादित)

अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 34

मन में भय की शंका प्रवेश करते ही वातावरण को संदेहपूर्ण बना देती है।

 मन में भय की शंका प्रवेश करते ही वातावरण को संदेहपूर्ण बना देती है।

*******************

      तुम्हें दूसरा कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, बाल भी बाँका नहीं कर सकता। तुम चाहो तो निर्भय, परम निःशंक बन सकते हो। तुम्हारी शुभ-अशुभ वृत्तियाँ, यश-अपयश के विचार, विवेक-बुद्धि ही तुम्हारा भाग्य निर्माण करती है। 

      भयभीत होना एक अप्राकृतिक बात है। प्रकृति नहीं चाहती कि मनुष्य डर कर अपनी आत्मा पर बोझ डालें। तुम्हारे सब भय, तुम्हारे दुःख, तुम्हारे नित्य प्रति की चिन्ताएँ तुमने स्वयं उत्पन्न कर ली है।

       यदि तुम चाहो तो अन्तःकरण का भूत-प्रेत, पिशाचों की श्मशान भूमि बना सकते हो। इसके विपरीत यदि तुम चाहो तो अपने अन्तःकरण को निर्भयता, श्रद्धा, उत्साह के सद्गुणों से परिपूर्ण कर सकते हो।

       भय की शंका मन में प्रवेश करते ही वातावरण को संदेह पूर्ण बना देती है। हमें चारों ओर वही चीज नजर आने लगती है, जिससे हम डरते हैं। यदि हम भय की भावनाएँ हमेशा के लिए मनोमन्दिर से निकाल डालें तो उचित रूप से तृप्त और सुखी रह सकते हैं। आनन्दित रहने के लिए यह आवश्यक है कि अन्तःकरण भय की कल्पनाओं से सर्वथा मुक्त हो।

       आइए! हम आज से ही प्रतिज्ञा करें कि "हम अभय हैं। भय के पिशाच को अपने निकट न आने देंगे। श्रद्धा और विश्वास के दीपक से अन्तःकरण में आलोकित रहेंगे और निर्भयता पूर्वक परमात्मा की इस पुनीत सृष्टि में विचरण करेंगे।"

(संकलित व सम्पादित)

-- अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 1

Wednesday, September 15, 2021

एक साहसी जीवन संगिनी

 एक साहसी जीवन संगिनी

*********************

युवा नारी के रूप में वन्दनीया माता जी की साधना आज की युवा पीढ़ी को संघर्ष के लिए प्रेरित करती है। उनका जीवन सुख नहीं, संघर्ष का पर्याय था। संघर्ष-पारिवारिक मूल्यों के लिए, संघर्ष सुसंस्कारों की प्रतिष्ठा के लिए, संघर्ष-आम नारी के सम्मान के लिए। उनके जीवन के कुछ पन्ने ‘महाशक्ति की लोकयात्रा’ में प्रकाशित हो चुके हैं। लेकिन ऐसा बहुत कुछ है जो अभी तक अनजाना, अनछुआ है। जो प्रकाशित हो चुका है, उसने अनगिनत को प्रेरित किया है, पर जो अभी आवरण में है, उसमें युवा चेतना को परिवॢतत करने की सामर्थ्य है। अपनी औपचारिक शिक्षा उनसे अधिक होने के बावजूद आज की युवा नारी उनसे जीवन जीने का सलीका, विपरीत परिस्थितियों में भी सही सोच बनाये रखने का गुर, संघर्ष करने का साहस पा सकती है।


    वन्दनीया माता जी कहा करती थी कि उनमें बचपन से ही राष्ट्रप्रेम था। समाज का दुःख-दर्द उन्हें संवेदित करता था। नारी की स्थिति सुधरे ऐसा वे सोचती थी। ये बातें उन्हें किसी ने सिखायी नहीं थी, बल्कि स्व-स्फुरित थी। पर तब ऐसा करने का अवसर न था। परिस्थितियाँ ऐसी न थीं कि वह अपना चाहा कर सके। ऐसे में उनकी भावनाएँ गुड़िया-गुड्डे के खेल में व्यक्त हुआ करती थी। माता जी की गुड़िया उन्हीं की तरह राष्ट्रवादी, संस्कारवान हुआ करती थी। उसे सिल्क, जार्जेट या अंग्रेजी कपड़ों से परहेज था। इनकी गुड़िया हमेशा खादी पहनती थी। कभी-कभी तो इसे तिरंगें कपड़े भाते थे और यह गुड़िया ऐसे किसी गुड्डे से शादी नहीं करना चाहती थी जो कि दहेज माँगे। दहेज वाले दूल्हे का बहिष्कार कर देना, उसकी बारात को दरवाजे से लौटा देना, उनकी गुड़िया का प्रिय कार्य था। मेहनत और जीवट के काम उनकी गुड़िया को भाते थे।


    बचपन एवं किशोरावस्था के ये खेल खेलते माताजी ज्यों ही युवावस्था की देहलीज में पहुँचीं, उनका विवाह हो गया। उन दिनों गुरुदेव का जीवन स्वाधीनता संघर्ष की अग्नि में तप रहा था। साथ ही सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए वे कई योजनाएँ बना रहे थे। गुरुदेव की इन योजनाओं में माताजी की भावनाएँ घुलने लगीं। यहाँ सभी कुछ ऐसा था, जिसकी कल्पना वे बचपन से करती आयी थीं। बस वे इन कामों में जुट गयी। थके हुए शरीर से भी श्रम उनका स्वभाव बन गया। अपनी बातों में कभी-कभी वह अपने अतीत की, युवावस्था के दिनों की झलक दिखा देती थीं। बातों ही बातों में ऐसे कई प्रसंग उनकी जबान पर आ जाते थे, जो उन दिनों के संघर्ष के सच को उजागर करते।स्वाधीनता संघर्ष में अपनी सक्रिय संलिप्तता के बावजूद गुरुदेव उन दिनों युग निर्माण मिशन की आधारशिला रख रहे थे। उनका यह दैवी अभियान धरती पर अवतरित हो रहा था। अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में संगठन की सक्रियता अंकुरित हो रही थी।


माताजी की इसमें बराबर की हिस्सेदारी थी। दिन में आने-जाने वालों के खाने-पीने का ध्यान रखना, कार्यालय के कई काम निबटाना-उनके रोज के काम थे। माताजी बताती थीं कि उन दिनों गुरुदेव कई-कई दिनों के लिए घर से गायब हो जाते थे। बहुत बार तो वह महीनों तक भूमिगत रहकर अपनी गतिविधियों को संचालित करते। ऐसे में माताजी पर अचानक भार आ पड़ता था। रिश्तेदार, परिचितों में अंतरंग सहयोगी न थे। जो थे भी, वे सदा अपनी मदद के लिए हाथ पसारे रहते थे। ऐसों से आशा की भी क्या जाय? इनकी अनेकों कमियों के बावजूद माताजी, इन्हें सहज निश्छल स्नेह दिया करती थी। अपनी युवावस्था के दिनों उन्होंने परिवार को जोड़े रखने के लिए बहुत मानसिक, भावनात्मक कष्ट सहे।


    चर्चा चलती है तो कई बातें उभरती हैं। ऐसे ही एक प्रसंग में माता जी ने बताया कि गुरुदेव उन दिनों लगभग दो महीने से गायब थे, उनकी कोई खोज खबर नहीं थी। मन उनके लिए ङ्क्षचतित रहता था, पता नहीं किस हाल में होंगे, खाना मिलता भी होगा कि नहीं? घर में जरूरत का सामान खत्म हो रहा था, बस जैसे-तैसे किसी तरह से सब कुछ चल रहा था। ङ्क्षचता, परेशानी के बीच शारीरिक और मानसिक संघर्ष करते हुए माताजी का स्वास्थ्य अचानक खराब हो गया। लगातार उन्हें बुखार रहने लगा। सभी उन्हें विश्राम की सलाह देते, पर विश्राम का अवसर कहाँ था?


    तभी अचानक एक रात को गुरुदेव आ पहुँचे। उनके साथ उनके कई साथी थे। गुरुदेव के कपड़े बहुत मैले हो चुके थे। उनकी दाढ़ी के बाल भी बढ़ गये थे। आँखों से लगता था कि जैसे वे कई दिनों से सोये नहीं। उनके साथियों का हाल भी कुछ ऐसा ही था। गुरुदेव ने माताजी से कहा कि सभी लोग कई दिनों से भूखे हैं। इधर-उधर भागते हुए दिन बीत रहे हैं। अगर सम्भव हो तो कुछ खिला दो। माताजी सोच में पड़ गयीं, क्योंकि घर की चीजें खत्म हो रही थीं। उन्होंने एक बार फिर खोज-बीन की। आटा तो नहीं था, लेकिन थोड़े से चावल और दाल थी। उन्होंने यही दाल-चावल पका दिये। अभी वह इन लोगों को खाना परोस पातीं, इतने में दरवाजे पर कुण्डी खटखटाये जाने की आवाज आयी।


    एक बारगी सबके चेहरे पर ङ्क्षचता की लकीरें चमक उठीं। पर माताजी धीरज से काम लेते हुए सभी को तलघर में ले गयीं। वहीं उन्होंने गुरुदेव सहित सबको बिठाया और दाल-चावल रखते हुए कहा आप लोग इन्हें परोसो-खाओ, तब तक मैं बाहर देखती हूँ। इन लोगों को बिठाकर जब उन्होंने बाहर आकर दरवाजा खोला, तो देखा कि पुलिस खड़ी थी, वह गुरुदेव के बारे में जानने के लिए आयी थी। पुलिस को देखकर एक बार तो उनका दिल जोर से धड़का। लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने अपने चेहरे पर बिना कोई भाव लाये, पुलिस वालों को बिठाया और उनसे इधर-उधर की बातें करती रहीं। पुलिस वालों ने आसपास के एक-दो कमरों में खोज बीन की। फिर आश्वस्त होकर वापस चले गये।


माताजी की सूझ काम आयी। पुलिस को बहलाकर वापस भेजने में लगभग एक घण्टा तो लगा ही। जब वह फिर से दरवाजा बन्द करके नीचे के तलघर में गयी तो देखा सब लोग खतरे से आशंकित, कुछ अनमने, कुछ चौकन्ने बैठे हैं। माताजी थोड़ा हँसते हुए कहा-अरे! आप लोगों ने अभी तक खाया नहीं। खाना खाइये, बाहर पुलिस थी तो जरूर, पर अभी कोई नहीं हैं, खतरा टल चुका है। सभी ने आश्वस्त होकर खाना खाया। खाना खाने के बाद सभी ने हाथ-मुँह धोया और जाने लगे। जाते हुए तौलिया वापस देते समय गुरुदेव का हाथ माताजी से छू गया, तो उन्होंने चौंकते हुए कहा-अरे! आपको तो तेज बुखार है, ऐसे में इतनी मेहनत करनी पड़ी। माताजी ने हँसते हुए वातावरण को थोड़ा सामान्य बनाते हुए बोली-अरे तो क्या हुआ? आप लोग देश के लिए जान न्यौछावर किये रहते हैं और मैं क्या देशभक्तों के लिए खाना भी नहीं बना सकती?


    माताजी की बात सुनकर गुरुदेव थोड़ी देर तक उनका हाथ थामे रहे। बरबस ही उनकी आँखें भीग आयीं। माताजी की भावनाएँ भी छलक पड़ीं। लेकिन तभी वह सचेत हुईं और उन्हीं ने गुरुदेव को वापस जाने का संकेत किया। इस प्रसंग की चर्चा करते हुए माताजी ने कहा था कि यह बात मेरे विवाह के थोड़े ही दिन बाद की होगी। इसके कुछ ही महीने बाद देश स्वतंत्र हो गया था। विवाह के तुरन्त बाद जीवन की ऐसी कठिन डगर पर हँसते हुए चलना साहस का सर्वोच्च शिखर है। इस आदर्श की डगर पर थोड़े युवा भी चलने की हिम्मत जुटा लें, तो युवा भारत विनिॢमत हो सकता है।