जीवन का अधिकाँश समय, श्रम एवं कौशल विशिष्टता सिद्ध करने में खपता है।
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किसी की जीवनचर्या का लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है, कि जीवन निर्वाह के साधन तो सरलतापूर्वक कम समय और कम परिश्रम में भी जुट सकते हैं, पर लोगों के निरन्तर व्यस्तता में ग्रसित रहने का प्रमुख कारण एक ही पाया जाता है, दूसरों की तुलना में अपनी विशिष्टता सिद्ध करना।
इसी का सरंजाम जुटाने में मनुष्य जीवन का अधिकाँश समय एवं कौशल खप जाता है। इसे मृगतृष्णा ही कहना चाहिए, जिनकी आकर्षक छवि मनुष्य को अपनी ओर खींचती है और उसकी बहुमूल्य क्षमता को चूस लेती है।
यह भुला दिया जाता है कि संसार में एक से एक बढ़कर "बड़े आदमी" भरे पड़े हैं। उनकी तुलना में भरपूर प्रयत्न करने पर भी कदाचित अपनी बढ़ी-चढ़ी सफलता भी नगण्य समझी जा सके।
फिर वह उत्साह तभी तक रहता है, जब तक हमें इच्छित वस्तु या स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती। उपलब्धि के कुछ क्षण ही पानी के बबूले जैसा उत्साह प्रदान करते हैं। इसके बाद तो जो मिलता है, उसका बोझ और दायित्व वहन करते रहना ही कठिन पड़ जाता है।
ठाट बाट, सम्पत्ति संग्रह, पदवी धारी, सत्ताधारी होने की इच्छाएँ मनः क्षेत्र में ही उठती है। दूसरों से अधिक समर्थ, सम्पन्न होने की अभिलाषा से प्रेरित होकर लोग प्रतिस्पर्धा में उतरते हैं और विजयी होने पर गर्व जताते हैं।
चुनाव जीतने में लोक सेवा की भावना कम और अपने को विशिष्ट सिद्ध करने की आकाँक्षा अधिक होती है। अखबारों में नाम छपाने, समारोहों में प्रमुख पद पर आसीन होने, तीर्थ यात्रा आदि के माध्यम से लोगों की दृष्टि में धर्मात्मा जिसने जैसे ताने-बाने इसीलिए बुने जाते हैं।
जो पाया है, उसे बचाए रहना भी कठिन होता है। ईर्ष्यालु उठ खड़े होते हैं और छिनने या नीचा दिखाने की दुरभि सन्धियाँ रचने लगते हैं, फिर जो हर्ष या यश मिला था, वह भी थोड़े ही समय स्थिर रहता है।
व्यस्तता-ग्रस्त दूसरे लोग तो उसे कब तक स्मरण रखे रहेंगे। स्वयं अपने को ही अपनी पिछली बातें याद नहीं रहती। जीवन में नए काम ही इतने आ जाते हैं कि पिछले दिनों की याद बनाए रखना सम्भव नहीं होता।
मनुष्य स्वभावतः महत्वाकाँक्षी है। सुख उपभोग की इच्छा हर प्राणी में पाई जाती है। इस हेतु वह अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में संलग्न रहता पाया जाता है।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1989 पृष्ठ 47
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