Wednesday, December 15, 2021

माँ गायत्री का युग शक्ति के रूप में अवतरण

 माँ गायत्री का युग शक्ति के रूप में अवतरण

**********************************

गायत्री को युग शक्ति के रूप में अवतरित होने हुए हम सब प्रत्यक्ष देखते हैं। लगता है युग परिवर्तन की आवश्यकता पूरी करने के लिए वह अपनी निरन्तर शाश्वत परम्परा को यथावत् बनाये रहकर भी समय की आवश्यकता पूरी करने वाली कार्य-पद्धति अपना रही है।


भगवान को परिस्थितियों के अनुसार अपने अवतारों के स्वरूप और क्रिया-कलाप में हेर-फेर करना पड़ा है। हिरण्य कश्यप जब धरती की सम्पदा चुरा कर समुद्र में जा छिपा था तो वाराह रूप बनाने की आवश्यकता पड़ी ताकि उस दस्यु की स्थिति का सामना करना पड़ा। समुद्र मंथन का प्रयोजन पूरा करने के लिए कच्छप का रूप करना ही उपयुक्त था। हिरण्यकश्यपु को वरदान था कि वह मनुष्य या पशु में से किसी के द्वारा न मारा जा सकेगा तो आधा पशु और आधा मनुष्य का विचित्र स्वरूप बनाकर नृसिंह आये और अस्त्र-शस्त्र से न मरने के उसके वरदान को निरस्त करने के लिए नाखूनों को हथियार बनाया। आततायियों से जूझने के लिए परशुराम-मर्यादाओं को स्थापित करने के लिए राम-योग का कर्म प्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्रान्ति के उद्गाता बुद्ध के रूप में अवतरणों की श्रृंखला का पर्यवेक्षण करने से पता चलता है कि अवतरण प्रक्रिया में जड़ पुनरावृत्ति नहीं है। वरन् आवश्यकतानुसार गतिविधियां अपनाने का लचीलापन है। अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना का सन्तुलन लक्ष्य में ही स्थापित है। लीला प्रकरण तो परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहना उचित भी है और आवश्यक भी।


आज की असुरता का स्वरूप पूर्व कालीन घटनाक्रमों से सर्वथा भिन्न है। भूत काल में असुरता सीधे आक्रमण करती रही है और उसे शस्त्र युद्ध से पराजित किया जाता रहा है। अब की बार उसने छद्म नीति अपनाई है और जन-मानस पर अनास्था के रूप में अपना आधिपत्य जमाया है। अनास्था का मोटा अर्थ तो नास्तिकता होता है, पर उसे ईश्वर को न मानने तक सीमित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः नास्तिकता का स्वरूप है आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा। नीति-निष्ठा और समाज-निष्ठा का उल्लंघन। मानवी गरिमा की विस्मृति। संक्षेप में इसे उच्चस्तरीय आस्थाओं को ऐसा अभाव कह सकते हैं जिसके कारण आचरण में निकृष्टता की मात्रा बढ़ती ही चली जाती है। आज के संकट का यही स्वरूप है। इसे आस्थाओं का दुर्भिक्ष कह सकते हैं। उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धा की प्रौढ़ता ही अन्तःकरण में सद्भाव-मस्तिष्क में सद्ज्ञान और शरीर में सत्कर्म बनकर उभरती है। यदि आस्थाओं में निकृष्टतावादी तत्व घुस पड़ें तो फिर हर क्षेत्र में विकृतियां ही भर जायगी। आकांक्षाओं का स्तर वैसा होगा जैसा पशुओं और पिशाचों का होता है। विचारणा वैसी उठेगी जैसी कुचक्रियों और अपराधियों में पाई जाती है। कर्म ऐसे बन पड़ेंगे जो पतित और पराजितों से बन पड़ते हैं। आज की समस्त समस्याओं का स्वरूप समझना है, गहराई में उतर कर एक ही तथ्य सामने आता है—आस्थाओं का संकट। सड़ी कीचड़ों से जिस प्रकार चित्र-विचित्र कृमि-कीटक उत्पन्न होते हैं—उसी प्रकार व्यक्ति और समाज के सामने इसी कारण अगणित समस्याएं और विपत्तियां आतीं और आंख-मिचौनी खेलती हैं।


आस्थाओं के क्षेत्र का युद्ध उसी क्षेत्र में लड़ा जायगा। वायुयानों की लड़ाई आकाश में—पनडुब्बियों की लड़ाई समुद्र में लड़ी जाती है। थल की लड़ाई में पैदलों और वाहनों का उपयोग होता है। आस्थाओं के क्षेत्र में घुसी असुरता से जूझने के लिये युग अवतार को भी तद्नुसार योजना बनानी और कार्य-पद्धति अपनानी पड़ रही है, युग शक्ति गायत्री का कार्य क्षेत्र आस्थाओं का परिशोधन है। इसी की जन-मानस का परिष्कार कहा गया है। विचार क्रान्ति की लाल मशाल में इसी तत्व-दर्शन की झांकी होती है। ज्ञान-यज्ञ का स्वरूप भी यही है। युगान्तरीय चेतना का अवतरण इन दिनों इन्हीं आधारों के सहारे होता है। समस्त भूमण्डल में बसे हुए मानव समाज के अन्तराल में अनास्था के असुर का साम्राज्य छाया दीखता है। शासक का स्वरूप क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार का होने पर भी आस्था संकट का कुहासा सर्वत्र छाया हुआ है। उसकी सघनता में जहां-तहां न्यूनाधिकता भले ही रह रही है। अतएव परिष्कार का क्षेत्र भी अति व्यापक है। यह धर्म युद्ध—सचमुच ही धर्म क्षेत्र में—अन्तःकरण में गहराई में उतर कर लड़ा जाना है। इसी के सरंजाम सर्वत्र खड़े होते दिखाई पड़ रहे हैं, अवतरण चेतना इसी के सांचे और ढांचे खड़े करने में लगी हुई है। शिल्पी इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रयोजन पूरे करने में इन दिनों जुटे हुए देखे जा सकते हैं। जागृत आत्माओं की गतिविधियां इसी एक दिशा में चलती दीख पड़ती हैं।गायत्री महाशक्ति का उपयोग सामान्य समय में उपासना, आराधना द्वारा आत्म-कल्याण का प्रयोजन पूरा करने—प्रसुप्त शक्तियों को जगा कर बढ़े हुए आत्म-बल का लाभ ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में लेने—जैसा रहता है। किन्तु युग क्रान्ति में स्वभावतः उसका कार्य क्षेत्र बढ़ेगा। अभीष्ट प्रखरता और प्रचण्डता उत्पन्न करने वाले विशिष्ट क्रिया-कलापों का निर्धारण होगा। वैसा ही इन दिनों हो भी रहा है।

No comments:

Post a Comment