मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है।
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मानव जीवन अमोल रत्नों का भण्डार है। अपरिमित विभूतियों का विधान है, किन्तु इसकी विभूतियांँ प्राप्त उसे ही होती है, जो उनके लिए प्रयत्न करता है, उनके लिए पसीना बहाता है। आलसी और स्थगनशील व्यक्ति इसकी छोटी सी सिद्धि भी नहीं पा सकता।
जीवन की बहुमूल्य विभूतियांँ पाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए, अपने को पूरी तरह से दांँव पर लगा देना चाहिए। जो इसकी निधियांँ प्राप्त करने का संकल्प लेकर कार्य में जुटा रहता है, वह अवश्य सफल और सुखी होता है।
मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है, एक अलौकिक अवसर है। यह बात ठीक-ठीक उन्हीं लोगों की समझ में आती है, जो उसका सदुपयोग करके इस लाभ को प्रत्यक्ष देख लेते हैं।
मानव जीवन का क्या महत्व है? इसको केवल दो व्यक्ति ही बता सकते हैं, एक तो वे जिन्होंने इसके चमत्कारों को अपने अनुभव में स्पष्ट देखा है, दूसरे वे जो इसे व्यर्थ में बर्बाद करके इसके अन्तिम बिन्दु पर पहुंँच कर पछता रहे हैं।
इस जीवन का एक-एक क्षण बहुत मूल्यवान है। मनुष्य को चाहिए कि वह पुरुषार्थ के बल पर इसकी पूरी कीमत लेने का प्रयत्न करें। जो साहसी है, सतर्क और सावधान है, मानव जीवन की अनन्त विभूतियांँ केवल वही पा सकता है। जीवन में केवल वही विजय प्राप्त कर सकता है, जो किसी भी परिस्थिति में हिम्मत नहीं हारता।
जीवन उसी का सफल होता है, जिसके यापन के पीछे कोई उद्देश्य अथवा कोई ऊंँचा लक्ष्य रहता है। जीवन में सदुद्देश्यता रहने से ही मनुष्य आज तक इतनी उन्नति करता चला आया है। मनुष्य को निरन्तर उन्नति और विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा देने वाली शक्ति सदुद्देश्यता ही है।
जीवन का कोई उद्देश्य न होने से ही पशु सदैव ही अपनी पाशविक अवस्था में ही रहते हैं। न तो उन्होंने आज तक कोई उन्नति की है और न आगे ही कर सकने की सम्भावना है। यही नहीं, बिना किसी सदुद्देश्य के जीवन बिताने वाले मनुष्य भी एक प्रकार के पशु ही हैं। वे भी अपने जीवन में कोई उन्नति नहीं कर सकते और एक दिन फिर मनुष्यता को खोकर पशुता में डूब जाएंँगे।
समुद्र की तरह जीवन-मन्थन करने से भी मनुष्य को सुख-शान्ति के असंख्य रत्न मिलते हैं। जीवन-मन्थन का अर्थ है, सामने आए हुए संघर्षों तथा बाधाओं से अनवरत लड़ते रहना। जो प्रतिकूलताओं को देखकर डर जाता है, मैदान छोड़ देता है, वह जीवन की अनन्त उपलब्धियों में से एक कण भी नहीं पा सकता।
जीवन निर्वाह की बात को उसकी सीमा तक ही रखना चाहिए। जिस दिन मनुष्य जीवन निर्वाह को सामने रखकर स्वार्थों का पोषण करना छोड़ देगा और सोचने लगेगा कि जिस प्रकार मेरे लिए जीवन निर्वाह आवश्यक है, उसी प्रकार दूसरों के लिए भी, उसी दिन संसार से बहुत से दु:खों का तिरोधन हो जायेगा।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1965 पृष्ठ 31