प.पू.गुरुदेव का अंतःकरण करूणा और ममत्व से भरा हुआ था!
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प.पू. गुरूदेव का जन्म एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ! पिता कुल पुरोहित थे। आस पास की सभी जमींदारियों में बड़ा सम्मान था तथा जब भी कभी भागवत पारायण होता उनके पिता पं. रूपकिशोर जी को ही बुलाया जाता। गाँव के बीच एक किलेनुमा हवेली में उनका निवास था। पर बालक श्रीराम का मन वहाँ घुटता रहता। वह निकल जाता अपने साथियों के साथ-दुखियों, बीमारों की तलाश में। गाँव में कभी हाट बाजार लगता तो उनके स्वयं सेवकों की टोली सबको पानी पिलाती। सबको प्राथमिक सहायता से लेकर पशु चिकित्सा के पैम्फलेट्स हाथों से बाँटते। सब ढेरों आशीर्वाद देते। ऐसे ही दिनों में एक दिन उन्हें जानकारी मिली कि उनके घर की हरिजन महिला छपको तीन चार दिनों से किसी कारण से आ नहीं रही। वे उसे प्यार से अम्मा कह कर बुलाते थे। निकल पड़े व पहुँच गए हरिजनों के टोले में। गाँव के सभी ब्राह्मणों, ठाकुरों ने टोका-रोका व कहा कि “घर जाकर पढ़ाई करो-भंगियों में तुम्हारा कोई काम नहीं है। कहीं छू लिया तो प्रायश्चित और करना पड़ेगा।
वे भला रुकने वाले थे। गंदी नालियों से गुजरते हुए वे पहुँच गए उस अम्मा के घर व देखकर हैरान रह गए कि उसकी हथेली में बड़ा घाव है व बिना दवा कराए उच्च ताप में वह बिस्तर में पड़ी है। पहले ढेरों उलाहने दिए और फिर का कि अभी मलहम पट्टी का सामान लेकर आता हूँ। शोषित समुदाय की उस वृद्ध ने श्रीराम को रोकते हुए कहा कि वह खुद ही पाँच मील दूर अस्पताल जाकर मलहम करा लेगी पर वे तो घर से सामान लेकर ही लौटे। खूब मन लगाकर कीड़ों से सने गैग्रीन में बदल रहे घाव को धोया और लाल दवा लगा कर मलहम पट्टी कर दी फिर कहा कि जड़ी बूटियों का काढ़ा और बना जाता हूँ ताप उतर जाएगा। वह डबडबाए नेत्रों से उन्हें आशीर्वाद देती रही। किन्तु आगे का मार्ग और भी दुष्कर था। घर पहुँचे तो गंगाजल का घड़ा लिए घर वाले खड़े थे ताकि स्नान करा के पवित्र किया जा सके व फिर प्रताड़ित कर आगे के लिए सावधान किया जा सके। बालक श्रीराम का कहना था कि ‘तुम लाख रोको मैं जाऊँगा जरूर। तब तक, जब तक कि उस बुढ़िया के घाव ठीक ठीक नहीं हो जाते। अतः गंगा जल की व्यवस्था और कर लेना क्योंकि रोज ही मुझे पवित्र करना पड़ेगा”। डाँट पड़ी तथा भोजन भी नहीं दिया गया। किन्तु बालक कच्ची मिट्टी का नहीं बना था।
वह पुनः अगले दिन गया व फिर पाँच दिन तक जब तक कि उस वृद्ध के घाव सूखकर वह चलने योग्य नहीं हो गई। इस बीच उसे घर के बाहर एक कोठरी में रहना पड़ा सभी बुजुर्गों की डाँट भरीपूरी मात्रा में सुननी पड़ी रोज गंगाजल से नहाना पड़ा जाने के मार्ग बदलने पड़े पर दूसरे की पीड़ा मिटाने का जो संकल्प लिया था वह पूरा हो कर ही रहा। संभवतः स्वयं महाकाल ने उस वृद्ध हरिजन महिला के मुँह से उसे ढेरों आशीर्वाद दिए कहा कि आगे चलकर वह एक बहुत बड़ा महात्मा बनेगा, ढेरों व्यक्तियों के हृदय का सम्राट बनेगा। हुआ भी यही। बीसवें दशक की उस वृद्ध माँ की आत्मा जहाँ आत्मा जहाँ भी होगी उस छोटे बालक रूपी वामन की इस अवतार लीला को देख रही होगी व सोचती होगी कि वह कितनी बड़भागी थी कि स्वयं निष्कलंक प्रज्ञावतार का प्रतिनिधि उसकी सेवा हेतु आया।
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