Friday, October 29, 2021

विश्वनारी की पवित्र आराधना

 विश्वनारी की पवित्र आराधना

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संसार में सब से अधिक प्रेम संबंध का अद्वितीय उदाहरण माता है। माता अपने बालक को जितना प्रेम करती है उतना और कोई संबंधी नहीं कर सकता। यौवन के उफान काल में पति पत्नी में भी अधिक प्रेम देखा जाता है पर वह वास्तविक दृष्टि से माता के प्रेम की तुलना में बहुत ही हलका और उथला बैठता है। पति पत्नी का प्रेम, आदान प्रदान एक दूसरे के मनःसंतोष एवं प्रतिफल के ऊपर निर्भर रहता है। उस में कमी या विघ्न हो तो वह प्रेम विरोध के रूप में परिवर्तित हो जाता है परन्तु माता का प्रेम अतीव सात्विक और उच्च कोटि का होता है। बालक से प्रतिफल मिलना तो दूर रहा उलटे अनेक कष्ट होते हैं इस पर भी वह वात्सल्य की परम सात्विक प्रेम की, अमृत धारा बालक को पिलाती रहती है। कुपुत्र होने पर माता की भावनाएं घटती नहीं।


श्रीमद भागवत में वर्णन आता है कि कंस की सभा में जब श्रीकृष्ण जी पधारे तो सभासदों ने अपनी अपनी भावनाओं के अनुरूप उन्हें देखा। रामायण में वर्णन है कि सिया स्वयंवर के समय उपस्थित जन समुदाय राम को साक्षात वैसा ही देखते थे जैसी कि उनकी भावना थी। ब्रह्म तत्व स्फटक मणि के समान स्वच्छ निर्मल एवं निर्विकार है। अपनी अपनी भावनाएं ही कंस सभा और सीया स्वयंवर सभासदों की भांति भगवान में परिलक्षित होती हैं। दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखता है। कुंए में अपनी ही प्रतिध्वनि वापिस लौटती है। स्फटिक मणि के निकट जिस रंग की वस्तु रक्खी होगी उसी रंग की वह मणि दिखाई देने लगेगी। भगवान को हम माता, पिता, भ्राता, सुखा आदि जिस किसी भाव से देखेंगे वे उसी भाव के अनुरूप हमारे लिए प्रति ध्वनित होगा।


हम भगवान को प्रेम करते हैं और उनके अनन्य प्रेम का प्रतिदान प्राप्त करना चाहते हैं। तब माता के रूप में उन्हें भजना सबसे अधिक उपयुक्त एवं अनुकूल बैठता है। माता का जैसा वात्सल्य अपने बालक पर होता है वैसा ही प्रेम प्रतिफल प्राप्त करने के लिए भगवान से मातृ संबंध स्थापित करना आत्म विद्या, मनोवैज्ञानिक रहस्यों के, आधार पर अधिक उपयोगी एवं लाभ दायक सिद्ध होता है। कंस, भगवान को काल के रूप में देखता था। उसे दिन रात सोते जागते उनका प्राण घाती शस्त्र पाणि महा भयंकर स्वरूप दिखाई पड़ता था। सूरदास के कृष्ण बाल गोपाल स्वरूप थे। हमारे लिये माता का सम्बन्ध अधिक स्नेहमय हो सकता है। माता की गोदी में बालक या अपने को सबसे अधिक आनंदित सुरक्षित संतुष्ट अनुभव करता है। प्रभु को माता मानकर जगज्जननी वेदमाता गायत्री के रूप में उसकी उपासना करें तो उसकी प्रतिक्रिया भगवान की ओर से भी वैसी ही वात्सल्य मय होगी जैसी कि माता की अपने बच्चे के प्रति होती है।


इसके अतिरिक्त एक वैज्ञानिक कारण यह भी है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है। पुरुष शरीर और मन में कुछ ऐसी कमियां हैं जो स्त्री से ही पूरी होती हैं। इन अभावों की पूर्ति के लिए विपरीत लिंग की ओर सदैव खिंचाव रहता है। ध्यान करने में पुरुषाकृति रूप में मन की उतनी प्रवृत्ति नहीं होती जितनी कि स्त्री रूप में। गायत्री माता की उपासना में मन अपेक्षाकृत अधिक शान्त स्थिर एवं संलग्न रह सकता है इसलिए गायत्री का इष्ट शीघ्र सिद्ध होता है।


नारी शक्ति पुरुष के लिए सब प्रकार आदरणीय, पूजनीय, एवं पोषणीय है। पुत्री के रूप में, बहिन के रूप में, माता के रूप में वह स्नेह करने योग्य, मैत्री करने योग्य एवं गुरूवत् पूजन करने योग्य है। पुरुष के शुष्क अन्तर में अमृत सिंचन यदि नारी द्वारा नहीं हो पाता तो वैज्ञानिक बतलाते हैं कि वह बड़ा रूखा कर्कश, क्रूर, निराश, संकीर्ण, एवं अविकसित रह जाता है। वर्षा से जैसे पृथ्वी का हृदय हर्षित होता है और उसकी प्रसन्नता हरियाली एवं पुष्प पल्लव के रूप में फूट पड़ती है। पुरुष भी नारी की स्नेह वर्षा से इसी प्रकार सचन प्राप्त करके अपनी शक्तियों का विकास करता है परन्तु एक भारी विघ्न इस मार्ग में वासना का है जो अमृत को विष बना देता है। दुराचार, कुदृष्टि, एवं वासना का सम्मिश्रण हो जाने से नर-नारी के सान्निध्य से प्राप्त होने वाले अमृत जल, विष बीज बन जाते हैं। इसी बुराई के कारण स्त्री पुरुषों का अलग अलग रहने के, सामाजिक नियम बनाये गये हैं। फल स्वरूप दोनों पक्षों को उन असाधारण लाभों से वंचित रहना पड़ता है जो नर नारी के पवित्र मिलन-पुत्री बहिन और माता के रूप में सामीप्य होने से, मिल सकते हैं।


इस विष विकार की भावना का शमन करने के लिए गायत्री साधना परम उपयोगी है। विश्व नारी के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दशा में जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से अन्य इन्द्रियों का निग्रह, मन का निरोध एवं अनेक मनो विकारों का शमन अपने आप होता जाता है। मातृ भक्त के हृदय में दुर्वासनाएं अधिक देर नहीं ठहर सकतीं।


श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी आदि कितने ही महापुरुष शक्ति उपासक थे शक्ति धर्म भारत का प्रधान धर्म है। जन्म भूमि को हम भारत माता के रूप में पूजते हैं सभी राष्ट्र वादी भारत माता को, मातृ शक्ति की जय बोलते हैं और उसकी उपासना करते हैं। शिव से पहले शक्ति की पूजा है। लक्ष्मी नारायण, सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, आदि नामों में नारी को प्रथम और नर को गौण रखा गया है माता का, पिता और गुरु से भी पहला स्थान है। इस प्रकार विश्व नारी के रूप में भगवान की पूजा करना नर पूजा की अपेक्षा अधिक उत्तम उपयोगी है। गायत्री उपासना की यही विशेषता है।


ब्रह्म निर्विकार है। इन्द्रियों से अतीत तथा बुद्धि से अगम्य है। उस तक सीधा पहुंचने का कोई मार्ग नहीं। नाम जप रूप का ध्यान, प्रार्थना, तपस्या, साधना, चिन्तन श्रवण, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण मात्र हैं। सतोगुणी माया, एवं चित शक्ति के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है। पिता से संबंध होने का कारण माता है। इसलिए पिता से माता का दर्जा ऊंचा है समुद्र से जल ला लाकर मेघ मालाएं ही वर्षा आयोजन करती हैं। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का अस्वादन करने का सौभाग्य गायत्री माता द्वारा ही मानव प्राणी को प्राप्त होता है।


ब्रह्म की इच्छा, शक्ति, एवं क्रिया गायत्री है। उसी से उत्पत्ति, विकास एवं अवसान का आयोजन होता है। सुन्दरता, मधुरता, क्रीणा, सम्पत्ति, कीर्ति, आशा, प्रसन्नता, करुणा, मैत्री, आदि के रूप में यह महाशक्ति ही जीवन क्षेत्र को आनंदित एवं तरंगित करती रहती है। इस विश्वनारी की, महागायत्री की, महा माता की आराधना करके हम अधिकाधिक आनंद की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

Thursday, October 28, 2021

संस्कार मायके के

 संस्कार मायके के

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*विवाह के बाद,पहली बार मायके आयी बेटी का स्वागत सप्ताह भर चला।सम्पूर्ण सप्ताह भर बेटी को जो पसन्द है, वही सब किया गया, वापिस ससुराल जाते समय, पिता ने बेटी को एक अति सुगंधित अगरबत्ती का पुडा दिया और कहा - _बेटी !! तुम जब ससुराल में पूजा करने जाओगी तब यह अगरबत्ती जरूर जलाना,_*


*माँ ने कहा - _बिटिया !! प्रथम बार मायके से ससुराल जा रही है, तो ऐसे कोई अगरबत्ती जैसी चीज कोई देता है भला,_ पिता ने झट से जेब मे हाथ डाला और जेब मे जितने भी रुपये थे वो सब बेटी को दे दिए ।*


*ससुराल में पहुंचते ही सासु माँ ने बहु के मात-पिता ने बेटी को बिदाई में क्या दिया यह देखा, तो वह अगरबत्ती का पुडा भी दिखा, सासु माँ ने मुंह बना कर बहु को बोला कि कल पूजा में यह अगरबत्ती लगा लेना।*


 *सुबह जब बेटी पूजा करने बैठी तो वह अगरबत्ती का पुडा खोला। उसमे से एक चिट्ठी निकली,चिट्ठी में लिखा था....*


_*बेटा !! यह अगरबत्ती स्वतः जलती है,मगर संपूर्ण घर को सुगंधित कर देती है,इतना ही नही तो, आजु-बाजू के पूरे वातावरण को भी अपनी महक से सुगंधित एवम प्रफुल्लित कर देती है....हो सकता है की तूम कभी पति से कुछ समय के लिए रुठ जाओगी या कभी अपने सास-ससुरजी से नाराज हो जाओगी,कभी देवर या ननद से भी रूठोगी,कभी तुम्हे किसी से बाते सुननी भी पड़ जाए, या फिर कभी अडोस-पड़ोसियों के बर्ताव पर तुम्हारा दिल खट्टा हो जाये,तब तुम मेरी यह भेंट ध्यान में रखना। अगरबत्ती की तरह जलना जैसे अगरबत्ती स्वयं जलते हुए पूरे घर और सम्पूर्ण परिसर को सुगंधित और प्रफुल्लित कर ऊर्जा से भरती है,ठीक उसी तरह तुम स्वतः सहन कर तेरे ससुराल को अपना मायका समझ कर सब को अपने व्यवहार और कर्म से सुगंधित और प्रफुल्लित करना....*_


*बेटी चिट्ठी पढ़कर फफकर रोने लगी, सासूमां लपककर आयी,पति और ससुरजी भी पूजा घर मे पहुंचे जहां बहु रो रही थी।अरे हाथ को चटका लग गया क्या?, ऐसा पति ने पूछा। क्या हुआ यह तो बताओ, ससुरजी बोले। सासूमाँ आजुबाजु के सामान में कुछ है क्या यह देखने लगी।* 


*तो उन्हें पिता द्वारा सुंदर अक्षरों में लिखी हुई चिठ्ठी नजर आयी,चिट्ठी पढ़ते ही उन्होंने बहु को गले से लगा लिया और चिट्ठी ससुरजी के हाथों में दी,चश्मा ना पहने होने की वजह से, चिट्ठी बेटे को देकर पढ़ने के लिए कहा। सारी बात समझते ही संपूर्ण घर स्तब्ध हो गया।*


*"सासु माँ बोली - _अरे !! यह चिठ्ठी फ्रेम करानी है,यह मेरी बहु को मिली हुई सबसे अनमोल भेंट है,पूजा घर के बाजू में में ही इसकी फ्रेम होनी चाहिए और फिर सदैव वह फ्रेम अपने शब्दों से,सम्पूर्ण घर और अगल-बगल के वातावरण को अपने अर्थ से महकाती रही,अगरबत्ती का पुडा खत्म होने के बावजूद भी......*_


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

Wednesday, October 27, 2021

बोना और काटना

 बोना और काटना

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भाइयो! लगभग 60 वर्ष हो गये। 60 वर्ष पहले हमारे गुरुदेव घर पर आये थे और उन्होंने कई बातें कहीं। शुरू में तो कुछ डर जैसा मालूम पड़ा। पीछे जब मालूम पड़ा कि ये हमारे तीन जन्मों में हमारे साथ रहे हैं। जो उन्होंने पहले जन्मों का दृश्य दिखा दिया तो हमारा भय दूर हो गया और फिर बातचीत शुरू हो गई। उन्होंने कहा, ‘‘अपनी पात्रता को विकसित करने के लिये तुम्हें चौबीस लक्ष के चौबीस साल तक चौबीस पुरश्चरण करने चाहिए।’’ एक साल में एक, जौ की रोटी और छाछ पर रह करके किस तरीके से चौबीस साल काटने पड़ेंगे। 


ये पूरी विधि बताने के बाद में एक और नई बात बताई। ‘‘बोना और काटना।’’ तुम्हारे पास जो कुछ भी चीज है, बोना शुरू करो भगवान् के खेत में और वो सौ गुना होकर के तुम्हें मिल जायेगा। ऋद्धि और सिद्धि का तरीका यही है। फोकट में नहीं मिलती कहीं से। कोई ऐसा नियम नहीं है कि कोई ऋद्धि बाँट रहा हो, सिद्धि बाँट रहा हो, कहीं से मिल रहा हो, इस तरह का नहीं है। 


किसान बोता है और काटता है, ठीक इसी तरीके से तुमको भी ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ बोनी पड़ेंगी और काटनी पड़ेगी। उन्होंने कहा- ‘‘तुम्हारे पास क्या- क्या वस्तुएँ हैं।’’ मालूम नहीं क्या वस्तुएँ हैं। तो उन्होंने कहा देखो, समय और श्रम तुम्हारे पास है, यह भगवान् के खेत में बोओ। कौन- सा भगवान्, ये विराट् भगवान् जो चारों ओर समाज के रूप में विद्यमान है। इसके लिये तुम अपना श्रम और शरीर को सब खर्च कर डालो और तुम्हें सौ गुना होकर के मिल जायेगा, एक नम्बर। नम्बर दो, बुद्धि तुम्हारे पास है, भगवान् की दी हुई सम्पदाओं में अकल से बजाय इसका चिंतन करने के, उसका चिंतन करने के, अहंकार का चिंतन करने के, वासनाओं का चिंतन करने के, बेकार की बातों का चिंतन करने की अपेक्षा अपने चिंतन करने की जो सामर्थ्य है, उसको सारी की सारी को भगवान् के निमित्त लगा दो। उनके खेत में बोओ। ये तुम्हारी शक्ति सौ गुनी होकर के तुमको मिल जायेगी, दो। तीसरी चीज, तुम्हारे पास हैं, भावनाएँ। भावनाएँ हमारे पास हैं, हाँ! आपके पास भी हैं। तीन शरीर हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। जिसमें से स्थूल शरीर में श्रम होता है, सूक्ष्म शरीर में बुद्धि होती है और कारण शरीर में भावनाएँ होती हैं। ये तीन चीजें वो हैं, जो भगवान् ने हमको दी हैं। 


श्रम और शरीर भगवान् ने हमको दिया है। बुद्धि किसी आदमी ने नहीं दी है, भगवान् ने दी है। और भावनाएँ जो हैं, भगवान् ने दी हैं, इसीलिये भगवान् की दी हुई चीजों को बोना चाहिए और एक चीज इस तरह की है, जो तुम्हारी कमाई हुई है। या पहले जन्म से कमाया हुआ हो या इस जन्म में कमाया हो। बहरहाल वो तुम्हारा कमाया हुआ है। भगवान् का दिया हुआ नहीं है। वो क्या? धन। धन, भगवान् किसी को नहीं देता। जो कोई चाहे ईमानदारी से, बेईमानी से, मेहनत से, हरामखोरी से चाहे कमा लो, चाहे मत कमा लो। भगवान् को इससे कोई लेना- देना नहीं है। धन जो तुम्हें मिला है, तुम्हारा कमाया हुआ तो शायद नहीं है। मैंने कहा- ‘‘मेरा कमाया हुआ कहाँ से हो सकता है? चौदह- पन्द्रह वर्ष का बच्चा कहाँ से धन कमा के लायेगा। पिता जी का दिया हुआ धन है’’। इस सारे के सारे धन को भगवान् के खेत में बो दो, और यह सौ गुना होकर मिल जायेगा। बस मैंने गाँठ बाँध ली और वो 60 वर्ष से बँधी हुई गाँठ मेरे पास ज्यों की त्यों चली आ रही है। 


जो कुछ भी कमाया था हमने सब बो दिया। हमारे पास जो जमीन थी। उसकी जब जमींदारियाँ खतम हुईं तो उसका जो पैसा आया, गायत्री तपोभूमि बनाने के लिये हमने दान दे दिया। हमारी बीबी के पास सोना था, 60 तोले के करीब, वो भी हमने बेच कर उसी को दे दिया। जो कुछ भी हमारे पास था, सब खाली कर दिया और वो गायत्री तपोभूमि के बनाने में, भगवान् का घर बनाने में, भगवान् का मन्दिर बनाने में हमने खर्च कर दिया। फिर 80 बीघा जमीन कुल काश्त की हमारे पास रह गई थी, फिर उसको भी खर्च कर डाला। उसको काहे में खर्च किया? उसको जहाँ हमारा जन्म हुआ है, उस गाँव में हमने एक हायर सेकन्डरी स्कूल बना दिया। कभी आप जायें तो देखना, आपकी तबियत बाग- बाग हो जायेगी और फिर वहाँ पर दूर- दूर तक कोई अच्छा अस्पताल नहीं है। सैकड़ों आदमी बीमार हो जाते हैं। उनकी मृत्यु हो जाती है। स्त्रियों की मृत्यु हो जाती है, गर्भवतियों की मृत्यु हो जाती है। तो वहाँ एक अच्छा अस्पताल बने तो अच्छी बात है। वहाँ शानदार अस्पताल हमने बना दिया है। 


ये कहाँ से बनाया? जो पैसा, पिताजी का छोड़ा हुआ था, उसको हमने खाया नहीं। छोटी उमर में खा लिया होगा तो हम नहीं कह सकते। लेकिन इसके बाद में हमने किसी का दिया हुआ धन खाया नहीं है। सब खर्च कर डाला। एक- एक पाई खर्च कर डाली। हमारे पास उनका दिया हुआ कुछ भी नहीं। आपके पास कितना धन है? हमारे पास कुछ भी नहीं है। तो फिर, तो आप तो नुकसान में रहे। अरे! आप नुकसान की बात कहते हो। 


हमारे गाँव कभी आप जायें तो हमारा कच्चा मकान था, सारे गाँव के कच्चे मकान थे, हमारा भी कच्चा मकान था। फूट- टूट के बराबर हो गया। लेकिन यहाँ जहाँ कहीं भी हम रहते हैं, पक्के मकानों में रहते हैं। बड़े शानदार मकानों में रहते हैं। 


गायत्री तपोभूमि हमने बनाया, आप जरा देखिए न, कैसा शानदार मकान है। लाखों रुपया उसमें लग गया और हमारा मकान देखिए न, अखण्ड ज्योति कार्यालय देखिए, उसका प्रेस देखिये और आप यहाँ आइए, शान्तिकुञ्ज देखिए, गायत्री नगर देखिए, ब्रह्मवर्चस देखिए, चौबीस सौ गायत्री शक्तिपीठों को देखिये। ये मैं बिल्डिंगों का किस्सा सुना रहा हूँ। ये तो बिल्डिंग हैं और बिल्डिंगों के अलावा इनमें जो आदमी रहते हैं, उन पे जो खर्च होता है वो, गायत्री तपोभूमि में कितने आदमी काम करते हैं। दो सौ आदमी वहाँ काम करते हैं। दो सौ आदमी (इस समय लगभग दो हजार) करीब यहाँ भी रहते हैं। इन सबका खाने का, पीने का, कपड़े का, रोटी का जो खर्चा निकलता है, ये कहाँ से आ जाता है? जाने कहाँ से आ जाता है। धन हमारे पास कुछ कम नहीं पड़ता। जरूरत होती है, तो भगवान् की तरफ इशारा कर देते हैं और वो हमारे लिये जो कुछ भी चीजें हैं, सब ज्यों का त्यों भेज देते हैं। भगवान् के लिये सब आदमी एक से हैं। जो नियम हमारे ऊपर लागू हैं, वही आपके ऊपर भी लागू हो सकते हैं। भगवान् न हमारे साथ में रियायत करने वाले हैं और न आपके साथ में उनका कोई वैर- विरोध है। तरीके वो ही हैं, जो हमारे जीवन में हमको बताये गये। हमारे गुरु ने हमको तरीका बताया था और हमने अख्तियार कर लिया और गुरु को हम बहुत धन्यवाद देते हैं और आपको हम सिखाते हैं, समझाते हैं और बताते हैं कि आप भी उसी रास्ते पर चलिये, जिस रास्ते पर हम चले हैं। आप भी निहाल हो जायेंगे, धन्य हो जायेंगे और क्या कहूँ मैं आपसे? बस। 

आज की बात समाप्त। ॥ॐ शान्तिः॥

Monday, October 25, 2021

संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है।

 संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है।

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       बर्ट्रैंड रसेल का मत है कि- " विचारों में जैसी फलदायी शक्ति है, वैसे ही किसी भी वस्तु में नहीं है। जो व्यक्ति उपकार और उन्नति के सम्बन्ध में कल्पना या मनन करते रहते हैं, वे अदृश्य रूप से संसार की बड़ी सेवा करते हैं।"

       संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है। कोई भी विचार अपने अच्छे या बुरे प्रभाव से खाली नहीं है। हृदय में घृणा के विचारों का उदय होने से शरीर में से एक प्रकार का विष निकलने लगता है, जो चारों ओर फैलता है और पास रहने वालों को हानि पहुँचाता है। इसी भाँति जब प्रेम, कृपा या उदारता के विचारों का उदय होता है, तो अपने निकटवर्ती प्राणियों में सन्तोष और शान्ति फैलाते हैं।

       गर्मी से पानी भाप बनकर आकाश की ओर जाते हुए दिखाई नहीं देता, परन्तु फिर भी इस बात को सब जानते हैं। इसी तरह विचारों को खुली हुई आँखों से नहीं देखा जा सकता, परन्तु उनकी भी पानी और हवा के समान तरङ्गे बहती है।

       जो लोग बुरे विचार करते हैं, वे सचमुच कुछ ही समय में बहुत बुरे बन जाते हैं। एक महापुरुष का कथन है कि- "जब तुम कहते हो कि मैं जीव हूँ, तब जीव हो और जब कहते हो कि मैं शिव हूँ तो शिव हो।" उसके कथन का तात्पर्य ही है, कि जैसा तुम अपने को समझते हो, वैसे विचार करते हो, वैसे ही बन जाते हो।

       विचारों की लहरों में एक बड़े गजब की ताकत यह है, कि वह अपने समान अन्य विचारों को बड़ी शीघ्रता से खींचकर इकट्ठा कर लेती है।

       पाप, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और निराशा की विचार तरङ्गों में एक प्रकार के प्राणघातक सुक्ष्म जन्तु होते हैं, जो मनुष्य की जीवनी शक्ति को खा डालते हैं। फलस्वरुप मनुष्य बीमार पड़ते हैं, दुखी होते हैं और अल्पायु में ही मर जाते हैं।

       इसके विपरीत प्रेम, उदारता, परोपकार और प्रसन्नता में बिल्कुल दूसरी ही बात है। वह न केवल निरोग रखते हैं, वरन् दूसरे सद्गुणों की वृद्धि करके दीर्घ जीवन प्रदान करते हैं।

        उत्तम विचार करने वाले मनुष्य का रक्त शुद्ध रहेगा और उसकी बुद्धि ऐसी निर्मल रहेगी, कि स्वल्प परिश्रम से ही बहुत ज्ञान सम्पादित कर लेगी।

       आध्यात्मिक चिकित्सक अपने विचारों द्वारा ही दूसरों के रोग दूर कर देते हैं। वे रोगी के हृदय में पवित्रता, उत्साह और प्रसन्नता के भाव उत्पन्न करते हैं, जिससे उनका रक्त के विषैले कीटाणु नष्ट होने लगते हैं और निर्बल अङ्ग फिर से जागृत होकर अपनी क्रियाएँ करने में समर्थ हो जाते हैं।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1941 पृष्ठ 17

Sunday, October 24, 2021

शक्ति का परिणाम प्रयोग करने वालों की इच्छा पर निर्भर है।

 शक्ति का परिणाम प्रयोग करने वालों की इच्छा पर निर्भर है।

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       इच्छा शक्ति एक प्रचण्ड बल है। मनुष्य जीवन का यही बिजली-घर है। इस शक्ति का जो जैसा उपयोग करता है, वह वैसा ही बन जाता है।

       आग में जलाने की ताकत मौजूद है। कोई इस ताकत को भली ओर लगाता है, कोई बुरी ओर। वैज्ञानिक और शिल्पी लोग इसकी सहायता से भाप बनाकर कल-कारखाने चलाते हैं और तरह-तरह की चीजें तैयार करते हैं। पण्डित हवन करके इसके द्वारा वायु शुद्ध करते हैं और चोर, डाकू, लुटेरे आग लगाकर गाँव के गाँव को तबाह कर देते हैं, सैकड़ों को अनाथ बना देते हैं। शक्ति का क्या परिणाम होगा? यह प्रयोग करने वालों की इच्छा पर निर्भर है।

       ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही अज्ञात पुरुष पर्वतों की गुफाओं में बैठे हुए तप कर रहे हैं। मनुष्य यदि अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए दृढ़ संकल्प कर ले, तो शरीर का दुःख-कष्ट कोई बाधा खड़ी नहीं कर सकता।

       पहाड़ से निकला हुआ पानी झरना जैसे सामने की शिलाओं और पत्थरों को तोड़ता-फोड़ता अपना रास्ता बना लेता है, वैसे ही दृढ़ इच्छाशक्ति भी विघ्नों को हटाकर सफलता तक पहुँचा देती है।

       मनुष्य यदि किसी विषय पर विचार करके "करूँगा" स्थिर कर ले, तो उसे करने में वह अपने शरीर तक को होम सकता है। ऐसी दशा में कोई कारण नहीं, कि सफलता न मिले।

       सर्वशक्तिमान मङ्गलमय परमात्मा ने मनुष्य के शरीर के भीतर यह महाशक्ति रखी है। हम इस महाशक्ति के महत्व को नहीं समझते। बहुतों को इसके अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं है, पर यह निश्चित है कि इच्छाशक्ति की सहायता के बिना कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मार्च 1941 पृष्ठ 21

Saturday, October 23, 2021

बाहरी परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुख या दुःख नहीं दे सकती।

 बाहरी परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुख या दुःख नहीं दे सकती।

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       जीवन वृक्ष की जड़ मन के अन्दर है। अक्सर बाहर की परिस्थितियाँ जीवन से मेल नहीं रखती, तब बड़ा दुःख होता है।

       पिता की मृत्यु हो गई, हम बालकों की तरह फूट-फूट कर रोते हैं। धन चोरी चला गया, हम दुःख से व्याकुल हो जाते हैं। शरीर अस्वस्थ हो गया, हमें चारों ओर मृत्यु ही नाचती नजर आती है। कार्य में सफलता नहीं मिली, हम चिन्ता की चिता में जल उठते हैं। दूसरे लोग कहना नहीं मानते, हम क्रोध से क्षुब्ध हो जाते हैं। 

      इनमें से एक ही परिस्थिति जीवन को दुःखमय बना देने के लिए पर्याप्त है, फिर यदि कई घटनाएँ एक साथ मिले, तो कहना ही क्या? जीवन में दुःख शोकों की भट्टी जलने लगती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ नहीं आती, फिर भी हम उनकी कल्पना करके अपने को दुःखी बनाते रहते हैं।

       संसार के निर्बाधित क्रम के अनुसार जो घटनाएँ घटित होती रहती है, उनसे हम बच नहीं सकते। हम कितना ही प्रयत्न क्यों न करें? प्रियजनों की मृत्यु होगी ही, दान, भोग के बाद बचा हुआ धन नष्ट होगा ही।

       बेशक मनुष्य बहुत शक्तिशाली है, प्रयत्न करने पर परिस्थितियों को बहुत कुछ अपने अनुकूल कर सकता है, परन्तु यह न भूलना चाहिए, कि मनुष्य-मनुष्य ही है। आज की परिस्थिति में वह ईश्वर नहीं है।

       घटनाएँ संसार के क्रम के साथ है, वह होती है और होंगी। उनके प्रवाह से भगवान राम और योगीराज कृष्ण भी नहीं बच सके। परिस्थितियों से कोई बच नहीं सकता।

       परिस्थितियों का मुकाबला मनुष्य कर सकता है। वह अपना पथ स्वयं निर्माण कर सकता है। दुःख में से सुख खोज सकता है और अपने जीवन में नरक-तुल्य दिखाई देने वाली वेदनाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

       कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती है, जो संसार क्रम के साथ सम्बन्धित हैं, उनको सहन करने की शक्ति विवेक द्वारा प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार अपने को विवेकपूर्वक ठीक स्थिति पर रखकर हम संसार के समस्त दुःखों से छुटकारा पा सकते हैं। 

      यही अध्यात्म पथ है। बाहरी परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुख या दुःख नहीं दे सकती। यदि ऐसा होता, तो समस्त धनी सुखी और सब गरीब दुःखी हुए होते, परन्तु वास्तव में बात इससे उल्टी है। निकट से परीक्षा करने पर अधिकाँश गरीब सुखी और अधिकाँश धनी दुःखी ही मिलेंगे।

       अध्यात्म पथ प्रकाश का मार्ग है। वास्तविकता प्रकाश में ही मालूम हो सकती है। प्रकाश की जड़ें आत्मा में है। आत्म-स्वरूप का दर्शन करके ही सारे दुःख-शोकों को जाना और त्यागा जा सकता है।

       आत्मा सुखों का मूल है। जीवन का वास्तविक आनन्द उसी से प्राप्त हो सकता है। श्रुति कहती है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो। पाठकों! अध्यात्म पथ की ओर चलो!

( संकलित व सम्पादित)

अखण्ड ज्योति फरवरी 1941 पृष्ठ 4

Friday, October 22, 2021

कुछ ऐसे थे देश के पहले शहीद खुदीराम बोस

 कुछ ऐसे थे देश के पहले शहीद खुदीराम बोस

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खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।


उनका बचपन बस बीता ही था, उनके साथी जब पढ़ाई और परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, वह क्रांति की मशाल रौशन कर रहे थे, जिस उम्र में लोग जिंदगी के हसीन ख्वाब बुनते हैं, वह वतन पर निसार होने का जज्बा लिए हाथ में गीता लेकर फांसी के फंदे की तरफ बढ़ गए और देश की आजादी के रास्ते में अपनी शहादत का दीप जलाया। यह थे अमर शहीद खुदीराम बोस। खुदीराम के बगावती तेवरों से घबराई अंग्रेज सरकार ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया, लेकिन उनकी शहादत ऐसा कमाल कर गई कि देश में स्वतंत्रता संग्राम के शोले भड़क उठे। आज ही के दिन यानी 11 अगस्त, 1908 को ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। आइये इस मौके पर उनसे जुड़ीं कुछ खास बातें जानते हैं...


🔷 ​परिचय


खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।


​🔶 पहली गिरफ्तारी


वह वंदेमातरम के पर्चे बांटते थे। पुलिस ने 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस पुलिस के शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन 1906 को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे।


​🔷 किंग्सफर्ड की हत्या की योजना


कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मैजिस्ट्रेट को बहुत सख्त और क्रूर अधिकारी माना जाता था। क्रांतिकारियों का मानना था कि वह अधिकारी देशभक्तों खासतौर पर क्रांतिकारियों को तंग करता था। क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया। युगांतर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेंद्र कुमार घोष ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुजफ्फरपुर (बिहार) में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।


​🔶 किंग्सफर्ड की जगह कैनेडी और उसकी बेटी की हत्या


ये दोनों क्रांतिकारी सूझबूझ वाले माने जाते थे। दोनों मुजफ्फरपुर पहुंचकर एक धर्मशाला में आठ दिन रहे। इस दौरान उन्होंने किंग्सफर्ड की दिनचर्या और गतिविधियों पर पूरी नजर रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेजी अधिकारी और उनके परिवार के लोग शाम को वहां जाते थे। 30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्सफर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुंचे। रात के साढे़ आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी ने किंग्सफर्ड की बग्घी समझकर उसपर बम फेंका, जिससे उसमें सवार मां-बेटी की मौत हो गई। वे दोनों यह सोचकर भाग निकले कि किंग्सफर्ड मारा गया है।


​🔷 फांसी की सजा


दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया। अपने को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए। खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफर्ड को मारने का प्रयास किया था। लेकिन, इस बात पर बहुत अफसोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी गलती से मारे गए। यह मुकदमा केवल पांच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।


🔶 ​स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा


मुजफ्फरपुर जेल में जिस मैजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसके किनारे पर ‘खुदीराम’ लिखा रहता था। स्कूल कालेजों में पढ़ने वाले लड़के इन धोतियों को पहनकर सीना तानकर आजादी के रास्ते पर चल निकले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्योछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं।

Thursday, October 21, 2021

पहले अपनी सेवा और सहायता करो।

 पहले अपनी सेवा और सहायता करो।

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       इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। शास्त्रों में नाना प्रकार के धर्म-अनुष्ठानों का सविस्तार विधि-विधान है और उनके सुविस्तृत महात्म्यों का वर्णन है।

       दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति, आत्म-सन्तोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है, पर इन सबसे बढ़कर भी एक पुण्य परमार्थ है और वह है- आत्म-निर्माण।

       अपने दुर्गुणों को, कुविचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध और चिन्ता, भय एवं वासनाओं को विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा यज्ञ है, जिसकी तुलना सहस्त्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

       अपने अज्ञान को दूर कर के मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

       हर मनुष्य अपना-अपना आत्म-निर्माण करें, तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्य को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं के पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी।

       दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा सहायता करना इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना, इतना बड़ा धर्म कार्य है, जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य परमार्थ से नहीं हो सकती।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मई 1946 पृष्ठ 1

Wednesday, October 20, 2021

विश्वास एक मानवीय रत्न है, उसे वास्तव में योग्य, सत्पात्रों को सौंपना चाहिए।

 विश्वास एक मानवीय रत्न है, उसे वास्तव में योग्य, सत्पात्रों को सौंपना चाहिए।

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       यह संसार सदैव से बड़ा विचित्र रहा है और आज तो और भी विचित्र हो गया है। इसमें विश्वास तथा आत्मीयता का शोषण करने की कला बहुत बढ़ गई है। लोग विश्वास पाकर ही धोखा देते हैं, आत्मीयता जताकर ही उल्लू सीधा करते हैं। कमजोरी पकड़ कर ही लाभ उठाते हैं।

       भावातिरेकी पात्र, कुपात्र देखे बिना ही, उनको जाँचे और परखे बिना अपनी दुर्बलता के कारण ही अपने यह अमूल्य रत्न किसी को भी सौंप देते हैं, जिसके फलस्वरूप कटु अनुभव के बाद खिन्नता तथा पश्चाताप के भागी बनते हैं।

       इसके विपरीत भी भावातिरेकी जिसके प्रति घृणा अथवा द्वेष की भावना बना लेता है, फिर उसे जल्दी बदलता ही नहीं। उसके लिए यह भावना पत्थर की लीक हो जाती है, फिर चाहे उसका यह भाव किसी भ्रम अथवा भूल से ही क्यों न बन गया हो?

       अपने उद्देश्य अथवा घृणा पात्र के प्रति उसका विरोध इस सीमा तक बढ़ जाता है, कि उसकी चर्चा, उसका नाम तक विष की तरह अखरने लगता है और यहाँ तक कि जहाँ उसकी चर्चा होती है, वहाँ या तो ठहरता ही नहीं अथवा चर्चा करने वाले से भी घृणा करने लगता है।

       भावातिरेकी हर बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखता है। तनिक सी कठिनाई, जरा सी अप्रियता अथवा साधारण सी प्रतिकूलता आने पर वह इतना वेदना विभोर हो उठता है, मानो संसार का सारा कष्ट, क्लेश उन्हीं पर आ टूटा हो।

       दिन-रात चिन्ता तथा कुण्ठा में गला करता है। अभाव की एक अभिव्यक्ति पर ही इतना तड़प उठता है, कि संसार का निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी उसे अपने से सुखी तथा सम्पन्न दीखता है।

       आपत्ति का एक झोंका उन्हें सूखे पत्ते की तरह उड़ा देता है और वे निराशा के अन्धकार में आकण्ठ मग्न हो जाते हैं। सारा संसार उन्हें सूना और जिन्दगी नीरस तथा निःसार दीखने लगती है।

       आत्मीयता अच्छी बात है, विश्वास बुरी चीज नहीं है, तथापि यह दोनों वस्तुएँ मूल्यवान हैं और यूँ ही गली-कूचे लूटाने, बरसाने वाली चीजें नहीं है। यह एक मानवीय रत्न है, इसे उन्हीं सत्पात्रों को सौंपना चाहिए, जो वास्तव में इसके योग्य हों।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1971 पृष्ठ 25

Tuesday, October 19, 2021

भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है!

 👉 भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है!

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🔶 प्रायः टालस्टाय कहा करते थे- “भाग्य बनाना तो हमारे हाथ की बात है। ईश्वर ने हमारे शरीर, हमारे मस्तिष्क और हमारी आत्मा में वे अद्भुत शक्तियाँ भर दी हैं जिनका हमें कुछ ज्ञान नहीं है। यदि हम इन अद्भुत शक्तियों के विकास में लग जायें, तो भाग्य की लकीरों को निश्चय ही बदल सकते हैं।” एक नहीं अनेकों व्यक्तियों ने भाग्य बदला है।


🔷 एक बार घोड़ा हाँकने वाले ने अपना भाग्य बदला था। क्या आपको उसकी कहानी मालूम है। यदि नहीं तो लीजिये उसे तरोताजा कर लीजिये-


🔶 उसका नाम लावेल था। फूटे नसीब को चुनौती देकर वह फ्राँस का प्रधान सचिव बन गया था।


🔷 गरीबी से उसके पाँव जकड़े थे। अभाव उसे चारों ओर से बाँधे हुये थे। रोटी- कपड़े और पढ़ने की समस्त असुविधाएँ उसके पास थी। उन्नति के कोई भी साधन उसके पास नहीं थे।


🔶 जब वह छोटा था, तो एक दिन पिता ने बाग में घूमते हुये एक सुन्दर फल को दिखा कर उससे कहा था,


🔷''देखो पुत्र ! उस सुन्दर पुष्प को देखो। पूरे उद्यान में उसका सौरभ और सौन्दर्य फैल रहा है। दिशाएँ सुगंध से जैसे भर गई हैं। मन उसकी ओर खिंचा जाता है। क्या तुम्हें मालूम है कि पूर्ण विकसित स्थिति में आने लिये इस पुष्प को कितने कष्ट उठाने पड़े, कितनी एक से एक बड़ी तकलीफें सहनी पड़ी ?? उसके चारों ओर काँटे ही काँटे हैं। तनिक सी हवा चलते ही इसका शरीर काँटों सेविंध जाता है। हिलने तक के लिये स्थान नहीं है। लेकिन फिर भी यह फूल अपना सौन्दर्य और सौरभ बिखेर रहा है। तुमको भी इसी प्रकार जीवन में एक दिन खिलना है, एक दिन गरीबी, अभावों, विषमताओं, विरोधों के नुकीले काँटों में बढ़ना है। सफलता प्राप्त करना है। इस सफलता के लिये हर प्रकार के काँटों का आलिंगन करना है। हमेशा याद रखना है कि जीवन क सफल निर्माण पुष्पों की शय्या पर नहीं होता, बल्कि काँटों की सेज पर होता है। भाग्य बदलने का एकमात्र उपाय उन्नति के लिये हर प्रकार का सच्चा और निरन्तर संघर्ष ही है।''


🔷 बालक लावेल पर इन शब्दों का जादू जैसा असर हुआ। उसने निरन्तर भाग्य के चक्र को बदल डालने के लिये सतत प्रत्यन किया। अब उसके जीवन का एक नया अध्याय खुला।


🔶 वह घोड़ा हाँकता, पर साथ ही पुस्तकें रखता। जो भी थोड़ा- सा अवकाश मिलता, उसी में पुस्तकें पढ़ने बैठ जाता। एक ओर घोड़ा की सेवा और जीविका उपार्जन का कुटिल वक्त, दूसरी ओर अध्ययन और भाग्य को बदल डालने का दृढ़ प्रयत्न, उसके लिये सतत उद्योग। उसकी रोजी कम होने लगी। पढ़ने लिखने में लगे रहने से ताँगे की कमाई में कमी आना अवश्यम्भावी था।


🔷 इधर उसे पढ़ाई में मजा आने लगा था। उसे फाके मस्ती करना मंजूर था, पर अध्ययन छोड़ना मंजूर न था। कभी- कभी वह तांगा हांकने की छुट्टीकर देता, पास के पैसे घोड़े पर व्यय कर देता। स्वयं पूरे दिन उपवास कर डालता। रात में पढ़ने के लिये रोशनी का प्रबन्ध न होता। विवश होकर उसे सड़क की लालटेन के नीचे पढ़ना पढ़ा। पुस्तक खरीदने के लिये उसके पास पैसा नहीं था। वह उन्हें उधार माँगता और पढ़ कर लौटा देता। जब तक एक पुस्तक याद न कर लेता, तब तक उसे न छोड़ता ।। कभी -कभी बारिश के पानी में भी पड़ता ही रहता ।। तूफान या ठन्ड से भी न डरता। वर्षों परिश्रम करते- करते वह विद्वान बन गया और अपनी विद्वत्ता के बल पर सफलता की उच्चतम मंजिल पर पहुँचा।


अखंड ज्योति जनवरी 1961 से

Monday, October 18, 2021

जीवन की सार्थकता ************

 जीवन की सार्थकता

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जीवन की सार्थकता का रास्ता एक ही है कि अमीरी और लिप्सा पर अंकुश लगाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय। उतना जुट जाने पर पूरा-पूरा संतोष किया जाय। इसके उपरान्त जो भी बचा रहता है उस समूचे को ऐसे उपक्रम में नियोजित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा का अभिवर्धन होता हो। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का उभय पक्षीय प्रयोजन सधता है। इस निर्धारण में भी यह देखना होता है कि सामयिक आवश्यकता पर ध्यान रखते हुए जो सर्वप्रथम सँभालने सुधारने योग्य है उसी को हाथ में लिया जाय। पड़ोस में आग लगने पर भोजन पकाने जैसा आवश्यक काम भी पीछे कभी के लिए छोड़ना पड़ता है। कितने ही काम सामने हो तो उसमें बुद्धिमानी का कदम यह होता है कि प्राथमिकता देने और पीछे धकेलने की एक सुव्यवस्थित शृंखला बनाई जाय। इसका निर्धारण ही सुव्यवस्था कहा जाता है। इस क्रम को बिगाड़ देने पर पूरा परिश्रम करने पर भी बात बनती नहीं और समस्याएँ सुलझने के स्थान पर और भी अधिक उलझ जाती है। इन दिनों प्रत्येक विज्ञजन के लिए करने योग्य सामयिक कार्य एक ही है, कि लोक मानस के परिष्कार का महत्त्व समझा जाय और आस्था संकट का निवारण करने के लिए प्राण प्रण से जुट पड़ा जाय। इस एक ही व्यवधान के समाधान पर समय की समस्त गुत्थियों का सुलझ सकना निर्भर है।


यह सब अनायास ही संभव नहीं हो सकता। इस श्रेय पथ पर चल सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव है, जो अपनी आकांक्षा उत्कंठा को तृष्णा से हटाये और उसे उतनी ही भावना पूर्वक श्रेय साधना के लिए लगायें। यह आन्तरिक परिवर्तन ही बाह्य क्षेत्र में वह सुविधा उत्पन्न कर सकता है, जिसके सहारे शरीर निर्वाह की तरह ही आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का महान प्रयोजन बिना किसी के, नितान्त सरलतापूर्वक सधता रहे। परमार्थ परायणों में से एक भी भूखा, नंगा नहीं रहा। उनके पारिवारिक उत्तरदायित्वों में से एक भी रुका नहीं पड़ा रहा। तरीके अनेकानेक हैं। अपना सोचा हुआ तरीका ही एक मात्र मार्ग नहीं है। नये सिरे से नये उपाय सोचने पर ऐसे समाधान हर किसी को उपलब्ध हो सकते हैं जिनमें से साँप मरे न लाठी टूटे। निर्वाह किसी के लिए समस्या नहीं। कठिनाई एक ही है-अनन्त वैभव की लिप्सा और कुटुम्बियों को सुविधा सम्पदा से लाद देने की लालसा। यदि परिवार के समस्त सदस्यों को श्रमजीवी, स्वावलम्बी बनाने की बात सोची जाय, औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार किया जाय तो इतने भर से जीवन को सार्थक बनाने वाली राह मिल सकती है। प्रश्न एक ही है कि शरीर के लिए जिया जाय या आत्मा के लिए। दोनों में से एक को प्रधान एक को गौण मानना पड़ेगा। यदि आत्मा की वरिष्ठता स्वीकार की जा सके तो उन प्रयोजनों को पूरा करना पड़ेगा, जिनके लिए सृष्टा ने यह सुर दुर्लभ अवसर उच्चस्तरीय उपयोग के निमित्त प्रदान किया है।

Sunday, October 17, 2021

हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक देवी है

 हमारी अंतश्चेतना ही वास्तविक देवी है

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साथियो! मैं आपको एक बात बताना चाहूँगा कि मनुष्य जीवन कैसा ऊबड़ -खाबड़, बेघड़, कुसंस्कारी है। हमारा जीवन कैसा संस्कारविहीन, दिशाविहीन, लक्ष्यविहीन, क्रियाविहीन, अनुशासनविहीन और अस्त- व्यस्त है। इन चीजों को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, विचारणाओं को अगर ठीक तरीके से बना लिया जाए, भावनाओं को ठीक तरीके से बना लिया जाए क्रियाशक्ति को ठीक तरीके से बना लिया जाए तो मित्रो! हम कैसे सुंदर हो सकते हैं? हम कैसे सुघड़ हो सकते हैं? मैं आपको क्या बताऊँगा, मैं तो एक ही शब्द में कह सकता हूँ कि अगर आपने चमत्कार वाली बात सुनी हो, लाभ वाली बात सुनी हो, वरदान वाली बात सुनी हो, आशीर्वाद वाली बात सुनी हो, वैभव वाली बात सुनी हो, अध्यात्म की महत्ता वाली बात सुनी हो, अक्ल की बात सुनी हो, अध्यात्म की कभी कोई गरिमा आपने भी सुनी हो, वरदान और आशीर्वाद वाली बात आपने सुनी हो तो समझना कि ये सारी की सारी विशेषताएँ जो बताई जा रही हैं, वे आदमी की अंतश्चेतना के विकसित स्वरूप की बताई जा रही हैं और किसी की नहीं बताई जा रही हैं। देवी की बताई जा रही हैं। तो चलिए देवी क्या हो सकती है? यह बताता हूँ आपको। हमारी अंतश्चेतना के अलावा कोई देवी नहीं है। हमारी अंतश्चेतना जब विकसित होती है तो कैसी हो जाती है? ऐसी हो जाती है जिसको सिद्धि कहते हैं, जिसको हमको सँभालना और सँजोना आता है, इसे जीवन में हम संस्कृति कहते हैं। सभ्यता कहते हैं। जीवन में साधना इसी को कहते हैं। नाई क्या करता है? नाई हमारी हजामत बना देता है और हमें ऐसा बना देता है जैसे मूँछें अभी निकली ही नहीं। यह मिरैकिल- जादू है, हजामत बनाने वाले का। हमको खूबसूरत बनाने वाले का। दर्जी, जो हमारे फटे- पुराने से कपड़े थे, उनका कुरता बना देता है। जॉकेट बना देता है। अरे बेटे, यह कपड़ा तो वही है ढाई गज, जो सवेरे पड़ा हुआ था। अब कैसा सुंदर बना हुआ है? कमाल है। यहाँ भी बटन यहाँ भी कच्चा। यहाँ भी गोट। यहाँ भी बाजू। देख ले ये किसका कमाल है? दर्जी का कमाल। है अभी कैसा था कपड़ा? मैला- कुचैला उलटी- सीधी सिलवटें पड़ी हुईं थी। नील लग करके आ गई। टिनोपाल लग करके आ गया। ये क्या चीज है? ये चमत्कार है। ये साधना है। कपड़े की साधना किसकी है? ये धोबी की साधना है। मूर्तिकार की साधना है? पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज सा छैनी और हथौड़े को लेकर के मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लगा। दो- चार दिन पीछे ऐसी बढ़िया लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है, कि लक्ष्मी जी हैं। बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है? 


अभी आपको मैं साधना का महत्त्व बता रहा था। ये घटिया वाली जिंदगी, बेकार जिंदगी, पत्थर जैसी जिंदगी को आप बढ़िया और शानदार बना सकते हैं। सोने का एक टुकड़ा ले जाइए साहब! अरे हम क्या करेंगे? कहीं गिर पड़ेगा। अच्छा तो अभी हम आते हैं। उसका क्या बना दिया? ये कान का बुंदा बना दिया। ये अँगूठी बना दी, मीना लगी हुई। अरे साहब बहुत सुंदर बन गया है यह। क्या यह वही टुकड़ा है? हो यह सुनार का कमाल है। सुनार की साधना है। उसने खाबड़- खूबड़ धातु के टुकड़े को कैसी सुंदर अँगूठी बना दिया, कैसा जेवर बना दिया? कैसा नाक का जेवर बना दिया? कैसा कैसा जेवर बना दिया? ये हमारी जिंदगी, बेतुकी जिंदगी, बेसिलसिले की जिंदगी। बेतुकी जिंदगी। बेहूदी जिंदगी को हम जिस तरह से सँभाल पाते हैं- साधना इसका नाम है। असल में साधना इसी का नाम है। वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाएँ और तहजीब सिखाएँ। कौन सी? मैं इसको बताऊँगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है, कभी अक्ल से काम करता है, कभी नहीं करता है। कमर ऐसी करके बैठना। हाँ साहब, ऐसे ही करके बैठूँगा। मटक नहीं, सीधे बैठ। मचक- मचक करता है। मित्रो! ये सारे के सारे अनुशासन, सारी की सारी डिसीप्लीन, यह आज का विषय नहीं है। कभी समय मिला तो आपको बताऊँगा कि आपको जो भी साधना के बहिरंग क्रिया- कलाप सिखाते हैं। आखिर क्या उद्देश्य है इनका? क्रिया का कोई उद्देश्य होना चाहिए। क्यों साहब, पालथी मारकर क्यों बैठते हैं? पद्मासन में क्यों बैठते हैं, हम तो ऐसे ही बैठेंगे, टाँग पसारकर। नहीं बेटे, टाँग पसारकर मत बैठिए। नहीं साहब हम तो टाँग लंबी करेंगे, इसको छोटी करेंगे, नहीं बेटे, ये भी गलत है। नहीं हम तो यूँ माला जप करेंगे। सिर के नीचे तकिये लगाकर। नहीं बेटे, ऐसे मत करना। ये ठीक नहीं है। यह क्या है? डिसीप्लीन है। साधना के माध्यम से हम अपने व्यावहारिक जीवन को किस तरीके से अनुशासित रूप दे सकते हैं, किस तरीके से उसे ढाल सकते हैं, किस तरीके से अपने कमी को, अपने विचारों को अपनी इच्छाओं को, आस्थाओं को परिष्कृत एवं अनुशासनबद्ध कर सकते हैँ, क्रमबद्ध कर सकते हें। असल में साधना इसी का नाम है। 


स्वर्णकार के तरीके से, कलाकार के तरीके से, गायक के तरीके से और वादक के तरीके से जो अपने को साध लेता है। उसे ही सच्चा साधक कहा जाता है। उसकी ही सही रागिनी निकलती है। सुर निकलता है। कैसे निकलता है? बा ! अरे बेटे ये क्या बोलता है? यूँ मत बोल। तो फिर कैसे बोलूँ? तू ऐसे बोल, जैसे कि भैरवी रागिनी गाई जाती है। गुरुजी सिखाइए। बेटा तू आ जाना हमारे पास, हम तुझे सिखाएँगे नया राग सिखाएँगे। अब तू ऐसे बोल जैसे कोयल बोलने लगती है, अभी तू जैसे चिल्ला रहा था इसे सुर नहीं कहते। बेटे, ऐसे फिर मत बोलना। सुर को, गले को इस तरीके से साध कि ऐसी मीठी- मीठी आवाज आए कि बस मजा आ जाए और ये धागे और तार जो सितार में बँधे हुए थे, उन्हें हिला। इसे भन- भन- भन के तरीके से नहीं, हम जैसे बताएँ उस तरीके से बजा। इस तार के बाद उसे बजा, इसके बाद इसे बजा, फिर देख किस तरीके से इसमें से कैसी- कैसी सुरलहरी निकलती है, तरंगें निकल सकती हैं। कैसी- कैसी ध्वनि निकल सकती हैं? जिन पर तू थिरकने लगेगा और नाचने लगेगा, तो महाराज जी ये कैसे बजेगा? बेटे यह एक साधना है, किसकी? धागों की, तारों की। यह किसकी है साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है। सोने की साधना, मुख की साधना और जीवन की साधना कि इसे कैसे जिया जा सकता है? जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है? इसे कैसे देवोपम बनाया जा सकता है? जीवन की अस्तव्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है? जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है? अगर ठीक तरीके से आप इसे जान पाएँ तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं, सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए जो चीज बाहर दिखाई पड़ती है, वास्तव में वह भीतर से ही आती है। बाहर तो उसकी खुशबू, बिखरती चली जाती है। जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है, परंतु उसे यह मालूम पड़ता है कि हवा में से पूरब से वह आती है। पश्चिम से आ रही है। बेटे, सुगंध कहीं बाहर से नहीं आती? भीतर से निकलती है।

Saturday, October 16, 2021

दस अक्षरों ने महाभारत रचाया

 दस अक्षरों ने महाभारत रचाया।

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       राजसूय यज्ञ समाप्त हो चुका था, किन्तु सांस्कृतिक समारोहों की अब तक हस्तिनापुर में धूम मची हुई थी।

       ऐसी ही एक रात्रि में  दुर्योधन नाट्यशाला से वापस लौट रहा था। मार्ग में स्फटिक का बना हुआ जलकुण्ड था। चन्द्रमा के प्रकाश से उस जलकुण्ड का रङ्ग इस तरह मिलता था, कि पर्याप्त प्रकाश होने पर भी किसी को यह भ्रम नहीं हो सकता था, कि यहाँ पर जल है।

       दुर्योधन को भी भ्रम हुआ और वह सीधा चलता चला गया और जल से भरे उसे हौज में जा गिरा।

       पाण्डवों का अन्तःपुर समीप ही था। राजरानी द्रौपदी मरकत-मणि के प्रकाश में वहाँ  वृहद-आरण्यक का अध्ययन कर रही थी। हौज में किसी के गिरने की आवाज से उनका ध्यान उधर आकर्षित हुआ, तो उन्होंने देखा दुर्योधन गिर पड़ा है।

       इतने दिनों की घृणा अचानक द्रौपदी के हृदय से वाणी में उतर आई और निकल ही तो गया, उनके मुख से "अन्धों के अन्धे ही होते हैं"।

       यह शब्द दुर्योधन के कान तक पहुँचे। उसने इसे जातीय अपमान समझा। दुर्योधन का सारा शरीर प्रतिशोध की आग में जल उठा। दुर्योधन ने वहीं प्रतिज्ञा की- "द्रौपदी को नग्न करके अपनी जंघा पर न बैठाया, तो मेरा भी नाम दुर्योधन नहीं।"

      इतिहास की यह घटना प्रसिद्ध है कि इन छः शब्दों अर्थात् दस अक्षरों की प्रतिक्रिया ही थी, कि जब पाण्डव द्युत-क्रीड़ा में द्रौपदी को भी हार गए, तो दुर्योधन ने अपनी यह प्रतिज्ञा पूरी की और उसी के कारण इतना बड़ा महाभारत रचा गया।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1971 पृष्ठ 31

Friday, October 15, 2021

साधना से सिद्धि

 साधना से सिद्धि

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साधना की गई, पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेक शब्दों की विकलता यही है।*


महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसे ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विफलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिए। उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा, _"गुरुदेव मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान मुझसे इतना रूठे क्यों हैं?"_ महायोगी  हँसे और कहने लगे, _"कल मैं बगीचे में गया था। वहां कुछ दूसरे युवक भी थे उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएं में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम करना पड़ा, लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हंसने लगे।_*


मैंने देखा, बस वह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएं में गई, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो, पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष-दुर्गुणों को दूर करो। पहले संयम, तब साधना, फिर सिद्धि- यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, तृप्ति नहीं मिलती। भगवान कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इंकार नहीं है।"*_ 


आइए साधना से सिद्धि प्राप्त करने के लिए अपने मन रूपी बाल्टी को ठीक करें!


अखंड ज्योति, मई 2003, पृष्ठ- 03

Thursday, October 14, 2021

धर्म जीतेगा अधर्म हारेगा

 👉 धर्म जीतेगा अधर्म हारेगा

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🔶 दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया। संवत् दो हजार के आसपास अधर्म नष्ट हो हो कर फिर जीवित होता हुआ प्रतीत होगा उसकी मृत्यु में बहुत देर लगेगी, पर अन्त में वह मर ही जायेगा।


🔷 तीस वर्ष से कम आयु के मनुष्य अवतार की वाणी से अधिक प्रभावित होंगे वे नवयुग का निर्माण करने में अवतार का उद्देश्य पूरा करने में विशेष सहायता देंगे। अपने प्राणों की भी परवा न करके अनीति के विरुद्ध वे धर्म युद्ध करेंगे और नाना प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जावेंगे। तीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिकाँश की आत्मा भारी होगी और वे सत्य के पथ पर कदम बढ़ाते हुए झिझकेंगे। उन्हें पुरानी वस्तुओं से ऐसा मोह होगा कि सड़े गले कूड़े कचरे को हटाना भी उन्हें पसंद न पड़ेगा। यह लोग चिरकाल तक नारकीय बदबू में सड़ेंगे, दूसरों को भी उसी पाप पंक में खींचने का प्रयत्न करेंगे, अवतार के उद्देश्य में, नवयुग के निर्माण में, हर प्रकार से यह लोग विघ्न बाधाएं उपस्थित करेंगे। इस पर भी इनके सारे प्रयत्न विफल जायेंगे, इनकी आवाज को कोई न सुनेगा, चारों ओर से इन मार्ग कंटकों पर धिक्कार बरसेंगी, किन्तु अवतार के सहायक उत्साही पुरुष पुँगब त्याग और तपस्या से अपने जीवन को उज्ज्वल बनाते हुए सत्य के विजय पथ पर निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ते जावेंगे।


🔶 अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 16

Wednesday, October 13, 2021

गायत्री का शाप विमोचन और उत्कीलन का रहस्य व ज्ञान विज्ञान क्या है?

 गायत्री का शाप विमोचन और उत्कीलन का रहस्य व ज्ञान विज्ञान क्या है?                                                               यह विदित है कि वैदिककालीन के बडे बडे तपस्वियों ऋषियों ने प्रधान रुप से गायत्री महाविद्धा को ही तपश्चार्य करके अभिष्ट सिद्धियाँ प्राप्त की थी।शाप और वरदान के लिए वे विविध विधियों से गायत्री महामंत्र का ही प्रयोग करते थे।

पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि गायत्री महामंत्र को ब्रह्मा, वसिष्ठ और विश्वामित्र ऋषियों ने शापित कर दिया कि - "भविष्य में गायत्री की साधना निष्फल होगी"।

 इस पौराणिक उपाख्यान में एक गुप्त रहस्य छिपा हुआ है। जिसे नहीं जानने वाले केवल "शापमुक्ताभव" मंत्रों को तोते की तरह दुहरा कर यह मान लेते है कि हमारी साधना शापमुक्त हो गयी ।

   👌मैंने इस बिषय पर विशेष अध्ययन करने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुंच सका हुँ कि जो वैदिककालीन मे जिस दिव्य सूत्रों को हमारे वैदिककालीन ऋषियों तपस्वियों अपने दैनिक जीवनशैली में आत्मसात् कर तपश्चार्य करते थे । उसी दुर्लभ दिव्य सूत्र को यदि आज के साधक अपने जीवन में आत्मसात् करले तो वही सिद्धियाँ प्राप्त हो सकता है जो वैदिककालीन ऋषियों को प्राप्त होता था।

👌दरसल हमारे पुराणों के रचयिताओं ने एक ऐसी मनगढ़ंत कहानियां लिख दिया कि गायत्री शापित है जिसे ब्रह्मा, वसिष्ठ और विश्वामित्र ने शापित कर दिया है। शापमुक्ताभव मंत्रों का जप किये बिना फलदायी नहीं हो सकता है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। गायत्री महाविद्धा/महामंत्र इस कलियुग में भी शापित या कीलित नहीं है। बल्कि यह महाविद्धा/महामंत्र तीन खुफिया तालों के भीतर सुरक्षित किया गया है या कहें कि हमारे ऋषियों ने इस विद्धा का दुराचारीयों द्वारा दुरप्रयोग न हो ,इसे कोई कुपात्र इस गायत्री शक्ति का मनमाना प्रयोग न कर सके, इसलिए कलियुग से पूर्व ही गायत्री को ब्रह्मा, वसिष्ठ और विश्वामित्र द्वारा कीलित कर दिया गया है ऐसा पुराणवेत्ताओं ने लिख कर दिग्भ्रमित मात्र किया गया है।जिससे कि इस विद्धा का दुरप्रयोग से बचाव हो सके।

जैसा कि आप हम सभी अपने अपने अमूल्य धरोहर को तालों में बंद कर रखते है जिससे कि कोई दुराचारी चुरा न ले जाए। ठीक उसी प्रकार इस दुर्लभ विद्या को तीन तालों (शापित) के भीतर बंद किया हुआ है। उन तीनों खुफिया तालों का चाभियाँ निम्न है :- 

1) ब्रह्मा नाम का चाभी

2) वसिष्ठ नाम का चाभी और 

3) विश्वामित्र नाम का चाभी ।


       आप में से अनेकों ने कहीं देखा होगा कि आज भी कुछ विशेष ताले एक से अनेक चाभियाँ से खुलती है। ठीक उसी प्रकार गायत्री महाविद्धा/महामंत्र शापितनुमा जो ताला लगा दिया गया है उपरोक्त सभी तीनों चाभियाँ से ही खुल पायेगा। वैसे आप लाख कोशिश कर ले खुल नहीं सकता है। अर्थात आप कितना भी गायत्री का मंत्र जप - तप, साधना - तपश्चार्य कर ले खुलनेवाला नहीं है। यह सभी एक खुफिया चाभियाँ है। जिसे कोई योग्य साधक या कहें गुरु के पास हो सकता है। जिसे आप ढूढें या उस खुफिया चाभियाँ को स्वयं साधना के संकल्पबल के आधार पर प्राप्त कर सकते है।


👌ये तीन रहस्यमयी खुफिया चाभियाँ का रहस्य ज्ञान विज्ञान क्या है:


👍ब्रह्मा: यह गायत्री महाविद्धा का पहला चाभी है। इसका संबंध है हमारे जीवन में शुद्धता से ,सुचिता से, ब्रह्म आचरण से। अर्थात ब्रह्माचर्य का पालन करना। मन वचन और कर्म की शुद्धता - संयम का होना । यानि सुचिता का पालन करना।

👍वसिष्ठ: वसिष्ठ का अर्थ होता है "#विशेष_रुप_से_श्रेष्ठ' का होना। यह दुसरा दिव्य खुफिया चाभियाँ है। गायत्री साधना मे जिन्होंने विशेष रुप से श्रम किया हो।.जिसने कमसे कम सवा करोड़ गायत्री महामंत्र का जप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए किया हो उसे #वसिष्ठ कहते हैं।

          सवा करोड़ गायत्री जप की साधना उपासना करनेवाला कोई गायत्री साधक उपासक ही वसिष्ठ की संरक्षण प्राप्त कर लेता है । यही वास्तविक में वसिष्ठ #शापमुक्ताभव विमोचन है।

👍विश्वामित्र: यह गायत्री महाविद्धा लगा तीसरा ताला का विशेष व गुप्त चाभियाँ में से एक है। इसके बिना गायत्री महाविद्धा पर शापरुपेण लगा हुआ ताला खुल नहीं सकता है।ताकि कोई दुराचारी खोल न सके।#विश्वामित्र का अर्थ होता है संसार का भलाई करने वाला ,परमार्थी, उदार ह्रदय वाला व्यक्ति सत्यपुरुष, कर्तव्यनिष्ठ हो। ऐसा जीवन जीने वाले को विश्वामित्र कहते है।


✌गायत्री का पथप्रदर्शक जिसे हम गुरु कह सकते हैं - केवल वसिष्ठ गुणवाल होना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि इसे तो कोई भी दुराचारी लोभवश पुरा कर सकता है। 

     परंतु उसे ब्रह्माचरण करने वाला तथा विश्वामित्र के गुणों से पूर्ण होना चाहिए। ऐसे गुरु या पथप्रदर्शक ही अपने शिष्य को सही रास्ता दिखा सकता है। 

लेकिन विडम्वना यह है कि आजकल इस कलियुग में ऐसे पथप्रदर्शक या गुरु मिलते कहाँ है। इसलिए उपरोक्त शापमुक्ताभव की चाभियाँ स्वय ढूंढने की इस आध्यात्म जगत में आवश्यकता है अन्यथा उस साधक का श्रम वेकार जाएगा। जिस साधक को ब्रह्माचरण करने वाला, वसिष्ठ और विश्वामित्र इन तीनों गुणधारक पथप्रदर्शक या गुरु प्राप्त कर लिया उसनै तीनों शापों से गायत्री को मुक्त कर लिया ।


      लेकिन हमरा सौभाग्य है कि परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ठ गायत्री उपासक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी हमारे संरक्षक है। जिन्होंने अपने जीवन में 24-24 लक्ष का 24 पुरश्चरण कर गायत्रीमय जीवन जीये है। मैं धन्य हुँ। ये आज के वसिष्ठ और विश्वामित्र है । मैं शत शत नमन करता हूँ। यदि आप को यह जानकारी ज्ञानवर्धक लगे तो अवश्य अपने अन्य गायत्री परीजनों ग्रुपों के बीच शेयर फॉरवर्ड अवश्य करें।

संजय कुमार (शोधकर्त्ता वैज्ञानिक आध्यात्म)

9968513410//8800191940

Email sanjayk1288@gmail.com

Tuesday, October 12, 2021

दूसरों को कोसने में समय व्यर्थ न करें, बल्कि स्वयं पर भरोसा रखें।

 दूसरों को कोसने में समय व्यर्थ न करें, बल्कि स्वयं पर भरोसा रखें।

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      हर व्यक्ति की अपनी क्षमताएँ व अपने हालात यानी परिस्थितियाँ होती है। न ही हम अपनी परिस्थितियों से भाग सकते हैं और न ही हर तरह की दौड़ में शामिल हो सकते हैं।

       हम दूसरों से अपनी तुलना करते हैं और सदैव उनसे आगे निकलने की होड़ में लगे रहते हैं। पीछे रह जाने का दुःख भी व्यक्ति को परेशान कर देता है, लेकिन इस तरह आगे बढ़ने की हमारी कोशिश कई उम्मीदों का बोझ साथ लिए चलती है और जिस यात्रा में बोझ जितना ज्यादा होता है, वहाँ चाल उतनी ही धीमी हो जाती है। 

      जीवन में रुकावटें कभी भी आ सकती है। सब कुछ ठीक-ठाक होने पर भी कभी-कभी हमें अपने लक्ष्यों को टालना पड़ जाता है, पर दूसरों के साथ तुलना करते हुए जीना हमारी वापसी को मुश्किल बना देता है, क्योंकि दूसरों के जैसा होने की कोशिश हमें अपने जैसा नहीं रहने देती और इसके कारण हम अपने समय और संसाधन का ही नुकसान करते हैं। 

      स्वयं को, हालातों को या दूसरों को कोसने में समय व्यर्थ न करें, बल्कि स्वयं पर भरोसा रखें। दूसरे क्या सोचेंगे, यह सोचने की बजाय जो बेहतर किया जा सकता है उस पर ध्यान दें। जिन्दगी का भी आनन्द लें, धीमी गति से ही सही, हर दिन आगे बढ़ने की कोशिश करें और सदैव नया सीखने के लिए तैयार रहें। कभी हमारे साथ चलने वाले लोग बहुत पिछड़ जाते हैं, तो कभी हम उनके साथ चलने में बहुत पीछे हो जाते हैं। 

      जब ऐसी स्थिति आ जाती है कि हम अपने साथ चलने वालों की गति के साथ आगे नहीं बढ़ पाते, तो उन्हें आगे बढ़ते देख कर मन बहुत परेशान होता है। समय के साथ हमारी जिन्दगी की रफ्तार भी बदलती रहती है।

       कभी ऐसी स्थिति भी आती है, जब हम पहले की रफ्तार के साथ दौड़ नहीं पाते और कभी ऐसी स्थिति आती है,  कि हम उम्मीद से अधिक तेज रफ्तार से आगे बढ़ते जाते हैं। हर समय स्वयं को समय की डेड-लाइन पूरी करने में न उलझाएँ बल्कि अपनी प्रगति की रिपोर्ट अपने मानकों के आधार पर बनाएँ।

       हर समय दौड़ते रहना भी व्यक्ति को जल्दी थका देता है। इसलिए जिन्दगी के हर छोटे-बड़े मोड़ पर एक बार रुक कर अपने लक्ष्य की ओर जरूर देखें और समीक्षा करें, कि हमारी यात्रा सही चल रही है नहीं?

       जरूरत पड़े तो नए लक्ष्य बनाएँ और साथ ही नई योजनाएँ भी। हम सदैव नए ढंग से काम करने के लिए तैयार रहें, तो हमारा हर दिन बेहतर सिद्ध होगा।

( संकलित व सम्पादित)

- अखण्ड ज्योति मई 2018 पृष्ठ 54

Monday, October 11, 2021

सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो*:- *राम

 *सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो*:- *राम* 🙏🙏🙏

✍️✍️✍️📿📿✍️✍️✍️


एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे :-


"कहो राम ! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ ?"


राम मुस्कुराए :- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?"


"जानते हो राम ! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्में भी नहीं थे|

  यह भी नहीं जानती थी, कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा|


राम ने कहा :- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है”|


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति के दो भाव होते हैं | पहला ‘मर्कट भाव’, और दूसरा ‘मार्जार भाव’|


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न... उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है, और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है| दिन रात उसकी आराधना करता है...”(मर्कट भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया| ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी, और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है... मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना..." (मार्जार भाव)


राम मुस्कुरा कर रह गए |


भीलनी ने पुनः कहा :- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं”| तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?”


राम गम्भीर हुए | कहा :-


भ्रम में न पड़ो मां ! “राम क्या रावण का वध करने आया है” ?


रावण का वध तो, लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है|


राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था”|


जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है|


 *राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है”|* 

 *(अंतयोदय)* 


राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं| राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया हैं मां|


माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं |


राम ने फिर कहा :-


 *राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए”|* 


राम निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है”|


राम निकला है, कि ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है”|


 *राम आया है, ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है”|* 


 **राम आया है, ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय”|* 


और


राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं”|

सबरी की आँखों में जल भर आया था|

उसने बात बदलकर कहा :- "बेर खाओगे राम” ?


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां"


सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया|


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु” ?


"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां ! बस इतना समझ रहा हूँ, कि यही अमृत है”|


सबरी मुस्कुराईं, बोलीं :- *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम"* 


 *अखंड भारत-राष्ट्र के महानायक, मर्यादा-पुरुषोत्तम, भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन !* 

🙏🙏💐💐🙏🙏

Sunday, October 10, 2021

जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी

  जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी 

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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


देवियो! भाइयो!!


🔶 कल आपको उपासना की महत्ता के बारे में बताया जा रहा था। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते हैं। बिजली को छूता है, तो उसके अन्दर करेण्ट आ जाता है। भगवान् को जो छुएगा, भगवान से उसमें करेण्ट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं। सच तो ये है भक्त भगवान से भी बड़े हो जाते हैं; क्योंकि भगवान भक्त का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं और दूसरे कामों में उपयोग करना चाहते हैं।


🔷 शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान हैं! जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से।


🔶 भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की कल हम आपको पहचान बता चुके हैं और ये बता चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए की हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।


🔷 नारद एक बार मनोकामना माँगने के लिए भगवान के पास गए और ये कहने लगे—एक युवती का स्वयंवर होने वाला है और मुझे आप राजकुमार बना दीजिये, सुन्दर बना दीजिए, ताकि मेरी अच्छी लड़की से शादी भी हो जाए और मैं सम्पन्न भी हो जाऊँ; दहेज जो मिलेगा, उससे मालदार भी हो जाऊँगा। मालदार बनने की और सम्पन्न बनने की दो ही तो मनोकामनाएँ हैं और क्या मनोकामना है? एक लोभ की मनोकामना है, एक मोह की मनोकामना है। दोनों के अलावा और कोई तीसरी मनोकामना दुनिया में है ही नहीं। इन दोनों मनोकामनाओं को लेकर जब नारद भगवान के यहाँ गए, तो भगवान के अचम्भे का ठिकाना नहीं रहा। भक्त कैसा? जिसकी मनोकामना हो। मनोकामना होगी तो भक्त नहीं होगा—भक्त होगा तो मनोकामना नहीं होगी। दोनों का निर्वाह एक साथ नहीं हो सकता।


🔶 जहाँ अँधेरा होगा, वहाँ उजाला नहीं रहेगा; जहाँ उजाला रहेगा, वहाँ अँधेरा नहीं होगा। दोनों एक साथ जोड़ कैसे होगा? इसलिए भगवान सिर पर हाथ रख करके जा बैठे। अरे! तुम क्या कहते हो नारद? लेकिन नारद ने अपना आग्रह जारी रखा—नहीं, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए, मुझे मालदार बनाइये, मेरी विषय-वासना पूरी कीजिए। भगवान चुप हो गए। नारद ने सोचा—भगवान ने चुप्पी साध ली है, शायद मेरी बात को मान लिया होगा। भगवान को माननी चाहिए भक्त की बात ऐसा ख्याल था। बस वो चले गए स्वयंवर में। स्वयंवर में जाकर के बैठे। राजकुमारी ने देखा—कौन बैठा है? नारद जी का और भी बुरा रूप बना दिया—बन्दर जैसा। राजकुमारी देखकर मजाक करने लगी, हँसने लगी; ये बन्दर जैसा कौन आ करके बैठा है? बस, उसको माला तो नहीं पहनाई और दूसरे राजकुमार को माला पहना दी।


🔷 नारद जी दुःखी हुए, फिर विष्णु भगवान के पास गए; गालियाँ बकने लगे। विष्णु ने कहा—अरे नारद! एक बात तो सुन। हमने किसी भक्त की मनोकामना पूरी की है क्या आज तक। इतिहास तो ला भक्तों का उठा करके। जब से सृष्टि बनी है और जब से भक्ति का विधान बना है, तब से भगवान् ने एक भी भक्त की मनोकामना पूरी नहीं की है। हर भक्त को मनोकामना का त्याग करना पड़ा है और भगवान की मनोकामना को अपनी मनोकामना बनाना पड़ा है। बस, कल हम ये बता रहे थे कि आप अगर उपासना कर सकते हों, तो आप भी भगवान के बराबर हो सकते हैं और उनसे बड़े भी हो सकते हैं और भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं; आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलम्बन लें तो। कल का ये विषय था।


🔶 आज दूसरी बात बताते हैं आपको। अपनी पात्रता का विकास करना पड़ेगा, पात्र इसके लिए बनना पड़ेगा। पात्र अगर न होंगे तब? शादी कोई लड़की करना चाहे किसी अच्छे लड़के से और वह बुड्ढी हो तब? गूँगी, बहरी, अन्धी हो तब? तो कौन शादी करेगा? इसीलिए पात्रता बहुत जरूरी है। कल हमने कहा था न—उस दिन आपसे कहा था, पानी का गड्ढा होना जरूरी है, बादलों की कृपा प्राप्त करने के लिए। बादल तो बरसते ही रहते हैं। उनकी कृपा तो सबके ऊपर है। गड्ढा जहाँ होगा, वहीं तो पानी जमा होगा न। गड्ढा न होगा तब? सूरज की कृपा तो हरेक के ऊपर है; लेकिन जिसकी आँखें खराब हो गई हों, उसके लिए क्या कर सकता है सूरज! दुनिया में एक से एक सुहावने दृश्य दिखाई पड़ते हैं; पर एक-से सुहावने दृश्य को देख कौन सकेगा?


🔷 जिसकी आँखों का तिल साबुत होगा, वही तो देखेगा? जिसकी आँखों का तिल साबुत नहीं है, तो कैसे देखेगा! जरा आप ही बताइये। जिसके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, दुनिया में एक-से बढ़िया संगीत और आवाज निकलती है, पर कानों की झिल्ली खराब हो जाए, तब दुनिया के संगीत सुनने के लिए आदमी की कोई सहायता-सेवा नहीं कर सकता। आदमी का दिमाग खराब हो जाए तब? तब एक से एक बढ़िया परामर्श देने वाले, एक-से सहायता देने वाले क्या कर सकते हैं? कोई सहायता नहीं कर सकता। किसकी? जिसका दिमाग खराब हो गया है। क्या करेंगे? अपना दिमाग तो सही हो, अपनी झिल्ली तो सही हो, अपनी आँखों का तिल तो सही हो। ये सही होंगे, तो फिर सूरज भी सहायता करेगा, वायु भी सहायता करेगी।


🔶 पाँच तत्त्व दुनिया में हैं, जिसमें से हवा भी है, रोशनी भी है, सूरज भी है—ये सब आदमी की सहायता करते हैं। इन्हीं की सहायता से तो आदमी जिन्दा है; लेकिन आदमी जिन्दा तो होना चाहिए। मर गया होगा तब, साँस क्या करेगी? बहुत अच्छी प्रातःकाल की हवा है; हवा फेफड़ों को मिलनी चाहिए; पर लेगा तो तभी, जब वह जिन्दा हो। जिन्दा नहीं हो, तो क्या करेगी हवा। एक से एक बढ़िया आहार है और भोजन है; लेकिन आहार और भोजन के होते हुए अगर किसी आदमी का पेट खराब हो जाए तब? आप क्या खिला करके करेंगे? और उल्टा पेट में दर्द हो जाएगा। आप पौष्टिक पदार्थ दीजिए, मलाई-मिठाई दीजिए। अगर पेट खराब है, पचता नहीं है, तो मलाई-मिठाई क्या करेगी? और जहर पैदा कर देगी। मेरा मतलब पात्रता से है।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Saturday, October 9, 2021

कठिनाइयों का स्वागत कीजिए

 ऋषि चिंतन

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कठिनाइयों का स्वागत कीजिए

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👉   जब तक यह शरीर बना हुआ है तब तक सुख और दु:ख का निवारण नहीं हो सकता । *"कठिनाइयाँ" जीवन का उसी तरह अंग हैं,  जिस तरह दिन के बाद रात्रि का होना,  ऋतुएँ  बदलते रहना ।* अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं को अपने ऊपर हावी न होने दिया जाए और उनके बीच से रास्ता निकालकर आगे बढ़ते रहा जाए ।


👉 *कठिनाइयों को अपने ऊपर हावी न होने देने का एक मार्ग व्यस्त रहना है ।* मनुष्य के  व्यस्त रहने से कठिनाइयों के प्रति शोक,  चिंता एवं उद्विग्नता में डूबने के लिए समय ही नहीं मिलेगा ।  *स्वामी विवेकानंद ने एक स्थान पर लिखा है -  "व्यस्त मनुष्य को आँसू बहाने के लिए भी समय नहीं मिलता ।"*  यह ठीक भी है । जो व्यस्त रहेंगे, उन्हें कठिनाइयों के संबंध में सोच-सोच कर दु:खी होते रहने का अवकाश ही कहाँ रहेगा ? इसके अतिरिक्त इन्हें जीवन का एक सहज क्रम मानकर भी निश्चिंत रहा जा सकता है । *यह सोचकर भी प्रसन्न हुआ जा सकता है कि आपत्तियों का झंझावात नरसिंहों को झकझोरकर उनका प्रमाद तोड़कर उन्हें पुरुषार्थ के लिए खड़ा कर देता है ।*


👉 *"विपत्तियाँ," "प्रतिकूलताएँ" अथवा "कठिनाइयाँ" जीवन का सहज स्वाभाविक कर्म है ।*  उनसे प्रभावित होना ही हो तो इस रुप में होना चाहिए कि वे मनुष्य को शिक्षा देने के लिए आती हैं । इसलिए उनसे न तो  भयभीत होने की आवश्यकता है और न भागने की ।

Friday, October 8, 2021

एक अच्छा इंसान बनिए

 एक अच्छा इंसान बनिए

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मैं बिस्तर पर से उठा,अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था...


मैंने ... पत्नी को देखकर कहा... *"काव्या थोड़ा छाती में रोज से आज ज़्यादा दु:ख रहा है...डाक्टर को बताकर आता हूँ . .."*


*"हां, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना"* मोबाइल में देखते देखते ही काव्या बोली...


मैं... एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा ... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...एक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...


ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव साईकल लेकर आया... साईकल को ताला मारते ही उसे मैंने मेरे सामने खड़ा देखा...


*"क्यों साब? एक्टिवा चालू नहीं हो रहा है..."*

 

मैंने कहा *"नहीं..."*


*"आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ?"*


*"साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके चालू कर देता हूँ ..."*

ध्रुव ने एक ही किक मारकर एक्टिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा.. *"साब अकेले जा रहे हो"*


मैंने कहा... *हां*


*"ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते...चलिए मेरे पीछे बैठ जाइए..."*


मैंने कहा *"तुम्हें एक्टिवा चलाना आता है?"* 


*"साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता छोड़कर बैठ जाओ..."*


पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे, ध्रुव दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया...


*"साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ.."*


ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही...मैं समझ गया था... फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे..कि अब तक क्यों नहीं आया? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता....


ध्रुव डाक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछे मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया....


डाक्टरों की टीम तो तैयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर... सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाक्टर ने कहा, आप समय पर पहुँच गए हो....इस में भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा...


अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है...डाक्टर ने ध्रुव को सामने देखा...


मैंने कहा, *"बेटे, दस्तखत करने आते है?"* 


*"साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो..."*


*"बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुमने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी...एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके लिख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है, ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर किये हैं, बस अब. .."*


*"और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो..."*


बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल ध्रुव के मोबाइल पर आया.वह शांति से काव्या को सुनने लगा...


थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला, *"मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो, मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पहुँच जाओ। हां मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूँ। डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है..."*


मैंने कहा, *"बेटा घर से फोन था...?"*


*हाँ साब.*


मैंने मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो? आँखों में आंसू के साथ ध्रुव के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला, *बेटा चिंता नहीं करते।।*


*मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है। तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है...बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना।*


ऑपरेशन बाद, मैं होश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आँखों में आंसू के साथ बोला, *ध्रुव कहाँ है?*


काव्या बोली-: *"वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा।"*


अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा...


हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया!


पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था...


*एक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था....यही नहीं मोबाइल आज घर घर कलह का कारण भी बन गया है बहू छोटी-छोटी बाते तत्काल अपने मां-बाप को बताती है और मां की सलाह पर ससुराल पक्ष के लोगो से व्यवहार करती है परिणामस्वरूप वह बीस बीस साल भी ससुराल पक्ष के लोगो से अपनापा जोड़ नहीं पाती।*


डाक्टर ने आकर कहा, *"सब से पहले यह बताइए ध्रुव भाई आप के क्या लगते?"*


मैंने कहा *"डाक्टर साहब, कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बेहतर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी।"*


*"बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था!"*


पिन्टू बोला :- *"हमको माफ करो पप्पा... जो फर्ज़ हमारा था, वह ध्रुव ने पूरा किया, वह हमारे लिए शर्मजनक है, अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी. .."*


*बेटा, जवाबदारी और नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है...जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे (या बग़ल झाकते है) हो जातें है।*


*अब रही मोबाइल की बात...बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने, जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है।*


*नहीं तो.... परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा।*

Thursday, October 7, 2021

ऐसा यज्ञ करो

 👉 ऐसा यज्ञ करो

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महाभारत की समाप्ति के उपरान्त पांडवों ने एक महान यज्ञ किया। कहते हैं कि वैसा यज्ञ उस जमाने में और किसी ने नहीं किया था। गरीब लोगों को उदारतापूर्वक इतना दान उस यज्ञ में दिया गया था कि उनके घर सोने से भर गये। वैसी दानवीरता को देख कर सबने दांतों तले उंगली दबाई।


इस यज्ञ की चर्चा देश-देशान्तरों में फैली हुई थी। यहां तक कि पशु-पक्षी भी उसे सुने बिना न रहे। एक नेवले ने जब इस प्रकार के यज्ञ का समाचार सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। क्योंकि एक छोटे से यज्ञ के उच्छिष्ट अन्न से छू जाने के कारण उसका आधा शरीर सोने का हो गया था। इस छोटे यज्ञ में जूठन के जरा से कण ही मिले थे जिनसे वह आधा ही शरीर स्पर्श कर सका था। तब से उसकी बड़ी अभिलाषा थी कि किसी प्रकार उसका शेष आधा शरीर भी सोने का हो जावे। वह जहां यज्ञ की खबर सुनता वहीं दौड़ा जाता और यज्ञ की जो वस्तुएं इधर-उधर पड़ी मिलतीं उनमें लोटता, किन्तु उसका कुछ भी प्रभाव न होता। इस बार इतने बड़े यज्ञ की चर्चा सुनकर नेवले को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह अविलम्ब उसकी जूठन में लोटने के लिये उत्साहपूर्वक चल दिया।


कई दिन की कठिन यात्रा तय करके नेवला यज्ञस्थल पर पहुंचा और वहां की कीच, जूठन, यज्ञस्थली आदि में बड़ी व्याकुलता के साथ लोटता फिरा। एक बार नहीं कई-कई बार वह उन स्थानों पर लोटा और बार-बार आंखें फाड़ कर शरीर की परीक्षा की कि देखें मैं सोने का हुआ या नहीं। परन्तु बहुत करने पर भी कुछ फल न हुआ। तब वह एक स्थान पर बैठ कर सिर धुनधुन कर पछताने लगा।


नेवले के इस आचरण को देखकर लोग उसके पास इकट्ठे हो गये और इसका कारण पूछने लगे। उसने बड़े दुःख के साथ उत्तर दिया कि इस यज्ञ की प्रशंसा सुनकर मैं दूर देश से बड़ा कष्ट उठा कर यहां तक आया था, पर मालूम होता है कि यहां यज्ञ हुआ ही नहीं। यदि यज्ञ हुआ होता तो मेरा आधा अंग भी सोने का क्यों न हो जाता? लोगों की उत्सुकता बढ़ी, उन्होंने नेवले से कहा आपका शरीर सोने का होने और यज्ञ से उसका संबंध होने का क्या रहस्य है कृपया विस्तारपूर्वक बताइये।


नेवले ने कहा—सुनिए! एक छोटे से ग्राम में एक गरीब ब्राह्मण अपने परिवार सहित रहता था। परिवार में कुल चार व्यक्ति थे। (1) ब्राह्मण (2) उसकी स्त्री (3) बेटा (4) बेटे की स्त्री। ब्राह्मण अध्यापन कार्य करता था। बालकों को पढ़ाने से उसे जो कुछ थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती थी, उसी से परिवार का पेट पालन करता था। एक बार लगातार तीन वर्ष तक मेह न बरसा जिससे बड़ा भारी अकाल पड़ गया। लोग भूख के मारे प्राण त्यागने लगे। ऐसी दशा में वह ब्राह्मण परिवार भी बड़ा कष्ट सहन करने लगा। कई दिन बाद आधे पेट भोजन की व्यवस्था बड़ी कठिनाई से हो पाती। वे बेचारे सब के सब सूखकर कांटा होने लगे। एक बार कई दिन उपवास करने के बाद कहीं से थोड़ा-सा जौ का आटा मिला। उसकी चार रोटी बनीं। चारों प्राणी एक-एक रोटी बांट कर अपनी थालियों में रख कर खाने को बैठने ही जाते थे कि इतने में दरवाजे पर एक अतिथि आकर खड़ा हो गया।


गृहस्थ का धर्म हैं कि अतिथि का उचित सत्कार करे। ब्राह्मण ने अतिथि से कहा—पधारिए भगवन्! भोजन कीजिये। ऐसा कहते हुए उसने अपनी थाली अतिथि के आगे रख दी। अतिथि ने उसे दो-चार ग्रास में खा लिया और कहा—भले आदमी, मैं दस दिन का भूखा हूं, इस एक रोटी से तो कुछ नहीं हुआ उलटी भूख और अधिक बढ़ गई। अतिथि के वचन सुनकर ब्राह्मण पत्नी ने अपनी थाली उसके आगे रखदी और भोजन करने का निवेदन किया। अतिथि ने वह भोजन भी खा लिया, पर उसकी भूख न बुझी। तब ब्राह्मण पुत्र ने अपना भाग उसे दिया। इस पर भी उसे संतोष न हुआ तो पुत्र वधू ने अपनी रोटी उसे दे दी। चारों की रोटी खाकर अतिथि की भूख बुझी और वह प्रसन्न होता हुआ चलता बना।

उसी रात को भूख की पीड़ा से व्यथित होकर वह परिवार मर गया। मैं उसी परिवार की झोंपड़ी के निकट रहता था। नित्य की भांति बिल से बाहर निकला तो उस अतिथि सत्कार से बची हुई कुछ जूठन के कण उधर पड़े हुए थे। वे मेरे जितने शरीर से छुए उतना ही सोने का हो गया। मेरी माता ने बताया कि किसी महान् यज्ञ के कण लग जाने से शरीर सोने का हो जाता है। इसी आशा से मैं यहां आया था कि पाण्डवों का यह यज्ञ उस ब्राह्मण के यज्ञ के समान तो हुआ होगा, पर यहां के यज्ञ का वैसा प्रभाव देखा तो अपने परिश्रम के व्यर्थ जाने का मुझे दुख हो रहा है।


कथा बतलाती है कि दान, धर्म या यज्ञ का महत्व उसके बड़े परिमाण पर नहीं, वरन् करने वाले की भावना पर निर्भर है। एक धनी का अहंकारपूर्वक लाखों रुपया दान करना एक गरीब के त्यागपूर्वक एक मुट्ठी भर अन्न देने की समता नहीं कर सकता। प्रभु के दरबार में चांदी सोने के टुकड़ों का नहीं, वरन् पवित्र भावनाओं का मूल्य है।


✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य

📖 धर्मपुराणों की सत्कथाएं

Wednesday, October 6, 2021

नवरात्रि अनुष्ठान

  नवरात्रि अनुष्ठान

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🔵 नवरात्रि अनुष्ठान में मन को एकाग्र तन्मय बनाने के साथ जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया को सशक्त बनाया जाता है। मातृभाव में ध्यान तुरंत लग जाता है व जप स्वतः होठों से चलता रहता है। ध्यान तब माला की गिनती की ओर नहीं जाता। उँगलियों से माला के मन के बढ़ते जाते हैं, ध्यान मातृसत्ता का अनन्त स्नेह व ऊर्जा देने वाले पयपान की ओर लगा रहता है। इस अवधि में आत्मचिन्तन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिन्ताओं से जितना खाली रखा जा सके-अस्तव्यस्तता से जितना मुक्त हुआ जा सकें, उसके लिए प्रयासरत रहना चाहिएं आत्मचिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए।


🔴 उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके।


🔵 अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।


🔴 गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। वर्ष की दो नवरात्रियों को गायत्री माता के दो आयातित वरदान मानकर हर व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस अवधि में उनका कोमल प्राण धरती पर प्रवाहित होता है, वृक्ष वनस्पति नवलल्लव धारण करते हैं, जीवन-जन्तुओं में नई चेतना इन्हीं दिनों आती है। विधिपूर्वक सम्पन्न नवरात्रि साधना से स्वास्थ्य की नींव तक हिल जाती हैं एवं असाध्य बीमारियाँ तक इस नवरात्रि अनुष्ठान से दूर होती देखी गयी हैं।


अखण्ड ज्योति मार्च 1996

नवरात्रि अनुशासन

  नवरात्रि अनुशासन

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🔵 उपवास का तत्वज्ञान आहार शुद्धि से सम्बन्धित है, “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रुप से आवश्यक समझी गई हैं। इसके लिए न केवल फल, शाक, दूध जैसे सुपाच्य पदार्थो को प्रमुखता देनी होगी, वरन् मात्र चटोरेपन की पूर्ति करने वाली मसाले तथा खटाई, मिठाई, चिकनाइ्र की भरमार से भी परहेज करना होगा। यही कारण है कि उपवासों से भी परहेज करना होगा। यही कारण हैं कि उपवासों की एक धारा, ‘अस्वाद व्रत’ भी हैं।


🔴 साधक सात्विक आहार करें और चटोरेपन के कारण अधिक खा जाने वाली आदत से बचें, यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किय जाए और उसकी अधिक मात्रा से अधिक बल मिलने वालों की प्रचलित मान्यता से पीछो छुड़ाया जाए। वस्तुतः आम आदमी जितना खाता है उससे आधे में उसका शारीरिक एवं मानसिक परिपोषण भली प्रकार हो सकता हैं। एक तत्व ज्ञानी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “आधा भोजन हम खाते हैं और शेष आधा हमें खाता रहता हैं।” लुकमान कहते थे कि-”हम रोटी नहीं खाते-रोटी हमें खाती है।” इन उक्तियों में संकेत इतना ही है कि शारीरिक और मानसिक स्वस्थ्य का महत्व समझने वालों को सर्वभक्षी नहीं स्वल्पाहारी होना चाहिए। नवरात्रि उपवास में इस आदर्श को जीवन भर अपनाने का संकेत हैं।


🔵 आध्यात्मिक दृष्टि से पौष्टिक एवं सात्विक आहार वह है जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है। उसमें सात्विक खाँद्यों का कम मात्रा में लेना ही नहीं, न्यायोपार्जित होने की बात भी सम्मिलित है। इतना ही नहीं उसी सिलसिले में एक और बात भी आती है कि इस प्रकार आत्म संयम बरतने से जा बचत होती है उसका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में होना चाहिए न कि संचय करके अमीर बनने में। यहीं कारण हैं कि जहाँ नवरात्रि अनुष्ठानों मं उपवास करकें जो कुछ बचाया जाता हैं उसे पूर्णाहुति के अन्तिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च कर दिया जाता है।


🔴 ब्रह्मभोज अर्थात् सत्कर्मो का परिपोषण। प्राचीन काल में एक वर्ग ही इस प्रयोजन में रहता था, अस्तु उसका निर्वाह एवं अपनाई हुई प्रवृत्तियों का व्यवस्थाक्रम मिलाकर जो आवश्यकता बनती हैं उसकी पूर्ति को ब्रह्मभोज कहा जाता था। इस प्रयोजन के लिए दी गई राशि को दान या दक्षिणा भी कहा जाता था। नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्णता यज्ञायोजन तथा ब्रह्मभोज के साथ सम्पन्न होती है। इसका कारण तलाश करने पर उपवास का रहस्य विज्ञान और विस्तार समझ में आता हैं।


🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Tuesday, October 5, 2021

नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

 👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

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🔴 नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है। 


🔵 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। माला में यों १०८ दाने होते हैं पर ८ अशुद्ध उच्चारण अथवा भूल- चूक का हिसाब छोड़ कर गणना १०० की ही की जाती है। इसलिये प्रतिदिन २७ माला का क्रम रखा जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है। 


🔴 आजकल हर बात में नकलीपन की भरमार है। मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं। अच्छा यह है कि उसमें छल- कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रूद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से मिल सकती हैं। गायत्री तप मे तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उसमें भी लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ का धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर सह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है। 


🔵 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय किएक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। 


🔴 अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः ६ बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थातृ ४ बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् ९ बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिए। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो २ (१/२) -३ घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से १ घण्टा पहले से लेकर २ घण्टे बाद तक अर्थात् ५ से ८ तक के तीन घण्टों में सवेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः ९ बजे बाद और रात्रि को ८ के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। यह अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना पड़ता है।

नवरात्र साधना की सरल विधि गायत्री चालीसा का अनुष्ठान

 नवरात्र साधना की सरल विधि गायत्री चालीसा का अनुष्ठान

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🔵 जो लोग अधिक कार्य व्यस्त हैं, जो अस्वस्थता या अन्य कारणों से नियमित साधन नहीं कर सकते वे गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान कर सकते हैं। 9 दिन नित्य 12 पाठ करने से करने से नवरात्रि में 108 पाठ पूरे हो सकते हैं प्रायः डेढ़ घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के नियम, प्रतिबन्ध, संयम, तप आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके बैठना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए। अन्तिम दिन 108 या 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देना चाहिए।


🔴 स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा के अनुष्ठान को बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यों तो गायत्री उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं। अभाव, कष्ट, विपत्ति, चिंता, शोक एवं निराशा की घड़ियों गायत्री का आश्रय लेने से तुरन्त शाँति मिलती है, माता की कृपा प्राप्त होने से पर्वत के समान दीखने वाले संकट राई के समान हलके हो जाते हैं और अन्धकार में भी आशा की किरणें प्रकाशमान होती हैं।


🔵 गायत्री को शक्तिमान, सर्वसिद्धि दायिनी सर्व कष्ट निवारिणी कहा गया है। इससे सरल, सुगम, हानि रहित, स्वल्परमसाध्य एवं शीघ्र फलदायिनी साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।


🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1996

Monday, October 4, 2021

दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक विपत्ति के समान हैं।

 दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक विपत्ति के समान हैं।

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       भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। लेकिन जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं। यदि कोई बड़ी भूल भी होती है, तो उसे हँसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं। यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।

       लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती, जितनी हमारी दृष्टि। दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाय, तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रङ्गीन काँच का चश्मा पहन लिया जाय, तो हर चीज उसी रङ्ग की दिखाई देगी।

       कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते, सुने जाते हैं। दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है। ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं। पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप में बाहर निकलते रहते हैं।

       दुर्भावनायुक्त ओछे आदमियों के मुख से निन्दा, बुराई, दोष-दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रभावित होती रहती है। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं करते। उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष-दृष्टा ही कहा जाएगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता और दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।

       इस प्रकार दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाए नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है, कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जाएँ तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है, कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उनके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही है, वह भी शत्रुता करेगा।

        इस प्रकार उस दोषदर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जाएँगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे, वह उतना ही चिन्तित, परेशान एवं आपत्ति-ग्रस्त रहेगा।

       उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएँ आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले की अधिक होंगे। ऐसी स्थिति में अपने लिए संकट उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमत्ता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाए रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।

- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1960 पृष्ठ 4

व्यवहार से ही बुद्धिमता और महानता का प्रमाण मिलता है

 व्यवहार से ही बुद्धिमता और महानता का प्रमाण मिलता है।

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      (1) प्रायः अनेकों प्रसङ्गों में बिना सोचे समझे ही अपने सम्बन्धियों और मित्रों को भ्रमवश, अभिमानवश, आवेश में आकर न कहने योग्य बर्ताव कर बैठते हैं। इस प्रकार के आवेश पर नियन्त्रण प्राप्त करना चाहिए।

       (2) ध्यान रहे! जो मनुष्य चरित्रहीन, स्वार्थी, अभिमानी एवं विवेकरहित होता है, वही हर एक अवसर पर प्रायः कर्तव्य और धर्म से विचलित होता है और इसी प्रकार के व्यक्ति मानव-समाज में ईर्ष्या, द्वेष, कलह आदि दुर्गुणों को फैलाते रहते हैं।

      (3) आप अपने भीतर देखते रहिये! जहाँ कहीं उद्दण्डता, अभिमान-वश आसुरी प्रकृति के लक्षण व्यवहार में आ जाएँ, वहीं अपनी विद्या एवं बुद्धिमत्ता को धिक्कारिये!

       (4)आप विचार करके देखिये, कितनी ही बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ आपको मिल जावें और कितने ही वैभव, ऐश्वर्य के बीच आप क्यों न रहें, सैकड़ों मनुष्य आप के इशारे पर क्यों न नाचते रहें, फिर भी आपकी बुद्धिमत्ता और महानता का सच्चा पता आपके दैनिक व्यवहारों से ही मिलेगा।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मई 1947 पृष्ठ 27

Sunday, October 3, 2021

बड़ा भाई

 बड़ा भाई


एक वकील साहब का सुनाया हुआ एक किस्सा* - सत्य घटना


*"मै अपने चेंबर में बैठा हुआ था, एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा। उसके हाथ में कागज़ो का बंडल, धूप से काला हुआ चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, सफेद कपड़े, उसके पंजों में मिट्टी लगी थी।"*


उसने कहा - *"उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगाना है, बताइए, क्या क्या कागजऔर चाहिए... खर्च क्या लगेगा ..."*


मैंने उन्हें बैठने का कहा - 


*"रघु, पानी दे इधर"* मैंने आवाज़ लगाई!


वो कुर्सी पर बैठे!


उनके सारे कागजात मैंने देखे, उनसे सारी जानकारी ली, आधा पौना घंटा गुजर गया।


*"मै इन कागज़ो को देख लेता हूँ , फिर आपके केस पर विचार करेंगे। आप ऐसा कीजिए, अगले शनिवार को मिलिए मुझसे।"*


चार दिन बाद वो फिर से आए- !


वैसे ही कपड़े

बहुत अशांत लग रहे थे


अपने छोटे भाई पर गुस्सा बहुत थे!

 

मैंने उन्हें बैठने का कहा,


वो बैठे!


ऑफिस में अजीब सी खामोशी गूंज रही थी।


मैंने बात की शुरुआत की ! -

*"बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए। और आपके परिवार के बारे में और आपकी निजी जिंदगी के बारे में भी मैंने बहुत जानकारी हासिल की।मेरी जानकारी के अनुसार: आप दो भाई है, एक बहन है, आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए। बाबा आप नौवीं पास है और आपका छोटा भाई इंजिनियर है।*


*अपने छोटे भाई की पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, लोगो के खेतों में दिहाड़ी पर काम किया, कभी अंग भर कपड़ा और पेट भर खाना आपको नहीं मिला फिर भी भाई के पढ़ाई के लिए पैसों की कमी आपने नहीं होने दी।*


*एक बार खेलते खेलते भाई पर किसी बैल ने सींग घुसा दिया तब भाई लहूलुहान हो गया। फिर आपने उसे कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल लेे गए। सही देखा जाए तो आपकी उम्र भी नहीं थी ये करने की, पर भाई में जान बसी थी आपकी। माँ बाप के बाद मै ही इन का माँ-बाप… ये भावना थी आपके मन में।*


,*फिर आपका भाई इंजीनियरिंग में अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया और आपका दिल खुशी से भरा हुआ था।*


*फिर आपने जी तोड़ मेहनत की। 80,000 की सालाना फीस भरने के लिए आपने रात दिन एक कर दिया यानि बीवी के गहने गिरवी रख के, कभी साहूकार से पैसा ले कर आपने उसकी हर जरूरत पूरी की। फिर अचानक उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई, डॉक्टर ने किडनी बदलने का कहा और तुम ने अगले मिनट में अपनी किडनी उसे दे दी यह कह कर कि कल तुझे अफसर बनना है,नौकरी करनी है, कहाँ कहाँ घूमेगा बीमार शरीर लेे के। मुझे गाँव में ही रहना है, ये कह कर किडनी दे दी उसे।*


*फिर भाई कालेज हॉस्टल पर रहने लगा।त्यौहार पर्व पर घर में जो पकवान मिठाई इत्यादि बनें भाई को देने जाओ, कोई तीज त्योहार हो, भाई के कपड़े बनाओ। घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर तुम उसे भोजन का डिब्बा देने साइकिल पर गए। हाथ का निवाला पहले भाई को खिलाया तुमने।*


*फिर आपकी मेहनत रंग लाई ओर भाई इंजीनियर बन गया, तुमने प्रशांता वश गाँव के लोगों को खाना खिलाया। फिर उसने उसी के कॉलेज की लड़की जो दिखने में एकदम सुंदर थी से शादी कर ली , तुम सिर्फ समय पर ही वहाँ गए।*


*भाई को नौकरी लगी, तीन साल पहले उसकी शादी हुई, अब तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला था। पर किसी की नज़र लग गई आपके इस प्यार को। शादी के बाद भाई ने आना बंद कर दिया। पूछा तो कहता है मैंने बीवी को वचन दिया है।घर पैसा देता नहीं, पूछा तो कहता है कर्ज़ा सिर पे है। पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा। पैसे कहाँ से आए पूछा तो कहता है कर्ज लिया है। तुमने विरोध किया तो कहता है भाई, तुझे कुछ नहीं मालूम, तू निरा गवार ही रह गया। अब तुम्हारा वही भाई चाहता है गाँंव की आधी खेती बेच कर उसे अपना हिस्सा दे दे।*


इतना कह के मैं रुका - रघु की लाई चाय की प्याली मैंने मुँह से लगाई -!


*"तुम चाहते हो भाई ने जो मांगा वो उसे ना दे कर उसके ही फ्लैट पर स्टे लगाया जाए - क्यों यही चाहते हो तुम..."*


वो तुरंत बोला, *"हां"*


मैंने कहा - *हम स्टे लेे सकते है, भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं।*


*पर….*


*1) तुमने उसके लिए जो खून पसीना एक किया है वो नहीं मिलेगा!*


*2) तुम्हारीे दी हुई किडनी वापस नहीं मिलेगी!*


*3) तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है वो भी वापस नहीं मिलेगी।*


*मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने उस फ्लैट की कीमत शून्य है।*

 

*तुम्हारे भाई की नीयत फिर गई, वो अपने रास्ते चला गया ;अब तुम भी उसी कृतघ्न सड़क पर मत जाओ।*


*वो भिखारी निकला,*


*तुम दिलदार थे।*


*दिलदार ही रहो …..*


*तुम्हारा हाथ ऊपर था,*


*ऊपर ही रखो।*


*कोर्ट कचहरी करने की बजाय बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ। पढ़ाई कर के तुम्हारा भाई बिगड़ गया , लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे..."*


वो मेरे मुँह को ताकने लगा।


उठ के खड़ा हुआ, सब काग़ज़ात उठाए 

और आँखे पोछते हुए बोला - 

*"चलता हूँ, वकील साहब।"*


उसकी रूलाई फुट रही थी और वो मुझे दिख ना जाए ऐसी कोशिश कर रहा था।


इस बात को अरसा गुजर गया!

                    

कल वो अचानक मेरे ऑफिस में आया।


कलमों में सफेदी झाँक रही थी उसके। साथ में एक नौजवान था और हाथ में थैली।


मैंने कहा- *"बाबा, बैठो"*


उसने कहा, *"बैठने नहीं आया वकील साहब, मिठाई खिलाने आया हूँ । ये मेरा बेटा, बैंक मैनेजर है !बैंगलोर में रहता है, कल आया है गाँव।अब तीन मंजिला मकान बना लिया है वहाँ।थोड़ी थोड़ी कर के 10–12 एकड़ खेती की जमीन खरीद ली अब।"*


मै उसके चेहरे से टपकते हुए खुशी को महसूस कर रहा था

*"वकील साहब, आपने मुझे कहा था- "कोर्ट कचहरी के चक्कर में मत पड़ो !" आपने बहुत नेक सलाह दी और मुझे उलझन से बचा लिया। जबकि गाँव में सब लोग मुझे भाई के खिलाफ उकसा रहे थे। मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली और मैंने अपने बच्चो को लाइन से लगाया और भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद नहीं होने दी।*


*कल भाई और उनकी पत्नी भी घर आए थे।पाँव छू छूकर माफी मांगने लगे। मैंने अपने भाई को गले से लगा लिया। और मेरी धर्मपत्नी ने उसकी धर्मपत्नी को गले से लगा लिया। हमारे पूरे परिवार ने बहुत दिनों बाद एक साथ भोजन किया। बस फिर क्या था आनंद की लहर घर में दौड़ने लगी।*


मेरे हाथ का पेडा हाथ में ही रह गया

 

मेरे आंसू टपक ही गए आखिर. .. .


*गुस्से को योग्य दिशा में मोड़ा जाए तो पछताने की जरूरत नहीं पड़े कभी*


*बहुत ही अच्छा है इस को समझना और अमल में लाना चाहिए।यह एक सच्ची घटना है शिक्षाप्रद है और बेमिसाल भी है।*


*जय गुरुदेव*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

भारतीय बालकों की शानदार परम्परा

 भारतीय बालकों की शानदार परम्परा 

(भाग 2)

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        (1) कम्पाउण्डर क्लोरोफॉर्म सूँघाने लाया कि रोगी के अँगूठे की खाल कड़ी है और वहाँ जो ऑपरेशन करना है, वह भी बड़ा है। तनिक से हिल जाने से नस कट सकती है और खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए बेहोश करके ऑपरेशन करने की ही डॉक्टर की राय है।

       रोगी ने कहा - "इसकी कुछ भी जरूरत नहीं है। डॉक्टर बिना डरे अपना काम करें, हिलने के कारण कोई खतरा होने की नौबत न आयेगी।"

       अन्त में ऑपरेशन बिना सुंघाये ही हुआ। रोगी शान्त भाव से बैठा रहा। उसने उफ तक नहीं किया। डॉक्टर चकित थे, कि इतने बड़े ऑपरेशन में भी रोगी कैसे अपना धैर्य रख सका? इस धैर्यवान रोगी का नाम था- चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, जो आगे चलकर भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।

      (2) गोपाल कृष्ण गोखले जब स्कूल में पढ़ते थे, तब एक दिन एक लड़के की मदद से गणित का प्रश्न पत्र हल किया। उत्तर ठीक बन पड़े तो उन्हें अध्यापक ने पुरस्कार दिया।

       बालक पुरस्कार लेने से प्रसन्न होने के अपेक्षा रोने लगा। अध्यापक ने इसका कारण पूछा तो उसने सच बात कह दी, कि प्रश्नपत्र मैंने दूसरों से पूछ कर हल किया है, ऐसी दशा में मुझे सजा मिलनी चाहिए न कि पुरस्कार।

       अध्यापक उसकी सच्चाई से बहुत प्रभावित हुए। उसने बच्चे को बहुत प्यार किया और यह पुरस्कार देते हुए कहा - "यह प्रश्न पत्र हल करने का नहीं, तुम्हारी सच्चाई का पुरस्कार है।

      (3) एक लड़का बहुत ही मन्दबुद्धि था। उसे पढ़ना-लिखना कुछ न आता था। बहुत दिन पाठशाला में रहते हुए भी उसे कुछ न आया तो लड़कों ने उसकी मूर्खता के कारण उसे वरधराज अर्थात् 'बैलों का राजा' कहना शुरू कर दिया। घर बाहर सब जगह उसका अपमान ही होता।

       एक दिन बाद बालक बहुत दुःखी होकर पाठशाला से चल दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। वह एक कुएँ के पास पहुँचा और देखा कि किनारे पर रखे हुए जगत के पत्थर पर रस्सी खींचने की रगड़ से निशान बन गए हैं।

       लड़के को सूझा कि जब इतना कठोर पत्थर रस्सी की लगातार रगड़ से घिस सकता है, तो क्या मेरी मोटी बुद्धि लगातार परिश्रम करने से न घिसेगी?

       वह फिर पाठशाला लौट आया और पूरी तत्परता और उत्साह के साथ पढ़ना आरम्भ कर दिया। उसे सफलता मिली। वह व्याकरण शास्त्र का उद्भट विद्वान हुआ। लघु सिद्धान्त कौमुदी नामक ग्रन्थ की रचना उसी ने की।

       उनके नाम में थोड़ा सुधार किया गया। वरधराज की जगह फिर उसे वरदराज कहा जाने लगा।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 40

भगवान् का नया अवतार होने जा रहा है

 भगवान् का नया अवतार होने जा रहा है


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।


हम आपको बता रहे हैं कि भगवान् का नया अवतार होने जा रहा है। आज की परिस्थितियों के अनुरूप यह अवतार है। जब-जब दुष्टता बढ़ती है, तब-तब देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप भगवान् अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। आज आस्थाओं में, जन-जन के मन-मन में असुर घुस गया है। इसे विचारों की विकृति कह सकते हैं। एक किश्त आज के अवतार की आज से २५०० वर्ष पूर्व बुद्ध के रूप में, विचारशील के रूप में आई थी। वही प्रज्ञा की, विवेक की, विचारों कह अब पुनः आई है। वह है गायत्री मन्त्र ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में। यह अवतार जो आ रहा है विचारों के संशोधन के रूप में दिमागों में ही नहीं, आस्थाओं में भी हलचलें पैदा करेगा। विचार-क्रान्ति के रूप में जो आ रही है वह युगशक्ति गायत्री है। यह गायत्री हिन्दुस्तान मात्र की नहीं, सारे विश्व की है। नये विश्व की माइक्रोफिल्म इसमें छिपी पड़ी है। गायत्री मन्त्र विश्व मन्त्र है। व्यक्ति का अन्तस् व बहिरंग बदलने वाले बीज इस मन्त्र के अन्दर छिपे पड़े हैं। यदि आपको यह बात समझ में आ गई तो आप हमारे साथ नवयुग का स्वागत करने में जुट जाएँगे। हम अपने लिए एक ही नाम बताते हैं मुर्गा। मुर्गा वह जो प्रभात के आगमन का उद्घोष करें कि नवप्रभात आ रहा है, नया युग आ रहा है, युगशक्ति का अवतरण हो रहा है, कुकुडूकूँ........। यह तो मुर्गा करता है। हम नए युग की अगवानी करें।


हम गायत्री की फिलॉसफी व युग के देवता विज्ञान की बात आपको बताते आए हैं। यह ब्रह्मविद्या घर-घर पहुँचे, इसमें आप सबका सहयोग चाहते हैं। जैसे सेतुबन्ध के लिए, गोवर्धन के लिए, अवतारों को सहयोग मिला, हम भी चाहते हैं कि आप भी इस प्रवाह में सम्मिलित हो जाएँ। आपको भी बाद में लगेगा कि हम भी समय पर जुड़ गए होते तो अच्छा रहता। युगशक्ति का उदय एवं अवतरण हो रहा है। आप इस अवतरण में एक हाथ भर लगा दें। आपकी गणना युगान्तरकारी पुरुषों में होने लगेगी। आप समय दीजिए, पैसा दीजिए। यह सोचकर नहीं कि हमारा काम रुकेगा। आप अपनी श्रद्धा को परिपक्व करने के लिए जो भी कर सकें वह कीजिए। हमें देने से, हमें गुरुदीक्षा से मतलब है। घर-घर, जन-जन तक गायत्री का सद्ज्ञान पहुँचाने का काम करना। दवा तो हमारे पास है आस्थाओं में छाई विषाक्तता की। आप मात्र सुई बन जाइए।  सम्पूर्ण समर्पण की, युगदेवता के काम के लिए खपने की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूँ। आशा है आप मेरी इच्छा पूरी करेंगे।


अन्त में यह कामना करते हैं कि जिस श्रद्धा ने हमारा कल्याण किया, वह आपका भी कल्याण करे, ताकि आप महान् बनने के अधिकारी हो सकें। आप सबका कल्याण हो, सब स्वस्थ हों, सबका समर्पण भाव बढ़ा रहे।