Sunday, January 2, 2022

जीवात्मा के भीतर का प्रकाश जगाना होगा!

 जीवात्मा के भीतर का प्रकाश जगाना होगा!

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मित्रो! काम किससे बनता है? काम उससे बनता है जिस जीवात्मा के भीतर प्रकाश भरा हुआ है। ऐसे आदमी जहाँ कहीं भी गये हैं, खराब परिस्थितियों को भी अच्छा बनाते चले गये हैं। बुरे लोगों को अच्छा बनाते चले गये हैं। बुरी परिस्थितियों पर कब्जा करते चले गये हैं। अँधेरे में रोशनी पैदा करते हुए चले गये हैं। और जिनके दिल और दिमाग सो गये थे, उनको जगाते हुए चले गये हैं। कौन? जो स्वयं जगा हुआ है। आपको स्वयं जगा हुआ इंसान बनाने के लिए हमने इस शिविर में बुलाया है। न जाने क्यों एक पुरानी घटना हमको बार- बार याद आ जाती है। कुंभ का मेला लगा हुआ था, जैसे यहाँ कल से कुंभ मेला प्रारंभ होने वाला है। उसी तरह कुंभ मेले में एक स्वामी जी आये थे। स्वामी जी ने इसी तरीके से व्याख्यान दिया था, जैसे हम आपको यहाँ दे रहे हैं। हमको स्वामी जी का नाम याद आ रहा है। उनके जो गुरु थे, आँखों से अंधे थे। उन्होंने अपने विद्यार्थी से कहा कि बेटे! तू मुझे कुछ देगा क्या? मैंने तुझे विद्या दे दी, प्यार दे दिया, बल दे दिया। तू भी कुछ देगा क्या?


विद्यार्थी बोला- ‘गुरुदेव! मेरे पास क्या है? मैं क्या दे सकता हूँ।’ लौंग का एक जोड़ा लेकर गुरुदेव के पास गया और बोला कि गुरुदेव! दक्षिणा में बस यही है हमारे पास। बेटे, लौंग के जोड़े का मैं क्या करूँगा? यह मेरे किस काम आने वाला है? तो फिर क्या चीज दूँ? मेरे पास क्या है बताइये? मैं तो साल भर आपके पास पढ़ा हूँ और रोटी भी तो मैंने यहीं से खाई है। कपड़ा भी तो आपने ही पहनाया है। अब मेरे पास क्या चीज रह जाती है जो मैं आपको दूँ।


गुरुदेव बोले- बेटे तेरे पास इतनी कीमती चीज है, जो तुझे भी मालूम नहीं है। मेरे पास क्या चीज है? तेरे पास है तेरा वक्त, तेरा श्रम, तेरा पसीना, तेरा हृदय, तेरा मस्तिष्क, तेरी बुद्धि, तेरी भावनाएँ। तेरे पास यह इतनी बड़ी चीजें हैं कि उसका रुपये से कोई सम्बन्ध नहीं है। रुपया तो इसके सामने धूल के बराबर है, मिट्टी के बराबर है। रुपया किसी काम का नहीं है इसके आगे। तेरे पास ये चीजें है, उन्हें तू मुझे दे दे।


विद्यार्थी को उमंग आ गयी। उसने कसम खाकर कहा- ‘गुरुजी! कसम खाकर के कहता हूँ कि यह जिंदगी आपके लिए है और इसे आपके लिए ही खर्च करूँगा।’ बस, वह निहाल हो गया। आँखों से अंधे गुरु की आँखें चमक पड़ीं। कौन से गुरु की? स्वामी बिरजानन्द की। स्वामी बिरजानन्द की आँखें मथुरा में अंधी हो गयीं थीं। बाहर की आँखें तो अंधी बनी रहीं, लेकिन भीतर की आँखों में ऐसी रोशनी आई, कि चेहरा चमक पड़ा। खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने उस विद्यार्थी से, जिसका नाम था ‘दयानन्द’- से कहा कि ‘बच्चे! तू जा। पाखंड खंडिनी पताका लेकर जा। पहला काम तुझे लोगों के मस्तिष्क की सफाई का करना पड़ेगा। पहला काम लोगों को ज्ञान देना नहीं है, रामायण पढ़ाना नहीं है, गीता पढ़ाना नहीं है, मंत्र देना नहीं है।’


नहीं, गुरुजी! शंकरजी का मंत्र दे दीजिए। अरे बाबा! शंकर जी भी मरेंगे और तू भी मरेगा। पहले अपने को भीतर- बाहर से धोकर के साफ कर ले। धोया नहीं जायेगा तो बात कैसे बनेगी। पाखाने का कमोड लेकर के आप जाइये। गुरुजी! इसमें गंगा जल डाल दीजिए। बेटे, इसमें गंगा जल डालने की बजाय तो यह जैसी है वैसी ही पड़ी रहने दे। मित्रो! इन्सान को जब तक धोया नहीं जायेगा और उसमें आप राम का नाम डालेंगे, हनुमानजी का नाम डालेंगे, गणेश जी का नाम डालेंगे और रामायण का नाम डालेंगे, तो रामायण की मिट्टी पलीत हो जायेगी और कृष्ण जी की मिट्टी पलीत हो जायेगी और वह गंदगी जहाँ की तहाँ बनी पड़ी रहेगी।


मित्रो! आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के लिए क्या करना पड़ता है? इसमें पहला काम सफाई का होता है, चाहे वह समाज की सफाई हो, चाहे व्यक्ति की सफाई हो, चाहे किसी की सफाई हो। सफाई किये बिना अध्यात्म का रंग किसी पर चढ़ा ही नहीं है। कपड़ा रँगने से पहले आपने उसे धोया था न? अगर आपने धोया नहीं होगा, तो कपड़े का रंग कभी भी नहीं आ सकता। राम का नाम कपड़ा रँगने के बराबर है। इसके पहले हमको वह काम करना पड़ता है, जिसको हम संयम कहते हैं। जिसको हम तप कहते हैं। जिसको हम योगाभ्यास कहते हैं। तप क्या होता है? संयम क्या होता है? और योगाभ्यास क्या होता है? इनसे आपके शरीर और मन पर अर्थात् बहिरंग और अंतरंग में जो पाप और दुष्प्रवृत्तियाँ हावी हो गयी हैं, उनको साफ करना पड़ता है।

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