श्रम देवता की साधना
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मनुष्य की छिपी सामर्थ्य और अजस्र गरिमा के प्रकटीकरण का एक ही उपाय है।अनवरत श्रम।श्रमनिष्ठा शरीर को थकाने वाली प्रक्रिया का नाम नहीं ।यह वह साधना है, जिसमें निराकार को साकार में परिणत किया जाता है और साकार को सुविकसित और सुसज्जित बनाया जाता है ।अगति को प्रगति में बदलने की सामर्थ्य केवल श्रम में है । पदार्थ का छोटे से छोटा परमाणु बिना विश्राम किए अनवरत गति से सक्रिय है । पवन को एक क्षण के लिए भी चैन नहीं । सूर्य और सितारे अपने नियत कर्मों में संलग्न हैं।धरती माँ का चिरंतन स्वप्न है कि उसका पुत्र उसे अधिक शोभायमान बनाने के लिए श्रम करे ।संसार की अपेक्षा है कि पुरुषार्थ का पूरा उपयोग हो और सुखद सम्भावनाओं से सारा वातावरण भर दिया जाए । जीवन की माँग है कि उसके प्रत्येक पक्ष को गौरवान्वित बनाने के लिए स्वेदबिंदु निरंतर झरते रहें । पसीने से पवित्र और कुछ नहीं ।जिस ललाट पर वह झलकता है, उसे समुन्नत बनाता चला जाता है । जिस भूमि पर गिरता है, उसे नंदनवन बना देता है ।अनगढ़ पत्थरों को देवप्रतिमा के रूप में पूजनीय बनाने का श्रेय, श्रम के देवता को ही दिया जा सकता है । कलाकारिता का सर्वोत्तम रहस्य अनवरत श्रम में सन्निहित है ।
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
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