Tuesday, November 30, 2021

मन_का_इन्जेक्शन-

 💥#मन_का_इन्जेक्शन-!

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       महर्षि कहते हैं कि दुःख, निराशा, कंपकंपी एवं अनियमित श्वसन बीमार मन के लक्षण हैं। यानि कि यदि मन बीमार है, तो ये पाँचों अनुभूतियाँ किसी न किसी तरह से होती रहेंगी। इन लक्षणों में प्रत्येक लक्षण मन की बीमार दशा का बयान करता है। उदाहरण के लिए दुःख- इसका मतलब है कि मन तनाव से भरा है, बँटा-बिखरा है। और यह बँटा-बिखरा मन निराश ही होगा और जो सतत उदास-निराश होता है, उसकी जैविक ऊर्जा का परिपथ हमेशा गड़बड़ होता है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर में बहने वाली जैव विद्युत् कभी भी ठीक-ठीक नहीं बहती और देह में एक सूक्ष्म कंपकंपी शुरू हो जाती है। और जब प्राण ही कंपायमान है, तो भला श्वास नियमित कैसे होगा? अब यदि इन सभी लक्षणों को दूर करना है तो उपाय एक ही है कि मन स्वस्थ हो जाय। मन की बीमारी समाप्त हो जाय।

                        

       इसके लिए उपाय एक ही है- मंत्र जप। मन यदि मंत्र के स्पर्श में आए अथवा मन में यदि मंत्र स्पन्दित होने लगे तो समझो कि मन की बीमारी ज्यादा देर तक टिकने वाली नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव अपनी आध्यात्मिक गोष्ठियों में इस सम्बन्ध में बड़ी अद्भुत बात कहते थे। उनका कहना था कि- बेटा, मंत्र मन का इन्जेक्शन है। देह की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक देह में इन्जेक्शन लगाते हैं। इस इन्जेक्शन की भी दो विधियाँ हैं- १. मांस पेशियों में लगाया जाने वाला इन्जेक्शन, २. रक्तवाहिनी नलिकाओं में लगाया जाने वाला इन्जेक्शन। चिकित्सक कहते हैं कि पहले की तुलना में दूसरी तरह से लगाया जाने वाला इन्जेक्शन जल्दी असर करता है।

                        

       परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि मंत्र ऐसा इन्जेक्शन है, जो मन में लगाया जाता है। इस इन्जेक्शन का प्रयोग मंत्रविद्या के मर्मज्ञ या आध्यात्मिक चिकित्सक करते हैं। इसके प्रयोग के तीन तरीके हैं। १. स्थूल वाणी के द्वारा, २. सूक्ष्म वाणी के द्वारा एवं ३. मानसिक स्पन्दनों के द्वारा। इसमें से पहला तरीका सबसे कम असर कारक है। यदि कोई बोल-बोल कर जप करे, तो असर देर से होता है। इसकी तुलना में दूसरा तरीका ज्यादा असरकारक है। यानि कि जप यदि अस्फुट स्वर में उपांशु ढंग से मानसिक एकाग्रता के साथ किया जाय, तो असर ज्यादा गहरा होता है। इन दोनों तरीकों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है, मंत्र जप का तीसरा तरीका कि वाणी पर सम्पूर्णतया शान्त रहे और मंत्र मानसिक स्पन्दनों में स्पन्दित होता रहे। इसका असर व प्रभाव बहुत गहरा होता है।

                        

       इस अन्तिम तरीके की खास बात यह है कि मंत्र का इन्जेक्शन सीधा मन में ही लग रहा है। मन के विचारों के साथ मंत्र के विचार-स्पन्दन घुल रहे हैं। यदि मंत्र गायत्री है, तो फिर यह असर हजारों-लाखों गुना ज्यादा हो जाता है। इसके प्रभाव के पहले चरण में मन की टूटी-बिखरी लय फिर से सुसम्बद्ध होने लगती है। मन में मंत्र के अनुरूप एक समस्वरता पनपती है। मानसिक चेतना में मंत्र नए प्राणों का संचार करता है। इसकी शिथिलता-निस्तेजता समाप्त होती है। एक नयी ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है। यह प्रक्रिया अपने अगले चरण से प्राणों की खोयी हुई लय वापस लाती है। जैव विद्युत् का परिपथ फिर से सुचारु होता है। और प्राणों की अनियमितता समाप्त हो जाती है।                  

                        

       इस सूत्र की व्याख्या में गुरुदेव कहते थे कि दुःख और निराशा मन के तल पर पनपते हैं। कंपकंपी एवं अनियमित श्वसन प्राणों के तल पर उपजता है। मंत्र जप करने वाले साधक की सबसे पहले मानसिक संरचना में परिवर्तन आते हैं। उसका मन नए सिरे से रूपान्तरित, परिवर्तित होता है। इस रूपान्तरण में दुःख प्रसन्नता में बदलता है और निराशा उत्साह में परिवर्तित होती है। प्रक्रिया के अगले चरण में प्राण बल बढ़ने से कंपकंपी दृढ़ता एवं बल में बदल जाती है। और श्वास की गति धीमी व सम होने लगती है। ये ऐसे दिखाई देने वाले अनुभव हैं- जिन्हें गायत्री मंत्र का कोई भी साधक छहः महीनों के अन्दर कर सकता है। शर्त बस यही है कि गायत्री मंत्र का जप गायत्री महाविज्ञान में दी गई बारह तपस्याओं का अनुशासन मानकर किया जाय। यह हो सका, तो अन्तर्यात्रा मार्ग पर प्रगति का चक्र और तीव्र हो जाएगा---!!

📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १२४ से साभार-!

 #प्रस्तुति-

     🌹#श्रद्धेय_डॉ_प्रणव_पण्ड्या_जी!

Monday, November 29, 2021

आलोचना करने का अभ्यास अपने आप से करें।

 आलोचना करने का अभ्यास अपने आप से करें।

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       आलोचना करना अच्छी बात है। इससे छिपे हुए दुर्गुण उभरकर ऊपर आते हैं। जब वे प्रकट होते हैं, तो निन्दा होने लगती है, फिर छोड़ देने में ही खैर दिखाई देती है।

       आलोचना करने का अभ्यास अपने आप से करना चाहिए। इससे अपने दुर्गुण सूझ पड़ते हैं और उन्हें बुहारने के प्रयत्न चल पड़ते हैं। स्वच्छता हो जाने पर निर्मल बना व्यक्ति प्रामाणिक और प्रशंसा का पात्र बनता है। उसे साहसी भी माना जाता है।

       जो अपनी आलोचना कर सके और जो अपने को धो सके, वह पराक्रमी है। किन्तु अपनी बुराइयों को छिपाकर जो दूसरों की निन्दा करता है, वह अपमान का भागी बनता है। समझा जाता है कि द्वेषवश बुराई की जा रही है।

       व्यक्ति इसमें अपना अपमान समझता है और चिढ़कर चुनौती देता है कि देखें कोई क्या कर लेगा? हम तो ऐसी ही बुराइयाँ अपनाये रहेंगे, जिसे रोकना हो रोके।

        इस प्रकार कलह बढ़ता है और साथ ही द्वेष भी। विग्रह खड़ा होता है और एक के बदले चार नई समस्याएँ खड़ी होती है। अच्छा यह है कि जो कार्य हम दूसरों के लिए हितकर समझते हैं, उन्हें अपने लिए करें।

       बुराई से बचना, उसे त्यागना अच्छी बात है, तो यह प्रयोग अपने आप से क्यों न किया जाय? दूसरे की गलती पकड़ने में भ्रम या भूल भी हो सकती है, पर अपनी बातें तो अपने को विदित होती है।

       जो त्रुटियाँ सूझ पड़े, उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। प्रयत्न चालू रहेंगे तो यह निश्चित है कि एक-एक करके दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा मिल जायेगा। जिसने अपने को सुधार लिया है, उसे दूसरे से कहने या सुधारने का अधिकार मिल जाता है।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना जनवरी 1987 पृष्ठ 16

Sunday, November 28, 2021

पुण्य का फल देखना चाहता हूं

 *पुण्य का फल देखना चाहता हूं*


एक सेठ बस से उतरे, उनके पास कुछ सामान था। आस-पास नजर दौडाई, तो उन्हें एक मजदूर दिखाई दिया।


सेठ ने आवाज देकर उसे बुलाकर कहा- *"अमुक स्थान तक इस सामान को ले जाने के कितने पैसे लोगे?"*


*"आपकी मर्जी, जो देना हो, दे देना, लेकिन मेरी शर्त है कि जब मैं सामान लेकर चलूँ, तो रास्ते में या तो मेरी सुनना या आप सुनाना ।"*


सेठ ने डाँट कर उसे भगा दिया और किसी अन्य मजदूर को देखने लगे, लेकिन आज वैसा ही हुआ जैसे राम वन गमन के समय गंगा के किनारे केवल केवट की ही नाव थी।


मजबूरी में सेठ ने उसी मजदूर को बुलाया । मजदूर दौड़कर आया और बोला - ,*"मेरी शर्त आपको मंजूर है?"*


सेठ ने स्वार्थ के कारण हाँ कर दी। 


सेठ का मकान लगभग 500 मीटर की दूरी पर था । मजदूर सामान उठा कर सेठ के साथ चल दिया और बोला, *सेठजी आप कुछ सुनाओगे या मैं सुनाऊँ।* 


सेठ ने कह दिया कि *तू ही सुना।*


मजदूर ने खुश होकर कहा- *''जो कुछ मैं बोलू, उसे ध्यान से सुनना"*


यह कहते हुए मजदूर पूरे रास्ते बोलता गया । और दोनों मकान तक पहुँच गये।


मजदूर ने बरामदे में सामान रख दिया , सेठ ने जो पैसे दिये, ले लिये और सेठ से बोला *सेठजी मेरी बात आपने ध्यान से सुनी या नहीं।*


सेठ ने कहा, *"मैने तेरी बात नहीं सुनी, मुझे तो अपना काम निकालना था।"*


मजदूर बोला- *"सेठजी! आपने जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी, कल ठीक सात बजे आपकी मौत होने वाली है"।*


सेठ को गुस्सा आया और बोले: *"तेरी बकवास बहुत सुन ली, जा रहा है या तेरी पिटाई करूँ?"*


मजदूर बोला: *"मारो या छोड दो, कल शाम को आपकी मौत होनी है, अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो ।"*


अब सेठ थोड़ा गम्भीर हुआ और बोला: *"सभी को मरना है, अगर मेरी मौत कल शाम होनी है तो होगी , इसमें मैं क्या कर सकता हूं ।"*  

मजदूर बोला: *"तभी तो कह रहा हूं कि अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो।"* 


सेठ बोला: *"सुना, ध्यान देकर सुनूंगा ।"*


*"मरने के बाद आप ऊपर जाओगे तो आपसे यह पूछा जायेगा कि _"हे मनुष्य ! पहले पाप काफल भोगेगा या पुण्य का_ क्योंकि मनुष्य अपने जीवन में पाप-पुण्य दोनों ही करता है, तो आप कह देना कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं" ।*


इतना कहकर मजदूर चला गया ।


दूसरे दिन ठीक सात बजे सेठ की मौत हो गयी। सेठ ऊपर पहुँचा तो यमराज ने मजदूर द्वारा बताया गया प्रश्न कर दिया कि *"पहले पाप का फल भोगना चाहता है कि पुण्य का'' ।* 


सेठ ने कहा *"पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन जो भी जीवन में मैंने पुण्य किया हो, उसका फल आंखों से देखना चाहता हूं।"*


यमराज बोले- *"हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, यहाँ तो दोनों के फल भुगतवाए जाते हैं।"*

 

सेठ ने कहा कि *फिर मुझसे पूछा क्यों, और पूछा है तो उसे पूरा करो, धरती पर तो अन्याय होते देखा है, पर यहाँ पर भी अन्याय है?*


यमराज ने सोचा, बात तो यह सही कह रहा है, इससे पूछकर बड़े बुरे फंसे, मेरे पास कोई ऐसी पावर ही नहीं है, जिससे इस जीव की इच्छा पूरी हो जाय। विवश होकर यमराज उस सेठ को ब्रह्मा जी के पास ले गये और पूरी बात बता दी।


ब्रह्मा जी ने अपनी पोथी निकालकर सारे पन्ने पलट डाले, लेकिन उनको कानून की कोई ऐसी धारा या उपधारा नहीं मिली, जिससे जीव की इच्छा पूरी हो सके।


ब्रह्मा भी विवश होकर यमराज और सेठ को साथ लेकर भगवान के पास पहुचे और समस्या बतायी । भगवान ने यमराज और ब्रह्मा से कहा: *"जाइये , अपना -अपना काम देखिये"* दोनों चले गये।


भगवान ने सेठ से कहा- *"अब बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?"*


सेठ बोला- *"अजी साहब, मैं तो शुरू से एक ही बात कह रहा हूं कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।*


भगवान बोले- *"धन्य है वो सदगुरू(मजदूर) जो तेरे अंतिम समय में भी तेरा कल्याण कर गया , अरे मूर्ख ! उसके बताये उपाय के कारण तू मेरे सामने खडा है, अपनी आँखों से इससे और बड़ा पुण्य का फल क्या देखना चाहता है। मेरे दर्शन से तेरे सभी पाप भस्मीभूत हो गये।"*

 

*इसीलिए बचपन से हमको सिखाया जाता है कि, गुरूजनों की बात ध्यान से सुननी चाहिए , पता नहीं कौन सी बात जीवन में कब काम आ जाए।*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

Saturday, November 27, 2021

विचार परिवर्तन में मनुष्य का अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है।

 विचार परिवर्तन में मनुष्य का अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है।

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       गर्म लोहे पर घन की चोट ठीक पड़ती है और उसे उचित आकार में मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, किन्तु जब वह ठण्डा होता है, तब उसकी स्थिति कठोर होती है। वैसी दशा में उसे अनुकूल आकृति में बदलने के लिए कहा या जब भी लोहे को मोड़ा जाएगा, उसे नरम बनाने की प्रक्रिया अपनानी ही पड़ेगी। इस प्रयोग में भूल करने पर बात बनती नहीं बिगड़ती है।

       विवाद करने से चिढ़ बढ़ती है‌, ईर्ष्या का उद्भव होता है। शत्रुता पनपती है। बात यहीं समाप्त नहीं होती, वरन् जिसने उसके अहंकार को चोट पहुंँचाई या उस प्रकार की चुनौती दी है, उसे नीचा दिखाने, चोट पहुंँचाने के लिए ऐसे षड्यंत्र रचता है, जिनके पीछे औचित्य का नाम भी नहीं होता।

       सांँप को छेड़ देने से वह प्राण का ग्राहक हो जाता है। सिंह-व्याघ्र जैसे हिंसक जानवरों को किसी यात्री का आंँख से आंँख मिलाना सहन नहीं होता। भले ही कोई नीचे आंँख करके उधर से दबे पांँव निकल जाय।

       विचार परिवर्तन का जहांँ तक संबंध है, वहांँ सबसे अधिक आड़े आता है, मनुष्य का अहंकार। यह है तो षड्-रिपुओं में से एक, किन्तु व्यक्तित्व के साथ इतना अधिक घुला होता है, कि सूक्ष्मदर्शी विवेकशीलों के अतिरिक्त अन्य लोग उसे छोड़ने योग्य बुराई के रूप में देखते नहीं, वरन् स्वाभिमान, आत्मसम्मान का नाम देकर उस दुराग्रह को हठ पूर्वक अपनाये ही रहते हैं।

       ऐसी दशा में व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तित्व की हेटी होने देता है और न अपनी मान्यताओं में अन्तर करना चाहता है। यह उसकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। दुराग्रह की-उसे छोड़कर यथार्थता अपनाने की बात उसके गले उतरती ही नहीं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना अप्रैल 1987 पृष्ठ 7

Friday, November 26, 2021

माँ गायत्री-ऋतम्भरा प्रज्ञा

 माँ गायत्री-ऋतम्भरा प्रज्ञा

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मित्रो! मैं कहानी का अर्थ समझाना चाहूँगा आपको, ताकि गायत्री की परिभाषा समझ में आ जाए कि गायत्री क्या हो सकती है एवं क्यों इसका दूसरा नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा है। एक कहानी सावित्री और सत्यवान की है। एक लड़की बड़ी रूपवती, बड़ी कुलवती, बड़ी सुंदर, ऐसी सुंदर जिसकी ख्याति संसार भर में फैल गई। सभी राजकुमार उसे देखकर यही कहते कि यह तो बड़ी सुंदर राजकुमारी है। यदि वह हमको मिल जाती तो अच्छा होता। लड़की के पिता के सामने सभी राजकुमार हाथ पसारने लगे और कहने लगे कि इसे हमको दीजिए। लड़की ने अपने पिता से कहा कि हमको अपनी मरजी का दूल्हा चुनने दीजिए। अच्छा तो आप चुन लें। ठीक है। रथ पर सवार होकर सेना को साथ लेकर सावित्री रवाना हुई। रवाना होते-होते वह सारे देशों के राजकुमारों से मिली और यह पता लगाया कि हमारे लिए कोई दूल्हा है क्या? कोई भी दूल्हा उसको पसंद नहीं आया। जंगल में एक दिन निकलकर जा रही थी सावित्री रथ समेत। उसने एक लड़के को देखा। वह एक लकड़हारा था। लकड़हारा बड़ा तेजस्वी मालूम पड़ता था और चेहरे पर उसके यशस्विता भी टपक रही थी। दृढ़ निश्चय भी टपक रहा था। सावित्री ने उसको रोका और पूछा लकड़हारे तुम कौन हो और कैसे हो? उसने कहा लकड़हारा तो इस समय पर हूँ पर पहले लकड़हारा नहीं था। हमारे माता पिता अंधे हो गए हैं। यहाँ जंगल में जाकर तप करते हैं उन्हीं की रक्षा करने के लिए हमने यह आवश्यक समझा कि उनको भोजन कराने से लेकर के सेवा करने तक के लिए हमको कुछ काम करना चाहिए और जिम्मेदारी को निभाना चाहिए। इस जंगल में और तो कोई पेशा है नहीं, लकड़ी काटकर ले जाते हैं और गाँव में बेच देते हैं, पैसे लाते हैं और उनका सामान खरीदकर लाते हैं। माता पिता को रोटी खिलाते हैं, सेवा करते हैं। आपने अपने भविष्य के बारे में क्या सोचा है? भविष्य के बारे में, क्या शादी नहीं करना चाहते। अभी हमारे माता पिता का कर्ज हमारे ऊपर रखा हुआ है, अभी हम शादी कैसे कर सकते हैं? सावित्री ने कहा --तुम कुछ और नहीं कर सकते क्या? पैसा नहीं कमा सकते? पैसे कमा करके हम क्या करेंगे? कर्तव्यों का वजन हमारे ऊपर रखा है। पहले कर्तव्यों का वजन तो कम कर लें, तब संपत्तिवान बनने की बात सोची जाएगी या शादी करने की बात देखी जाएगी। अपनी सुविधा की बात बहुत पीछे की है। पहले तो वह करेंगे जो हमारे ऊपर कर्ज के रूप में विद्यमान है, इसलिए माता-पिता, जिन्होंने हमारे शरीर का पालन किया, पहला काम उनकी सेवा का करेंगे, इसके बाद और बातों को देखेंगे। पढ़ना होगा तो पीछे पढ़ेंगे। नौकरी करनी होगी तो पीछे करेंगे या शादी करनी होगी तो पीछे करेंगे, अभी तो हमको कर्ज चुकाना है, माता-पिता की सेवा करनी है।


लकड़हारे की बात सुनकर राजकुमारी रुक गई। अब वह विचार करने लगी कि बाहर से ये लकड़हारा है, लेकिन भीतर से कितना शानदार है। कितना शानदार इसका कलेजा, कितना शानदार इसका दिल, कितना शानदार इसकी जीवात्मा। इसने अपने सुख और भौतिक सुविधाओं को लात मार दी और अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता दी। यह बड़ा जबरदस्त है। लकड़हारा है तो क्या हुआ। लकड़हारे से सावित्री ने कहा कि हम तो दूल्हा तलाश करने 'चले थे, अब हम आपसे ही ब्याह करेंगे। अब हम आपको ही माला पहनाना चाहते हैं। वह हँसा, उसने कहा-हमको अपने पेट का तो गुजारा करना ही मुश्किल पड़ता है फिर तुम्हारा गुजारा कैसे कर सकते हैं? उसने कहा-हम पेट पालने के लिए आपकी सहायता माँगने के लिए नहीं आए? आपकी सहायता करने के लिए आए हैं। हम बहुत बड़े मालदार हैं। हमारा बाप बहुत बड़ा मालदार है, हमारे पास बहुत सारा पैसा है। हम आपकी सेवा कर सकते हैं? यह सुनकर राजकुमार -नारद बोला जी बता गए थे कि एक साल बाद हमारी मृत्यु होने वाली है। सावित्री ने कहा कि हमारे पास इतनी विशेषता है कि हम आपकी जान बचा सकते हैं। हम आपको सम्पन्न बना सकते हैं। आपको यशस्वी बना सकते हैं। हम आपको सब कुछ उपलब्ध करा सकते हैं। हम बड़े मालदार हैं---और सावित्री ने गले में माला पहना दी। क्या आपने सावित्री सत्यवान की कहानी पढ़ी है? पढ़ी होगी तो जानते होंगे कि फिर क्या हुआ था? राजकुमारी से विवाह करने के बाद सत्यवान के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था, जब यमराज आए थे और सत्यवान का प्राण निकालकर ले गए थे। तब सावित्री ने कहा था-नहीं, यमराज बड़े नहीं हो सकते। हम बड़े हैं। आखिर सावित्री ने यमराज से अपने पति का प्राण छीन लिया था। आपने सुना है या नहीं सुना है। हमें नहीं मालूम, पर यह एक कहानी है, जो गायत्री का प्राण, गायत्री की जीवात्मा, गायत्री की वास्तविकता और गायत्री की फिलॉसफी है। आप इस फिलॉसफी की गहराई में जाइए किनारे पर बैठकर गायत्री का भजन करेंगे तो उससे क्या मिलेगा? यह तो किनारे बैठकर किनारे का भजन है। अरे डुबकी मार करके गायत्री के भजन की वास्तविक स्थिति ढूँढ़कर के ला। जहाँ से लोग शक्तिवान बन जाते हैं, चमत्कारी बन जाते हैं वहाँ तक डुबकी मार। वहाँ तक डुबकी नहीं मारेगा, किनारे तक बैठा रहेगा।


सावित्री किसे कहते हैं? सावित्री बेटे गायत्री का ही दूसरा नाम है और सत्यवान? सत्यवान उसे कहते हैं, जिस साधक ने अपना जीवन समय के लिए सिद्धांतों के लिए अर्थात आदर्शों के लिए समर्पित किया है, उस आदमी का नाम है सत्यवान। सावित्री गायत्री के लिए यह आवश्यक है कि उसका भक्त सत्यवान हो अर्थात सिद्धान्तवादी हो, आदर्शवादी हो। उत्कृष्ट चिंतन में लगा हो। कर्तव्यों में लगा हुआ हो। इस तरह का अगर कोई व्यक्ति है, तो उसे गायत्री का साधक कह सकते हैं। साधना के लिए पकड़ना पड़ेगा चेतना का स्तर, जहाँ शक्तियाँ निवास करती हैं, जहाँ भगवान निवास करते हैं, जहाँ आस्थाएँ निवास करती हैं। उस स्थान का नाम, उस स्तर का नाम वह भूमि है, जिसे दिव्यलोक कहते हैं, जहाँ गायत्री भी निवास करती है, चेतना निवास करती है, जिसको हमने ऋतम्भरा प्रज्ञा कहा है। चलिए हमें ऋतम्भरा प्रज्ञा ही कहने दीजिए। ऋतम्भरा प्रज्ञा क्या है? वह प्रज्ञा, वह धारणा, वह निष्ठा जो आदमी को ऊँचा उठा देती है, ऊँचा उछाल देती है। जिसकी प्रेरणा से आदमी ऊँची बातों पर विचार करता है और नीची बातों से ऊँचा उठता चला जाता है, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञावान के सामने, आदर्श रहते हैं, ऊँचाई रहती है।

Thursday, November 25, 2021

भारत करेगा विश्व का नेतृत्व :-भविष्यवाणी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी


भारत करेगा विश्व का नेतृत्व :-भविष्यवाणी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी

 गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

अखण्डमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।


देवियो! भाइयो!

बहुत पुराने समय की बात है, जब रावण सीताजी को चुराकर ले गया था और सबके सामने यह समस्या थी कि मुकाबला कैसे किया जाए? रावण से युद्ध कैसे किया जाए? बहुत सारे लोग थे, राजा-महाराजा भी थे, पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि रावण से लड़ने के लिए जाए, कौन अपनी जान गँवाए, कौन मुसीबत में फँसे? इसलिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। रामचन्द्रजी कहने लगे कि क्या कोई भी लड़ने हमारे साथ नहीं जाएगा? तो फिर क्या हुआ? देवताओं ने विचार किया और कहा कि भगवान के काम में हमको सहायता करनी चाहिए और सुग्रीव की सेना में, हनुमान की सेना में सम्मिलित होकर रावण से लड़ने के लिए चलना चाहिए। देवताओं ने बन्दर रूप बनाया, रीछ का रूप बनाया। कहाँ रावण और कहाँ बेचारे बन्दर, दोनों का कोई मुकाबला नहीं था, फिर भी वे लड़ने के लिए चल पड़े, क्यों? क्योंकि वे देवता थे। देवता न होते, अगर रीछ-बन्दर रहे होते तो पेड़ों पर फुदक रहे होते, फिर वे सीताजी को छुड़ाने के लिए रामराज्य की स्थापना के लिए, लंका को तहस-नहस करने के लिए भला इस तरह के कार्य कैसे कर सकते थे? लेकिन उन्होंने किया। आप लोगों को मैं रीछ और बन्दर के रूप में देवता मानता हूँ। आज फिर उसी ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति होने जा रही है। आप लोग पहले जन्म में देवता हैं। अकेले में जब कभी आपको शान्ति का समय मिले, एकान्त का समय मिले, तब आप अपने अन्दर झाँककर देखना कि आप रीछ-बन्दर हैं या देवता हैं। वास्तव में आप देवता हैं। देवताओं के सिवाय आड़े वक्त में कोई और काम नहीं आ सकता, देवता ही काम आते हैं। आप लोगों में से हर एक को मुझे यही कहना है कि आपको जब कभी अपने आप में मौका मिले तो कहना कि गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुजी ने कहा था कि हमारे भीतर देवता बैठा हुआ है, देवता विराजमान है। देवता जो काम किया करते हैं, वे जिस काम के लिए अपना जीवन लगाया करते हैं, जिसके लिए पुरुषार्थ किया करते हैं, वही पुरुषार्थ हमारे सुपुर्द किया गया है।


एक बात तो मुझे आपसे यही कहनी थी। दूसरी बात यह कहनी थी कि जब महाभारत हुआ था, तब अर्जुन यह कह रहा था कि हम तो पाँच पाण्डव हैं और कौरव सौ है और उनके पास विशाल सेना भी है, जबकि हमारे पास सेना भी नहीं है, थोड़े-से पाँच-पचास आदमी हैं। ऐसे में भला युद्ध कैसे हो सकता है? हम मारे जाएँगे। इसलिए वह इसलिए वह बार-बार मना कर रहा था और कह रहा था कि महाराज हमें लड़ाइए मत, इसमें हमको सफलता नहीं मिल सकती। आप हिसाब लगाइए कि इनसे लड़कर हम फतह कैसे पा सकेंगे? जीत कैसे सकेंगे? तब भगवान ने उससे कहा था कि देखो अर्जुन, इन सबको तो मैंने पहले से ही मारकर रखा है। और तुम्हारे लिए सिंहासन सजाकर रखा है। तुम पाँचों को सिंहासन पर बैठना पड़ेगा, राज्य करना पड़ेगा, ये तो सब मरे-मराए रखें हैं, तुम तो खाली तो खाली तीर-कमान चलाओगे। इसी तरह जो काम मेरा था सो मैंने करके रखा है। इस युग को बदलने के सम्बन्ध में जो महत्त्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनके सम्बन्ध में आपको श्रेय तो भर लेना है। जीतना किससे है और हरना किससे है? न किसी से हारना है, न किसी से जीतना है। न किसी को मारना है और न कोई पुरुषार्थ करना है। आपको तो जो विजयी होने का श्रेय मिलना चाहिए और वही श्रेय आपको प्राप्त करना है। अर्जुन ने भी प्राप्त किया था। इससे पहले जब वह ज्यादा बहस करने लगा था कि मेरे बाल-बच्चे हैं, मेरा काम हर्ज हो जाएगा, फलाना हो जाएगा, मुझे टाइम नहीं है, तब कृष्ण भगवान झल्ला पड़े थे और उन्होंने एक हुक्म दिया-‘तस्मात् युद्धाय युजस्व’ लड़, दुनिया भर के बहाने मत बना, लड़ाई कर। भगवान् हमारा क्या होगा? यह पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा था कि तेरी जिम्मेदारी हम उठाते हैं, तू युद्ध कर।


साथियो ! आज गुरुपूर्णिमा का दिन है, आप में से हर एक आदमी की, देवता की जिम्मेदारी हम उठाते हैं। देवता जब रीछ-बन्दर बनकर चले आए थे तो पीछे उनके घर बीवी-बच्चे रह गए थे, कुटुम्ब रह गया था, उन सबको भगवान ने सँभाला था। आपके घर को सँभालने की, व्यापार को सँभालने की, खेती-बाड़ी को सँभालने की, हारी-बीमारी को सँभालने की जिम्मेदारी हमारी है और यह सब जिम्मेदारियाँ हम उठाते हैं। आप हमारा काम कीजिए हम आपका काम करेंगे। हम आपको यकीन दिलाते हैं, आप हमारा विश्वास कीजिए हम आपका काम जरूर करेंगे। पिता ने बच्चे का हर काम किया है। पिता से बच्चे ने जब जो माँगा है, दिया है। जब टॉफी दी है, झुनझुना माँगा तो झुनझुना दिया है। तुम तो छोटे बच्चे हो, इसलिए यही माँगते रहते हो। अब आगे से जो भी कहना हो बेटे लिखकर दे जाना। लिखना और कहना बराबर है और फिर हमारा जवाब सुनते जाना और नोट करके ले जाना कि गुरुजी ने यह वायदा किया है कि चौबीस पुरश्चरणों का जो पुण्य पहले कमाया था उसका और अब हमको तीन साल हो गए हैं, एकान्त मौन रहकर साधना की है, उसकी पुण्य-सम्पदा जो हमारे पास जमा है, उसमें आपका हिस्सा बराबर है। माँ के पेट में जब बच्चा आता है, तब कानूनन उसका हक बाप की जायदाद पर हो जाता है। इसी तरह हमारी कमाई पर आपका हक है। प्रार्थना मत कीजिए, निवेदन मत कीजिए, मनुहार मत कीजिए, वरदान मत माँगिए। आप अपना हक माँगिए, हम आपका काम करते हैं और आपको हक चुकाना पड़ेगा। आप बीमार रहते हैं तो हम आपकी बीमारी को अच्छा करेंगे। आप पैसे की तंगी में आ गए हैं तो हम उस तंगी को भी दूर करेंगे। आप लड़ाई-झगड़े में फँस गए हैं तो हम उसमें भी आपकी मदद करेंगे। आप पर मुसीबत आ गई है तो आपकी ढाल बनकर उस मुसीबत को रोकेंगे।


श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ चलाया था, आपका रथ हम चलाएँगे। काहे का रथ? आपके कारोबार का रथ, आपके व्यापार का रथ? आपके धन्धे का रथ, आपके शरीर का रथ, आपकी गृहस्थी का रथ-यह सब हम चलायेंगे, इसका हम वायदा करते हैं, लेकिन साथ-साथ आपसे यह निवेदन भी करते हैं कि आप हमारे रास्ते पर आइए, साथ-साथ चलिए। हमारे कन्धे से कन्धा मिलाइए। इसमें आपको कोई नुकसान नहीं होगा। आप यह यकीन रखिए हमने उन विरोधियों को मारकर रखा है और विजय की माला आपके लिए गूँथकर रखी है। पाँचों पाण्डवों के लिए विजय की मालाएँ बनी हुई रखी थीं। आपको पहनना है, आपको श्रेय भर लेना है। यह जो नवयुग का क्रम चल रहा है, उसमें जब आप भागीदार होंगे तो श्रेय आपको ही मिलेगा। आप पूछें-गुरुजी हमारे बीबी-बच्चों का क्या होगा? बेटे, उनकी जिम्मेदारी हमारी है। यदि वे बीमार रहते हैं तो हम उनकी बीमारियाँ दूर कर देंगे। व्यापार में नुकसान होता है तो तेरे उस नुकसान को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है। तेरे व्यापार में जो घाटा पड़ जाए तो तू हमसे वसूल ले जाना। लेकिन जब बच्चा बड़ा हो जाता है, तब कुछ बड़ी चीज दी जाती है जो छोटे बच्चे को नहीं दी जा सकती। अब आप जवान हो गए हैं। अब हम सबको काम-धन्धे से लगाएँगे और जो हमारे पास बाकी बचा है वह भी आप सबको बाँट देंगे। नहीं गुरुजी, जब आप जाएँगे तब अपनी कमाई भी अपने संग ले जाएँगे? बेटे, हम ऐसा नहीं करेंगे। हम आपको देकर जाएँगे। चाहे वह पुण्य की कमाई हो, चाहे वह सांसारिक कमाई हो, चाहे आध्यात्मिक कमाई हो। उस कमाई में तुम्हारा हिस्सा है।


साथियो ! हमने जीवन भर दिया है। बाप-दादों की दो हजार बीघे जमीन थी, वह हम दे आए और स्त्री के पास जेवर था, वह भी हम दान में दे आए। बच्चों की गुल्लक में पैसे थे वह भी हम दे आए। अब आपके पास कुछ और धन है? नहीं बेटे, धन के नाम पर एक कानी कौड़ी का लाखवाँ हिस्सा भी हमारे पास नहीं है। आपको तलाशी लेना हो या मरने के बाद पता लगाना हो कि गुरुजी के पास क्या मिला, तो मालूम पड़ेगा कि शान्तिकुञ्ज में एक ऋषि रहा करता था और यहाँ की रोटी खाया करता था। बेटे, धन के नाम पर हमारे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन हाँ एक पूँजी है हमारे पास, यदि वह न होती तो हम इतनी बड़ी बात क्यों कहते? हमारे पास वह पूँजी है तप की, जिसको हम सामान्य क्लास का कहते हैं। जिससे हम आपकी मुसीबतों में, कठिनाइयों में सहायता कर सकते हैं। दूसरा वह जिसमें हम आपको संसार का नेता बनाना चाहते हैं। हमको भगवान ने नेता बनाकर भेजा है। चाणक्य को नेता बनाकर भेजा था। वह नालन्दा विश्वविद्यालय के डीन थे। अब्राहम लिंकन को, जार्ज वाशिंगटन को, गारफील्ड को नेता बनाकर भेजा था। विनोबा को नेता बनाकर भेजा था। हम भी आपमें से हर एक आदमी को नेता बनाना चाहते हैं, नेता बनाने की हमारी इच्छा है। आपकी इच्छाएँ क्या हैं, यह हमको मालूम हो या न हो तो आप लिखकर दे जाना। हमारा एक क्रम है। जब हम बैठते हैं तब देख लेते हैं। रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह हम सब लिखकर रख जाएँगे। जब यह युगसन्धि समाप्त होगी और सन् २००० आएगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर गए थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया। मिशन में कोई फर्क नहीं आया है और न ही आएगा। दोपहर बाद तो अब हमने मिलना भी शुरू कर दिया है। पाँच-पच्चीस आदमी को ऊपर बुला भी लेते हैं। यह हमारा दोपहर से शाम तक का क्रम है। इस तरीके से कभी आएँगे तो जब किसी को बहुत जरूरी काम हो तो मिल लेना। सांसारिक कठिनाइयाँ हों तो माताजी से कहिएगा। कोई आध्यात्मिक बात हो या कुछ ऊँचा उठना हो तो हमारे पास आवें। हम आपके बड़े कदम उठाने में मदद करेंगे। हमने इस दुनिया में बड़े कदम उठाए हैं और बड़े कदम उठाने के लिए आपसे भी कहते हैं। दो बातें हो गई है आप ध्यान रखना।


एक और बात मैं अपने सबूत में आपके बताता हूँ जो विश्व के एक बहुत बड़े भविष्यवक्ता ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कही थी। संसार में ऐसे भविष्यवक्ता तो बहुत-से हैं जो हाथ देखकर यह बताते हैं कि तेरा विवाह कब हो आएगा, पैसा कब आएगा, कब क्या हो जाएगा? इसी तरह जन्मपत्री बनाने वाले बहुत-से लोग हैं, किन्तु दुनिया में एक ऐसा व्यक्ति भी हुआ है, जिसने सारे संसार की राजनीति के बारे में लिखा है। जिसमें से आठ सौ भविष्यवाणियाँ सही हो चुकी हैं। एक हजार वर्ष पहले हुआ था, वह था—नोस्ट्राडेमस। उसने ऐसी भविष्यवाणियाँ की थीं, जो एको-एक सौ फीसदी सही हो जाती थीं। ब्रिटेन का तब नामोनिशान नहीं था, जब नोस्ट्राडेमस पैदा हुआ था। स्काटलैण्ड था, आयरलैण्ड था, इंग्लैण्ड था, पर ब्रिटेन नहीं था, लेकिन उसमें लिखा था कि ब्रिटेन बनेगा, इतने दिनों तक राज्य करेगा और सन् १८४२ में इसका सिराजा बिखर जाएगा और अब जितना भी उसका राज्यमण्डल है सब खत्म हो जाएगा। वह सब एक-एक अक्षर सही हुआ। यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर सोया करते हैं। उस कवितामय पुस्तक पर हजारों आदमियों ने टिप्पणियाँ की हैं। उसी में से एक आप अखण्ड-ज्योति अगले अंक में पढ़ेंगे, जो उसने हिन्दुस्तान के बारे में की है। उसकी भविष्यवाणी है कि हिन्दुस्तान का अध्यात्म और पाश्चात्य का तत्व-विज्ञान यह दोनों आपस में मिल जाएँगे, पाश्चात्य भौतिक विज्ञान और अध्यात्म मिल जाएँगे, रूस और हिन्दुस्तान मिल जाएँगे, चीन से अमेरिका की लड़ाई हो जाएगी, आदि-आदि बहुत-सी भविष्यवाणियाँ हैं। उन बहुत-सी भविष्यवाणियों में से आपके काम की एक ही है कि हिन्दुस्तान सारी दुनिया का नेतृत्व करेगा, जैसा कि आजकल अमेरिका कर रहा है। चाहे वह बम बनाए, चैलेंजर बनाए, स्टारवार की योजना बनाए, किन्तु बाद का नेतृत्व भारत करेगा। हिन्दुस्तान को सारी दुनिया का नेतृत्व करने के लिए बड़े कर्मठ व्यक्ति चाहिए, बड़े शक्तिशाली और क्षमता सम्पन्न व्यक्ति चाहिए, बड़े लड़ाकू योद्धा चाहिए, बड़े इंजीनियर चाहिए, बड़े-बड़े समर्थ आदमी चाहिए और वही मैं तलाश कर रहा हूँ। बेटे, तुममें योग्यता नहीं है तो तुम्हें योग्यता हम देंगे। तुम्हारी खेती-बाड़ी को ही नहीं सँभालूँगा, वरन् योग्यता भी दूँगा, ताकि तुम संसार का नेतृत्व कर सको।

Wednesday, November 24, 2021

गुरुदेव के चिंतन से मिली कारागार से मुक्ति

 गुरुदेव के चिंतन से मिली कारागार से मुक्ति

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यह घटना तुलसीपुर पुरानी बाजार जिला बलरामपुर उ.प्र. की है। श्री घनश्याम वर्मा दो भाई थे। बड़े भाई सीताराम जी थे, जिनके बच्चे नहीं थे। घनश्याम वर्मा जी के चार बच्चे सन्तोष, अशोक, रवि टिंकू एवं एक बच्ची थी। सीताराम जी के बच्चे न होने के कारण सम्पत्ति को लेकर भारी विवाद था। परिवार के अलावा अन्य लोग भी उनकी सम्पत्ति को हड़पना चाहते थे। दोनों परिवार में बँटवारा था। अलग बनाते खाते थे। मेरा इस परिवार से परिचय कुछ ही दिन पूर्व हुआ था। वर्मा जी के यहाँ बच्चे का जन्म दिवस संस्कार था। यज्ञ के माध्यम से संस्कार सम्पन्न हुआ। संस्कार के माध्यम से मैंने गुरुदेव एवं मिशन की जानकारी दी। उस समय मथुरा से एक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था ‘‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’’। इस ग्रन्थ की स्थापना घर- घर में कराई जा रही थी। मैंने इस ग्रन्थ का एक पृष्ठ पढ़कर सुनाया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने भी अपने घर में ग्रन्थ को स्थापित किया। इसके बाद नियमित उपासना एवं ‘‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’’ ग्रन्थ का नियमित स्वाध्याय का क्रम चल पड़ा।


घटना 2003- 04 की है। सीताराम जी किसी कार्यवश बाहर गए हुए थे। जाने का प्रयोजन किसी को मालूम नहीं था। वे कब जाते, कब आते इस विषय में भाई के परिवार में किसी को कुछ मालूम नहीं रहता था; क्योंकि दोनों परिवार के निकास द्वार अलग- अलग दिशा में थे। एक दिन पड़ोस के एक व्यक्ति ने घनश्याम जी से सीताराम जी के बारे में पूछा कि कहाँ है, तो घनश्याम जी ने अनभिज्ञता जताई। पड़ोस के व्यक्ति ने कहा कि कई दिन से दिखाई नहीं पड़ रहे हैं और घर में ताला भी नहीं लगा है। लोगों ने घर के आस- पास जाकर देखा घर से अजीब- सी दुर्गन्ध आ रही थी। उन्होंने घनश्याम वर्मा के घर में यह बात बताई। घनश्याम वर्मा जी का बड़ा लड़का अन्य कुछ व्यक्तियों को साथ लेकर घर में घुसा। घर में सभी जगह देखा- कुछ नहीं मिला, जिससे दुर्गन्ध का कारण मालूम हो सके। काफी देर बाद देखा कि बाथरूम के दरवाजे में ताला लगा था। ताला तोड़ कर देखा तो सीताराम जी की लाश पड़ी थी। कई दिनों से पड़े रहने के कारण लाश से दुर्गन्ध आ रही थी। तुरन्त पुलिस स्टेशन को सूचित किया। यह घटना हवा की तरह चारों तरफ फैल चुकी थी। काफी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। पुलिस आई। सभी लोगों के सामने लाश को बाहर निकाला गया। लाश को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस छानबीन करने लगी।


घटना के दो तीन दिन बाद पुलिस आई और घनश्याम वर्मा जी के दो पुत्र सन्तोष और अशोक को पकड़ ले गई। उनके दोनों बच्चे एक एम.एससी. दूसरा बी.एससी कर रहा था। साथ ही वे सिविल परीक्षा की तैयारी भी कर रहे थे। काफी छान- बीन हुई। जाँच के परिणाम स्वरूप अदालत ने दोनों बच्चों को दोषी मानकर गोण्डा भेजा। उसके पश्चात् आदर्श कारागार लखनऊ भेज दिया गया। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दोनों बच्चों की श्रद्धा कम नहीं हुई, बल्कि उस समय को वे स्वाध्याय एवं जप में लगाते। लेख भी लिखते और हमेशा प्रसन्न रहते। इस घटना को ईश्वरीय इच्छा और परीक्षा की घड़ी भर मानकर चलते रहे। कहते हैं कि जो सच्चा आध्यात्मिक होता है वह सुख दुःख से परे होता है। उसका दुःख तपस्या के समान होता है। ऐसा ही कुछ इन बच्चों के साथ हो रहा था।


एक दिन जेलर राउण्ड लगा रहे थे। सभी जगह चेक करने के बाद वे सन्तोष के कमरे में पहुँचे तो देखा एक युवक बहुत शान्त भाव में बैठा कुछ अध्ययन कर रहा है। जेलर मन ही मन सोचने लगे कि जेल में कैदी हमेशा परेशान, उद्विग्न और चिंतित रहते हैं। कुछ तो ऐसे विकराल होते हैं कि उनका जीवन कभी सुधरता नहीं है। सामान्य कैदियों को भी वे अपने जैसा बना लेते हैं। उन्होंने अपने चिन्तन को विराम दिया और अनायास ही सन्तोष के पास पहुँच गए। जेलर ने पूछा- क्या हाल है? बच्चे ने सहज भाव से उत्तर दिया सब कुछ गुरुदेव की कृपा से ठीक है। उनकी कृपा से स्वाध्याय एवं ध्यान का अच्छा अवसर मिला है, वही कर रहा हूँ। बच्चे के विश्वास भरे शब्दों को सुनकर जेलर दंग रह गए। सोचा लोग अपनी परेशानी बताते हैं, मैं उनकी परेशानी दूर करता हूँ। इसे तो कोई परेशानी ही नहीं है। वे सोच में पड़ गए। उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने पूछा कि कौन हैं तुम्हारे गुरुदेव? और यह स्वाध्याय और ध्यान कैसा? उस बच्चे ने ‘ऋषि चिन्तन के सान्निध्य में’ पुस्तक का हवाला दिया और पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़कर सुनाया- किसी परिस्थिति में विचलित न हों (पृष्ठ सं. ६७)। सुनकर जेलर बहुत प्रभावित हुए और उस पुस्तक के लिए अनुरोध किया कि कुछ दिन के लिए मुझे दे दो। बच्चे ने कहा कि यह पुस्तक मेरे गुरुजी ने दी है, इसे नहीं दे सकता। परन्तु जब मेरे पिताजी मुझसे मिलने आएँगे तो दूसरी पुस्तक आपके लिए मँगवा दूँगा। इस घटना से जेलर को उन बच्चों से आत्मिक लगाव हो गया।


जेलर प्रतिदिन दोनों बच्चों से मिलने आते। हाल−चाल पूछते और गुरुदेव के चिन्तन को सुनकर जाते, जो उस दिन का चिन्तन होता। अन्ततः परिणाम यह हुआ कि जेलर ने स्वयं सिफारिश कर बच्चों को जेल से रिहा करवा दिया। जेलर बच्चों के गुणों से परिचित हो चुके थे उन्हें विश्वास हो चुका था कि ये बच्चे निर्दोष हैं। बच्चों ने जेलर को गुरुदेव का वह अनुपम ग्रन्थ भेंट किया। जेलर ने भी गुरुदेव के साहित्य से प्रभावित होकर गुरुसत्ता से जुड़ने का सुयोग प्राप्त किया। इस प्रकार घनश्याम जी के दोनों बच्चे गुरुकृपा से अपने जीवन को संस्कारित करने के साथ औरों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गए। गुरुकृपा की शक्ति की पहचान बहुत ही सहज ढंग से उनने कई लोगों को करा दी।


प्रस्तुति:चन्द्रमणि शुक्ला दे.सं.वि.वि., हरिद्वार

Tuesday, November 23, 2021

सत्य को जीवन में उतारने, आचरण में ढालने वाले के कार्य सफल होते हैं।

 सत्य को जीवन में उतारने, आचरण में ढालने वाले के कार्य सफल होते हैं।

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       गाँधी जी ने जिस सत्य को अनुभूत किया और आचरण में उतारा, उसके बलबूते वे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला सके। अन्यथा गाँधी जी से पहले भी कितने ही लोग सत्य बोलते और महात्मा भी थे।

       सत्य दैवी सम्पदा और ईश्वर के समतुल्य है, जिन्हें यह विश्वास होता है, अटूट श्रद्धा होती है, ऐसा सत्य जीवन में फलदायी भी होता है।

       सत्य बोलना, सत्य आचरण करना और प्रत्येक कार्य को सत्य की कसौटी पर कसकर करना, यह तीनों बातें भिन्न हैं। सत्य बोलना आसान है और कितने ही लोग प्रतिदिन सत्य बोलते हैं, किन्तु आचरण सत्य से भिन्न होने के कारण उनके जीवन में न कोई फल निकलता है, न उनके सत्य का कोई चमत्कार उनके जीवन में उन्हें दिखाई देता है, क्योंकि मन, वचन और कर्म में सदैव भिन्नता बनी रहने से योग नहीं बनता और कोई फल नहीं निकलता।

       जिन्होंने सत्य को जीवन में उतारा है, आचरण में ढाला है, उन्हीं के कार्य सफल हुए हैं। जिन्होंने जीवन भर अहिंसा व्रत का आचरण किया है, ऐसे लोगों के प्रति लोग बैरभाव छोड़ देते हैं।

       जीवन में अस्तेय का व्रत जिन्होंने लिया है, उन्हें धनाभाव कभी नहीं रहा। जिस प्रकार ब्रह्मचारी का वीर्यवान बनना आवश्यक है, उसी प्रकार सत्याचरण अपनाने वाले का ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी होना स्वाभाविक है।

       कहा गया है कि सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। शास्त्र वचन है कि सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। प्रतिफल मिलने में देर हो सकती है, पर ऐसा नहीं है कि उत्कृष्ट आचरण अपनाने वाले को हेय स्थिति में पड़ा रहना पड़े।

       व्यक्तित्व विकास के लिए मन, वाणी और कर्म की एकता सधनी चाहिए, किन्तु मन, वाणी और कर्म में एषणा और लोभ आदि अनेकों ऐसे विग्रह उत्पन्न करते हैं, जो व्यक्तित्व का विकास नहीं होने देते।

       सत्य को वाणी का तप कहा गया है। इसका तात्पर्य है, उसमें मन की चोरी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। जिनके मन, वाणी और कर्म की अभेदता सध चुकी है, उन्हें सत्य का साक्षात्कार अवश्य होता है।

(संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति फरवरी 1989 पृष्ठ 20

Monday, November 22, 2021

साधक कैसे बनें?

 साधक कैसे बनें?

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साधकों में से कई व्यक्ति हमसे ये पूछते रहते हैं—क्या करें? क्या करें? मैं उनमें से हरेक से ये कहता हूँ, ये मत पूछो, बल्कि ये पूछो कि क्या बनें? क्या बनें? अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने से भी ज्यादा कीमती है, पर जो कुछ भी आप कर रहे होंगे, वो सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे, तो जो भी गीली मिट्टी आपके सम्पर्क में आयेगी, आपके तरीके से आपके ढंग की शकल के खिलौने बनते हुए चले जायेंगे। आप सूरज बनें। आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा? जिन लोगों के लिये आप करना चाहते हैं वो आपके साथ-साथ चलेंगे और चमकेंगे। सूरज के साथ में नवग्रह और बत्तीस उपग्रह हैं, ये सबके सब लोग चमकते हैं और साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि सूरज चलता है। हम चलें।


हम प्रकाशवान् हों। हम देखेंगे, जिस जनता के लिये हम चाहते थे कि ये हमारा अनुगामी बने और हमारी ये नकल करे, आप देखेंगे कि आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं। आप स्वयं भी नहीं चलेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि दूसरे आदमी हमारा कहना मानें, ये मुश्किल बात है। आप गलें और वृक्ष बनें और वृक्ष बनकर के अपने जैसे असंख्य बीज आप पायें, अपने भीतर से आप पैदा कर डालें। हमको बीज की जरूरत है, बीज लाइये, बीज बनिए, कहाँ से बीज लायेंगे? आप गलिए, वृक्ष बनिए और अपने भीतर से ही फल पैदा कीजिए और प्रत्येक फल में से ढेरों के ढेरों बीज पैदा कीजिए, लीजिए बन गये तैयार। अपने भीतर से ही क्यों न बीज बनायें?


मित्रो! जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है, उनको ये पूछने की जरूरत न पड़ी ‘क्या करेंगे?’, उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गई, कि वो सब कुछ कर सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता को और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिये काफी था। अर्जुनदेव जी थाली, बरतन साफ करते थे। उन्होंने अपने आपको गुरु के अनुशासन में ढालने का प्रयत्न किया था और जब उनके गुरु तलाश करने लगे कि कौन-से शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाय? सारे विद्वानों की अपेक्षा, सारे नेता और दूसरे गुण वालों की अपेक्षा उन्होंने अर्जुनदेव को चुना। उनके गुरु रामदास जी ने ये कहा, कि अर्जुनदेव ने अपने आपको बनाया है और बाकी आदमी इस कोशिश में लगे रहे कि हम दूसरों से क्या करायें और स्वयं क्या करें, बल्कि होना ये चाहिए था कि अपने आपको बनाना चाहिए था।


अर्जुनदेव ने न कुछ किया था, न कराया था, केवल अपने आपको बना लिया था। इसीलिये उनके गुरु ने ये माना कि ये सबसे अच्छा आदमी है। सप्तऋषियों ने अपने आपको बनाया। उनके अन्दर तप की सम्पदा थी, ज्ञान की सम्पदा थी। हरिद्वार या जहाँ कहीं भी रहते चले, जो कुछ भी काम उन्होंने कर लिया, वो एक महानतम श्रेणी का उच्चस्तरीय काम कहलाया। अगर उनका व्यक्तित्व घटिया होता तो फिर बात कैसे बनती?


गाँधीजी ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। बुद्ध ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। हम अपने भीतर चुम्बकत्व पैदा करें। खदानों के अन्दर जो लोहे के कण, धातु के कण जमा हो जाते हैं, उसका कारण ये है कि जहाँ कहीं भी खदान होती है, वहाँ चुम्बकत्व रहता है। चुम्बकत्व से खदान छोटी-छोटी चीजों को खींचता रहता है। हम अपनी क्वॉलिटी बढ़ायें। हम अपना चुम्बकत्व बढ़ायें। हम अपना व्यक्तित्व बढ़ायें; चूँकि ये सबसे बड़ा करने के लिये काम है।


समाज की सेवा करें। हाँ! ठीक है। वो भी आपको करनी चाहिए, पर मैं ये कहता हूँ समाज सेवा से भी पहले ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस बात को समझें कि हमको अपनी क्वॉलिटी बढ़ानी चाहिये। खनिज में से जो धातु निकलती हैं, वो कच्ची होती हैं, लेकिन जब पकाकर के ठीक कर ली जाती हैं, साफ-सुथरी बना दी जाती हैं, तो उन्हीं धातुओं का नाम-स्वर्ण, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। उसी का नाम फौलाद हो जाता है। हम अपने आपको फौलाद बनायें। अपने आपकी सफाई करें, अपने आपको धोयें, अपने आपको परिष्कृत करें। इतना कर सकना, अगर हमारे लिये सम्भव हो जाये तो समझना चाहिए आपका ये सवाल पूरा हो गया, अब हम क्या करें? नहीं ये करें कि हम अच्छे बनें। समाज सेवा भी करना, पर समाज सेवा करने से पहले आवश्यक है कि समाज सेवा के लायक हथियार अपने आपको बना लें। ये ज्यादा अच्छा है। हम अपने आपकी सफाई करें। समाज सेवा भी करें, पर अपने आपकी सफाई को भूल नहीं जायें। मित्रो! एक और बात कह करके हम अपनी बात समाप्त करना चाहते हैं।


एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जायें। आप दुकान में शामिल हो जायें। हमारी दुकान में बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को मुनाफेदार शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। ज्यादा हम कहाँ तक दे पायेंगे? भीख माँगने वाले को कहाँ, किसी ने क्या, कितना दिया है? थोड़ा सा ही दे पाते हैं। लेकिन आप हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते हमारी दुकान में? अन्धे और पंगे का योग क्यों नहीं बना लेते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य ने और मान्धाता ने साझेदारी की थी। सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? आप हमारे साथ शामिल हो जायें और हम और आप मिलकर के बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये, वो बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों और ये विश्वास कर सकते हों कि हम प्रामाणिक आदमी हैं तो जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें और हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, श्रम की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें।


हमारी जिन्दगी के मुनाफे का यही तरीका है कि हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव के साथ में मिला दिया और उनकी कम्पनी में शामिल हो गये। हमारे गुरुदेव हमारे भगवान् की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कम्पनी में शामिल हैं। आप में से हरेक को आवाहन करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत है तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें और जुड़ करके हम जो लाभ कमायेंगे, भौतिक और आध्यात्मिक ,, उनका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से जैसे कि हम धन्य हो गये, निहाल हो गये। यही है साधकों से हमारा विनम्र अनुरोध।

Sunday, November 21, 2021

ऐसे थे पूज्य गुरुदेव

 ऐसे थे पूज्य गुरुदेव

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गुरुवर जो कहते उसे पूर्णतया स्वयं के जीवन में करके दिखाते। ‘‘दूसरों के प्रति उदारता स्वयं के प्रति कठोरता’’ उनके जीवन में सतत चरितार्थ तो थी ही, किन्तु उस समय वह चरम अवस्था में पहुँच गई, जब उनकी माता दानकुँवरि बाई का निधन हो गया।

   

मथुरा में जब वे अस्वस्थ थीं, उस समय भी आचार्य जी के कार्यक्रम सारे देश में अनवरत चल रहे थे। हर बार तपोभूमि के कार्यकर्ताओं (जिनमें मैं भी शामिल था) को देख- रेख करने की हिदायत देकर जाते थे; पर पता नहीं क्यों इस बार उन्होंने कहा कि यदि कुछ अनहोनी घट गई तो दोनों स्थान पर टेलीग्राम करना। जहाँ कार्यक्रम समाप्त हो व जहाँ प्रारंभ हो। साथ ही आवश्यक निर्देश देकर दौरे पर चले गए।


द्रष्टा की आँखों से भला कोई बात छिपी कैसे रह सकती है? वही हुआ जिसे समझा गए थे। उस समय छत्तीसगढ़ (पुराना मध्यप्रदेश) के महासमुंद में एक हजार एक कुण्डीय यज्ञ चल रहा था। प्रवचन के बीच में उन्हें टेलीग्राम दिया गया। टेलीग्राम पर नजर पड़ते ही वे सब कुछ समझ गए। एक मिनट के लिए आँखें मूँदकर उन्होंने दिवंगत आत्मा को श्रद्धाञ्जलि दी। पुनः सहज भाव से यथावत् अपनी विवेचना करने लगे। उस समय लोगों को कुछ समझ में नहीं आया, पर बाद में जब सभी ने सुना तो आश्चर्यचकित रह गए। ऐसा समाचार पाकर तनिक भी विचलित न होना, स्थिर भाव से अपना कार्य करते रहना किसी स्थितप्रज्ञ योगी के लिए ही संभव है।


सबके मन में एक ही आशंका थी कि गुरुदेव मथुरा चले जाएँगे तब यहाँ यज्ञ का क्या होगा? किन्तु उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निश्चिंत करते हुए स्वयं के प्रति कठोर बनकर स्पष्ट कर दिया कि आगे के सभी कार्यक्रम यथावत् होते रहेंगे। हम कहीं नहीं जा रहे, आप सभी के बीच ही रहेंगे। सबने आश्चर्य किया कि ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ?’’ स्वयं की माताजी का श्राद्धकर्म चल रहा हो तो बेटा बाहर कैसे रह सकता है, पर महापुरुषों के सभी कार्य लौकिक नियमों के अनुसार सम्पन्न नहीं होते। उन्होंने तो अपनी ओर से श्राद्धकर्म उस एक मिनट में ही सम्पन्न कर लिया था।


कार्यक्रम आयोजक प्रसन्न थे, क्योंकि इस स्थिति में भी पूज्यवर सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहे। उनका कोई भी कार्यक्रम स्थगित नहीं हुआ। सभी कार्यक्रम यथावत् जारी रहे। अन्तिम संस्कार के सारे लौकिक कृत्य वंदनीया माताजी द्वारा सम्पन्न हुए। इस संबंध में उन्हें सूक्ष्म सम्पर्क से निर्देश मिल गए थे। उनके निर्देशानुसार स्वजनों, परिजनों, आगन्तुकों इष्ट मित्रों की उपस्थिति में अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया गया।


इसके बाद परम वंदनीया माताजी ने कम से कम एक दिन के लिए इस असह्य दुःख में पूज्यवर की उपस्थिति चाही। इसके लिए उन्हें मनाने हेतु मुझे जाने के लिए कहा गया। एक तरफ वन्दनीया माताजी का सजल आग्रह, दूसरी ओर गुरुकार्य के प्रति पूज्यवर की दृढ़निष्ठा- मैं हतप्रभ खड़ा सोच रहा था क्या करूँ? गुरुदेव को उनके निश्चय से डिगाना कठिन ही नहीं असंभव था। उनके सामने जाकर यह बात कहनी पड़ेगी, यह सोचकर ही पसीने छूटने लगे। बचने की कोशिश में मैंने कहा- बलराम जी को भेज दें! पर उन्होंने कहा- ‘‘उन्हें तो मना करेंगे। उनसे आग्रह करना, आने की आवश्यकता बताना उनके वश की बात नहीं, इसलिए तुम्हें ही जाना पड़ेगा।’’ मैं निरुत्तर हो गया।


महासमुन्द के बाद बालाघाट में कार्यक्रम था। वहाँ यज्ञस्थल में पहुँचा तो देखा पूर्णाहुति चल रही थी। इधर प्रणाम का क्रम भी शुरू हो चुका था। मुझे वहाँ देखकर पूज्यवर सब कुछ समझ गये। बोले- ‘‘रास्ते में बात करेंगे, अभी जाकर नहा- धो लो’’ स्नान- ध्यान के बाद भोजन किया। मथुरा से बालाघाट पहुँचने में दो रात्रि का जागरण था, मगर विश्राम का अवसर नहीं था। क्योंकि अगला कार्यक्रम जबलपुर में था और हमें तत्काल जबलपुर के लिए प्रस्थान करना था। गाड़ी में बैठकर गुरुदेव ने विस्तार से सारी बातें सुनीं।


इसके बाद मैंने माताजी का आग्रह सुनाया और निवेदन किया कि केवल एक दिन के लिए चलें ताकि स्वजनों- परिजनों, इष्ट मित्रों का शिष्टाचार किया जा सके। गुरुदेव कुछ गम्भीर हुए। एक क्षण रुककर बोले- मैंने अपने बच्चों को समय दिया हुआ है। मैं अपने काम के लिए उनको निराश करूँ, यह सम्भव नहीं। रही बात शिष्टाचार की, तो अब ताई जी के बाद घर में सबसे बड़ा मैं ही हूँ। मुझे किसी से शिष्टाचार निभाने की आवश्यकता नहीं। मैं जो कहूँगा उसी को पालन करना सबका कर्तव्य होगा।


मैंने समझाने का प्रयास किया कि किसी कार्यक्रम को स्थगित करने की जरूरत नहीं होगी, जबलपुर के बाद बिलासपुर के निर्धारित कार्यक्रम के बीच एक दिन खाली है। इसलिए जबलपुर का कार्यक्रम सम्पन्न कर तुरन्त मथुरा की ओर प्रस्थान किया जाए तो वहाँ सभी से मिलकर निर्धारित समय पर बिलासपुर पहुँच जाएँगे या एक दिन विलम्ब हो तो भाई लोग मिलकर सँभाल लेंगे। दरअसल इस आशय की सूचना हमने बिलासपुर के कार्यक्रम आयोजक श्री उमाशंकर चतुर्वेदी जी को दे दी थी कि संभव है कि एक दिन विलंब हो जाय। ऐसी परिस्थिति में आप लोग मिलकर संभाल लें लेकिन यह बात मैंने गुरुदेव को नहीं बताई। इधर बालाघाट से रवाना होते समय बिलासपुर से चतुर्वेदी जी भाई साहब के सुपुत्र नरेन्द्र जी आ पहुँचे। वे पूज्यवर को लेने आए थे। उन्हें देखते ही गुरुदेव बोल उठे ‘तू चल, मैं आ जाऊँगा। मुझसे बोले- ‘‘कर दिया न तूने लड़के को परेशान’’ आखिर निराश होकर मुझे अकेले ही लौटना पड़ा।

                                                                                                                      प्रस्तुति :: वीरेश्वर उपाध्याय

Saturday, November 20, 2021

विश्वास --एक जीवनी शक्ति*

 *विश्वास --एक जीवनी शक्ति*


किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था, वो जब भी नाचता तो बारिश होती थी। अतः गाव के लोगों को जब भी बारिश की जरूरत होती थी, तो वे लोग साधु के पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे नाचे, और जब वो नाचने लगता तो बारिश ज़रूर होती।


कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई की किसी साधू के नाचने से बारिश होती है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ।


शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दे दी कि *हम भी नाचेंगे तो बारिश होगी और अगर हमारे नाचने से नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से भी नहीं होगी।* 


फिर क्या था अगले दिन सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर साधु की कुटिया पर पहुंचे।


साधु को सारी बात बताई गयी, फिर लड़कों ने नाचना शुरू किया, आधे घंटे बीते और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे, कुछ देर में दूसरे ने भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई।


अब साधु की बारी थी, उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई, साधु नाचता रहा …


दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई…. 


पर साधु तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था, धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी। 


लड़के दंग रह गए और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा- *”बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिश नहीं हुई और आपके नाचने से हो गयी?”*


 साधु ने उत्तर दिया – *”जब मैं नाचता हूँ तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ, _पहली_ बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिश को होना ही पड़ेगा और _दूसरी_ ये कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक कि बारिश न हो जाये।”*


*सफलता पाने वालों में यही गुण विद्यमान होता है, वो जिस चीज को करते हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा विश्वास होता है और वे तब तक उस चीज को करते हैं जब तक कि उसमे सफल ना हो जाएं।* 


*इसलिए यदि हमें सफलता हांसिल करनी है तो उस साधु की तरह ही अपने ऊपर पूरा विश्वास होना चाहिए।*


*“विश्वास जीवन की शक्ति है, इसका अभाव अज्ञान है और जीवन में वे ही विजयी हो सकते है, जिन्हें विश्वास है कि वे विजयी होंगे"*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

Friday, November 19, 2021

दूसरों की आँखों में अपनी शान जमाने की सोचना व्यर्थ है।

 दूसरों की आँखों में अपनी शान जमाने की सोचना व्यर्थ है।

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        दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं या क्या सोचेंगे? इस बात पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। क्योंकि किसी के कुछ भी सोचने में अपना कुछ बनता-बिगड़ता नहीं।

       लोगों की स्मरणशक्ति इस संबंध में बड़ी दुर्बल है। वह देखी या सुनी घटनाओं के विलक्षण होने पर ही सुनने या देखने के लिए तनिक-सा ध्यान बँटाते हैं। इसके साथ अपने काम में लग जाते हैं। इसके उपरान्त वे अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि जो-जो देखा या सुना था, उसे फिर से स्मरण करने के लिए व्यस्तता के बीच गुजरते हुए अवकाश ही नहीं निकाल पाते।

       जैक फ्राक्सन कहते थे कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते होंगे, यह चिन्ता सताती है, किन्तु इसके बाद जब परिपक्वता आने लगती है, तो यह परवाह नहीं रहती, कि कोई हमारे बारे में क्या सोचता और कहता है?

        लोगों को मात्र अपनी समस्याओं में रस है। वे उसमें इतने व्यस्त रहते हैं, कि दूसरों की सराहना या निन्दा करने के लिए उनके पास समय ही नहीं रहता। ऐसी दशा में जिस-तिस की आँखों में बड़ा आदमी बनने का आडम्बर बनाना व्यर्थ है।

       लोगों को रिझाने के लिए एवं सस्ती वाहवाही लूटने के लिए सज-धज करने और ठाट-बाट बनाने में अपना पैसा और समय खर्च करना बेकार है। लोगों की आँखों में अपनी शान जमाने की बात सोचना व्यर्थ है।

       इसी प्रकार अपने को अधिक विद्वान, धनवान, गुणवान बताने और अपनी सफलताओं का ढिंढोरा पीटना भी व्यर्थ है। इस शेखीखोरी के जमाने में औसत आदमी अपनी वस्तु स्थिति से बढ़-चढ़कर बातें करता है, ताकि उसे अधिक गुणवान, सौभाग्यवान मानकर सराहा जा सके, पर होता ठीक इसके विपरीत है। जो अपनी जाँच-पड़ताल में खरा नहीं उतरा है, उसे मात्र किसी की बकवास के आधार पर कोई सही मानने लगेगा, इसकी आशा किसी से भी नहीं की जानी चाहिए।

       अपने संबंध में डींंगे हाँकने के संबंध में भी यही बात है। अक्सर दुर्गुणी और बचकाने लोग ही अपनी शेखी बघारते और दूसरों के द्वारा वाह-वाही लेने के लिए उन्हें रिश्वत देते रहते हैं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना जनवरी 1987 पृष्ठ 8

Thursday, November 18, 2021

जैसा अन्न वैसा मन

 *जैसा अन्न वैसा मन*


*एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी !*


*अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ?*


*तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?*


*भगवन ने जहा कि चलो गंगा से ही पूछते है, दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि "हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई !"*


*गंगा ने कहा "मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ !"*


*अब वे लोग समुद्र के पास गए, "हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए !"समुद्र ने कहा "मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ !"* 


*अब वे लोग बादल के पास गए और कहा "हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप पापी हुए !"*


*बादलों ने कहा "मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है, जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है , उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है !"*


*अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसे ही विचार मानव के बन जाते है ! इसीलिये सदैव भोजन सिमरन और शांत अवस्था मे करना चाहिए और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए !*

 *जैसे-*


*भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे। द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।*


*इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी। श्रीकृष्ण ने भांप लिया था। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए. परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है।*


*इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए। पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे। द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी. अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई।*


*भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूं। द्रोपदी सकुचाई को भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो. मुझे शांति मिलेगी।*


*द्रोपदी ने कहा- स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?*


*भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। जैसा अन्न वैसा मन। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था। उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी। सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी।*


*अन्न ही रक्त का कारक है। अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है। अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है। सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं।*


*भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए। दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है। उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है। यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है। जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होजायेंगे*

*संकलित*...

प्रभु श्री राम चन्द्र जी महाराज जी की जय

ॐ नमः शिवाय

Wednesday, November 17, 2021

भक्त के अधीन भगवान* *(सदना कसाई)*

 *भक्त के अधीन भगवान*

*(सदना कसाई)*


एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवद्नाम गुनगुनाता रहता था।


एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था, कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया, उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया, यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा।


वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है।


धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदना कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो मांस देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मांस ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता।


इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदना की दुकान की बिक्री बढ़ गई।


बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता थे, जहां मांस कटता हो व बिकता हो। किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई ।


दूर से खड़ा वह सदना कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने के बाद ब्राह्मण सदना कसाई के पास गया।


ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदना कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदना ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है!


ब्राह्मण बोला- *“तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।"*


*बातों ही बातों में उन्होंने सदना कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है।*


सदना बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। *अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं, अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें। मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“*


ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी।


कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा- *हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ।*


स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- *तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है, परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान - कीर्तन करते रहते हैं, उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदना तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था।*


ब्राह्मण अगले दिन ही, सदना कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया। *ब्राह्मण की बात सुनकर सदना कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है, तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन  ही करूंगा l*

इस संदेश को सिर्फ पड़कर भूल मत जाइएगा हो सके तो अपने जीवन में कुछ अनुसरण भी कीजियेगा।


*शुभ प्रभात। आज का दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलकारी हो। देव दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं*

Tuesday, November 16, 2021

सद्व्यहार: एक अचूक अस्त्र

 *सद्व्यहार: एक अचूक अस्त्र*


एक राजा ने एक दिन स्वप्न देखा कि कोई परोपकारी साधु उससे कह रहा है कि ,*बेटा! कल रात को तुझे एक विषैला सर्प काटेगा और उसके काटने से तेरी मृत्यु हो जायेगी।*


*वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है, पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेने के लिए वह तुम्हें काटेगा।*


प्रातःकाल राजा सोकर उठा और स्वप्न की बात पर विचार करने लगा। धर्मात्माओं को अक्सर सच्चे ही स्वप्न हुआ करते हैं।


राजा धर्मात्मा था, इसलिए अपने स्वप्न की सत्यता पर उसे विश्वास था। वह विचार करने लगा कि अब आत्म- रक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?


सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुँचा कि *मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है।*


 उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।


*संध्या होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह- जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने या छेड़- छाड़ करने का प्रयत्न न करे।*


रात को ठीक बारह बजे सर्प अपनी बाँबी में से फुसकारता हुआ निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया।


 वह जैसे- जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख- देखकर आनन्दित होता गया।


कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, स्थान- स्थान पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे।


जैसे- जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं,


परन्तु उसे जरा भी हानि पहुँचाने की चेष्टा नहीं करते। यह असाधारण सौजन्य देखकर सर्प के मन में स्नेह उमड़ आया।


*सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मन्त्र- मुग्ध कर लिया था। कहाँ वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया।*


*हानि पहुँचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूँ तो किस प्रकार काटूँ ?*


यह प्रश्न उससे हल न हो सका। राजा के पलंग तक जाने तक सर्प का निश्चय पूर्ण रूप से बदल गया।


सर्प के आगमन की राजा प्रतीक्षा कर रहा था। नियत समय से कुछ विलम्ब में वह पहुँचा। 


सर्प ने राजा से कहा- *‘हे राजन्! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूँ। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूँ। लो इसे अपने पास रखो।’* 

इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सर्प उलटे पाँव अपने घर वापस चला गया।

Monday, November 15, 2021

दुःख का कारण पाप ही नहीं है

 दुःख का कारण पाप ही नहीं है!

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आमतौर से दुःख को नापसंद किया जाता है। लोग समझते हैं कि पाप के फलस्वरूप अथवा ईश्वरीय कोप के कारण दुःख आते हैं, परंतु यह बात पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। दुःखों का एक कारण पाप भी है यह तो ठीक है, परंतु यह ठीक नहीं कि समस्त दुःख-पापों के कारण ही आते हैं।


कई बार ऐसा भी होता है कि ईश्वर की कृपा के कारण, पूर्व संचित पुण्यों के कारण और पुण्य संचय की तपश्चर्या के कारण भी दुःख आते हैं। भगवान को किसी प्राणी पर दया करके उसे अपनी शरण लेना होता है, कल्याण के पथ की ओर ले जाना होता है तो उसे भव-बंधन से, कुप्रवृत्तियों से छुड़ाने के लिए ऐसे दुःखदायक अवसर उत्पन्न करते हैं, जिनकी ठोकर खाकर मनुष्य अपनी भूल समझ जाय, निद्रा को छोड़कर सावधान हो जाय।


सांसारिक मोह, ममता और विषय-वासना का चस्का ऐसा लुभावना होता है कि उन्हें साधारण इच्छा होने से छोड़ा नहीं जा सकता। एक हलका-सा विचार आता है कि जीवन जैसी अमूल्य वस्तु का उपयोग किसी श्रेष्ठ काम में करना चाहिए, परंतु दूसरे ही क्षण ऐसी लुभावनी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं, जिनके कारण वह हलका विचार उड़ जाता है और मनुष्य जहाँ का तहाँ उसी तुच्छ परिस्थिति में पड़ा रहता है। इस प्रकार की कीचड़ में से निकालने के लिए भगवान अपने भक्त को झटका मारते हैं, सोते हुए को जगाने के लिए बड़े जोर से झकझोरते हैं। यह झटका और झकझोरना हमें दुःख जैसा प्रतीत होता है।


मृत्यु के समीप तक ले जाने वाली बीमारी, परमप्रिय स्वजनों की मृत्यु, असाधारण घाटा, दुर्घटना, विश्वसनीय मित्रों द्वारा अपमान या विश्वाघात जैसी दिल को चोट पहुँचाने वाली घटनाएँ इसलिए भी आती हैं कि उनके जबरदस्त झटके के आघात से मनुष्य तिलमिला जाय और सहज होकर अपनी भूल सुधार ले। गलत रास्ते को छोड़कर सही मार्ग पर आ जाय।


पूर्व संचित शुभ संस्कारों के कारण इसलिए दुःख आते हैं कि शुभ संस्कार एक सच्चे चौकीदार की भाँति उस मनुष्य को उत्तम मार्ग पर ले जाना चाहते हैं, परंतु पाप की ओर उसकी प्रवृत्ति बढ़ती है तो वे शुभ संस्कार इसे अपने ऊपर आक्रमण समझते हैं और इससे बचाव करने के लिए पूरा प्रयत्न करते हैं। कोई आदमी पाप कर्म करने जाता है, परंतु रास्ते में ऐसा विघ्न उपस्थित हो जाता है कि उसके कारण उस कार्य में सफलता नहीं मिलती। वह पाप होते-होते बच जाता है। चोरी करने के लिए यदि रास्ते में पैर टूट जाय और दुष्कर्म पूरा न हो सके, तो समझना चाहिए कि पूर्व संचित शुभ संस्कारों के कारण, पुण्य फल के कारण ऐसा हुआ है।


धर्म कर्म करने में, कर्तव्य धर्म का पालन करने में असाधारण कष्ट सहना पड़ता है। अभावों का सामना करना होता है। इसके अतिरिक्त दुष्टात्मा लोग अपने पापपूर्ण स्वार्थों पर आघात होता देखकर उस धर्म सेवा के विरुद्ध हो जाते हैं और नाना प्रकार की यातनाएँ देते हैं, इस प्रकार के कष्ट सत्पुरुषों को पग-पग पर झेलने पड़ते हैं। यह पुण्य संचय के, तपश्चर्या के अपनी सत्यता की परीक्षा देकर स्वर्ण समान चमकाने वाले दुःख हैं।


निस्संदेह कुछ दुःख पापों के परिणामस्वरूप भी होते हैं, परंतु यह भी निश्चित है कि भगवान की कृपा से, पूर्व संचित शुभ संस्कारों से और धर्म सेवा की तपश्चर्या से भी वे आते हैं। इसी प्रकार जब अपने ऊपर कोई विपत्ति आए, तो केवल यह ही न सोचना चाहिए कि हम पापी हैं, अभागे हैं, ईश्वर के कोपभाजन हैं, संभव है वह कष्ट हमारे लिए किसी हित के लिए ही आया हो, उस कष्ट की तह में शायद कोई ऐसा लाभ छिपा हो, जिसे हमारा अल्पज्ञ मस्तिष्क आज ठीक-ठीक रूप से न पहचान सके।


दूसरे लोग अनीति और अत्याचार करके किसी निर्दोष व्यक्ति को सता सकते हैं। शोषण, उत्पीड़ित और अन्याय का शिकार कोई व्यक्ति दुःख पा सकता है। अत्याचारी को भविष्य में उसका दण्ड मिलेगा, पर इस समय तो निर्दोष को ही कष्ट सहना पड़ा। ऐसी घटनाओं में उस दुःख पाने वाले व्यक्ति के कर्मों का फल नहीं कहा जा सकता।


विद्या पढ़ने में विद्यार्थी को काफी कष्ट उठाना पड़ता है, माता को बालक के पालने में कम तकलीफ नहीं होती, तपस्वी और साधु पुरुष लोक-कल्याण और आत्मोन्नति के लिए नाना प्रकार के दुःख उठाते हैं, इस प्रकार स्वेच्छा से स्वीकार किए हुए कष्ट और उत्तरदायित्व को पूरा करने में जो कठिनाई उठानी पड़ती है एवं संघर्ष करना पड़ता है, उसे दुष्कर्मों का फल नहीं कहा जा सकता।


हर मौज मारने वाले को पूर्व जन्म का धर्मात्मा और हर कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति को पूर्व जन्म का पापी कह देना उचित नहीं। ऐसी मान्यता अनुचित एवं भ्रमपूर्ण है। इस भ्रम के आधार पर कोई व्यक्ति अपने को बुरा समझे, आत्मग्लानि करे, अपने को नीच या निंदित समझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। कर्म की गति गहन है, उसे हम ठीक प्रकार नहीं जानते केवल परमात्मा ही जानता है।


हमें अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए हर घड़ी प्रयत्नशील एवं जागरूक रहना चाहिए। दुःख-सुख जो आते हों, उन्हें धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। मनुष्य की जिम्मेदारी अपने कर्तव्य धर्म का पालन करने की है। सफलता-असफलता या दुःख-सुख अनेक कारणों से होते हैं, उसे ठीक प्रकार कोई नहीं जानता।

Sunday, November 14, 2021

अध्यात्म को बदनाम ना करें

 अध्यात्म को बदनाम ना करें!

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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।


देवियो, भाइयो!


मित्रो! बात को समझिए। समझेंगे नहीं, तो हमारा अध्यात्म बदनाम होता चला जाएगा, नाश होता चला जाएगा और हर आदमी नास्तिक होता चला जाएगा। यह नास्तिकता की निशानी है। नहीं साहब! क्रिया करने से यह फायदा हो जाता है। आध्यात्मिकता का यह सस्तापन नास्तिकता की निशानी है। अगर इतना सस्ता अध्यात्म को बनाएँगे, तो आप निराश होंगे। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हम जब देवी-देवताओं के सामने पूजा करते हैं, तो उस पूजा करने के पीछे शिक्षण है, मार्गदर्शन है, प्रेरणा है। हम देवता के सामने फूल चढ़ाते हैं। फूल चढ़ाने से क्या फायदा होता है? आपके हिसाब से देवता एक ऐसा आदमी है, जिसको हमेशा गंदगी में रहना पड़ता होगा, जैसे मच्छर, मक्खी गंदगी में रहते हैं।


देवता माने गंदगी में रहने वाला, जिसको कभी खुशबू नहीं मिली, तो साहब! लीजिए, फूल लीजिए। क्या बात है आपने फूल खिला दिया? जिंदगी भर तो हमारे बाप दादाओं ने फूल नहीं देखे थे, यह आपकी व्याख्या है। फूल को पाकर के देवता को प्रसन्न होना चाहिए और फिर ले वरदान, ले वरदान। आपकी इस वाहियात सोच, वाहियात कसौटी के हिसाब से देवता को शक्कर की गोलियाँ खानी चाहिए। देखिए साहब! हमको तो बीस साल से शक्कर की गोली नहीं मिली। आपके बराबर दयालु और दानी और कोई नहीं है। अच्छा, तो लीजिए वरदान। शक्कर की सात गोली और सात वरदान—आपकी मान्यता तो यही है न?


मित्रो! हनुमान जी के पास दीपक जलाइए और वरदान पाइए। क्यों साहब! क्या माँगना है? दीपक क्यों ले आए? अरे साहब! हम यहाँ अँधेरे में पड़े थे। रास्ता पता नहीं था कि कहाँ, किधर जाएँ, कहाँ पानी पिएँ? हम घुप्प अँधेरे में पड़े थे। आपने दीपक जला दिया, बहुत मेहरबानी आपकी। अब आप दीपक जलाने का वरदान लीजिए, पर मैं बहुत नाराज हूँ कि आप देवताओं की ऐसी मिट्टी पलीद करते हैं। ये परिभाषाएँ नहीं हैं, जो अपने आप सोच रखी हैं। फिर क्या परिभाषाएँ हैं?


इसकी परिभाषा यह है कि पूजा के प्रतीक जब हम देवता के सामने रखते हैं, तो वह नसीहत देता है, मार्गदर्शन करता है। फूल हमारा मार्गदर्शन करता है। उस साइंस के हिसाब से जिसका अर्थ होता है—अपने आप को बदलना। फूल हमको बताता है कि वह एक किताब है। फूल एक गुरु है, फूल एक व्याख्यान है, फूल एक कथा है। फूल यह बताता है कि देवता के समीप जाना है, देवता का प्यार पाना है, तो आपको फूल जैसा जीवनक्रम बनाना चाहिए। फूल जैसी सुगंध, फूल जैसा कोमल, फूल जैसा शालीन, फूल जैसा परोपकारी, फूल जैसा हँसने और हँसाने वाला होना चाहिए।


अगर आप फूल से यह शिक्षण प्राप्त कर सकते हों, तो आपका फूल चढ़ाना सार्थक है। क्यों? क्योंकि उस सार्थकता से आपको प्रेरणा मिलेगी, प्रकाश मिलेगा। आप चाहे जहाँ उसका उपयोग करें। हमारी जिंदगी में क्या परिवर्तन होना चाहिए और हमें अपना क्या विकास करना चाहिए? अगर फूल चढ़ा दिया, तो उसके गुण हमको ध्यान रखने चाहिए कि हमें अपनी जिंदगी में क्या करना है? हमें क्या करना है? यह बिना बोलने वाला फूल अपनी मूकवाणी से सिखाता है।


मित्रो! दीपक से क्या मतलब है? दीपक से यह मतलब है कि हमारा दिल स्नेह-प्यार से लबालब भरा हुआ हो। स्नेह क्या है? चिकनाई। तेल, घी को भी स्नेह कहते हैं और प्यार को भी स्नेह कहते हैं। स्नेह से हमारा दीपक, हमारा मिट्टी का कटोरा, हमारा हृदय लबालब भरा हो और हमारी संपदा, हमारी प्यार की संपदा जलती रहे। हम स्वयं जलते रहें, हम स्वयं प्रकाशवान हों और दूसरों को प्रकाश फैलाएँ। अपने आप को जला करके दूसरों को रोशनी देता है, यह दीपक अपने आप में फिलॉसफी है। दीपक अपने आप में दर्शन है। दीपक अपने आप में शिक्षण है। दीपक अपने आप में एक पुस्तक है।


दीपक अपने आप में एक व्याख्यान है। इस व्याख्यान को आप सुनें और समझें, तत्पश्चात यह विचार करें कि क्या यह हमारे लिए संभव है कि दीपक जैसी जिंदगी जिएँ, क्या हमारे जीवन में दीपक जैसे सद्भावों का समावेश संभव है। यदि आप विचार कर सकें और दीपक आपको प्रेरणा देने में समर्थ हो सके और आप दीपक से प्रेरणा ग्रहण कर सकें और प्रेरणा ग्रहण करने के बाद में अपने जीवन में कुछ हेर-फेर बदलाव कर सकें, तो आपका दीपक जलाना सार्थक है। दीपक का यह महत्त्व बिलकुल सही है। दीपक जलाने का माहात्म्य बिलकुल सही है, पर शर्त सिर्फ यही है कि आप दीपक की फिलॉसफी को समझें। फिलॉसफी को समझें ही नहीं, वरन उससे प्रेरणा और प्रकाश लेकर के अपने आप को बदलना शुरू करें, तो आपका दीपक जलाना ठीक है।


मित्रो! हम भगवान को शक्कर की गोलियाँ अर्पित करते हैं, शक्कर की गोलियाँ खिलाते हैं। शक्कर की गोलियाँ खिलाने का तात्पर्य है कि भगवान मिठास को प्यार करते हैं। हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे व्यवहार में मिठास हो, हमारे आचरण में मिठास हो। हम चारों ओर शहद बिखेरते फिरें, ताकि हर आदमी हमारी ओर आकर्षित हो। शहद हमारी वाणी, शहद हमारा व्यवहार हो। शक्कर की गोलियाँ भगवान को प्यारी लगती हैं। भगवान शक्कर खाना पसंद करते हैं। भगवान को और कोई जायका पसंद नहीं है। सिर्फ एक ही जायका पसंद है, वो है शक्कर—मिठास।


भगवान जी! आप मिर्च का अचार खा लीजिए। नहीं साहब! हम नहीं खाएँगे मिर्च का अचार, अच्छा तो कचौड़ी का भोग लगा लीजिए। नहीं, कचौड़ी नहीं, हलुआ का प्रसाद बँटेगा। नहीं साहब! हलुआ नहीं, हम तो दालमोंठ बाँटेंगे। नहीं बेटे! शक्कर का ही बाँटना। क्यों साहब! यह क्या मामला है? शक्कर खाते-खाते महादेव जी के दाँतों में कैविटी हुई कि नहीं? दाँत खराब हुए कि नहीं हुए? ज्यादा शक्कर खाने से दाँतों में कीड़े लग जाते हैं और बच्चों के दाँत खराब हो जाते हैं।

Saturday, November 13, 2021

चेतना का परिष्कार है - अध्यात्म

 चेतना का परिष्कार है - अध्यात्म

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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।


देवियो, भाइयो! 


मित्रो! क्रियाएँ क्या हैं? आपको यह मालूम है? क्रियाएँ संकेत करती हैं, दिशाएँ देती हैं कि आखिर हमको करना क्या है? आखिर हमको जीना कैसे है? यह सारे-का अध्यात्म, वह अध्यात्म है, जिसको आपने बाजीगरी का नाम दिया हुआ है। आपको मैं बाजीगरी का इतिहास बताता हूँ। आप बाजीगरी के विद्यार्थी हैं। बाजीगर कौन होते हैं? जो क्रिया पर विश्वास करते हैं। हाथ की हेराफेरी करने से ये मिल सकता है और यह करने से यह मिल सकता है। नेति करने से यह मिलता है, धोति करने से यह मिलता है, बज्रोली करने से यह मिलता है।


आप क्रिया पर विश्वास करते हैं, इसलिए मैं आपको बाजीगर कहता हूँ और बाजीगर की संतान कहता हूँ। क्रिया से क्या हो सकता है? तमाशे से क्या हो सकता है? कुछ नहीं हो सकता। क्रिया किस काम के लिए है? क्रियाओं का मकसद एक है। क्रिया एक शिक्षण है। प्राचीनकाल में पुस्तकें कम थीं, इसलिए ये इशारे बना दिए गए थे कि जीवनयापन करने के ये तरीके अख्तियार करने चाहिए। तरीके अख्तियार करने के लिए तरह-तरह की क्रियाएँ बना दी गई थीं। क्रिया का अपने आप में कोई महत्त्व नहीं है। क्रिया का महत्त्व सिर्फ इस माने में है कि वह मार्गदर्शन करती है कि आपको जीना कैसे चाहिए?


मित्रो! पहले यह जान लीजिए कि अध्यात्म क्या चीज है? अध्यात्म के पीछे की बात बाद में जानिए। अध्यात्म है—"साइंस ऑफ सोल?" 'सोल' की साइंस है—अध्यात्म। 'सोल' किसकी? जीवात्मा की। जीवात्मा की साइंस होती है? एक फिजिक्स साइंस होती है। एक साइंस वह है जो पदार्थ से, मैटर से ताल्लुक रखती है, जिसे केमिस्ट्री कहते हैं, जूलॉजी कहते हैं, बायोलॉजी कहते हैं। यह सारी-की चीजें पदार्थ से ताल्लुक रखती हैं। यह फिजिक्स है, जिसे विज्ञान कहते हैं, साइंस कहते हैं।


चेतना का परिष्कार—अध्यात्म


एक और साइंस है। वह कौन-सी साइंस है? उसका नाम है—"साइंस ऑफ सोल।" पदार्थ की साइंस अलग है, मैटर की साइंस अलग है, परंतु 'सोल' मैटर नहीं है। 'सोल' एक चेतना है। चेतना को हम कैसे परिष्कृत कर सकते हैं? चेतना में निखार कैसे ला सकते हैं और चेतना की क्वालिटी हम कैसे बढ़ा सकते हैं? सारे-के उच्चस्तरीय सिद्धांतों के समुच्चय का नाम अध्यात्म है। अध्यात्म को आप क्या समझते हैं? आप तो ऐसी वाहियात बातें समझते हैं, जिन्हें जानकर गुस्सा आता है। आप क्या समझते हैं? आप तो यह समझते हैं कि शरीर में, दिमाग से क्रिया करेंगे, तो यह कमा लेंगे। यह फायदा कर लेंगे, इस देवता को पकड़ लेंगे। मुक्ति पा लेंगे। यह चमत्कार मिल जाएगा। आप न जाने क्या-क्या ख्वाब सँजो करके रखते हैं?


मित्रो! प्रत्येक क्रिया के पीछे शिक्षण है। प्रत्येक क्रिया के पीछे प्रेरणा है, प्रत्येक क्रिया के पीछे मार्गदर्शन है और प्रत्येक क्रिया के पीछे सूक्ष्म प्रक्रिया है, जो हमको सिखाती है कि हमारे जीवन की क्वालिटी कैसी रहनी चाहिए? क्वालिटी का एक उदाहरण मैं आपको बता सकता हूँ। देवताओं के सामने हम पूजा-पत्री का सामान रखते हैं। क्या-क्या रखते हैं? धूपबत्ती रखते हैं, चंदन रखते हैं, रोली रखते हैं, अक्षत रखते हैं, दीपक रखते हैं। आपकी परिभाषा के मुताबिक़ ये सब चीजें—चमत्कारिक होनी चाहिए। आपकी परिभाषा से देवताओं को इन वस्तुओं के द्वारा प्रसन्न होना चाहिए। इन वस्तुओं के द्वारा बृहस्पति को प्रसन्न करने का क्या तरीका है? पीपल का पत्ता, केले का पत्ता, केले के पत्ते पर हल्दी, हल्दी के ऊपर आँवला, आँवले के ऊपर सुपारी लेकर के चले जाइए और बरगद के नीचे रख करके आइए, बृहस्पति देवता प्रसन्न हो जाएँगे। आपकी परिभाषा के मुताबिक़ यही तरीका है न?


जैसे आप, वैसे आपके विचार। जैसे आपके सिद्धांत, जैसे आपके विश्वास—एक से बढ़कर एक वाहियात हैं—बृहस्पति देवता को प्रसन्न करने के लिए, शनि देवता को प्रसन्न करने के लिए लोहे की अंगूठी पहन लीजिए। अच्छा आप अँगूठी पहनेंगे और शनि देवता को क्या मिलेगा? चार आने। तेल में उनकी झाँकी देख लीजिए। बेटे! यही तेल शनि देवता को दे आ, ताकि शनि देवता अपनी मालिश तो कर लेंगे। तेल से दाल में बघार लगा लेंगे, छौंक लगा लेंगे और दाल तो खा लेंगे। नहीं साहब! शनि के दिन तेल लगा लीजिए, मालिश कर लीजिए, तो शनि देवता को फायदा हो जाएगा। चल मूर्ख! बेसिर-पैर की बातें करता है, बेबुनियाद की बात करता है।

Friday, November 12, 2021

बच्चों में सद्गुणों के बीज बोएँ

 बच्चों में सद्गुणों के बीज बोएँ।

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       व्यक्ति जो भी बचपन में सीखता है, वह उसके साथ तब तक रहता है, जब तक वह जीवित रहता है। वह ज्ञान, आदतें, दृष्टिकोण, स्वभाव और व्यवहार जो एक व्यक्ति एक वयस्क के रूप में प्रदर्शित करता है, वास्तव में वह सब बचपन से ही उसके द्वारा आत्मसात् की जाने लगती है।

       एक वयस्क मनुष्य बचपन की आदतों, संस्कारों, विचारों, मनोभाव आदि का परिणाम है, जिसे वह बचपन से ही विकसित करने लगता है।

       सचमुच जैसे छोटे से बीज में भविष्य का वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही एक बच्चे में भविष्य का मनुष्य छिपा होता है। यदि बीज उन्नत किस्म का है, तो उसका असर उस बीज से निकलने वाले वृक्ष पर पड़ेगा ही। सही जलवायु पाकर एक बीज से ही विराट् वटवृक्ष निकल आता है, वैसे ही एक छोटे से, नन्हे से नौनिहाल में, बच्चे में से एक विराट् व्यक्तित्व बाहर निकल आता है।

       बच्चा एक ऐसी कली की तरह से है, जो हजारों संभावनाओं का प्रतीक है। जैसे कली में फूल का भाग्य निहित होता है, वैसे ही भविष्य का मनुष्य अपने बचपन में ही आकार लेने लगता है।

       बचपन वयस्क के व्यक्तित्व को पहले से दर्शाता है अर्थात् बचपन भविष्य के मनुष्य को दिखाता है, वैसे ही जैसे सुबह दिन को दिखाती है। एक बच्चे का आचरण और व्यवहार उस बच्चे के अन्दर विकसित हो रहे भविष्य के मनुष्य को दिखाता है।

        पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों के कारण भी व्यक्ति बुरी आदतों, व्यवहार, दृष्टिकोण व विभिन्न प्रकार की बुराइयों के प्रति सहज ही आकर्षित होने लगते हैं। इसके साथ ही बुरी सङ्गति के कारण भी बच्चे बुरी आदतें सीखने लगते हैं। बच्चों को ऐसे वातावरण की आवश्यकता होती है जिसमें वे बुरी आदतों के प्रति आकर्षित न हो सकें।

       साथ ही यह प्रयास करें कि उनमें अच्छी आदतों, संस्कारों के बीज बोए जा सकें। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे उर्वर भूमि में बीज सहज ही उग आते हैं, पर बंजर भूमि में ऐसा सम्भव नहीं होता। उस बंजर भूमि को विशेष प्रयास से उर्वर बनाना होता है। 

      उसी प्रकार एक अभिभावक को भी एक कुशल किसान की तरह बच्चों की बंजर मनोभूमि को उर्वर बनाकर उनमें सद्गुणों व शुभ संस्कारों, आदतों, अभ्यासों के बीज बोने पड़ते हैं और उनकी सिंचाई व देखभाल करनी पड़ती है।

       बच्चा गीली मिट्टी के समान है। उसे मनचाहा आकार देना हो, तो उसके बचपन में ही उसे उसमें शुभ भावनाओं, विचारों, संस्कारों के बीज बोए जाने चाहिए। उसमें ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी और बहादुरी के बीज बोए जाने चाहिए। उसको करुणा, प्रेम, सेवा, सम्वेदना आदि मानवीय भावनाओं को कहानियों, कथाओं, कविताओं, सत्सङ्ग, स्वाध्याय, वृत्तचित्रों व स्वयं के आचरण से भरा जाना चाहिए।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति नवम्बर 2021 पृष्ठ 15

Thursday, November 11, 2021

भगवान के साथ अगर हमारे संबंध हो जाए तो!

 भगवान के साथ अगर हमारे संबंध हो जाए तो!

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गुरुनानक को उनके पिता ने नाराज होकर बीस रुपये व्यापार करने को दिये और कहा-जा व्यापार द्वारा अपना जीवन निर्वाह कर। गुरुनानक देव संत थे, उन्होंने बीस रुपये की हींग खरीदी और वहाँ आये, जहाँ पर संतों का एक भण्डारा चल रहा था। उस समय दाल बन रही थी। उसमें हींग का छोंक लगा दिया तथा सभी के आगे दाल परोस दी। सभी उपस्थित लोगों ने प्रेम से भोजन किया तथा प्रसन्न हुए। प्रातःकाल जब नानक घर पहुँचे, तो उनके पिता काफी नाराज थे। उन्होंने पूछा कि पैसों का क्या किया? नानक जी ने सारी बात बता दी तथा यह कहा कि पिताजी! हमने ऐसा व्यापार किया है, जो भविष्य में हजार गुना होकर वापस होगा। आज वास्तव में गुरुनानक साहेब की याद में स्वर्णमन्दिर अमृतसर में विद्यमान है, जो करोड़ों-अरबों का है। मित्रो, यह भगवान् के साथ व्यापार करने का लाभ है। हमने विचार किया-वह कैसा मंदिर है। करोड़ों का कौन-सा मन्दिर है, जिसमें गुरुनानक सोये हुए हैं। मित्रो, यह महत्त्व है भगवान् के साथ जुड़ने का, उससे सम्बन्ध करने का।


मित्रो, काश्मीर में हजरत मोहम्मद साहब का पवित्र बाल एक शीशी में रखा है। जहाँ हजारों-करोड़ों रुपयों की मस्जिद बनी है, जहाँ मोहम्मद साहब का बाल रखा है। अगर आज गुरुनानक देव, मोहम्मद साहब आ जायें तथा इतना बड़ा मूल्यवान मकान देख लें, तो उनको आश्चर्य होगा। मित्रो, यह आध्यात्मिकता का मूल्य है। भगवान् से सम्बन्ध बनाने के बाद आदमी कितना मूल्यवान हो जाता है, यह विचार करने का विषय है। वह बहुत कीमती हो जाता है। नानक, विवेकानंद, मोहम्मद साहब महान हो गये। भगवान् से सम्बन्ध हो जाने पर आदमी का वजन और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं।


अगर एक औरत की शादी एक सेठजी के साथ होती है तथा दुर्भाग्य से उसके पति का देहान्त हो जाता है, तो दूसरे दिन से ही वह सेठानी, उसकी सारी जमीन-जायदाद की मालकिन बन जाती है। यही होता है-भक्त का भगवान् से सम्बन्ध जोड़ने पर। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी, वकील की पत्नी वकीलनी, पंडित की पत्नी पंडितानी बन जाती है, चाहे वह पाँचवीं क्लास ही क्यों न पास हो। जिस प्रकार धर्मपत्नी बनकर आत्मा से सम्बन्ध जोड़ने पर वह पति की सारी सम्पत्ति की मालकिन बन जाती है, उसी प्रकार भगवान् से सम्बन्ध जोड़ने पर होता है। आपको यहाँ हमने इसलिए बुलाया है कि आपका ब्याह भगवान् से करा दें। इसके लिए आपको हमने अनुष्ठान प्रारम्भ कराया है। यह अनुष्ठान आपके विवाह के समय हल्दी लगाने तथा बाल सँवारने, वस्त्र आदि से सजाने के बराबर है। हम आत्मा का परमात्मा से मिलन कराना चाहते हैं। यह बाजीगरी है। हम आपका संबंध भगवान् से कराना चाहते हैं, ताकि आपका सम्बन्ध मालदार आदमी से हो जाये। मालदार आदमी के साथ सम्बन्ध बना लेने से आदमी को हर समय फायदा रहता है।


मित्रो, किसी का सम्बन्ध मालदार आदमी से होता है और वह उसके यहाँ काम करता है, तो उसे सेठजी कुछ लाने को भेजते हैं, तथा सौ रुपये देते हैं। वह अस्सी रुपये का सामान लाता है तथा बीस रुपये अपने पॉकेट में रख लेता है। सेठजी उससे पूछते भी नहीं हैं। इस प्रकार छोटे-छोटे कामों में वह पैसा इकट्ठा करता जाता है और मालदार के साथ मालदार हो जाता है। उसकी बीबी कहती है कि हमारे घर में बाबू की तनख्वाह से क्या होगा, अगर रोज न कमायें। यह है मालदार आदमी से जुड़ने पर भौतिक लाभ। भगवान् से जुड़ने पर हमें क्या-क्या लाभ मिलते हैं, यह आप जुड़कर स्वयं देखें।

Wednesday, November 10, 2021

भावना से सिद्धि

 *भावना से सिद्धि*


महाराज अंबरीष के संबंध में प्रजा में प्रख्यात था कि वे बड़े ही धर्म परायण व्यक्ति है। प्रतिदिन राजमहल के प्रांगण में ही बनवाये गये भगवान विष्णु के मंदिर में प्रातःकाल उषा बेला में पहुंचने, भगवान के विग्रह की पूजा अर्चना करने, संध्या, उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती।


इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभावग्रस्तों को प्रतिदिन एक स्वर्णमुद्रा बांटते थे, जिनकी भीड़ रोज प्रातः से ही लग जाया करती थी।


पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरांत अंबरीष अपनी समस्याओं को उनके पास लेकर सुलझाने के लिए आये नागरिकों से भेंट करते, उनके कष्ट सुनते, और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे।


इन सभी कार्यों से निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिये ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुंच जाते थे। महाराज अंबरीष को यही समय मिलता था भोजन के लिए।


*कष्टसाध्य जीवन जीते हुए ईश्वर भक्ति और प्रजावत्सलता के पुण्य कार्यों में लगे रहने के कारण अंबरीष को एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति से अपनी कष्टसाध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गये थे।*


महाराज अंबरीष की ख्याति से प्रभावित होकर अवंती राज्य के नरेश उदयभानु ने अपनी कन्या उदयानी के विवाह का प्रस्ताव किया। अंबरीष ने स्पष्ट कह दिया कि वह कठोर दिनचर्या का अभ्यस्त है और उसके साथ विवाह कर उदयानी को कष्ट तथा असुविधायें ही मिलेंगी।


परंतु उदयभानु ने कहा कि- _ *‘उदयानी स्वयं भक्ति, सेवा तथा तप तितिक्षा में विशेष रुचि रखती थी। यह प्रस्ताव भी उसी का है।’_*


अंबरीष ने प्रसन्न होकर विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।


*विवाह के पश्चात् प्रथम रात्रि को उषाकाल में, अंबरीष के उठने से पहले ही उदयानी जाग गयी और उसने विष्णु मंदिर में जाकर पूजा-अर्चा कर ली। अंबरीष जब जागकर मंदिर में गये तो यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि उनसे पहले ही उदयानी पूजा-पाठ से निवृत्त हो चुकी है और वह भी उन्हीं के मंदिर में। प्रथम पूजा का श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए यह सोचकर अंबरीष ने उदयानी को निर्देश दे दिया कि वह बाद में ही पूजा के लिए जाया करे। उदयानी ने सहर्ष इस निर्देश को अंगीकार कर लिया।*


कुछ समय बाद अंबरीष अनुभव करने लगे कि उदयानी उनकी अपेक्षा साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमंडल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य-शांति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उदयानी भाव समाधि की स्थिति में जा पहुंची हैं।


_*मैं इतने समय से पूजा, भक्ति और सेवा साधना में लगा हुआ हूं। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। उदयानी किस प्रकार इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार अंबरीष को और भी खिन्न और उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि भी कम होने लगी।*_


इन्हीं दिनों अंबरीष के गुरु, उस समय के प्रख्यात सिद्धयोगी राज-प्रासाद में आये। 


दिव्य दृष्टि से योगी ने महाराज अंबरीष के मनोद्वेगों को ताड़ लिया और पूछा *‘राजन्! आजकल आप निराश और खिन्न से क्यों दिखाई देते हैं?’*


अंबरीष ने अपनी मनोव्यथा खोल दी तो योगी ने समाधान किया- _*‘‘राजन्! सिद्धि पूजा या दीर्घ अवधि का नहीं भावना का परिणाम है। तुम जो पूजा साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है, जबकि राजमहिषी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया उसके पास अहं कहां बचा? और जहां अहं मिट जाता है वहां ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।’’*_


*इन वचनों ने अंबरीष की साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।*


(...........अखण्ड ज्योति Feb 1979)


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो ।*

Tuesday, November 9, 2021

सबसे समर्थ और सबसे सच्चा साथी

 *_धर्म_*

(सबसे समर्थ और सबसे सच्चा साथी)


एक छोटे से गाँव मे श्रीधर नाम का एक व्यक्ति रहता था स्वभाव से थोड़ा कमजोर और डरपोक किस्म का इंसान था!


एक बार वो एक महात्माजी के दरबार मे गया और उन्हे अपनी कमजोरी बताई और उनसे प्रार्थना करने लगा की *हॆ देव मुझे कोई ऐसा साथी मिल जायें जो सबसे शक्तिशाली हो और विश्वासपात्र भी जिस पर मैं आँखे बँद करके विश्वास कर सकु जिससे मैं मित्रता करके अपनी कमजोरी को दुर कर सकु! हॆ देव भले ही एक ही साथी मिले पर ऐसा मिले की वो मेरा साथ कभी न छोड़े।*


तो महात्मा जी ने कहा *पुर्व दिशा मे जाना और तब तक चलते रहना जब तक तुम्हारी तलाश पुरी न हो जायें! और हाँ तुम्हे ऐसा साथी अवश्य मिलेगा जो तुम्हारा साथ कभी नही छोडेंगा बशर्ते की तुम उसका साथ न छोड़ो।*


श्रीधर - *बस एक बार वो मुझे मिल जायें तो फिर मैं उसका साथ कभी न छोडूंगा पर हॆ देव मॆरी तलाश तो पुरी होगी ना?*


महात्माजी - *हॆ वत्स यदि तुम सच्चे दिल से उसे पाना चाहते हो तो वो बहुत सुलभता से तुम्हे मिल जायेगा नही तो वो बहुत दुर्लभ है।*


फिर उसने महात्माजी को प्रणाम किया आशीर्वाद लिया और चल पड़ा अपनी राह पर चल पड़ा!


सबसे पहले उसे एक इंसान मिला जो शक्तिशाली घोड़े को काबू मे कर रहा था तो उसने देखा यही है वो जैसै ही उसके पास जाने लगा तो उस इंसान ने एक सैनिक को प्रणाम किया और घोड़ा देकर चला गया श्रीधर ने सोचा सैनिक ही है वो तो वो मित्रता के लिये आगे बड़ा पर इतने मे सैनापति आ गया सैनिक ने प्रणाम किया और घोड़ा आगे किया सैनापति घोड़ा लेकर चला गया श्रीधर भी खुब दौड़ा और अन्ततः वो सैनापति तक पहुँचा पर सैनापति ने राजाजी को प्रणाम किया और घोड़ा देकर चला गया तो श्रीधर ने राजा को मित्रता के लिये चुना और उसने मित्रता करनी चाही पर राजा घोड़े पर बैठकर शिकार के लिये वन को निकले श्रीधर भी भागा और घनघोर जंगल मे श्रीधर पहुँचा पर राजा कही न दिखे!


प्यास से उसका गला सुख रहा था थोड़ी दुर गया तो एक नदी बह रही थी वो पानी पीकर आया और एक वृक्ष की छाँव मे गया तो वहाँ एक राहगीर जमीन पे सोया था और उसके मुख से राम राम की ध्वनि सुनाई दे रही थी और एक काला नाग उस राहगीर के चारों तरफ चक्कर लगा रहा था श्रीधर ने बहुत देर तक उस दृश्य को देखा और फिर वृक्ष की एक डाल टूटकर नीचे गिरी तो साँप वहाँ से चला गया और इतने मे उस राहगीर की नींद टूट गई और वो उठा और राम राम का सुमिरन करते हुये अपनी राह पे चला गया!


श्रीधर पुनः महात्माजी के आश्रम पहुँचा और सारा किस्सा कह सुनाया और उनसे पुछा हॆ *नाथ मुझे तो बस इतना बताओ की वो कालानाग उस राहगीर के चारों और चक्कर काट रहा था पर वो उस राहगीर को डँस क्यों नही पा रहा था। लगता है देव की कोई अदृश्य सत्ता उसकी रक्षा कर रही थी।*


महात्माजी ने कहा *उसका सबसे सच्चा साथी ही उसकी रक्षा कर रहा था जो उसके साथ था* 


तो श्रीधर ने कहा *वहाँ तो कोई भी न था देव बस संयोगवश हवा चली वृक्ष से एक डाली टूटकर नाग के पास गिरी और नाग चला गया।*


महात्माजी ने कहा *"नही वत्स उसका जो सबसे अहम साथी था वही उसकी रक्षा कर रहा था जो दिखाई तो नही दे रहा था पर हर पल उसे बचा रहा था और उस साथी का नाम है "धर्म" हॆ वत्स धर्म से समर्थ और सच्चा साथी जगत मे और कोई नही है केवल एक धर्म ही है जो सोने के बाद भी तुम्हारी रक्षा करता है और मरने के बाद भी तुम्हारा साथ देता है! हॆ वत्स पाप का कोई रखवाला नही हो सकता और धर्म कभी असहाय नही है महाभारत के युध्द मे भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों का साथ सिर्फ इसिलिये दिया था क्योंकि धर्म उनके पक्ष मे था।*


*हॆ वत्स तुम भी केवल धर्म को ही अपना सच्चा साथी मानना और इसे मजबुत बनाना क्योंकि यदि धर्म तुम्हारे पक्ष मे है तो स्वयं नारायण और सद्गुरु तुम्हारे साथ है नही तो एक दिन तुम्हारे साथ कोई न होगा और कोई तुम्हारा साथ न देगा और यदि धर्म मजबुत है तो वो तुम्हे बचा लेगा इसलिये धर्म को मजबुत बनाओ।*


*हॆ वत्स एक बात हमेशा याद रखना की इस संसार मे समय बदलने पर अच्छे से अच्छे साथ छोड़कर चले जाते है केवल एक धर्म ही है जो घनघोर बीहड़ और गहरे अन्धकार मे भी तुम्हारा साथ नही छोडेंगा कदाचित तुम्हारी परछाई भी तुम्हारा साथ छोड़ दे परन्तु धर्म तुम्हारा साथ कभी नही छोडेंगा बशर्ते की तुम उसका साथ न छोड़ो इसलिये धर्म को मजबुत बनाना क्योंकि केवल यही है हमारा सच्चा साथी।*


*श्रीधर ने फिर धर्म को ही अपना सच्चा साथी माना।*


*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

Monday, November 8, 2021

सूर्य षष्ठी व्रत कथा :-


सूर्य षष्ठी व्रत कथा :-

 छठी मइया दिहा आशीष 

 

              पौराणिक कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था, राजा प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी। इससे राजा और उनकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गई।

            जब राजा को संतान प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मृत पुत्र प्राप्त हुआ। इसकी जानकारी मिलने पर राजा प्रियव्रत को बहुत दुःख हुआ। संतान शोक से दुखी होकर राजा ने आत्म हत्या का मन बना लिया, परंतु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।

           देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्ठी देवी हूँ, लोगों को पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य प्रदान करती हूँ। जो भी सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण करती हूँ। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया।

          राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की आराधना के साथ देवी षष्ठी की पूरे विधि -विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई, तभी से सूर्यषष्ठी का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

जितेन्द्र रघुवंशी

Sunday, November 7, 2021

सुखों की भाँति ही दुःख को भी सहन कीजिए।

 सुखों की भाँति ही दुःख को भी सहन कीजिए।

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      सुखों के समान दुःख भी जीवन में आते ही हैं। दुःखों से सर्वथा रहित होना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। सुख के उपभोग के लिए मन पहले से ही तैयार रहता है। कोई सुख मिले, सफलता प्राप्त हो, लाभ हो, यश और वैभव बढ़े, तो इन सम्पदाओं को स्वीकार करने में किसी को कोई अड़चन नहीं होती, जब भी जिस समय भी यह मिले, उसी समय उन्हें प्रसन्नता पूर्वक शिरोधार्य कर लिया जाता है।

       पर यह बात दुःख के सम्बन्ध में नहीं होती। दुःख की बात सुनते ही घबराहट होती है, डर लगता है, कष्ट होता है और वैसा अप्रिय अवसर सामने आते ही मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है।

       कई बार तो यह हड़बड़ी इतनी अधिक होती है, कि विचार शक्ति ही कुण्ठित हो जाती है। क्या करें? क्या न करें? यह सूझ नहीं पड़ता। ऐसी स्थिति में कई बार मनुष्य ऐसे निर्णय या काम कर बैठता है, जो आपत्ति को और भी बढ़ा देते हैं तथा जिनके लिए पीछे बहुत पश्चाताप करना पड़ता है।

       इसलिए मनोभूमि की स्वस्थता इसी में मानी गई है, कि मनुष्य दुःखों के लिए भी वैसे ही कटिबद्ध रहे, जैसे सुखों के लिए तैयार रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि जानबूझकर दुःखों को बुलाया जाय या उन्हें हटाने का प्रयत्न न किया जाय। 

      ऐसा तो करना ही होता है। यह मनुष्य का स्वभाव है। इसके लिए किसी शिक्षा की जरूरत नहीं है। आपत्ति से बचने और दुःखों को हटाने के लिए कीट-पतङ्ग तक प्राप्त करते हैं, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है? वह पूरी चतुरता के साथ इस दिशा में काम करता ही है और अपनी बुद्धिमत्ता से अनेकों आपत्तियों को हटा भी लेता है।

       इतना होते हुए भी यह किसी के लिए भी सम्भव नहीं है, कि वह पूर्ण रुप से दुःखों से बचा रहे। लाख प्रयत्न करने पर भी उनके प्रयत्नों में अपूर्णता रहेगी ही, क्योंकि व्यक्ति अपूर्ण है।

       इस अपूर्णता के कारण दुःखों को हटाने का प्रयत्न भी पूर्णतया सफल न होगा। उसमें कहीं न कहीं त्रुटि रह ही जायेगी और अभाव एवं कष्टों का किसी मात्रा में सामना करना ही पड़ेगा।

(संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1961 पृष्ठ 14

Saturday, November 6, 2021

अपने भीतर के सूर्य को उदय करें

 "अपने भीतर के सूर्य को उदय करें"

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             यदि किसी को आत्मज्ञान की या आंतरिक ऊर्जा की थोडी-सी झलक भी मिलती है तो उतने में भी उसका जीवन अत्यन्त प्रकाशित महसूस होता है।                     

         यदि किसी के भीतर आंतरिक ऊर्जा का संपूर्ण जागरण हो जाए तो उसका व्यक्तित्व कितना प्रकाशित व प्रेरक बन जाएगा।

             हर व्यक्ति के अंदर उसकी जीवात्मा में सूर्य के समान प्रकाश मौजूद है, लेकिन वह चित्त के आवरण में ढका रहता है। 

               जो व्यक्ति अपना आत्मदर्शन कर पाते हैं, वे उस प्रकाश तक पहुंचते है और तब उनका व्यक्तित्व आलोकित हो उठता है। 

                सूर्य और मनुष्य में बहुत सारी बातें एक समान हैं। दोनों में अनन्त ऊर्जा समाहित है। दोनों में प्रकाश की कोई सीमा नहीं है। दोनों में ही दूसरों को जीवन देने की अदभुत शक्ति है।

              विज्ञान की शब्दावली में भले ही सूर्य के पास व्यक्ति की तरह मन नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से सूर्य इस जगत की आत्मा है, इस जगत का केन्द्र है, सृष्टि के सारे घटना क्रमों का मुख्य स्त्रोत सूर्य है और सूर्य, परमात्मा का साक्षात दृश्य रूप व प्रत्यक्ष देवता है। 

              सूर्य निरन्तर लोगों को अनुशासन, संतुलन व निरन्तरता की सीख देता है। उसका उदय व अस्त होना, दोनो ही बिशेष हैं। सूर्य के चढने और डूबने, दोनो के ही मायने हैं।

             हम कभी यह सोच भी नहीं सकते कि कल सूर्य होगा भी या नहीं। भले ही वह दिखाई न दे, बादलो के कुहासों में छिपा हो, फिर भी यह भरोसा होता है कि वह है। लेकिन इस तरह का भरोसा हम स्वयं पर नही कर पाते, अपनी ऊर्जा का अनुभव नही कर पाते, अपने प्रकाश को महसूस नही करते।

                 दूसरों से ईर्ष्या, जलन, शरमिंदगी, संकोच व घृणा में हम अपनी बहुत सारी ऊर्जा बेकार कर देते हैं। छोटी छोटी बातो पर हम अपना धैर्य खो बैठते हैं। खुद को साबित करने व प्रतिक्रिया देने में जुट जातें हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते और बीच मार्ग में ही अपनी ऊर्जा खो देते हैं। यह स्थिति पढाई, कैरियर, स्वास्थ्य, नौकरी, रिश्तें आदि सभी पर लागू होती है, क्योंकि हम अपने कार्य व विश्राम के बीच संतुलन बनाना नहीं सीखते।

             सूर्य से यह सीखा जा सकता है कि हम अपने कार्य व विश्राम के बीच संतुलन कैसे बिठाऐं। हम भी सूर्य के समान हर दिन नए जोश और उत्साह के साथ कार्य की शुरूआत करें। सूर्य के समान ही धीरे धीरे अपने गुणों , अपनी क्षमताओं को बढाऐं, फिर अपनी सीमाओं को समझे, होश में रहें, विश्राम करें और जिस तरह श्याम के समय सूर्य अस्त होता है, विश्राम करता है, उसी तरह दिन भर के कार्यों के बाद अपनी बैटरी को रिचार्ज करने के लिए हम विश्राम करें; क्योंकि कार्य के समान विश्राम भी जरूरी है।

               हमारे कार्यो का प्रभाव केवल हम पर नहीं पडता, वरन् दूसरो पर भी पडता है। हमारे कार्यो के प्रभाव से दूसरो को भी मार्गदर्शन व प्रेरणा मिलती है। हमारा सही दिशा में पूरी एकाग्रता से काम करना, संभावनाओं के नए रास्ते खोलता है। जब भी हम अपने कार्यों को प्रभावकारी ढंग से करते हैं, तब हमारे कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से पूरे हो जाते हैं।  अपने काम के लिए हमारे अंदर पूरा जोश  और उत्साह होना ही हमें ऊर्जा से भर देता है और कार्य के प्रति हमारी दृढता सभी प्रकार की बाधाओं को दूर कर देती है।

                यदि हमारे अंदर साहस व दृढता की उष्मा है और बुरे से बुरे हालात में भी आशा व उम्मीद की किरण हमारे अंदर जिंदा है तो चाहे स्थिति कैसी भी हो, उस दौर में हमारी जीवन यात्रा शुभ ही होती है। इस यात्रा के दौर में सबसे अहम बात है कि अपनी आंतरिक ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट होने से बचाया जाए और उसे सही दिशा में लगाया जाए। इसके साथ ही अपनी आंतरिक ऊर्जा को बढाने के निम्न उपाय भी किए जाऐं-

1. जहां तक संभव हो, दिमाग को शांत रखा जाए, क्योंकि किसी भी अंग की तुलना में हमारे दिमाग को सबसे अधिक ऊर्जा चाहिए, अतः हमें अपनी ऊर्जा को बेकार की चिंताओं, शिकायतों व व्यर्थ के कार्यो में नहीं गंवाना चाहिए।

2. अपनी आंतरिक ऊर्जा को बढाने के लिए उचित शारीरिक व मानसिक पोषण का ध्यान रखना चाहिए। पोषक तत्वों से भरपूर, उचित मात्रा में किया गया आहार हमारी ऊर्जा को निरन्तर बढाता है।

3. कार्य के साथ साथ विश्राम को भी पर्याप्त समय देना चाहिए, इसलिए दिनभर के कार्योके बाद हमें विश्राम करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

4. नियमित व्यायाम करें और शरीर को सक्रिय व मजबूत बनाने का प्रयास करें।

5. हंसना हंसाना और दूसरों की मदद करना भी हमें ऊर्जा से सराबोर करता है।

           इस तरह उपरोक्त बातें हमारें अंदर की ऊर्जा को सक्रिय बनाने में हमारी मदद करती हैं और हमारे भीतर छिपी हुई सूर्य के समान ऊर्जा को उजागर करती हैं।

     --अखण्ड ज्योति, जून 2018

    -- अखिल विश्ब गायत्री परिवार

Friday, November 5, 2021

मैं अभागन उन्हें पहचान न पाई

 मैं अभागन उन्हें पहचान न पाई

        सन् २००९ ई. की गुरु पूर्णिमा के दिन अपने पति और बेटे के साथ मैं हरिद्वार पहुँची। दो कुली को साथ लेकर हम तीनों प्लेटफार्म से बाहर आए। सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ था। जगह- जगह सेना के जवान तैनात थे। हमारे बाहर निकलते ही सेना के एक गश्ती दल ने रोककर कहा- शहर में धारा १४४ लागू है। एक साथ पाँच लोगों का घर से निकलना मना है। तुरन्त वापस जाओ। वरना गिरफ्तार कर लिए जाओगे, पर हमारा शान्तिकुञ्ज पहुँचना बहुत ही जरूरी था। हमें अगले दिन से आरम्भ होने वाली विशेष साधना के लिए उसी दिन संकल्प लेना था। पति और बेटे को वहीं छोड़कर मैं सड़क की ओर बढ़ी। पतिदेव ने टोका- कहाँ जा रही हो? मैंने कहा- आगे जाकर देखती हूँ, शायद कोई सवारी मिल जाए। मेरा जवाब सुनकर वे मुझ पर बरस पड़े- तुमने सुना नहीं कि धारा १४४ लागू है। यहाँ कोई तेरा बाप बैठा है, जो तुझे ले जाएगा। मैंने तमककर कहा- हाँ हैं न बाप! वही तो ले जाएँगे।


        बाहर निकलकर काफी देर तक खड़ी रही, पर कोई सवारी नहीं मिली। मैंने घड़ी देखी- बीस मिनट बीत चुके थे। शाम होने से पहले पहुँचना जरूरी था। कुछ देर और रुकी रही तो संकल्प का समय निकल जाएगा। यह सोचकर मुझे रोना आ गया। हे गुरुदेव! अब क्या करूँ? तुमने बुलाया, तो मैं आ गई। अब तुम्हीं कुछ ऐसा करो कि संकल्प ले सकूँ।     


        मुझे रोते देख गश्ती दल वाले आकर पूछताछ करने लगे। मैं उन लोगों को समझाने का प्रयास कर रही थी कि मेरा आज ही शांतिकुंज पहुँचना बहुत जरूरी है। सभी यही कहते- पैदल चले जाओ, मगर मैं उतनी दूर तक पैदल चल नहीं सकती थी और हमारे साथ सामान भी बहुत सारे थे।


        करीब ४५ मिनट बाद सामने से एक रिक्शा वाला आता हुआ दिखा। उसने पीला कुर्ता पहन रखा था। कन्धे पर पीला झोला भी लटकाये हुए था। पास आने पर मैंने उसे रोकते हुए कहा- बाबा मुझे शांतिकुंज जाना है, चलोगे क्या? रिक्शा वाला बोला- बैठ जाओ, पहुँचा देता हूँ। मैंने कहा- मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे साथ मेरा बेटा और पति हैं। कुछ सामान भी है। उसने कहा- ले आओ।


        वापस आकर मैंने बेटे से कहा- जल्दी से सामान उठाओ, एक रिक्शा वाला जाने को तैयार है। इतना सुनते ही मेरे पति बेटे से कहने लगे- तुम्हारी माँ तो पागल हो गई है। धारा १४४ में रिक्शे वाले को कौन जाने देगा। इतने में रिक्शा वाला भी हमारे पास आकर बोला- चलना है तो चलो, नहीं तो मैं जा रहा हूँ। मैंने इन दोनों से कहा- कोई जाए या न जाए, मैं तो जाती हूँ। मेरे रिक्शा पर बैठने के बाद वे दोनों भी सामान के साथ आ बैठे।


        रिक्शा अभी थोड़ी ही दूर चला था कि गश्ती दल वालों से सामना हुआ। उन्होंने रिक्शा किनारे लगवाकर कहा- पैदल जाना हो तो जाओ, रिक्शा नहीं जायेगा। रिक्शावाला कुछ देर तो चुपचाप खड़ा रहा, फिर उसने नजर बचाकर निकलने की कोशिश की। लेकिन गश्ती दल वालों ने उसे निकलने नहीं दिया। जब तीन बार ऐसा ही हुआ, तो उसने सिपाहियों से कहा- अब तुम लोग हाँ कहो या ना कहो, मुझे तो इन्हें शांतिकुंज ले ही जाना है। सिपाहियों ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा- बाबा, हम तो नियम से बँधे हैं, यदि तुम्हें जाने दें, तो साहब हमें सस्पेंड कर देंगे।


        रिक्शे वाले ने कहा- तुम्हें कोई सस्पेंड नहीं करेगा। कहाँ हैं तुम्हारे साहब? ले चलो मुझे उनके पास। एक सिपाही रिक्शे वाले को साथ लेकर अन्दर गया। देखते ही साहब कड़ककर बोले- क्या बात है? रिक्शावाले ने बताया- बाबूजी इनका शांतिकुंज पहुँचना बहुत जरूरी है। महिला हैं, इतनी दूर पैदल कैसे चलेंगी? साथ में सामान भी है। दोनों की बहस में दस मिनट बीत गए। अंत में बाबा ने कहा- रिक्शा नहीं जा सकती, तो आप ही पहुँचाइये। आपके पास तो सरकारी गाड़ी भी है।


        इस बात पर पास ही बैठे बड़े साहब को हँसी आ गई। वे बोल पड़े- अरे जाने दो इसे, पागल है, मानेगा नहीं। रिक्शा आगे बढ़ चला। बाबा ने शांतिकुंज के गेट पर पहुँचकर रिक्शा रोका। मैंने बाबा से कहा- तुम भी चलो, सुबह हवन करके चले जाना। बाबा मुस्कराने लगे। अब मेरा ध्यान बाबा के चेहरे की तरफ गया। मैं यह देखकर चौंक पड़ी कि बाबा का चेहरा पूज्य गुरुदेव से मिलता- जुलता है। पूजा घर में मैं देर तक गुरुदेव का फोटो देखती रहती हूँ। मुझे लगा कहीं ये गुरुदेव ही तो नहीं। वहीं कद- काठी, वही ललाट, वैसे ही ऊपर की तरफ लहराते बाल। फर्क सिर्फ इतना था कि बाबा की तरह उनकी दाढ़ी नहीं थी।


        तभी बाबा के बोलने से मेरा ध्यान टूटा। वे कह रहे थे- सामान अन्दर ले जाओ, देर हो रही है। मैंने कहा- पहले भाड़ा तो दे दूँ। वे बोले- एक बार में सारा सामान नहीं जा सकेगा। तुम लोग थोड़ा सामान अन्दर रखकर आ जाओ, तब तक मैं बाकी के सामान देखता हूँ।

        वापस आकर मैंने देखा कि सामान तो गेट के पास ही रखा है, लेकिन न तो वहाँ कोई रिक्शा है और न ही रिक्शे वाले बाबा। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बिना पैसे लिए ही बाबा चले कैसे गये। अचानक मन में यह सवाल उठा- कहीं ये पूज्य गुरुदेव ही तो नहीं थे। हरिद्वार स्टेशन के पास धारा १४४ होने के बावजूद एक रिक्शे वाले का आना, पुलिस वालों को मनाकर हमें शांतिकुंज पहुँचाना अनायास ही नहीं हुआ। यह गुरुदेव की ही लीला है।


        बात समझ में आते ही मैंने दोनों हाथों से सिर पीट लिया- हाय अभागन! तुमने उन्हें पहले ही क्यों नहीं पहचाना? मैं बिलख उठी- हाय गुरुदेव! मुझे छलावा देकर चले गए। अपने बारे में बता दिया होता, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता। यह अभागन भी तुम्हारे चरणों की धूल अपने माथे से लगाकर अपना जीवन सफल बना लेती।

    

प्रस्तुतिः नीता बेन देवेन्द्र भाई जानी

अहमदाबाद (गुजरात)