निराश रहने का कारण है- आत्मविश्वास का अभाव।
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उदास स्वभाव के मनुष्य को यदि एक तिनके की बराबर हानि हो जाय, तो वह समझता है कि मेरा सर्वस्व चला गया। मेरी सारी सम्पदा नष्ट हो गई। जब जरा-जरा सी बातों में इतना उद्वेग होता है, तो किसी महत्वपूर्ण विषय पर गम्भीरता के साथ विचार करने के लिए उनके मस्तिष्क में स्थान नहीं बच पाता।
जैसे पहाड़ से नीचे बहने वाला पानी बर्फ को भी अपने साथ बहा लेता है, वैसे ही आँसू जब बहते हैं, तो चेहरे की सुन्दरता को भी बहा ले जाते हैं।
तेजाब में पड़ा हुआ मोती पहले मैला होता है, फिर गल जाता है। उसी तरह निराशा पहले मनुष्य को निर्बल बनाती है, फिर उसे खा जाती है।
कायरता हमारे हाथों को बाँध देती है और सद्गुणों पर आलस्य का पर्दा डाल देती है और जीवन के वास्तविक आनन्द का गला घोंटकर हत्या कर देती है।
एक महापुरुष का कथन है कि - "आँधी के झोंके से टूट कर गिरे हुए वृक्ष में फिर उठने की शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार निराशा के भार से दबा हुआ मनुष्य अपाहिज बन जाता है।
आत्मविश्वास का अभाव अन्य प्रकार के अभावों, अपने भाई-बन्धुओं को बुलाता है, जैसे कोई खाने की वस्तु मिलने पर कौंआ काँव-काँव करके अन्य कौओं को बुला लेता है।
आत्मा को दुर्बल बनाने वाला, उत्साह को नष्ट करने वाला, सफलता के आसन पर विफलता को बिठाने वाला केवल एक ही शत्रु है, वह है आत्मविश्वास का अभाव।
इस शत्रु से सावधान रहो! जब जरा सी उदासीनता या निराशा के भाव मन में उत्पन्न होने लगे, तो तुरन्त सावधान हो जाओ! अपने आत्मा को समझो! जैसे ही तुम अपनी महान शक्ति को पहचानते हो, वैसे ही कमजोरी के विचार स्वयमेव चले जाते हैं।
उस उदासीन मनुष्य को देखो! जड़ कटे हुए पौधे की तरह सिर झुकाये और आँखें नीची किये हुए खड़ा है। क्या अपने लिए तुम ऐसी ही स्थिति पसन्द करोगे?
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति मार्च 1941 पृष्ठ 23
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