ऋषि चिंतन
*********
अंतर की गहराई में उतरें
*******************
👉 *विपत्ति और अतृप्ति से भरा नीरस जीवन यह बताता है कि अंतःकरण की गरिमा सूखने और झुलसने लगी है ।* जड़ें मजबूत और गहरी हो तो जमीन में से पेड़ के लिए पर्याप्त जीवन-रस प्राप्त कर लेती हैं और वह हरा-भरा बना रहता है । आंतरिक श्रद्धा यदि मर न गई हो तो अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सरसता और प्रफुल्लता खोजी जा सकती है । *उल्लास सुख-साधनों पर नहीं, उत्कृष्ट दृष्टिकोण पर निर्भर है ।*
👉 यदि आनंद की आवश्यकता हो तो उसे बिना किसी पदार्थ या व्यक्ति की सहायता से प्रचुर परिमाण में पाया जा सकता है । *उसके लिए अपनी ही अंतरात्मा का परिशोधन करना पड़ता है ।* *"आंतरिक पवित्रता"* में इतना सौंदर्य और मिठास भरा रहता है कि उसके दर्शन पाने, करने तथा रसास्वादन करने से वह मिलता है, *जिसके अभाव में जीव को निरंतर भटकना ही पड़ता है
👉 बाहर दौड़ने में पुरुषार्थ है । पुरुषार्थ कई तरह की सफलताएँ प्रस्तुत करता है । बड़प्पन की प्यास हो तो जल-जंगल छानने ही पड़ेंगे, *पर यदि महानता का देवत्व अभीष्ट हो तो तो उसके लिए भीतर की खोज करनी पड़ेगी ।* तृप्ति किसी पदार्थ में नहीं, *दृष्टिकोण की गरिमा में उसका स्रोत है ।*
👉 *जीवन का आनंद लेना हो तो उसके लिए अंतर की गहराई में उतरने का, समुद्र तल से मोती ढूँढ लाने वाले जैसा साहस संजोना पड़ेगा ।*
No comments:
Post a Comment