Friday, December 17, 2021

पूज्यवर ने लाखों लोगों का जीवन बदला!

 पूज्यवर ने लाखों लोगों का जीवन बदला!

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भगवान् बुद्ध के समय में एक प्रसंग आता है कि अंगुलिमाल से जब उनकी भेंट हुई तो अंगुलिमाल के जीवन में परिवर्तन आ गया, वह डाकू से भिक्षुक बन गया। आम्रपाली जब उनके सम्पर्क में आई तो वह भी अपना सर्वस्व समर्पित कर साधिका बन गयी। ऐसे ही प्रसंग पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आने पर अनेकों लोगों के साथ घटित हुए हैं।


पूज्य गुरुदेव का सान्निध्य पाकर, मार्गदर्शन पाकर, उनका साहित्य पढ़कर लोगों की मान्यताओं तक में परिवर्तन आया, जिसमें सबसे बड़ा परिवर्तन नारी समाज के प्रति जो संकीर्ण दृष्टिकोण था, उसमें आया। लोगों ने अपने घर की बहु-बेटियों को न केवल गायत्री उपासना का अधिकार ही दिया, बल्कि उन्हें मिशन के कार्य के लिए घर से बाहर निकलने की अनुमति भी दी। इसके साथ ही नारी समाज के प्रति आदर, सहयोग और सम्मान का भाव भी बढ़ा। लाखों-करोड़ों परिवारों में नारी समाज को श्रेष्ठ जीवन जीने का अवसर मिला, जो अपने आपमें एक बहुत बड़ी क्रान्ति है।


जो भी गुरुदेव के सम्पर्क में आया, उसके चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में असाधारण परिवर्तन आता चला गया। परिजनों ने शराब, माँस आदि दुर्व्यसन एवं अन्य अनेकों दुर्गुणों को छोड़कर श्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प लिया। उनके जीवन में आये परिवर्तन को देखकर नाते-रिश्तेदार तक दाँतों तले अँगुली दबाकर रह गये कि इनके जीवन में इतना सुधार कैसे आ गया, ये तो चमत्कार ही हो गया।


श्री शिव प्रसाद मिश्रा जी, शान्तिकुञ्ज

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शान्तिकुञ्ज आ जाने पर मेरी ड्यूटी प्रतीक्षालय में लोगों को गुरुजी-माताजी से मिलाने में लगी। प्राण प्रत्यावर्तन शिविरों के समय लोग अपने दोष-दुर्गुण निःसंकोच गुरुजी के सामने प्रकट करते थे, कोई-कोई लिखकर भी देते थे। किसी बहुत बड़ी गलती पर पहले वे नाराज होते, फिर बड़े वैज्ञानिक ढंग से प्रायश्चित भी बताते थे। जैसे जितना बड़ा गड्ढा खोदा है, उतनी ही मिट्टी लाकर भरना होगा। जितना किसी को नुकसान पहुँचाया है, शारीरिक, मानसिक या नैतिक, उससे अधिक लाभ पहुँचाना होगा।


एक बार रामसुभाग सिंह नाम का एक व्यक्ति उनके पास आया। वह वैगन ब्रेकर के नाम से प्रसिद्ध था, अर्थात् रेल के वैगन ही लूट कर ले जाता था। वह अपनी कमर में हमेशा दो पिस्तौल रखता था। गुरुजी से मिलने के बाद उसने हावड़ा में 108 कुण्डीय यज्ञ कराया तथा कितने ही अखण्ड ज्योति के सदस्य केवल धौंस के बलबूते पर बनाये। उसने डाका डालना छोड़ दिया और सुधर गया।

गुरुजी के पास जब आता तो कहता, ‘‘गुरुजी मैं आपसे क्या कहूँ, आप तो सब जानते हैं।’’ तब गुरुजी कहते कि मैं यदि तेरे अंदर देखूँगा तो मुझे बहुत कुछ दिख जायेगा, इसलिये तू वही बता जिसका समाधान तू चाहता है।


उठ! मेरे साथ चल

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श्री देवी सिंह तोमर, शान्तिकुञ्ज

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तोमर जी बताया करते थे कि कैसे उनके जीवन में गुरुजी के केवल एक प्रवचन से ही आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। वे बताते थे कि ‘‘मैं टेलीफोन विभाग में सुपरवाइजर था। मैं खूब माँस खाता था व शराब पीता था। एक दिन गायत्री परिवार के कुछ लोग आये व मुझसे कहा कि गुरुजी आने वाले हैं। राजासाहब का एक महल राजगढ़ में शक्तिपीठ के लिये मिल गया है, उसको ठीक करने व सजाने के लिये हम चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। गायत्री परिवार और गुरुजी से मैं परिचित था। मैंने उन्हें 1500 रुपये दिये। उन्होंने मुझे कार्यक्रम में बुलाया। मैंने कह दिया कि मैं शराब पीकर ही आऊँगा और सचमुच मैं शराब पीकर ही गया। मैंने गुरुजी का भाषण सुना। गुरुजी ने कहा, ‘‘जो शराब पीता है वह अपना चरित्र सुरक्षित नहीं रख सकता। उसके लिये आत्मीयता, प्रेम, उत्तरदायित्व और परिवार कोई मायने नहीं रखते।’’ मेरा दिमाग ठनका। मैं सामने ही बैठा था। गुरुजी फिर बोले, ‘‘जो माँस खाते हैं, वे मुर्दा खाते हैं, क्योंकि जब उसे काटा जाता है तो उसके टुकड़े बिलखते हैं और उस दर्द चीत्कार के हार्मोन्स उसमें मिले होते हैं और मुर्दा तो वह हो ही जाता है।’’ फिर तो मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जो माँस खाया है, शराब पी है, उसको उँगली डालकर उल्टी कर दूँ। उसके बाद मैंने कभी माँस और शराब को नहीं छुआ। जब मैं रिटायर हो गया तो एक रात दो बजे नींद में गुरुजी ने मुझे एक थप्पड़ मारा और कहा ‘‘उठ! मेरे साथ चल।’’ मैंने पत्नी को जगाया और कहा, ‘‘अब अपन शान्तिकुञ्ज चलते हैं और फिर हम लोग शान्तिकुञ्ज आ गये।’’

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