Monday, August 30, 2021

गायत्री उपासना−एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

 गायत्री उपासना−एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

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सद्बुद्धिदायिनी, एकमुखी, प्रथम स्तरीय गायत्री उपासना को भारतीय धर्म में प्रत्येक मनुष्य का एक अत्यन्त आवश्यक अनिवार्य नित्य−कर्म माना गया है। जिस प्रकार शौच,स्नान,भोजन,शयन आदि नित्य−कर्म न करने से शारीरिक स्वास्थ्य सन्तुलन नष्ट होता है उसी प्रकार गायत्री उपासना के अभाव में उस सद्बुद्धि से भी वंचित रहना पड़ता है जो हमारे गुण कर्म और स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्यक है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति के दो पहियों की गाड़ी पर ही हमारा सर्वांगपूर्ण जीवन विकास निर्भर रहता है। इसमें से एक अंग की उपेक्षा करने पर हमारी वही स्थिति हो जाती है जो लंगड़े, काने एवं आधे शरीर में लकवा मारे हुए रोगी की होती है। मोटर का एक पहिया यदि चलते−चलते निकल पड़े तो उसके उलट जाने की दुर्घटना हो जायगी। हमारी भौतिक समृद्धि तो बढ़ती जा रही है पर आध्यात्मिक स्तर गिरी पड़ी स्थिति में ही बना हुआ है ऐसी दशा में मोटर उलटने जैसी दुर्घटनाओं का दुखद दृश्य हमें अपने जीवनों में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। किन्तु जब यह गलती सुधार ली जाती है तो बिगड़े काम को बना लेने वाले बुद्धिमानों की तरह हम पुनः एक सुव्यवस्थित जीवन क्रम को विकसित हुआ देखते हैं।


हमारा व्यक्तिगत अनुभव

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हमें अपने व्यक्तिगत जीवन का प्रायः सारे का सारा ही समय गायत्री की शोध, अन्वेषण और साधन करने में लगा देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस महाविद्या के संबन्ध में शास्त्रों में क्या लिखा है यह जानने के लिए प्रायः दो हजार प्रमुख धर्म ग्रन्थों को पढ़ा है। पढ़कर उनका सार−संग्रह किया है। सम्पूर्ण भारत के कोने−कोने में इस विद्या के ज्ञाता मनीषियों और साधना संलग्न तपस्वियों की खोज की है,उनके चरण धो−धोकर उनके अनुभव का सार एकत्रित किया है। स्वयं भी अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय एकनिष्ठ भाव से उसी उपासना में लगाया है। इतने प्रयास का निचोड़ यह निकाला है कि गायत्री उपासना में लगाये हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई न कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सान्निध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।


गायत्री उपासना का सीधा प्रभाव साधक की अन्तरात्मा पर सात्विकता की अभिवृद्धि के रूप में पड़ता है। उसके मनः क्षेत्र में समाया हुआ तमो−गुण,असुरत्व,तत्क्षण घटना आरम्भ हो जाता है। अपने दोष दुर्गुण देखने और समझने की क्षमता उसमें जागृत होती है, साथ ही कुकर्मों के प्रति घृणा करने और सत्कर्मों की ओर आकर्षित होने का स्वभाव भी अनायास ही बनने लगता है। बहुत पढ़ने और सुनने से भी जिन लोगों ने अपने ऊपर कोई प्रभाव ग्रहण नहीं किया था उनका मन इस उपासना के द्वारा स्वयं ही द्रवित हुआ है और उस आन्तरिक परिवर्तन के कारण बाहरी जीवन में आश्चर्यजनक हेर−फेर दिखाई देने लगा है। आत्म−सुधार की प्रक्रिया में गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व देखकर ही प्राचीन काल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्व साधारण के लिए एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य घोषित किया था।


अन्तः प्रेरणा का विकास और प्रकाश

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हमें अपने व्यक्तिगत सम्पर्क में आये हुए ऐसे हजारों व्यक्तियों का पता है जिन्होंने गायत्री उपासना आरम्भ करने के बाद अपने विचार और कार्यों में कायाकल्प जैसा परिवर्तन किया। जो लोग माँस खाते थे, नशेबाजी की लत जिन्हें बुरी तरह घेरे हुए थी, शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, चरस, तम्बाखू के जो गुलाम बने हुए थे, उनमें से किसी ने एक बारगी, किसी ने धीरे−धीरे इन्हें बिना किसी बाहरी दबाव या उपदेश के अपने आप ही छोड़ दिया। उनके भीतर से ही कुछ ऐसी प्रेरणा और घृणा उत्पन्न हुई जिसके कारण उन्हें इन सत्यानाशी दुर्व्यसनों को अनायास ही छोड़ देने का सुअवसर मिल गया। जुआ, सट्टा, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट आदि के द्वारा भारी कमाई करने वाले लोगों में से कितनों ने ही बुराइयों को सर्वांश में अथवा बहुत अंश में परित्याग कर दिया और गरीबी एवं सादगी का जीवन बिताते हुए कम खर्च में मितव्ययितापूर्वक हँसी खुशी एवं सन्तोष का जीवन बिताने लगे। गायत्री को माता−माता पुकारते रहने पर कितने ही व्यक्तियों की भावनाओं का ऐसा विकास हुआ कि उन्हें नारी मात्र में माता की प्रतिमा घूमती हुई दिखाई देने लगी और पहले जो व्यभिचार और दुराचार की दिशा में मन दौड़ा करता था वह मार्ग बिलकुल ही अवरुद्ध हो गया। अश्लील साहित्य पढ़ने, गंदे चित्र देखने, गंदी आदतों में अपना शरीर निचोड़ने की जिन्हें बुरी लतें लगी हुई थीं उनकी यह बुराइयाँ गायत्री उपासना के प्रभाव से बड़ी सरलतापूर्वक छूटती देखी गई हैं। चढ़ते खून के किशोर और नव युवकों में ऐसे विचार बहुत करके देखे जाते हैं। हमारा सुनिश्चित मत है कि उसकी मानसिक स्थिति स्वच्छ करने में गायत्री उपासना जादू जैसा काम करती है।


स्नेह सौजन्य की अभिवृद्धि

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जिन घरों में द्वेष, क्लेश, कलह और संघर्ष का वातावरण बना रहता था, परिवार के हर सदस्य को मन मुटाव की स्थिति में देखा जाता था, उन घरों में गायत्री का प्रवेश हुआ, सब लोग थोड़ी−थोड़ी उपासना करने लगे, तो कुछ ही दिनों में परिस्थितियाँ ही बदल गईं। द्वेष का स्थान प्रेम ने ले लिया और सब लोग स्नेह सहयोग पूर्वक मिल−जुल कर रहने लगे। कितने ही ऐसे लोगों को हम जानते हैं जो आये दिन बीमार रहते थे, कोई न कोई रोग उन्हें घेरे ही रहता था। शारीरिक कष्ट, अशक्तता, उपार्जन में असमर्थता और दवादारू में बढ़ते हुए खर्च के कारण उन्हें निरन्तर चिन्ता घेरे रहती थी, पर जब उन्होंने गायत्री उपासना आरंभ की तो यह दवा उन सबसे अधिक अचूक सिद्ध हुई जो उनने बहुत पैसा खर्च करके खरीदी थीं। किसी भी अनुभवी डाक्टर की अपेक्षा यह उपासना क्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। कारण स्पष्ट है, गायत्री की उपासना से व्यक्ति के अन्तःकरण में सात्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबन्ध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।


अभाव एवं आपदाओं का समाधान

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आर्थिक कठिनाई, सन्तान का अभाव, बीमारी, मुकदमा, शत्रुओं का प्रकोप, कुसमय, स्वजनों से मनोमालिन्य, प्रयत्नों में असफलता, आकस्मिक दुर्दैव, द्वेष, दुर्भाव, चिन्ता, निराशा, शोक संतापों में ग्रसित व्यक्तियों को गायत्री उपासना की सलाह मान लेने के लिए यदि कभी तैयार कर लिया गया है तो उसका परिणाम आशाजनक ही निकला है। प्रस्तुत कठिनाइयों का किसी न किसी मार्ग से आशाजनक समाधान हुआ है। श्रद्धा, भावना की दृष्टि से विचार करने वाले इसे मंत्र शक्तिया माता की कृपा मानते हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनके अपने विचार व्यवहार में ऐसा हेर-फेर हो गया होता है जिसके कारण गुत्थियों के सुलझने और कठिनाइयों के हल होने का उपाय सहज ही बन पड़ता है। अशान्त और उद्विग्न मन रहने पर अपने विचार और कार्य अस्त-व्यस्त रहते हैं, उत्तेजित और असंतुलित मन यह सोच नहीं पाता कि प्रस्तुत कठिनाइयों का सही हल क्या हो सकता है। गायत्री उपासना के प्रभाव से जब आत्मबल बढ़ता है, सद्बुद्धि का प्रकाश अन्तःकरण में उत्पन्न होता है तो कठिनाई को पार करने का उचित मार्ग सूझ पड़ता है, इतना ही नहीं उस पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है। उचित मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को पार कर सकता है, बड़ी से बड़ी उलझनें सुलझा सकता है फिर छोटी-माटी समस्याओं का हल होना तो कठिन ही क्या है?


दिव्य विभूति को दिव्य अनुभूति

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सद्बुद्धि को कल्पलता कहा गया है। जिस मस्तिष्क में उसे स्थान मिल जायेगा, वहाँ पुष्पवाटिका जैसी महक उठती रहेगी और चित्त को आह्लादित करने वाली धारा प्रवाहित होती रहेगी। चंदन का वृक्ष अपने आस-पास के पौधों को सुगन्धित बना लेता है। सन्तुलित मस्तिष्क चन्दन वृक्ष से बढ़ कर है वह स्वयं तो शान्ति की सुगन्ध प्राप्त करता ही है, अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य अगणित मस्तिष्कों को भी सन्मार्गगामी बना देता है। गायत्री उपासना का प्रभाव मनः क्षेत्र के शाँत, स्वस्थ और प्रगतिशील बनाने में वही काम करता है जो वनस्पतियों के लिए वर्षा का जल किया करता है। कहते हैं कि ‘नाग दमन’ बूटी की गन्ध पाकर वहाँ से साँप बहुत दूर भाग जाते हैं। कुविचारों और दुर्भावनाओं के साँपों को दूर भगाने के लिए गायत्री उपासना को एक उच्च कोटि की ‘नाग दमन’ बूटी कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। अनुपयुक्त कामनाओं को हटाकर चित्त को तृष्णा और वासना से रहित बना देना या सन्तोष उत्पन्न करने वाला वातावरण, जहाँ गायत्री उपासना उत्पन्न करती है वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती। गायत्री को कामधेनु इसीलिए कहा गया है। इसका श्रद्धा पूर्वक पयपान करने के उपरान्त कोई अतृप्ति शेष नहीं रह जाती।


आन्तरिक दुर्बलताओं और त्रूटियों के कारण ही मनुष्य का साँसारिक जीवन अभावग्रस्त, अविकसित एवं अशान्त रहता है। भीतर की कमजोरी ही बाहर दीनता और हीनता के रूप से दृष्टिगोचर होती है। आत्मघाती लोग ही इस संसार में तिरस्कृत अवांछित घृणित उपेक्षित और असफल रहते हैं। जिसके भीतर आत्मबल भरा होगा, जिसके अन्तर में प्रकाश उठ रहा होगा उसके बाह्य जीवन का प्रत्येक क्षेत्र, आशा उत्साह, स्फूर्ति, तेजस्विता और पुरुषार्थ से परिपूर्ण दिखाई देगा। भीतरी बल की आभा को बाहर प्रकट होने से कोई आवरण रोक नहीं सकता। गरीबी, अस्वस्थता एवं विपन्न परिस्थितियों में पड़े हुए होने पर भी मनस्वी व्यक्ति अपनी महानता की प्रभा फैलाते रहते हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा क्षणिक ही हो सकती है, चिरस्थायी नहीं। व्यक्ति का विकसित व्यक्तित्व ही वस्तुतः उसकी सच्ची सम्पत्ति सिद्ध होती है। यह सम्पत्ति जिसके पास मौजूद है उसे न तो दरिद्र कहा जा सकता है और न असफल। बादलों के टुकड़े चन्द्रमा को देर तक कहाँ छिपाये रहते हैं? विपन्नता किसी मनस्वी व्यक्ति को दुर्दशाग्रस्त स्थिति में देर तक कहाँ पड़ा रख सकती है? जहाँ आत्मबल होगा वहाँ कोई भी अभाव, चाहे वह व्यक्तिगत हो अथवा साँसारिक अधिक समय तक टिक नहीं सकेगा। गायत्री उपासना मनुष्य के व्यक्तित्व, आन्तरिक स्तर और आत्मबल को बढ़ाती है, जिससे उसकी सुख−शान्ति और समृद्धि का मार्ग हर दिशा में प्रशस्त होता है।


उपासना एक आवश्यक धर्म कर्तव्य

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हमारे नित्य कर्म में जिस प्रकार स्नान, भोजन श्रम−विश्राम आवश्यक हैं उसी प्रकार गायत्री उपासना के लिए एक छोटा समय भाग नियत रहना चाहिये। सद्बुद्धि से बढ़कर और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं। जब कि साधारण मूल्य वाली वस्तुओं के उपार्जन के लिए हम इतना श्रम करते हैं तो क्या हमें इस धरती की सबसे श्रेष्ठ सम्पदा का उपार्जन करने के लिए कुछ भी समय न लगाने की हठ पर ही अड़ा रहना उचित है? गायत्री के प्रथम स्तर जिसमें जप, अनुष्ठानों, बीज मंत्रों और अमुक विधि−विधानों की आवश्यकता होती है, सर्व साधारण के लिए सरल है। इसमें कोई भूल रहने पर भी हानि की संभावना नहीं रहती। थोड़ा करने या विधि−विधान की पूरी जानकारी न होने पर लाभ भले ही थोड़ा मिले पर हानि या प्रतिकूल फल की तो किसी भी दशा में कोई आशंका नहीं रहती। मानव प्राणी में मानवता की विशेषता को बढ़ाने वाली इस आध्यात्म−विज्ञान सम्मत परम श्रेयस्कर प्रक्रिया को हममें से प्रत्येक को किसी न किसी रूप में अपनाना ही चाहिए। दैनिक जीवन का एक आवश्यक धर्म−कर्तव्य समझ कर उसे अपने नित्य−कर्म में उचित स्थान देना ही चाहिये।

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