Friday, December 31, 2021

मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है।

 मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है।

*****************************

       मानव जीवन अमोल रत्नों का भण्डार है। अपरिमित विभूतियों का विधान है, किन्तु इसकी विभूतियांँ प्राप्त उसे ही होती है, जो उनके लिए प्रयत्न करता है, उनके लिए पसीना बहाता है। आलसी और स्थगनशील व्यक्ति इसकी छोटी सी सिद्धि भी नहीं पा सकता।

       जीवन की बहुमूल्य विभूतियांँ पाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए, अपने को पूरी तरह से दांँव पर लगा देना चाहिए। जो इसकी निधियांँ प्राप्त करने का संकल्प लेकर कार्य में जुटा रहता है, वह अवश्य सफल और सुखी होता है।

       मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है, एक अलौकिक अवसर है। यह बात ठीक-ठीक उन्हीं लोगों की समझ में आती है, जो उसका सदुपयोग करके इस लाभ को प्रत्यक्ष देख लेते हैं।

       मानव जीवन का क्या महत्व है? इसको केवल दो व्यक्ति ही बता सकते हैं, एक तो वे जिन्होंने इसके चमत्कारों को अपने अनुभव में स्पष्ट देखा है, दूसरे वे जो इसे व्यर्थ में बर्बाद करके इसके अन्तिम बिन्दु पर पहुंँच कर पछता रहे हैं।

       इस जीवन का एक-एक क्षण बहुत मूल्यवान है। मनुष्य को चाहिए कि वह पुरुषार्थ के बल पर इसकी पूरी कीमत लेने का प्रयत्न करें। जो साहसी है, सतर्क और सावधान है, मानव जीवन की अनन्त विभूतियांँ केवल वही पा सकता है। जीवन में केवल वही विजय प्राप्त कर सकता है, जो किसी भी परिस्थिति में हिम्मत नहीं हारता।

       जीवन उसी का सफल होता है, जिसके यापन के पीछे कोई उद्देश्य अथवा कोई ऊंँचा लक्ष्य रहता है। जीवन में सदुद्देश्यता रहने से ही मनुष्य आज तक इतनी उन्नति करता चला आया है। मनुष्य को निरन्तर उन्नति और विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा देने वाली शक्ति सदुद्देश्यता ही है।

       जीवन का कोई उद्देश्य न होने से ही पशु सदैव ही अपनी पाशविक अवस्था में ही रहते हैं। न तो उन्होंने आज तक कोई उन्नति की है और न आगे ही कर सकने की सम्भावना है। यही नहीं, बिना किसी सदुद्देश्य के जीवन बिताने वाले मनुष्य भी एक प्रकार के पशु ही हैं। वे भी अपने जीवन में कोई उन्नति नहीं कर सकते और एक दिन फिर मनुष्यता को खोकर पशुता में डूब जाएंँगे।

       समुद्र की तरह जीवन-मन्थन करने से भी मनुष्य को सुख-शान्ति के असंख्य रत्न मिलते हैं। जीवन-मन्थन का अर्थ है, सामने आए हुए संघर्षों तथा बाधाओं से अनवरत लड़ते रहना। जो प्रतिकूलताओं को देखकर डर जाता है, मैदान छोड़ देता है, वह जीवन की अनन्त उपलब्धियों में से एक कण भी नहीं पा सकता।

       जीवन निर्वाह की बात को उसकी सीमा तक ही रखना चाहिए। जिस दिन मनुष्य जीवन निर्वाह को सामने रखकर स्वार्थों का पोषण करना छोड़ देगा और सोचने लगेगा कि जिस प्रकार मेरे लिए जीवन निर्वाह आवश्यक है, उसी प्रकार दूसरों के लिए भी, उसी दिन संसार से बहुत से दु:खों का तिरोधन हो जायेगा।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1965 पृष्ठ 31

Thursday, December 30, 2021

स्वयं को पहचाने

 👉 स्वयं को पहचाने

****************

एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला "महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।"


स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’


आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।


स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि "यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|"


तो व्यक्ति ने कहा "मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।"


स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा "यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।"


यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।


अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।


दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।

Wednesday, December 29, 2021

कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा

 👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा 

***************************************

ईसा को अपराधी ठहराया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राण हरण किये। गुरु गोविंद सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध हैं वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ है उसे उतना ही अधिक भार सहन करना पड़ा है। भगवान बुद्ध की जीवन गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थी। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड़यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधी को विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लांछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थी, प्रताप बढ़ने के बाद ही वह घटने लगी थी। अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल में सन्तों में से प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविंदसिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जी-जागते प्रमाण हैं।


संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने, जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए है। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय हैं। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगति क्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं। व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची हैं इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता हैं कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महा-मानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रामाणिकता को लोक-मान्यता मिलती हैं। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सादा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर कभी पर तभी बरसती हैं जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकरा कर प्रस्तुत करता हैं।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 53

Monday, December 27, 2021

भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा

 👉 भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा

*****************************

🔵 इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।


🔴 बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।


🔵 समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।


🌹 पूज्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

🌹 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1987 पृष्ठ 59

Sunday, December 26, 2021

अंधविश्वास का पर्दाफाश

 अंधविश्वास का पर्दाफाश

********************

🔵 सिक्ख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह एक महान् योद्धा होने के साथ बडे बुद्धिमान् व्यक्ति थे। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा बडी गहरी थी। वह धर्म के लिए ही जिए और धर्म के लिए ही मरे। धर्म के प्रति अडिग आस्थावान् होते हुए भी वे अंधविश्वासी जरा भी न थे और न अंधविश्वासियों को पसंद करते थे।


🔴 गुरु गोविंदसिंह का संगठन और शक्ति बढा़ने की चिता में रहते थे। उनकी इस चिंता से एक पंडित ने लाभ उठाने की सोची। वह गुरु गोविंदसिंह के पास आया और बोला-यदि आप सिक्खो की शक्ति बढाना चाहते हैं, तो दुर्गा देवी का यज्ञ कराइए। यज्ञ की अग्नि से देवी प्रकट होगी और वह सिक्खों को शक्ति का वरदान दे देगी। गुरु गोविंदसिंह यज्ञ करने को तैयार हो गये। उस पंडित ने यज्ञ कराना शुरू किया।


🔵 कई दिन तक यज्ञ होते रहने पर भी जब देवी प्रकट नही हुइ तो उन्होंने पंडित से कहा-" महाराज! देवी अभी तक प्रकट नहीं हुई।'' धूर्त पंडित ने कहा-देवी अभी प्रसन्न नहीं हुई है। वह प्रसन्नता के लिये बलिदान चाहती है। यदि आप किसी पुरुष का वलिदान दे सकें तो वह प्रसन्न होकर दर्शन दे देगी और बलिदानी व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।


🔴 देवी की प्रसन्नता के लिए नर बलि की बात सुनकर गुरु गोविंदसिंह उस पंडित की धूर्तता समझ गए। उन्होंने उस पडित को पकडकर कहा- 'बलि के लिए आपसे अच्छा आदमी कहाँ मिलेगा। आपका बलिदान पाकर देवी तो प्रसन्न हो ही जायेगी, आपको भी स्वर्ग मिल जायेगा। इस प्रकार हम दोनों का काम बन जाएगा। गुरु गोविंदसिंह का व्यवहार देखकर पंडित घबरा गया, गुरु गोविंदसिंह ने बलिदान दूसरे दिन के लिए स्थगित करके पंडित को एक रावटी में रख दिया।


🔵 पंडित घबराकर गुरु गोबिंदसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और गिडगिडाने लगा-'मुझे नहीं मालूम था कि बलिदान की बात मेरे सिर पर ही आ पडेगी, गुरु जी, मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। गुरु गोविंदसिंह ने कहा क्यों घबराते हो ? बलिदान से तो स्वर्ग मिलेगा, क्यों पंडित जी, बलिदान की बातें तभी तक अच्छी लगती हैं न जब तक वह दूसरों के लिए होती हैं? अपने सिर आते ही असलियत खुल गई न।''


🔴 पंडित बोला- इस बार क्षमा कर दीजिए महाराज। अब कभी ऐसी बातें नहीं करूँगा।'' गुरु गोविंदसिंह ने उसे छोड़ दिया और समझाया-इस प्रकार का अंध-विश्वास समाज में फैलाना ठीक नही। देवी अपने नाम पर किसी के प्राण लेकर प्रसन्न नहीं होती। वह प्रसन्न होती है अपने नाम पर किए गए अच्छे कामो से। '' बाद में गुरु गोविंदसिंह ने उसे रास्ते का खर्च देकर भगा दिया। गोविदसिंह ने सिक्खों को समझाया। किसी देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या करने से न तो पुण्य है और न शक्ति। धर्म के नाम पर किसी जीव का प्राण लेना घोर पाप है। शक्ति बढती आपस में प्रेम रखने से, धर्म का पालन करने से। शक्ति बढ़ती है-ईश्वर की उपासना करने से और उसके लिए त्याग-करने से। शक्ति बढ़ती है-अन्याय और अत्याचार का विरोध और निर्बल तथा असहायों की सहायता करने से। सभी लोग एक मति और एक गति होकर संगठित हो जाएँ और धर्म रक्षा में रणभूमि में अपने प्राणो की बलि दें। देवी इसी सार्थक बलिदान से प्रसन्न होगी और आज के इसी मार्ग से मुक्ति मिलेगी। अंध-विश्वास के आधार पर अपनी जान देने अथवा किसी दूसरे जीव की जान लेने से न तो देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और न सद्गति मिलती है।


🔵 गुरु गोविंदसिंह के इन सार वचनों को सभी सिक्खों ने हृदयगम किया। उस पर आचरण किया और अपने जीवन का कण-कण देश धर्म की रक्षा में लगाकर ऐतिहासिक यश प्राप्त किया।


🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Friday, December 24, 2021

उपासना कैसे करें

 उपासना कैसे करें

***************

*"गुरुदेव !एक बात और बताएं। लोग अक्सर कहते हैं कि उपासना के लिए न तो समय मिलता है और न ही उचित स्थान । छोटे-छोटे घर हैं, वहां कई लोग रहते हैं पूरा परिवार है। ऐसे में उपासना व जप के लिए एकांत ही नहीं मिलता ।फिर क्या करें?"* हमने जिज्ञासा प्रकट की।


*"यह तो आज की बहुत गंभीर समस्या है लेकिन इसका समाधान भी बड़ा सरल है। उपासना के लिए साफ-सुधरा स्थान हो ,एकांत हो और आसन लगाकर एकाग्रचित्त होकर बैठने की सुविधा हो तो फिर बात ही क्या है। इस प्रकार बैठकर उपासना व ध्यान करने से मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। परंतु यह सुविधा न मिले तो क्या कुछ भी न करें।"*


*"एक घुड़सवार एक बार कहीं जा रहा था। घोड़ा बहुत प्यासा था ,हांफ रहा था, पर रास्ते में कहीं पानी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक उसने देखा कि एक खेत के किनारे बैठा किसान रहट से कुएं से पानी निकालकर खेत को सींच रहा है। बैल चल रहे थे, रहट की माला नीचे जाती थी, पानी लेकर ऊपर आती थी ,पानी नीचे गिरकर नाली में होकर खेत में पहुंच रहा था ।रहट चलने से चीं-चीं की आवाज हो रही थी ।उसने घोड़े को पानी पिलाने के लिए आगे बढ़ाया ,घोड़ा रहट की आवाज से डरकर पीछे हट गया ।उसने फिर प्रयास किया, वह फिर पीछे हट गया। वह सवार लगाम पकड़कर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद किसान ने कहा- _खड़े क्यों हो ,घोड़े को पानी क्यों नहीं पिलाते_ ।*


*सवार बोला _'यह चीं-चीं बंद हो जाए तो पानी पिलाऊं_।*


*इस पर किसान हंसा और बोला _'अरे यह चीं-चीं बंद हो जाएगी तो पानी भी बंद हो जाएगा फिर क्या पिलाओगे। अगर पिलाना है तो इस चीं-चीं में ही पिला लो_।"*


*"तो बेटे! यही तत्व की बात है। जगह नहीं है , शोर है , सारा परिवार उसी कमरे में रहता है, सब जगह चीं-चीं हो रही है ।पर यदि उपासना करनी है, साधना करनी है, ध्यान करना है, जप करना है तो इसी चीं-चीं ही में करना होगा। बच्चों की चींचीं मे ही मन के घोड़े को पानी पिलाना होगा।"*


*"जहां भी हो, जैसे भी हो , जिस स्थिति में भी हो, हर समय गायत्री माता को ध्यान में रखो । बस में, ट्रेन में ,कारखाने में ,बाजार में, घर में हर समय चीं-चीं के बीच इसका ध्यान करो। जब भी समय मिले जप करो। यही सच्ची गायत्री उपासना है।*


*"गुरुदेव यह तो बड़ा ही कठिन कार्य है। कहना तो सरल है पर करना असंभव सा लगता है।"* हम ने आशंका व्यक्त की


*"हां बेटे! हर कार्य कहने में आसान और करने में कठिन होता है ।पर जब करने का मन बना लोगे तो वह स्वतःही सुगम व सरल हो जाएगा ।अच्छा ! भक्त प्रहलाद के बारे में तो जानते ही हो। उससे अधिक विषम परिस्थितियां किस के समक्ष रही होंगीं। कहां एक छोटा सा बालक और कहां एक सर्वशक्तिमान सम्राट , जिसके भय से मनुष्य ही नहीं जीव जंतु तक काँपते थे ।सारे राज्य में भगवान का नाम लेने पर मृत्युदंड देने का विधान था। लोग हर समय हिरण्यकश्यप नमः का ही जाप करते थे । प्रहलाद तो उस निरंकुश शासक का पुत्र था । घर- बाहर हर जगह , हर समय उसे यही सब सुनने को मिलता था। जिसका बाप ही इतना कुबुद्धिग्रस्त हो उस नन्हे से बालक की विषम परिस्थितियों की कल्पना करो।"*


*"पर प्रहलाद पर गायत्री माता की कृपा थी, उसमें सद्बुद्धि का जागरण हुआ था, उसने विवेक से विचार करके अपने पिता की क्रूरता की निस्सारता को समझा था और ईश्वर भक्ति के सच्चे मार्ग पर चल पड़ा था। उसके दृढ़ निश्चय को क्या कोई डिगा सका था ? नहीं, उसके पिता की समस्त क्रूर शक्तियां भी उसे विचलित नहीं कर सकीं और अंत में विजय किसकी हुई- सद्बुद्धि की।"*


*"तो बेटे , प्रयास तो करना ही पड़ेगा । चींचीं और चिल्ल-पों के कारण यदि कुछ भी न किया तो फिर केवल पछताना ही पड़ेगा । यह हो सकता है कि प्रहलाद की भांति पूर्ण सफलता न मिले पर कुछ न कुछ लाभ तो होगा ही। जो भी थोड़ा बहुत फल मिलेगा वह गायत्री की पंचकोशी साधना का व्यवहारिक रूप ही होगा।"*

Thursday, December 23, 2021

भविष्यवाणियाँ जो पूरी होकर रहेंगी:

 भविष्यवाणियाँ जो पूरी होकर रहेंगी:


धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होगा। उसके प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जाएगा। सम्प्रदायवादियों के डेरे उखड़ जाएँगे, उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दीखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपनाकर भलेमानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। ……………… पाखंड पूजा के बल पर जीने वाले उलूक, दिवा प्रकाश से भौचक्के होकर देखेंगे और किसी कोटर में बैठे दिन गुजारेंगे।


अगले दिनों ज्ञानतंत्र ही धर्मतंत्र होगा। ....... तब लोग प्रतिमापूजक देवमन्दिर बनाने की तुलना में पुस्तकालय, विद्यालय जैसे ज्ञानमंदिर बनाने को महत्व देंगे। ………… कथा पुराणों की कहानियाँ तब उतनी आवश्यक न मानी जाएँगी जितनी जीवन समस्यायों को सुलझाने वाली प्रेरणाप्रद अभिव्यंजनाएँ। ….... धर्म के ऊपर चढ़ी हुई सड़ी गली केंचुली उतर कर कूड़े-करकट  ढेर में जा गिरेगी। ………… अपने वर्ग के  नहीं, समस्त विश्व के हित साधन की दृष्टि से ही समस्यायों पर विचार किया जाएगा।


जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे। छूत-अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले काले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। ………………… हरामखोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। ................... तब न तो मांसाहार की छूट रहेगी और न पशु पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बंधनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे। 


-युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अखंड ज्योति मई 1972, पृष्ठ-35-36

जीवन का अधिकाँश समय, श्रम एवं कौशल विशिष्टता सिद्ध करने में खपता है।

 जीवन का अधिकाँश समय, श्रम एवं कौशल विशिष्टता सिद्ध करने में खपता है।

***********************

       किसी की जीवनचर्या का लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है, कि जीवन निर्वाह के साधन तो सरलतापूर्वक कम समय और कम परिश्रम में भी जुट सकते हैं, पर लोगों के निरन्तर व्यस्तता में ग्रसित रहने का प्रमुख कारण एक ही पाया जाता है, दूसरों की तुलना में अपनी विशिष्टता सिद्ध करना।

       इसी का सरंजाम जुटाने में मनुष्य जीवन का अधिकाँश समय एवं कौशल खप जाता है। इसे मृगतृष्णा ही कहना चाहिए, जिनकी आकर्षक छवि मनुष्य को अपनी ओर खींचती है और उसकी बहुमूल्य क्षमता को चूस लेती है।

       यह भुला दिया जाता है कि संसार में एक से एक बढ़कर "बड़े आदमी" भरे पड़े हैं। उनकी तुलना में भरपूर प्रयत्न करने पर भी कदाचित अपनी बढ़ी-चढ़ी सफलता भी नगण्य समझी जा सके। 

      फिर वह उत्साह तभी तक रहता है, जब तक हमें इच्छित वस्तु या स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती। उपलब्धि के कुछ क्षण ही पानी के बबूले जैसा उत्साह प्रदान करते हैं। इसके बाद तो जो मिलता है, उसका बोझ और दायित्व वहन करते रहना ही कठिन पड़ जाता है।

       ठाट बाट, सम्पत्ति संग्रह, पदवी धारी, सत्ताधारी होने की इच्छाएँ मनः क्षेत्र में ही उठती है। दूसरों से अधिक समर्थ, सम्पन्न होने की अभिलाषा से प्रेरित होकर लोग प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं और विजयी होने पर गर्व जताते हैं।

       चुनाव जीतने में लोक सेवा की भावना कम और अपने को विशिष्ट सिद्ध करने की आकाँक्षा अधिक होती है। अखबारों में नाम छपाने, समारोहों में प्रमुख पद पर आसीन होने, तीर्थ यात्रा आदि के माध्यम से लोगों की दृष्टि में धर्मात्मा जिसने जैसे ताने-बाने इसीलिए बुने जाते हैं।

       जो पाया है, उसे बचाए रहना भी कठिन होता है। ईर्ष्यालु उठ खड़े होते हैं और छिनने या नीचा दिखाने की दुरभि सन्धियाँ रचने लगते हैं, फिर जो हर्ष या यश मिला था, वह भी थोड़े ही समय स्थिर रहता है।

     व्यस्तता-ग्रस्त दूसरे लोग तो उसे कब तक स्मरण रखे रहेंगे। स्वयं अपने को ही अपनी पिछली बातें याद नहीं रहती। जीवन में नए काम ही इतने आ जाते हैं कि पिछले दिनों की याद बनाए रखना सम्भव नहीं होता।

       मनुष्य स्वभावतः महत्वाकाँक्षी है। सुख उपभोग की इच्छा हर प्राणी में पाई जाती है। इस हेतु वह अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में संलग्न रहता पाया जाता है।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1989 पृष्ठ 47

Tuesday, December 21, 2021

भगवान वास्तव में श्रेष्ठताओं और सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है!

 भगवान वास्तव में श्रेष्ठताओं और सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है!

********************************************

कामना करने वाले भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छाएँ पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामनापूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’। यह सही है कि भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया हुआ है, पर हविस पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया। आपका योग और क्षेम अर्थात् आपकी शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक, मानसिक आवश्यकताएँ पूरी करना भगवान् की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविस पूरी नहीं हो सकती। हविसों के लिए, तृष्णाओं के लिए भागिए मत। यह भगवान् की शान में, भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है, सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भक्त माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान कोई इनसान नहीं हैं, उसे तो हमने बना लिया है। भगवान वास्तव में सिद्धान्तों का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति, आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः यही भगवान् की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।


प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह, समर्थन और सहयोग बरसता है, वहाँ आदमी के पास चीज की कमी नहीं रह सकती। बुद्ध की प्रामाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता लोकहित के लिए थी। व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने के बाद में वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गये। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया। लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गए, लाखों लोगों ने अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। क्या यह हो सकता है? हाँ! शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें, छाया आपके पीछे-पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे-पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान् की ओर चलिए, सिद्धान्तों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धान्त, इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।


मित्रो ! जो हविस आपके ऊपर हावी हो गई है उससे पीछे हटिए, तृष्णाओं से पीछे हटिए और उपासना के उस स्तर पर पहुँचने की कोशिश कीजिए जहाँ कि आपके भीतर से, व्यक्तित्व में से श्रेष्ठता का विकास होता है। भक्ति यही है। अगर आपके भीतर से श्रेष्ठता का विकास हुआ हो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको जनता का वरदान मिलेगा। चारों ओर से इतने वरदान मिलेंगे कि जिसको पा करके आप निहाल हो जाएँगे। भक्ति का यही इतिहास है, भक्त का यही इतिहास है। भगवान के अनुग्रह का, गायत्री माता के अनुग्रह का यही इतिहास है, यही इतिहास था और यही इतिहास रहेगा। अगर इस रहस्य को, सार को समझ लें, तो आपका यहाँ आना सार्थक हो जाए। आपका गायत्री अनुष्ठान सार्थक हो जाए, अगर आप इस सिद्धांत को समझकर जाएँ कि हमको सद्गुणों का विकास करने के लिए तपश्चर्या कराई जा रही है और अगर हमारी यह तपश्चर्या सही साबित हुई तो भगवान हमको यहाँ से विदा करते समय गुण, कर्म और स्वभाव की विशेषता देंगे और हमको चरित्रवान व्यक्ति के तरीके से विकसित करेंगे। चरित्रवान व्यक्ति जब विकसित होता है, तब उदार हो जाता है, परमार्थ-परायण हो जाता है, लोकसेवी हो जाता है, जनहितकारी हो जाता है और अपने क्षुद्र स्वार्थ को देखना शुरू कर देता है। आपकी अगर ऐसी मनःस्थिति हो जाए तो मैं कहूँगा कि आपने सच्ची उपासना की और भगवान् का वरदान पाया।

Sunday, December 19, 2021

अपनी बातचीत में प्रभाव उत्पन्न करना एक उपलब्धि है।

 अपनी बातचीत में प्रभाव उत्पन्न करना एक उपलब्धि है।

*****************************

       कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिनकी न कोई बात मानता है, न उनका कोई सच्चा मित्र, हितैषी, शुभचिन्तक ही होता है। वे जिससे भी बात करते हैं, वही उनका शत्रु बन जाता है। इसका कारण होता है- व्यक्ति का वार्तालाप करने का ढँग। जिससे भी बातें करते हैं, ऐसी भूल कर जाते हैं, कि सामने वाले के अन्तःकरण पर चोट कर जाती है और वह उसके प्रति गलत धारणा बना लेता है। अन्यथा वाक्-चातुर्य और व्यवहार कुशलता के बल पर तो पूरा व्यवसाय क्षेत्र ही चल रहा है।

      जीभ की कमाई खाने वाले वक्ता, गायक, प्रचारक अपनी चतुराई के आधार पर ही लोगों को प्रभावित करते और अपनी बात मनवा लेते हैं। व्यवसायी लोग अपने व्यवसाय और औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए नए-नए क्षेत्र व साधन व व्यक्ति खोजने में इसी आधार पर सफल होते रहते हैं।

       बातचीत करना वस्तुतः एक कला है, अन्यथा बातें तो गूँगे-बहरों को छोड़कर सभी करते और सुनते हैं, लेकिन कौन किसका, किस प्रकार प्रभाव ग्रहण करता है? इसका आंकलन किया जाय, तो यही ज्ञात होगा कि कई लोगों की बातें उबा देने वाली, या मन खट्टा कर देने वाली अथवा हृदय को चोट पहुँचाने वाली होती है।

       कई व्यक्तियों की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि उनकी बात का न सिर है न पैर। न तो वह अपने शब्दों का प्रयोग समझ-बूझकर करते हैं, जिससे श्रोता प्रभावित हो सकें, न ही वह यह जानकर बातें करते हैं, कि किस अवसर पर कैसी बात करनी चाहिए? क्योंकि उन्हें इस संबंध में कोई ज्ञान नहीं। फलत: उनकी बातें बोरियत लाने वाली और अप्रासंगिक ही हो जाती है।

       विश्व विख्यात विचारक स्वेट मार्डेन के अनुसार व्यवहारिक जीवन की सफलता के लिए वाक्-चातुर्य के साथ व्यवहार कुशलता, शिष्टता, सज्जनता, मधुरता आदि सद्गुण यदि व्यक्ति के जीवन में समाहित हो जाय, तब जीवन संग्राम में सफलता मिलना सुनिश्चित है।

       श्रेष्ठ वाक्पटु होना, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना तथा उनसे सहयोग प्राप्त करना, अपनी बातचीत में प्रभाव उत्पन्न करना एक उपलब्धि है। मित्र बनाने में ही नहीं कार्यक्षेत्र में सफल होने व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का व्यवहार कुशल होना नितान्त आवश्यक है।

       यदि व्यक्ति अपने बात साफ ढँग से, नपे-तुले शब्दों में बिना किसी वाक्छल के सधी- बँधी वाणी में व्यक्त करके सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करता है, तब यह उसकी सफलता है।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना दिसम्बर 1987 पृष्ठ 28

Saturday, December 18, 2021

गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

 👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी 

************************************

🔷 एक बड़ी ही प्यारी अनुभूति कथा है। समर्थ गुरू रामदास के शिष्य स्वामी कल्याण गोदावरी नदी से कुछ कोस दूर एक गाँव में ठहरे हुए थे। अपने सद्गुरू के नाम की अलख जगाते हुए सत्प्रवृत्तियों का प्रसार करना उनका व्रत था। जय- जय रघुवीर समर्थ, को उच्चस्वर से पुकारते हुए जब वह ग्राम वीथियों से गुजरते ,तो लोग बरबस उन्हें घेर लेते। उनके पास आश्चर्यजनक सिद्धियाँ तो नहीं थीं, पर गुरूकृपा का बल था। अपने गुरू पर उनका सम्पूर्ण विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। उनकी भक्तिपूर्ण बातें लोगों में चेतना की नयी लहरें पैदा करती। 


🔶 ग्रामवासी स्वामी कल्याण के वचनों से आह्लादित थे। उन्हें जीवन की नयी दिशा मिल रही थी। परन्तु रूढ़िवादी साधु और कई तांत्रिक उनकी इन बातों से प्रसन्न नहीं थे, क्योंकि कल्याण स्वामी के वचनों ने जन जीवन में इतनी जागृति पैदा कर दी थी कि इन सभी का व्यवसाय बन्द होने लगा था। कर्म के सिद्धान्त पर विश्वास करने लगा जन- जीवन सत्कार्यों में प्रवृत्त होने लगा था। चमत्कारों की ओछी बाजीगरी से उसे उकताहट होने लगी थी। जन मानस की यह स्थिति अपने को सिद्ध कहने वाले तांत्रिकों को रास नहीं आयी। उन्होंने कल्याण स्वामी के प्रति अनेकों षड्यंत्र रचने शुरू कर दिये। वे सब मिलकर किसी भी तरह जन- जीवन की नजर में उन्हें अप्रमाणिक एवं अयोग्य साबित करना चाहते थे।


🔷 जब उनके सामान्य उपक्रम असफल साबित हुए, तो उन्होंने अपनी चमत्कारी सिद्धियों का सहारा लिया। इन सिद्धियों के बल पर उन्होंने गाँव के तालाबों, कुआँ, बावड़ियों का जल सुखा दिया। इस तांत्रिक अत्याचार से सामान्य जनता पानी के लिए तरसने लगी। मनुष्य एवं पशुओं का जीवन बिना पानी के विपन्न हो गया। बिलखते बच्चे ,परेशान गृहणियों की जिन्दगी दूभर हो गयी। परेशान गाँववासी कल्याण स्वामी के यहाँ गये। पर वे करते भी क्या? उनके पास ऐसी कोई सिद्धि नहीं थी, जिससे समस्या का हल हो सके। इधर इन कु्रर तांत्रिकों ने उनका और उनके गुरू का अपमान करना प्रारम्भ कर दिया। गाँव वालों को जितना सम्भव था। 


🔶 कल्याण स्वामी के लिए स्वयं के अपमान का तो कोई मोल नहीं था, पर गुरू का अपमान उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। ग्रामीण जनों की दुर्दशा भी उनसे देखी न गयी। आखिर में उन्होंने गुरूगीता एवं गुरूमंत्र का आश्रय लेने की सोची। ग्रामवासियों के कल्याण के लिए उन्होंने कठिन उपवास करते हुए गायत्री महामंत्र से सम्पुटित करके गुरूगीता का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। प्रगाढ़ तप में उनके दिन बीतते ।। प्रार्थना में उनकी रातें व्यतीत होतीं। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। एक रात प्रार्थना करते समय उनकी भाव चेतना समर्थ सद्गुरू के चरणों में विलीन होने लगी। उनके हृदय में बस एक ही आर्त पुकार थी, हे सद्गुरू! इन निर्दोष ग्रामीण जनों की रक्षा करो। 


🔷 भक्त की पुकार गुरूदेव अनसुनी न कर सके। उनकी परावाणी कल्याण स्वामी की अंतर्चेतना में गूँज उठी, चिंता न कर, माँ गोदावरी से प्रार्थना कर, उनको मेरा संदेश देना, उन्हें कहना मेरे गुरू ने आपको ग्रामीण जनों के कल्याण के लिए आमंत्रित किया है। समर्थ गुरू का यह विचित्र सा संदेश कल्याण स्वामी को ठीक से समझ नहीं आया। फिर भी वे अपने गुरूभक्ति की धुन में माँ गोदावरी के पास गये और उन्होंने गुरू का संदेश सुनाते हुए ग्रामवासियों का जल संकट दूर करने के लिए प्रार्थना की। इतना ही नहीं गोदावरी से एक लकीर खींचते हुए गाँव में आ गये। 


🔶 उनके उस कार्य का तांत्रिकों ने बड़ा मजाक उड़ाया। लेकिन सबको आश्चर्य तो तब हुआ, जब उन्होंने देखा कि पानी से खाली गाँव कुएँ, तालाब, बावड़िया फिर से पानी से भर गये हैं। माँ गोदावरी प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं बहती रही, किन्तु उनकी अंतर्धारा ने गाँव आकर सबका कष्ट दूर कर दिया। गाँव वालों ने गुरूभक्ति का यह प्रत्यक्ष चमत्कार देखा और उन सबने स्वीकार किया, किसी भी मांत्रिक- तांत्रिक सिद्धि से गुरूभक्ति की सिद्धि बड़ी है। गुरूभक्ति से बड़कर न तो कोई सिद्धि और न शक्ति।


✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या

📖 गुरुगीता पृष्ठ 171

Friday, December 17, 2021

पूज्यवर ने लाखों लोगों का जीवन बदला!

 पूज्यवर ने लाखों लोगों का जीवन बदला!

*********************************

भगवान् बुद्ध के समय में एक प्रसंग आता है कि अंगुलिमाल से जब उनकी भेंट हुई तो अंगुलिमाल के जीवन में परिवर्तन आ गया, वह डाकू से भिक्षुक बन गया। आम्रपाली जब उनके सम्पर्क में आई तो वह भी अपना सर्वस्व समर्पित कर साधिका बन गयी। ऐसे ही प्रसंग पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आने पर अनेकों लोगों के साथ घटित हुए हैं।


पूज्य गुरुदेव का सान्निध्य पाकर, मार्गदर्शन पाकर, उनका साहित्य पढ़कर लोगों की मान्यताओं तक में परिवर्तन आया, जिसमें सबसे बड़ा परिवर्तन नारी समाज के प्रति जो संकीर्ण दृष्टिकोण था, उसमें आया। लोगों ने अपने घर की बहु-बेटियों को न केवल गायत्री उपासना का अधिकार ही दिया, बल्कि उन्हें मिशन के कार्य के लिए घर से बाहर निकलने की अनुमति भी दी। इसके साथ ही नारी समाज के प्रति आदर, सहयोग और सम्मान का भाव भी बढ़ा। लाखों-करोड़ों परिवारों में नारी समाज को श्रेष्ठ जीवन जीने का अवसर मिला, जो अपने आपमें एक बहुत बड़ी क्रान्ति है।


जो भी गुरुदेव के सम्पर्क में आया, उसके चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में असाधारण परिवर्तन आता चला गया। परिजनों ने शराब, माँस आदि दुर्व्यसन एवं अन्य अनेकों दुर्गुणों को छोड़कर श्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प लिया। उनके जीवन में आये परिवर्तन को देखकर नाते-रिश्तेदार तक दाँतों तले अँगुली दबाकर रह गये कि इनके जीवन में इतना सुधार कैसे आ गया, ये तो चमत्कार ही हो गया।


श्री शिव प्रसाद मिश्रा जी, शान्तिकुञ्ज

*******************************

शान्तिकुञ्ज आ जाने पर मेरी ड्यूटी प्रतीक्षालय में लोगों को गुरुजी-माताजी से मिलाने में लगी। प्राण प्रत्यावर्तन शिविरों के समय लोग अपने दोष-दुर्गुण निःसंकोच गुरुजी के सामने प्रकट करते थे, कोई-कोई लिखकर भी देते थे। किसी बहुत बड़ी गलती पर पहले वे नाराज होते, फिर बड़े वैज्ञानिक ढंग से प्रायश्चित भी बताते थे। जैसे जितना बड़ा गड्ढा खोदा है, उतनी ही मिट्टी लाकर भरना होगा। जितना किसी को नुकसान पहुँचाया है, शारीरिक, मानसिक या नैतिक, उससे अधिक लाभ पहुँचाना होगा।


एक बार रामसुभाग सिंह नाम का एक व्यक्ति उनके पास आया। वह वैगन ब्रेकर के नाम से प्रसिद्ध था, अर्थात् रेल के वैगन ही लूट कर ले जाता था। वह अपनी कमर में हमेशा दो पिस्तौल रखता था। गुरुजी से मिलने के बाद उसने हावड़ा में 108 कुण्डीय यज्ञ कराया तथा कितने ही अखण्ड ज्योति के सदस्य केवल धौंस के बलबूते पर बनाये। उसने डाका डालना छोड़ दिया और सुधर गया।

गुरुजी के पास जब आता तो कहता, ‘‘गुरुजी मैं आपसे क्या कहूँ, आप तो सब जानते हैं।’’ तब गुरुजी कहते कि मैं यदि तेरे अंदर देखूँगा तो मुझे बहुत कुछ दिख जायेगा, इसलिये तू वही बता जिसका समाधान तू चाहता है।


उठ! मेरे साथ चल

***************

श्री देवी सिंह तोमर, शान्तिकुञ्ज

**************************

तोमर जी बताया करते थे कि कैसे उनके जीवन में गुरुजी के केवल एक प्रवचन से ही आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। वे बताते थे कि ‘‘मैं टेलीफोन विभाग में सुपरवाइजर था। मैं खूब माँस खाता था व शराब पीता था। एक दिन गायत्री परिवार के कुछ लोग आये व मुझसे कहा कि गुरुजी आने वाले हैं। राजासाहब का एक महल राजगढ़ में शक्तिपीठ के लिये मिल गया है, उसको ठीक करने व सजाने के लिये हम चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। गायत्री परिवार और गुरुजी से मैं परिचित था। मैंने उन्हें 1500 रुपये दिये। उन्होंने मुझे कार्यक्रम में बुलाया। मैंने कह दिया कि मैं शराब पीकर ही आऊँगा और सचमुच मैं शराब पीकर ही गया। मैंने गुरुजी का भाषण सुना। गुरुजी ने कहा, ‘‘जो शराब पीता है वह अपना चरित्र सुरक्षित नहीं रख सकता। उसके लिये आत्मीयता, प्रेम, उत्तरदायित्व और परिवार कोई मायने नहीं रखते।’’ मेरा दिमाग ठनका। मैं सामने ही बैठा था। गुरुजी फिर बोले, ‘‘जो माँस खाते हैं, वे मुर्दा खाते हैं, क्योंकि जब उसे काटा जाता है तो उसके टुकड़े बिलखते हैं और उस दर्द चीत्कार के हार्मोन्स उसमें मिले होते हैं और मुर्दा तो वह हो ही जाता है।’’ फिर तो मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जो माँस खाया है, शराब पी है, उसको उँगली डालकर उल्टी कर दूँ। उसके बाद मैंने कभी माँस और शराब को नहीं छुआ। जब मैं रिटायर हो गया तो एक रात दो बजे नींद में गुरुजी ने मुझे एक थप्पड़ मारा और कहा ‘‘उठ! मेरे साथ चल।’’ मैंने पत्नी को जगाया और कहा, ‘‘अब अपन शान्तिकुञ्ज चलते हैं और फिर हम लोग शान्तिकुञ्ज आ गये।’’

Thursday, December 16, 2021

*हृदय में भगवान*

 *हृदय में भगवान* 

***************

यह घटना जयपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है, जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। उनके द्वारा बताई प्रभु कृपा की कहानी के अनुसार:-

 

एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके हृदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है।

          मैंने अपने साथी डाक्टर से विचार करने के बाद उस दंपत्ति से कहा - 30% संभावना है बचने की ! दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी, नहीं तो बच्ची के पास सिर्फ तीन महीने का समय है !

          माता पिता भावुक हो कर बोले, "डाक्टर साहब ! इकलौती बिटिया है। ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा नहीं है,

मैंने अन्य कोई विकल्प के लिए मना कर दिया

दंपति ने कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये।"


          सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया। बच्ची मुझ से बहुत घुलमिल चुकी थी, बहुत प्यारी बातें करती थी। उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती, बेटी घबराना नहीं। भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं। वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।


          सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा, "बेटी ! चिन्ता न करना, ऑपरेशन के बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे।" बच्ची ने कहा, "डाक्टर अंकल मैं बिलकुल नहीं डर रही क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं, पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे तो देखकर बताना भगवान कैसे दिखते हैं ?" मै उसकी बात पर मुस्कुरा उठा।


          ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता, बच्ची को बचाना असंभव है, दिल में खून का एक कतरा भी नहीं आ रहा था। निराश होकर मैंने अपनी साथी डाक्टर से वापिस दिल को स्टिच करने का आदेश दिया।


          तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड़ कर प्रार्थना करने लगा, "हे ईश्वर ! मेरा सारा अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए।" 


          मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी। इसी बीच मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे कोहनी मारी। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया यह देखकर कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया।


          मेरे 60 साल के जीवन काल में ऐसा पहली बार हुआ था। आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया। होश में आने पर मैंने बच्ची से कहा, "बेटा ! हृदय में भगवान दिखे तो नहीं पर यह अनुभव हो गया कि वे हृदय में मौजूद हर पल रहते हैं।


          इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू किया। मैं यह अनुरोध करता हूँ कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए।


यह कहानी एक ह्रदय रोग विशेषज्ञ की आत्म बीती है!

Wednesday, December 15, 2021

माँ गायत्री का युग शक्ति के रूप में अवतरण

 माँ गायत्री का युग शक्ति के रूप में अवतरण

**********************************

गायत्री को युग शक्ति के रूप में अवतरित होने हुए हम सब प्रत्यक्ष देखते हैं। लगता है युग परिवर्तन की आवश्यकता पूरी करने के लिए वह अपनी निरन्तर शाश्वत परम्परा को यथावत् बनाये रहकर भी समय की आवश्यकता पूरी करने वाली कार्य-पद्धति अपना रही है।


भगवान को परिस्थितियों के अनुसार अपने अवतारों के स्वरूप और क्रिया-कलाप में हेर-फेर करना पड़ा है। हिरण्य कश्यप जब धरती की सम्पदा चुरा कर समुद्र में जा छिपा था तो वाराह रूप बनाने की आवश्यकता पड़ी ताकि उस दस्यु की स्थिति का सामना करना पड़ा। समुद्र मंथन का प्रयोजन पूरा करने के लिए कच्छप का रूप करना ही उपयुक्त था। हिरण्यकश्यपु को वरदान था कि वह मनुष्य या पशु में से किसी के द्वारा न मारा जा सकेगा तो आधा पशु और आधा मनुष्य का विचित्र स्वरूप बनाकर नृसिंह आये और अस्त्र-शस्त्र से न मरने के उसके वरदान को निरस्त करने के लिए नाखूनों को हथियार बनाया। आततायियों से जूझने के लिए परशुराम-मर्यादाओं को स्थापित करने के लिए राम-योग का कर्म प्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्रान्ति के उद्गाता बुद्ध के रूप में अवतरणों की श्रृंखला का पर्यवेक्षण करने से पता चलता है कि अवतरण प्रक्रिया में जड़ पुनरावृत्ति नहीं है। वरन् आवश्यकतानुसार गतिविधियां अपनाने का लचीलापन है। अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना का सन्तुलन लक्ष्य में ही स्थापित है। लीला प्रकरण तो परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहना उचित भी है और आवश्यक भी।


आज की असुरता का स्वरूप पूर्व कालीन घटनाक्रमों से सर्वथा भिन्न है। भूत काल में असुरता सीधे आक्रमण करती रही है और उसे शस्त्र युद्ध से पराजित किया जाता रहा है। अब की बार उसने छद्म नीति अपनाई है और जन-मानस पर अनास्था के रूप में अपना आधिपत्य जमाया है। अनास्था का मोटा अर्थ तो नास्तिकता होता है, पर उसे ईश्वर को न मानने तक सीमित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः नास्तिकता का स्वरूप है आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा। नीति-निष्ठा और समाज-निष्ठा का उल्लंघन। मानवी गरिमा की विस्मृति। संक्षेप में इसे उच्चस्तरीय आस्थाओं को ऐसा अभाव कह सकते हैं जिसके कारण आचरण में निकृष्टता की मात्रा बढ़ती ही चली जाती है। आज के संकट का यही स्वरूप है। इसे आस्थाओं का दुर्भिक्ष कह सकते हैं। उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धा की प्रौढ़ता ही अन्तःकरण में सद्भाव-मस्तिष्क में सद्ज्ञान और शरीर में सत्कर्म बनकर उभरती है। यदि आस्थाओं में निकृष्टतावादी तत्व घुस पड़ें तो फिर हर क्षेत्र में विकृतियां ही भर जायगी। आकांक्षाओं का स्तर वैसा होगा जैसा पशुओं और पिशाचों का होता है। विचारणा वैसी उठेगी जैसी कुचक्रियों और अपराधियों में पाई जाती है। कर्म ऐसे बन पड़ेंगे जो पतित और पराजितों से बन पड़ते हैं। आज की समस्त समस्याओं का स्वरूप समझना है, गहराई में उतर कर एक ही तथ्य सामने आता है—आस्थाओं का संकट। सड़ी कीचड़ों से जिस प्रकार चित्र-विचित्र कृमि-कीटक उत्पन्न होते हैं—उसी प्रकार व्यक्ति और समाज के सामने इसी कारण अगणित समस्याएं और विपत्तियां आतीं और आंख-मिचौनी खेलती हैं।


आस्थाओं के क्षेत्र का युद्ध उसी क्षेत्र में लड़ा जायगा। वायुयानों की लड़ाई आकाश में—पनडुब्बियों की लड़ाई समुद्र में लड़ी जाती है। थल की लड़ाई में पैदलों और वाहनों का उपयोग होता है। आस्थाओं के क्षेत्र में घुसी असुरता से जूझने के लिये युग अवतार को भी तद्नुसार योजना बनानी और कार्य-पद्धति अपनानी पड़ रही है, युग शक्ति गायत्री का कार्य क्षेत्र आस्थाओं का परिशोधन है। इसी की जन-मानस का परिष्कार कहा गया है। विचार क्रान्ति की लाल मशाल में इसी तत्व-दर्शन की झांकी होती है। ज्ञान-यज्ञ का स्वरूप भी यही है। युगान्तरीय चेतना का अवतरण इन दिनों इन्हीं आधारों के सहारे होता है। समस्त भूमण्डल में बसे हुए मानव समाज के अन्तराल में अनास्था के असुर का साम्राज्य छाया दीखता है। शासक का स्वरूप क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार का होने पर भी आस्था संकट का कुहासा सर्वत्र छाया हुआ है। उसकी सघनता में जहां-तहां न्यूनाधिकता भले ही रह रही है। अतएव परिष्कार का क्षेत्र भी अति व्यापक है। यह धर्म युद्ध—सचमुच ही धर्म क्षेत्र में—अन्तःकरण में गहराई में उतर कर लड़ा जाना है। इसी के सरंजाम सर्वत्र खड़े होते दिखाई पड़ रहे हैं, अवतरण चेतना इसी के सांचे और ढांचे खड़े करने में लगी हुई है। शिल्पी इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रयोजन पूरे करने में इन दिनों जुटे हुए देखे जा सकते हैं। जागृत आत्माओं की गतिविधियां इसी एक दिशा में चलती दीख पड़ती हैं।गायत्री महाशक्ति का उपयोग सामान्य समय में उपासना, आराधना द्वारा आत्म-कल्याण का प्रयोजन पूरा करने—प्रसुप्त शक्तियों को जगा कर बढ़े हुए आत्म-बल का लाभ ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में लेने—जैसा रहता है। किन्तु युग क्रान्ति में स्वभावतः उसका कार्य क्षेत्र बढ़ेगा। अभीष्ट प्रखरता और प्रचण्डता उत्पन्न करने वाले विशिष्ट क्रिया-कलापों का निर्धारण होगा। वैसा ही इन दिनों हो भी रहा है।

Tuesday, December 14, 2021

माँसाहार या शवाहार

 👉 *माँसाहार या शवाहार*


*मित्रों !! जिसे हम मांस कहते हैं वह वास्तव में क्या है?आत्मा के निकल जाने के बाद पांच तत्व का बना आवरण अर्थात शरीर निर्जीव होकर रह जाता है।यह निर्जीव,मृत अथवा निष्प्राण शरीर ही लाश या शव कहलाता है। यह शव आदमी का भी हो सकता है और पशु का भी।इस शव को बहुत अशुभ माना जाता है।*


इसकी भूत मिट्टी आदि निकृष्ट चीजों से तुलना की जाती है।


*यदि कोई इसे छू लेता है तो उसे स्नान करना पड़ता है। जिस घर में यह रखा रहता है उस घर को अशुद्ध माना जाता है। और वहां खाना बनना तो दूर कोई पानी भी नहीं पीना चाहता। इसको देखकर कई लोग तो डर भी जाते हैं क्योंकि आत्मा के निकल जाने पर यह अस्त-व्यस्त और डरावना हो जाता है।*


मांसाहार करने वाले लोग इसी शव को  या लाश को खाते हैं। इसलिए यह मांसाहार !! शवाहार या लाशाहार ही है।


*आधुनिक पात्रों में जंगली खाना*

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

कहा जाता हैं कि प्राचीन समय में जब सभ्यता का विस्तार नहीं हुआ था उस समय मानव जंगल में रहता था। तो उसके पास जीवन में उपयोगी साधनों का अभाव था। उस समय पेट भरने के लिए वह जंगली जानवरों का कच्चा मांस खा लेता था।


धीरे-धीरे कृषि प्रारंभ हुई अनेक प्रकार के खादों का उत्पादन हुआ, शहर बसे और मानव ने अनेक जीवन उपयोगी साधनों का आविष्कार कर उस  आदिम जंगली जीवन को तिलांजलि दे दी। उस समय की भेंट में आज उसके पास मकान, वस्त्र, जूते, बर्तन, मोटर, कम्प्यूटर आदि सब उत्तम प्रकार के आरामदायक साधन है।


उपरोक्त तथ्य यदि सत्य है तो मानव ने काफी विकास कर लिया है। वह हाथ में लेकर खाने के बजाए, पत्तों ऊपर रखकर खाने के बजाय आधुनिक डिजाइन की प्लेस में चम्मच के प्रयोग से खाता है। डाइनिंग टेबल पर बैठना भी उसने सीख लिया। परंतु प्रश्न यह है कि वह खाता क्या है? उसकी प्लेट में है क्या?


*यदि इतनी साज सज्जा, रखरखाव को अपना कर, इतना विकास करके भी उसकी प्लेट पर रखा आहार यदि आदिम काल वाला ही है, यदि इतना विकास करके भी वह उस जंगली मानव वाले खाने को ही अपनाए हुए हैं तो विकास क्या किया?*


यह तो वही बात हुई कि मटका मिट्टी के स्थान पर सोने का हो गया पर अंदर पड़ा पदार्थ जहर का जहर ही रहा।यदि सभ्यता ने विकास किया तो क्या सिर्फ बर्तनों और डाइनिंग टेबल कुर्सियों तक ही विकास किया?


*क्‍या खाने के नाम पर सभ्यता नहीं आई? फर्क  इतना ही तो है उस समय जानवर को मारने के तरीके दूसरे थे और आजकल तीव्रगति वाली मशीनें यह कार्य कर देती है परंतु मुख तो अपने को मानव कहलाने वाले का ही है। मारने के हथियार बदल गए परंतु खाने वाला मुख तो नहीं बदला। मुख तो मानव का ही है।*


*पेट बन गया शमशान*

〰️〰️〰️〰️〰️〰️

*शव को जब श्मशान में ले जाते हैं तो उसे चिता पर लिटा कर आग लगाई जाती है। परंतु मानव को देखिए, वह शव को अथवा शव के टुकड़ों को रसोईघर में ले जाता है। फिर उस को रसोईघर के बर्तनों में पकाता है। तो उसकी रसोई क्या हो गई? श्मशान ही बन गई ना! तो फिर उस लाश को मुंह के माध्यम से पेट में डालता हैं। सच पूछो तो ऐसे व्यक्ति के घर की हवा भी पतित बनाने वाली है।*


संत तुकाराम कहते हैं कि पापी मनुष्य यह नहीं देख पाता है कि सभी प्राणियों में प्राण एक सरीका होता है। जो व्यक्ति ना तो स्वयं कष्ट पाना चाहता है, ना मरना चाहता है वह निष्ठुरता पूर्वक दूसरों पर हाथ कैसे उठाता है?


वास्तव में मांस खाने वाले को इस शब्द का अर्थ समझना चाहिए मांस अर्थार्थ माम्सः मेरा वह।

जिसको मैं खा रहा हूं वह मुझे खाएगा। यह एक दुष्चक्र है। हिंसा इस चक्र को जन्म

देती है - उसके इस जन्म में मैं उसे खाता हूं,

अगले जन्म में मुझे हिंसा का शिकार होना होगा।

और इस प्रकार मेरा भोजन ही मेरा कॉल बन कर जन्म जन्मांतर तक मेरे पीछे लगा रहेगा।


*इसलिए माँ प्रकृति की बड़ी संतान मानव को अपने छोटे भाइयों (मूक प्राणियों) को जीने का अधिकार देते हुए, मैं जिऊँ और अन्य को मरने दो, इस राक्षसी प्रवृत्ति को छोड़ देना चाहिए।*


*हम बदलेंगे,युग बदलेगा।*

Monday, December 13, 2021

मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग २)

 👉 *मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग २)*


*सहानुभूति का अर्थ वाक्जाल या ऊपरी दिखावा मात्र नहीं। कई सयाने व्यक्ति बातों के थाल परोसने में तो कोई कसर नहीं करते, पर कोई रचनात्मक सद्भाव उनसे नहीं बन पाता।* अरे भाई! बड़ा बुरा हुआ तुम्हारी तो सारी सम्पत्ति जल गई, अब क्या करोगे, आजीविका कैसे चलेगी, बच्चे क्या खायेंगे आदि-आदि अनेकों प्रकार की मीठी मीठी चिकनी-चुपड़ी बातें तो करेंगे, पर यह न बन पड़ेगा कि बेचारे को अभी तो खाना खिलादे। *जो सामान जलने से बच गया है, उसे कहीं रखवाने का प्रबन्ध करवा दें। कोई ऐसा संकेत भी करे तो नाक भौं सिकोड़ते हैं।* भाई-बेबस हूँ, पिछली दालान में तो बकरियाँ बंधती हैं, बरामदे में शहतीर रखे हैं। जबान की जमा-खर्च बनाते देर न लगी, पर सहायता के नाम पर एक कानी कौड़ी भी खर्च करने को जो तैयार न हुआ, ऊपरी दया दिखाई ही तो इससे क्या बनता है। *सच्ची सहानुभूति वह है जो दूसरों को उदारतापूर्वक समस्याएँ सुलझाने में सहयोग दे। करुणा के साथ कर्तव्य का सम्मिश्रण ही सहानुभूति है।* केवल बातें बनाने से प्रयोजन हल नहीं होता है, उसे तो दिखाया या प्रपंच मात्र ही कह सकते हैं।


*प्रशंसा और आत्म-सुरक्षा का सहानुभूति से कोई सम्बन्ध नहीं। प्रशंसा एक मूल्य है, जो आप कर्तव्य के बदले में माँगते हैं।* मूल्य माँगने से आपकी सेवा की कर्तव्य न रही, कर्म बन गई। इसे नौकरी भी कह सकते हैं । ऐसी सहानुभूति से कोई लाभ नहीं हो सकता क्योंकि आपकी इच्छा पर आघात होते ही आप विचलित हो जायेंगे। *प्रशंसा न मिली तो आत्मीयता का भाव समाप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में भावना की शालीनता नष्ट हो जाती है।* ऐसी सहानुभूति घृत निकाले हुए छाछ जैसी होगी। शहद निकाल लिया तो मोम की क्या कीमत रही। *बदले में कुछ चाहने की भावना से सहानुभूति की सार्थकता नहीं होती, इसे तो व्यापार ही कह सकते हैं।*


*सहानुभूति मानव अन्तःकरण की गहन, मौन और अव्यक्त कोमलता का नाम है। इसमें स्वार्थ और संकीर्णता का कहीं भी भाव नहीं होता।* जहाँ ऐसी निर्मल भावनायें होती हैं, वहाँ किसी प्रकार के अनिष्ट के दर्शन नहीं होते। आत्मीयता, आदर, सम्मान और एकता की भावनाएँ, सहानुभूतिपूर्ण व्यक्तियों के अन्तःकरण में पाई जाती हैं। *इससे वे हर घड़ी स्वर्गीय सुख की रसानुभूति करते रहते हैं। उन्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। क्लेश उन्हें छू नहीं जाता।* उनके लिए सहयोग की कोई कमी न रहेगी। ऐसे व्यक्ति क्या घर, क्या बाहर एक विलक्षण सुख का अनुभव कर रहे होंगे। *और भी जो लोग उनके संपर्क में चले जाते हैं, उन्हें भी वैसी ही रसानुभूति होने लगती है।*


*दूसरों के दुःखों में अपने को दुःख जैसे भावों की अनुभूति हो तो हम कह सकते हैं कि हमारे अन्तःकरण में सच्ची सहानुभूति का उदय हुआ है।* इससे व्यक्तित्व का विकास होता है और पूर्णता की प्राप्ति होती है। सभी में अपनापन समाया हुआ देखने की भावना सचमुच इतनी उदात्त है कि इसकी शीत छाया में बैठने वाला हर घड़ी अलौकिक सुख का आस्वादन करता है। दीनबन्धु परमात्मा की उपासना करनी हो तो आत्मीयता की उपासना करनी चाहिये। *दार्शनिक बालक ने परमात्मा की पूजा का कितना हृदय स्पर्शी चित्र खींचा है।* उन्होंने लिखा है- “दीनों के प्रति मैं सहज भाव से खिच जाता हूँ, उनकी भूख मेरी भूख है, उनके पैरों में रहता हूँ, वंचनाओं की पीड़ा सहना है, गले से लगाता हूँ, मैं भी उतनी देर के लिये दीन और ठुकराया हुआ प्राणी बन जाता हूँ।”


*सहानुभूति लोगों में एकात्म-भाव पैदा करती है। दूसरे लोगों का आन्तरिक प्रेम और सद्भाव प्राप्त होता है। ऐसे लोगों में विचार-हीनता और कठोरता नहीं आ सकती।* वे सदैव मृदुभाषी, उदार, करुणावान और सेवा की कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत बने रहेंगे। जो दूसरों के साथ सहयोग करना नहीं जानते, जो समाज में सदैव अत्याचार और विक्षोभ की गलित-वायु फूँकते रहते हैं, उन्हें इन दुर्गुणों के बुरे परिणाम भी अनिवार्य रूप से भोगने पड़ते हैं। *स्वार्थी असंवेदनशील और हिसाबी व्यक्ति चतुराई में कितने ही बड़े चढ़े रहें, कितने ही पढ़े-लिखें, शिक्षित तथा योग्य क्यों न हों, अन्त में सफलता से हाथ धोना ही पड़ेगा।*


.... *क्रमशः जारी*

✍🏻 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

📖 *अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ १६*


Sunday, December 12, 2021

प.पू.गुरुदेव का अंतःकरण करूणा और ममत्व से भरा हुआ था!

 प.पू.गुरुदेव का अंतःकरण करूणा और ममत्व से भरा हुआ था!

*******************************************

प.पू. गुरूदेव का जन्म एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ! पिता कुल पुरोहित थे। आस पास की सभी जमींदारियों में बड़ा सम्मान था तथा जब भी कभी भागवत पारायण होता उनके पिता पं. रूपकिशोर जी को ही बुलाया जाता। गाँव के बीच एक किलेनुमा हवेली में उनका निवास था। पर बालक श्रीराम का मन वहाँ घुटता रहता। वह निकल जाता अपने साथियों के साथ-दुखियों, बीमारों की तलाश में। गाँव में कभी हाट बाजार लगता तो उनके स्वयं सेवकों की टोली सबको पानी पिलाती। सबको प्राथमिक सहायता से लेकर पशु चिकित्सा के पैम्फलेट्स हाथों से बाँटते। सब ढेरों आशीर्वाद देते। ऐसे ही दिनों में एक दिन उन्हें जानकारी मिली कि उनके घर की हरिजन महिला छपको तीन चार दिनों से किसी कारण से आ नहीं रही। वे उसे प्यार से अम्मा कह कर बुलाते थे। निकल पड़े व पहुँच गए हरिजनों के टोले में। गाँव के सभी ब्राह्मणों, ठाकुरों ने टोका-रोका व कहा कि “घर जाकर पढ़ाई करो-भंगियों में तुम्हारा कोई काम नहीं है। कहीं छू लिया तो प्रायश्चित और करना पड़ेगा।


वे भला रुकने वाले थे। गंदी नालियों से गुजरते हुए वे पहुँच गए उस अम्मा के घर व देखकर हैरान रह गए कि उसकी हथेली में बड़ा घाव है व बिना दवा कराए उच्च ताप में वह बिस्तर में पड़ी है। पहले ढेरों उलाहने दिए और फिर का कि अभी मलहम पट्टी का सामान लेकर आता हूँ। शोषित समुदाय की उस वृद्ध ने श्रीराम को रोकते हुए कहा कि वह खुद ही पाँच मील दूर अस्पताल जाकर मलहम करा लेगी पर वे तो घर से सामान लेकर ही लौटे। खूब मन लगाकर कीड़ों से सने गैग्रीन में बदल रहे घाव को धोया और लाल दवा लगा कर मलहम पट्टी कर दी फिर कहा कि जड़ी बूटियों का काढ़ा और बना जाता हूँ ताप उतर जाएगा। वह डबडबाए नेत्रों से उन्हें आशीर्वाद देती रही। किन्तु आगे का मार्ग और भी दुष्कर था। घर पहुँचे तो गंगाजल का घड़ा लिए घर वाले खड़े थे ताकि स्नान करा के पवित्र किया जा सके व फिर प्रताड़ित कर आगे के लिए सावधान किया जा सके। बालक श्रीराम का कहना था कि ‘तुम लाख रोको मैं जाऊँगा जरूर। तब तक, जब तक कि उस बुढ़िया के घाव ठीक ठीक नहीं हो जाते। अतः गंगा जल की व्यवस्था और कर लेना क्योंकि रोज ही मुझे पवित्र करना पड़ेगा”। डाँट पड़ी तथा भोजन भी नहीं दिया गया। किन्तु बालक कच्ची मिट्टी का नहीं बना था।


वह पुनः अगले दिन गया व फिर पाँच दिन तक जब तक कि उस वृद्ध के घाव सूखकर वह चलने योग्य नहीं हो गई। इस बीच उसे घर के बाहर एक कोठरी में रहना पड़ा सभी बुजुर्गों की डाँट भरीपूरी मात्रा में सुननी पड़ी रोज गंगाजल से नहाना पड़ा जाने के मार्ग बदलने पड़े पर दूसरे की पीड़ा मिटाने का जो संकल्प लिया था वह पूरा हो कर ही रहा। संभवतः स्वयं महाकाल ने उस वृद्ध हरिजन महिला के मुँह से उसे ढेरों आशीर्वाद दिए कहा कि आगे चलकर वह एक बहुत बड़ा महात्मा बनेगा, ढेरों व्यक्तियों के हृदय का सम्राट बनेगा। हुआ भी यही। बीसवें दशक की उस वृद्ध माँ की आत्मा जहाँ आत्मा जहाँ भी होगी उस छोटे बालक रूपी वामन की इस अवतार लीला को देख रही होगी व सोचती होगी कि वह कितनी बड़भागी थी कि स्वयं निष्कलंक प्रज्ञावतार का प्रतिनिधि उसकी सेवा हेतु आया।

Saturday, December 11, 2021

खुशी की वजह

 👉 *!! खुशी की वजह !!*


*जंगल के सभी खरगोशों ने एक दिन सभा बुलाई। बैठक में सभी को अपनी समस्याएं बतानी थीं। सभी खरगोश बहुत दुखी थे। सबसे पहले सोनू खरगोश ने बोलना शुरू किया कि जंगल में जितने भी जानवर रहते हैं, उनमें खरगोश सबसे कमज़ोर हैं।*


सोनू बोल रहा था, *“शेर, बाघ, चीता, भेड़िया, हाथी सब हमसे अधिक शक्तिशाली हैं। सबसे कोई न कोई डरता है, लेकिन हमसे कोई नहीं डरता।”* सोनू की बात सुन कर चीकू खरगोश तो रोने ही लगा। उसने रोते हुए कहा कि खरगोशों की ऐसी दुर्दशा देख कर तो अब जीने का मन ही नहीं करता। 


बात सही थी। खरगोश से कोई नहीं डरता था। *उन्हें लगने लगा था कि संसार में उनसे कमज़ोर कोई और नहीं। ऐसे में तय हुआ कि कल सुबह सारे खरगोश एक साथ नदी के किनारे तक जाएंगे और सारे के सारे नदी में डूब कर जान दे देंगे।* ऐसी ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है।


*सुबह सारे खरगोश इकट्ठा हुए और पहुंच गए नदी के किनारे। जैसे ही वो नदी के किनारे पहुंचे, उन्होंने देखा कि वहां बैठे मेंढ़क खरगोशों को देख कर डर के मारे फटाफट नदी में कूदने लगे।* 


उन्हें ऐसा करते देख खरगोश वहीं रुक गए। वो समझ गए कि मेंढ़क उनसे डर रहे हैं। बस फिर क्या था, मरना कैंसिल हो गया। 


*सोनू खरगोश ने वहीं एक सभा की और सभी खरगोशों को बताया कि भाइयों हमें हिम्मत से काम लेना चाहिए। इस संसार में कोई ऐसा भी है, जो हमसे भी कमज़ोर है। ऐसे में अगर हमारे पास दुखी होने की कई वज़हें हैं तो खुश होने की भी एक वज़ह तो है ही।*


चीकू खरगोश ने भी कहा कि हां, हमें हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए। हम कमज़ोर हैं, ये सोच कर हमें दुखी होने की जगह ये सोच कर हमें खुश होना चाहिए कि हम सबसे अधिक खूबसूरत हैं और हम जंगल में किसी भी जानवर की तुलना में अधिक तेज़ गति से दौड़ सकते हैं। फिर सारे खरगोश खुशी-खुशी जंगल में लौट आए।


शिक्षा/संदेश :-

*“ज़िंदगी में बेशक आपके सामने हज़ार-पांच सौ मुश्किलें होंगी लेकिन आप दुनिया को दिखा दीजिए कि अब आपके पास मुस्कुराने की दो हज़ार वज़हें हैं।”*


Friday, December 10, 2021

मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग १)

 👉 *मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग १)*


*मानव-जीवन की सफलता, सौंदर्य और उपयोगिता में वृद्धि जिन नैतिक सद्गुणों से होती है, उनमें सहानुभूति का महत्व कम नहीं है।* शक्ति , सत्यनिष्ठा, व्यवस्था, सच्चाई कर्म-निष्ठा, निष्पक्षता, मितव्ययिता और आत्म-विश्वास के आधार पर सम्मान मिलता है, समृद्धि प्राप्त होती है और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता के दर्शन होते हैं, किन्तु लौकिक जीवन में जो मधुरता तथा सरसता अपेक्षित है, वह सहानुभूति के अभाव में सम्भव नहीं। *सहानुभूति चरित्र की वह गरिमा है, जो दूसरों का मन मोह लेने की क्षमता रखती है। इससे पराये अपने हो जाते हैं।* किसी तरह की रुकावट परेशानी मनुष्य जीवन में नहीं आती। सहानुभूति से मन निर्मल होता है, *पवित्रता जागती है और बुद्धि-प्रखरता से व्यक्तित्व निखर उठता है।*


*सन्त वेलूदलकाक्स का कथन है, “जब अपनी ओर देखो तो सख्ती से काम लो, दूसरों की ओर देखो तो नम्रता का उद्गार प्रकट करो।* अनुचित छोटाकशी से परहेज करो- दोष-दर्शन साधारण मनुष्यों का कार्य है। इसमें सन्देह नहीं है कि दूसरों को गिराने, नीचा दिखाने की वृत्ति आत्म-हीनता की परिचायक है। *निकृष्ट विचार-धारा के लोग सदैव समाज में कलह और कटुता के बीज बोते हैं। इससे सभी उनका निरादर करने लगते हैं।* उनका विश्वास उठ जाता है और मुसीबत पड़ने पर कोई साथ तक नहीं देता। बीमार पड़े हैं, पर दवा का कहीं इन्तजाम नहीं। *दूध माँगते हैं पर कोई पानी देने को भी तैयार नहीं होता। बड़ी दुर्दशा होती है, कोई पास तक नहीं आता।* पर किया क्या जाए, *जिसने दूसरों के साथ उदारता, करुणा, शालीनता, सभ्यता, मुक्तहस्तता एवं दयालुता का कभी भी रुख न अपनाया हो, उसको आड़े वक्त कोई सहयोग न करे, सहायता न दे तो इसमें आश्चर्य करने की कौन-सी बात है।*


*दूसरों को जीतने के लिये सहानुभूति एक रामबाण हैं। ‘सह’ का अर्थ है साथ-साथ, अर्थात् उस जैसा। अनुभूति का अर्थ है अनुभव, बोध।* जैसी उसकी अवस्था हो वैसी ही अपनी, इसी का नाम सहानुभूति है। एक व्यक्ति पीड़ा से छटपटा रहा है, गहरी चोट लग गई, है इससे बेचारे का पाँव टूट गया है, कष्ट के मारे तड़फड़ा रहा है। *एक दूसरा व्यक्ति उसकी बगल में खड़ा है, उससे यह दृश्य देखा नहीं जाता। यह कष्ट मुझे होता तो कितनी तकलीफ होती, वह इस भावना मात्र से छटपटा उठता है।* उसकी भी दशा ठीक वैसी ही हो जाती है, जैसी चोट खाये व्यक्ति की। *झट डॉक्टर को बुलाता है, घाव साफ करता है और दवा लगाता है। दूसरों की कठिनाई मुसीबतों को अपना दुःख समझ कर सेवा करने का नाम सहानुभूति है।* यह मानवता का उच्च नैतिक गुण है। वाल्ट विटमैन के शब्दों से यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि सहानुभूति किसे कहते हैं। *उन्होंने लिखा है, “मैं विपत्तिग्रस्त मनुष्य से यह नहीं पूछता कि तुम्हारी दशा कैसी है वरन्-मैं स्वयं भी आपदग्रस्त बन जाता हूँ।*


.... *क्रमशः जारी*

✍🏻 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

📖 *अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

Thursday, December 9, 2021

सर्वसमर्थ गायत्री माता

 सर्वसमर्थ गायत्री माता

******************

यह  मई  १९७०  की  बात  है। मैं  अपने  छोटे  भाई  महावीर  सिंह  के  साथ  चार  दिन  के  शिविर  में  मथुरा  गया  हुआ  था। उस  दौरान  गुरुदेव  ने  मुझसे  कहा  कि  तेरी  कोई  पीड़ा  हो  तो  मुझे  बतला। मैंने  कहा- गुरुदेव  मेरा  एक  छोटा  भाई  है। उसके  हाथ  पैर  में  जान  नहीं  है। हिलते  डुलते  भी  नहीं  है। पूज्यवर  ने  कहा- बेटा  वह  उसके  पिछले  जन्म  का  प्रारब्ध  है। जिसका  परिणाम  भुगत  रहा  है। मैंने  कहा- गुरुदेव  अगर  वह  अच्छा  नहीं  हो  सकता  है  तो  ऐसी  कृपा  करें  कि  वह  मर  जाय। हम  लोगों  से  उसका  कष्ट  देखा  नहीं  जाता। गुरुदेव  बोले- मैं  तो  ब्राह्मण  हूँ, किसी  को  मार  कैसे  सकता  हूँ!  फिर  कुछ  सोचते  हुए  धीरे  से  बोले- जब  मनुष्य  किसी  को  जिन्दा  नहीं  कर  सकता  तो  मारने  का  अधिकार  उसे  कैसे  मिल  सकता  है? मैंने  कहा- कम  से  कम  चलने  फिरने  लग  जाय.....।


गुरुदेव  कुछ  देर  मौन  हो  गए। उसके  पश्चात्  बोले  बेटा  गायत्री  माता  से  कहूँगा, वह  ठीक  हो  जाएगा। भस्मी  ले  जा, भस्मी  से  उसकी  मालिश  करना  और  मेरा  काम  करना।


मैंने  भस्मी  ले  जाकर  अपनी  माँ  को  दी  और  बताया  कि  गुरुदेव  की  कृपा  से  भैय्या  ठीक  हो  जाएगा। इस  बात  पर  ज्यादा  विश्वास  किसी  को  नहीं  हुआ। मेरे  पिताजी  को  तो  बिल्कुल  विश्वास  नहीं  था। उन्होंने  कहा- अगर  यह  लड़का  ठीक  हो  जाएगा  तो  हम  गुरुजी  की  शक्ति  को  मानेंगे। आसपास  के  लोगों  में  यह  बात  फैल  गई  थी। सभी  लोग  उसको  देखने  आते। डॉक्टर  लोग  भी  बच्चे  की  स्थिति  जानने  के  लिए  आते। मेरी  माँ  ने  भस्म  को  भाई  के  अविकसित  हाथ  पैर  में  रोजाना  लगाना  शुरु  किया  और  महामृत्युंजय  मंत्र  का  जप  उसने  निमित्त  शुरू  किया। थोड़े  ही  दिनों  में  उसके  मसल्स  बनने  लगे।


इस  तरह  देखते- देखते  करीब  चार  महीने  बीत  गए। लोगों  की  उत्सुकता  बढ़  रही  थी। हाथ  पैरों  में  धीरे- धीरे  जान  आने  लगी। धीरे- धीरे  वह  चारपाई  पकड़कर  उठने- बैठने  लगा  और  कुछ  ही  महीनों  में  वह  एकदम  सामान्य  बच्चे  की  तरह  हो  गया। किसी  को  विश्वास  नहीं  होता  था  कि  यह  वही  बच्चा  है। हम  लोगों  की  खुशी  का  ठिकाना  न  रहा। पिताजी  गाँव  भर  घूमते, लोगों  को  बताते  कि  गुरुदेव  ने  मेरे  बच्चे  को  हाथ  पैर  दे  दिए  हैं। उन  दिनों  गायत्री  यज्ञ  के  लिए  कोई  तैयार  नहीं  होता  था, पर  इस  घटना  ने  हमें  यज्ञ  करने  हेतु  बाध्य  कर  दिया। ठाठरिया  (चूरू) राजस्थान  में  ६  से  ९  मई  १९७२  तक  एक  विशाल  यज्ञ  का  निर्धारण  किया  गया। उस  यज्ञ  में  दूर- दूर  से  लोग  आए। जो  भी  आता  वह  व्यक्ति  पूज्यवर  की  सिद्धियों  से  अधिक  गायत्री  यज्ञ  के  तत्वदर्शन  से  प्रभावित  होता। हजारों  लोग  दीक्षा  लेकर  गए। हजारों  का  साहित्य  बिका। उस  क्षेत्र  में  करीब  पचास  शाखाएँ  खुल  गईं।


इस  घटना  के  बाद  मेरा  पूरा  परिवार  गुरुदेव  से  गहराई  से  जुड़  गया। मैंने  स्वैच्छिक  सेवानिवृत्ति  लेकर  २२  अगस्त  १९९८  को  स्थायी  रूप  से  सेवा  दे  दी। तब  से  उनके  चरणों  में  रहकर  उन्हीं  का  कार्य  कर  रहा  हूँ।  


प्रस्तुति :- रामसिंह  राठौर  -शान्तिकुञ्ज  (उत्तराखण्ड)

Wednesday, December 8, 2021

नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति

 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति

******************************

ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि उत्पादित सम्पदा यदि सभी में बँट गई होती तो सभी लोग लगभग एक ही तरह का - समान स्तर का जीवन जी रहे होते। अभाव कृत्रिम है। वह मात्र एक ही कारण उत्पन्न हुआ है कि कुछ लोगों ने अधिक बटोरने की विज्ञान एवं प्रत्यक्षवाद की विनिर्मित मान्यता के अनुरूप यह उचित समझा है कि नीति, धर्म, कर्तव्य सदाशयता, शालीनता, समता, परमार्थ परायणता जैसे उन अनुबन्धों को मानने से इंकार कर दिया जाए जो पिछली पीढ़ियों में आस्तिकता और धार्मिकता के आधार पर आवश्यक माने जाते थे। अब उन्हें प्रत्यक्षवाद ने अमान्य ठहरा दिया, तो सामर्थ्यवानों को कोई किस आधार पर मर्यादा में रहने के लिए समझाए? किस तर्क के आधार पर शालीनता और समता की नीति अपनाने के लिए बाधित करे। पशुओं को जब नीतिवान परोपकारी बनाने के लिए बाधित नहीं किया जा सका, तो बन्दर की औलाद बताए गए मनुष्य को यह किस आधार पर समझाया जा सके कि उसे उपार्जन तो करना चाहिए पर उसको उपभोग में ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए। सदुपयोग की उन परम्पराओं को भी अपनाना चाहिए जो न्याय, औचित्य, सद्भाव एवं बाँटकर खाने की नीति अपनाने की बात कहती है। यदि वह अध्यात्मवादी प्रचलन जीवित रहा होता तो प्रस्तुत भौतिकवादी प्रगति के आधार पर बढ़ते हुए साधनों का लाभ सभी को मिला होता। सभी सुखी एवं समुन्नत पाए जाते। न कोई अनीति बरतता और न किसी को उसे सहने के लिए विवश होना पड़ता ।


विज्ञान ने जहाँ एक से एक अद्भुत चमत्कारी साधन उत्पन्न किए वहाँ दूसरे हाथ से उन्हें छीन भी लिया। कुछ समर्थ लोग जन्नत का मजा लूटते और शेष सभी दोषारोपण की सड़न में सड़ते हुए न पाए जाते। विज्ञान के साथ सद्ज्ञान का समावेश भी यदि रह सका होता तो भौतिक और आत्मिक सिद्धान्तों पर आधारित प्रगति सामने होती और उसका लाभ हर किसी को समान रूप से मिल सका होता। पर किया क्या जाए? भौतिक विज्ञान जहाँ शक्ति और सुविधा प्रदान करता है, वहीं प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ नीति, धर्म, संयम, स्नेह, कर्तव्य आदि को झुठला भी देता है। ऐसी दशा में उद्दण्डता अपनाए हुए समर्थ का दैत्य-दानव बन जाना स्वाभाविक है। उनका बढ़ता वर्चस्व उन दुर्बलों का शोषण करेगा ही जिन्हें प्रगति ने बहुलता से पैदा करके समर्थों को उदार बनने एवं ऊँचा उठाने का श्रेय देने के लिए पैदा किया है। तथाकथित प्रगति ने इसी नीतिमत्ता का बोलबाला होते देखने की स्थिति पैदा कर दी है।


उदाहरण के लिए प्रगति के नाम पर हस्तगत हुई उपलब्धियों को चकाचौंध में नहीं उनकी वस्तुस्थिति में खुली आँखों से देखा जा सकता है। औद्योगीकरण के नाम पर बने कारखानों ने संसार भर में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भर दिया है। अणु शक्ति की बढ़ोत्तरी ने विकिरण से वातावरण को इस कदर भर दिया है कि तीसरा युद्ध न हो तो भी भावी पीढ़ियों को अपंग स्तर की पैदा होना पड़ेगा। ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग ने संसार का तापमान इतना बढ़ा दिया है कि हिम प्रदेश पिघल जाने पर समुद्रों में बाढ़ आने और ओजोन नाम से जानी जाने वाली पृथ्वी की कवच फट जाने पर ब्रह्माण्डीय किरणें धरती की समृद्धि को भूनकर रख सकती हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशक मिलकर पृथ्वी की उर्वरता को विषाक्तता में बदलकर रखे दे रहे हैं। खनिजों का उत्खनन जिस तेजी से हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि कुछ ही दशाब्दियों में धातुओं का, खनिज तेलों का भण्डार समाप्त हो जाएगा। बढ़ते हुए कोलाहल से तो व्यक्ति और पगलाने लगेंगे। शिक्षा का उद्देश्य उदरपूर्ति भर रहेगा, उसका शालीनता के तत्त्वदर्शन से कोई वास्ता न रहेगा। आहार में समाविष्ट होती हुई स्वादिष्टता प्रकारान्तर से रोग-विषाणुओं की तरह धराशायी बनाकर रहेगी। कामुक उत्तेजनाओं को जिस तेजी से बढ़ाया जा रहा है, उसके फलस्वरूप न मनुष्य में जीवनी शक्ति का भण्डार बचेगा, न बौद्धिक प्रखरता और शील-सदाचार का कोई निशान बाकी रहेगा। पशु-पक्षियों और पेड़ों का जिस दर से कत्लेआम हो रहा है, उसे देखते हुए यह प्रकृति छूँछ होकर रहेगी। नीरसता, निष्ठुरता, नृशंसता, निकृष्टता के अतिरिक्त और कुछ पारस्परिक व्यवहार में कोई ऊँचाई शायद ही दीख पड़े। मूर्धन्यों का यह निष्कर्ष गलत नहीं है कि मनुष्य सामूहिक आत्म-हत्या की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्तियों की बढ़ोत्तरी देखते हुए कथन कुछ असम्भव नहीं लगता। स्नेह सौजन्य और सहयोग के अभाव में मनुष्य पागल कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर आक्रमण करने के अतिरिक्त और कुछ कदाचित ही कर सके।


मनुष्य जाति आज जिस दिशा में चल पड़ी है, उससे उसकी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन होते दीखता है। संचित बारूद के ढेर में यदि कोई पागल एक माचिस की तीली फेंक दे, तो समझना चाहिए कि यह अपना स्वर्गोपम धरालोक धूलि बनकर आकाश में न छितरा जाए। विज्ञान की बढ़ोत्तरी और ज्ञान की घटोत्तरी ऐसी ही विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में बहुत विलम्ब भी नहीं लगने देंगी। ऐसा दीखता है।

Tuesday, December 7, 2021

लोभ, मोह के बंधन में न फँसे

 लोभ, मोह के बंधन में न फँसे

************************

अब किसी को भी धन का लालच नहीं करना चाहिए और बेटे-पोतों को दौलत छोड़ मरने की विडम्बना में नहीं उलझना चाहिए। यह दोनों ही प्रयत्न निरर्थक सिद्ध होंगे। अगला जमाना जिस तेजी से बदल रहा है, उससे इन दोनों विडम्बनाओं से कोई लाभान्वित न हो सकेगा, वरन् लोभ और मोह की इस दुष्प्रवृत्ति के कारण सर्वत्र धिक्कारा भर जाएगा। दौलत छिन जाने का दु:ख और पश्चात्ताप सताएगा, सो अलग। इसलिए यह परामर्श हर दृष्टि से सही ही सिद्ध होगा कि मानव जीवन जैसी महान उपलब्धि का उतना ही अंश खर्च करना चाहिए, जितना निर्वाह के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हो। इस मान्यता को हृदयंगम किए बिना आज की युग पुकार के लिए किसी के लिए कुछ ठोस कार्य कर सकना संभव न होगा। एक ओर से दिशा मुड़े बिना दूसरी दिशा में चल सकना सम्भव ही न होगा।


लोभ-मोह में जो डूबा हुआ होगा, उसे लोकमंगल के लिए न समय मिलेगा न सुविधा। सो परमार्थ पक्ष पर चलने वालों को सबसे प्रथम अपने इन दो शत्रुओं को—रावण, कुम्भकरणों को, कंस, दुर्योधनों को निरस्त करना होगा। यह दो आंतरिक शत्रु ही जीवन विभूति को नष्ट करने के सबसे बड़े कारण हैं। सो इनसे निपटने का अंतिम महाभारत हमें सबसे पहले आरंभ करना चाहिए। देश के सामान्य नागरिक जैसे स्तर का सादगी और मितव्ययितापूर्ण जीवन स्तर बनाकर स्वल्प व्यय में गुजारे की व्यवस्था बनानी चाहिए और परिवार को स्वावलम्बी बनाने की योग्यता उत्पन्न करने और हाथ-पाँव से कमाने में समर्थ बनाकर उन्हें अपना वजन आप उठा सकने की सडक़ पर चला देना चाहिए। बेटे-पोतों के लिए अपनी कमाई की दौलत छोडक़र मरना, भारत की असंख्य कुरीतियों और दुष्ट परम्पराओं में से एक है।


संसार में अन्यत्र ऐसा नहीं होता। लोग अपनी बची हुई कमाई को जहाँ उचित समझते हैं, वसीयत कर जाते हैं। इसमें न लडक़ों को शिकायत होती है न बाप को, कंजूस कृपण की गालियाँ पड़ती हैं, सो अलग। इसलिए हम लोगों में से जो विचारशील हैं, उन्हें तो ऐसा साहस इकट्ठा करना चाहिए। जिनके पास इस प्रकार का ब्रह्मवर्चस न होगा, वे माला सटकाकर, पूजा-पत्री उलट-उलट कर मिथ्या आत्मप्रवंचना भले ही करते रहें, वस्तुत: परमार्थ पथ पर एक कदम भी न बढ़ सकेंगे। समय, श्रम, मन और धन का अधिकाधिक समर्पण विश्वमानव की सेवा कर सकने की स्थिति तभी बनेगी जब लोभ और मोह के खरदूषण कुछ अवसर मिलने दें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक संपत्ति मौजूद है, उनके लिए यही उचित है कि आगे के लिए उपार्जन बिलकुल बंद कर दें और सारा समय परमार्थ के लिए लगाएँ। प्रयत्न यह भी होना चाहिए कि सुयोग्य स्त्री-पुरुषों में से एक कमाए, घर खर्च चलाए और दूसरे को लोकमंगल में प्रवृत्त होने की छूट दे दे। संयुक्त परिवारों में से एक व्यक्ति विश्व सेवा के लिए निकाला जाए और उसका खर्च परिवार वहन करे। जिनके पास संग्रहीत पूँजी नहीं है। रोज कमाते, रोज खाते हैं उन्हें भी परिवार का एक अतिरिक्त सदस्य, बेटा ‘लोकमंगल’ को मान लेना चाहिए और उसके लिए जितना श्रम, समय और धन अन्य परिवारियों पर खर्च होता है, उतना तो करना ही चाहिए।


अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ-५६, ५७

Monday, December 6, 2021

प्रारब्ध

 🌫🌫   *प्रारब्ध*   🌫🌫

*एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था। धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था*


     *जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे*


    *धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे।इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे*


    *अब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया।*


    *एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये  तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है।*


    *एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है ? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं।*


    *अभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआऔर उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया।*


     *वह व्यक्ति रोते हुये कहता है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना।*


     *प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ।*


     *व्यक्ति कहता है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है।*


 *प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।*


ईश्वर कहते है: *प्रारब्ध तीन तरह* के होते है :


*मन्द*, 

                    *तीव्र*, तथा 

                                            *तीव्रतम*


*मन्द प्रारब्ध* मेरा नाम जपने से कट जाते है । *तीव्र प्रारब्ध* किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है । पर *तीव्रतम प्रारब्ध* भुगतने ही पडते है।


*लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ।*


           *प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।*

  *तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर।।*

ओउम

Sunday, December 5, 2021

देवताओं के गायत्री मन्त्र

 देवताओं के गायत्री मन्त्र

*******************

🔷 अनेक कष्टो से मनुष्य की रक्षा करती है गायत्री मंत्र।

भूत प्रेत, चोर डाकू, राज कोप, आशंका, भय, अकाल मृत्यु, रोग और अनेक प्रकार की बाधाओं का निवारण करके मनुष्य को सदैव तेजश्वी बनाय रखता है।

इन मंत्रों को प्रतिदिन जपकर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य प्राप्ति की जा शक्ति है।


🔶 १. गणेश गायत्री:- यह समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण करने में सक्षम है

ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।


🔷 २. नृसिंह गायत्री:- यह मंत्र पुरषार्थ एवं पराक्रम की बृद्धि होती है।

ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।


🔶 ३. विष्णु गायत्री:- यह पारिवारिक कलह को समाप्त करता है।

ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।


🔷 ४. शिव गायत्री:- यह कल्याण करने में अदूतीय है।

ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।


🔶 ५. कृष्ण गायत्री:- यह मंत्र कर्म क्षेत्र की सफलता हेतु इसका जप आवश्यक है।

ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।


🔷 ६. राधा गायत्री:- यह मंत्र प्रेम का अभाव दूर होकर, पूर्णता को पहुचता है।

ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।


🔶 ७. लक्ष्मी गायत्री:- यह मंत्र पद प्रतिष्ठा, यश ऐश्वर्य और धन Sसम्पति की प्राप्ति होती है।

ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।


🔷 ८. अग्नि गायत्री:- यह मंत्र इंद्रियों की तेजस्विता बढ़ती है।

ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।


🔶 ९. इन्द्र गायत्री:- यह मंत्र दुश्मनों है हमले से बचाता है।

ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।


🔷 १०. सरस्वती गायत्री:- यह मंत्र ज्ञान बुद्धि की वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।


🔶 ११. दुर्गा गायत्री:- यह मंत्र से दुखः और पीड़ानही रहती है।शत्रु नाश, विघ्नों पर विजय मिलती है।

ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।


🔷 १२. हनुमान गायत्री:- यह मंत्र कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत होती हैं।

ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।


🔶 १३. पृथ्वी गायत्री:- यह मंत्र दृढ़ता, धैर्य और सहिष्णुता की वृद्धि होती है।

ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।


🔷 १४. सूर्य गायत्री:- यह मंत्र शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि। तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।


🔶 १५. राम गायत्री:- यह मंत्र इससे मान प्रतिष्ठा बढती है।

ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात्।


🔷 १६. सीता गायत्री:- यह मंत्र तप की शक्ति में वृद्धि होती है।

ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्।


🔶 १७. चन्द्र गायत्री:- यह मंत्र निराशा से मुक्ति मिलती है और मानसिकता प्रवल होती है।

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।


🔷 १८. यम गायत्री:- यह मंत्र इससे मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।

ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि। तन्नो यम: प्रचोदयात्।


🔶 १९. ब्रह्मा गायत्री:- यह मंत्र व्यापारिक संकटो को दूर करता है।

ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।


🔷 २०. वरुण गायत्री:- यह मंत्र प्रेम भावना जागृत होती है, भावनाओ का उदय होता हैं।

ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात्।


🔶 २१. नारायण गायत्री:- यह मंत्र प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता है।

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो नारायण: प्रचोदयात्।


🔷 २२. हयग्रीव गायत्री:- यह मंत्र समस्त भयो का नाश होता है।

ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात्।


🔶 २३. हंस गायत्री:- यह मंत्र विवेक शक्ति का विकाश होता है,बुद्धि प्रखर होती है।

ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।


🔷 २४. तुलसी गायत्री:- परमार्थ भावना की उत्त्पति होती है।

ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।


🔶 गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल प्राप्त होता है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है। इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है।


🔷 गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में क्या कहा जाए। ब्रह्म की जितनी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं। वेदमाता गायत्री से यही विनम्र प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करें।

Saturday, December 4, 2021

"संकल्प"

 👉 "संकल्प"

***********

बात नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बचपन की है जब वे स्कूल में पढ़ा करते थे। बचपन से ही वे बहुत होशियार थे और सारे विषयो में उनके अच्छे अंक आते थे, लेकिन वे बंगाली में कुछ कमजोर थे। बाकि विषयों की अपेक्षा बंगाली मे उनके अंक कम आते थे।


एक दिन अध्यापक ने सभी छात्रों को बंगाली में निबंध लिखने को कहा। सभी छात्रों ने बंगाली में निबंध लिखा। मगर सुभाष के निबंध में बाकि छात्रों की तुलना में अधिक कमियाँ निकली।


अध्यापक ने जब इन कमियों का जिक्र कक्षा में किया तो सभी छात्र उनका मजाक उड़ाने लगे।


उनकी कक्षा का ही एक विद्यार्थी सुभाषचंद्र बोस से बोला- “वैसे तो तुम बड़े देशभक्त बने फिरते हो मगर अपनी ही भाषा पर तुम्हारी पकड़ इतनी कमजोर क्यों है।”


यह बात सुभाषचन्द्र बोस को बहुत बुरी और यह बात उन्हें अन्दर तक चुभ गई। सुभाषचंद्र बोस ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह अपनी भाषा बंगाली सही तरीके से जरुर सीखेंगे।


चूँकि उन्होंने संकल्प कर लिया था इसलिये तभी से उन्होंने बंगाली का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया। उन्होंने बंगाली के व्याकरण को पढ़ना शुरू कर दिया, उन्होंने दृढ निश्चय किया कि वे बंगाली में केवल पास ही नहीं होंगे बल्कि सबसे ज्यादा अंक लायेंगे।


सुभाष ने बंगाली पढ़ने में अपना ध्यान केन्द्रित किया और कुछ ही समय में उसमे महारथ हासिल कर ली। धीरे धीरे वार्षिक परीक्षाये निकट आ गई।


सुभाष की कक्षा के विद्यार्थी सुभाष से कहते – भले ही तुम कक्षा में प्रथम आते हो मगर जब तक बंगाली में तुम्हारे अंक अच्छे नहीं आते, तब तक तुम सर्वप्रथम नहीं कहलाओगे।


वार्षिक परीक्षाएं ख़त्म हो गई। सुभाष सिर्फ कक्षा में ही प्रथम नहीं आये बल्कि बंगाली में भी उन्होंने सबसे अधिक अंक प्राप्त किये। यह देखकर विद्यार्थी और शिक्षक सभी दंग रहे गये।


उन्होंने सुभाष से पूछा – यह कैसे संभव हुआ ?


तब सुभाष विद्यार्थियों से बोले – यदि मन ,लगन ,उत्साह और एकग्रता हो तो, इन्सान कुछ भी हाँसिल कर सकता है।

Thursday, December 2, 2021

समय किसी के लिए नहीं ठहरता, किसी के लिए नहीं रुकता

 समय किसी के लिए नहीं ठहरता, किसी के लिए नहीं रुकता।

***********************

      हर कार्य की अपनी महत्ता है, लेकिन समय पर किसी भी कार्य के पूरा होने पर ही उसकी महत्ता दृष्टिगोचर होती है, अन्यथा कार्य कितने ही अच्छे ढंग से किया गया हो, समय निकल जाने पर वह निरर्थक हो जाता है। 

      इसलिए कोई भी कार्य जो जरूरी है, उसे कल के भरोसे न छोड़ा जाय क्योंकि आने वाला कल हो सकता है कि अनेक परेशानियों व झंझटों को लेकर आए। इसलिए किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए "शुभस्य शीघ्रम्" की नीति को अपनाना चाहिए। 

      यह वास्तविकता है कि समय किसी के लिए नहीं ठहरता, किसी के लिए नहीं रूकता। हमें ही समय के साथ आगे बढ़ना होता है और समय के साथ अपना तालमेल बैठाना होता है।

       समय का सही सदुपयोग करने के लिए सही समय पर सही निर्णय लेना जरूरी है। हम जैसा भी निर्णय लेते हैं, वैसा ही कार्य करने लगते हैं। हमारे जीवन की दिशा धारा समय की उस धार में बहती है, जिस दिशा में हमारे निर्णय होते हैं। 

      व्यक्ति को अपने जीवन में किस समय क्या करना चाहिए? इसे जानने के लिए उसे सदा सजग रहना जरूरी है। जब व्यक्ति वर्तमान में घटित हो रही घटनाओं से रूबरू होता है, तो उसे यह भली-भाँति ज्ञात होता है कि अमुक समय में किस तरह के कार्य को करने की प्राथमिकता दी जाय।

       समय हमारे जीवन का पर्याय है। हमारे पास कुल कितना समय है, उतना ही हमारा जीवन है। जो व्यक्ति अपने समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी कद्र नहीं करता। यही कारण है कि जो समय का अपने जीवन में सही ढंग से सुनियोजन कर पाते हैं, वहीं सफलता के सोपानों पर अपने कदम बढ़ा पाते हैं। 

      आज के इस युग में जिसने समय को साध लिया, समय का सही सदुपयोग कर लिया, समयानुसार अपने को सुव्यवस्थित कर लिया, वही व्यक्ति सही मायने में अपने जीवन में सफल है।

( संकलित व सम्पादित)

- अखण्ड ज्योति अगस्त 2019 पृष्ठ 28