जीवन एक संग्राम है और खेल भी है।
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जैसे संग्राम में थोड़ी सी असावधानी घातक होती है, उसी प्रकार जीवन में भी थोड़ी सी भी असावधानी घातक होती है। संग्राम में जैसे बहादुरी की आवश्यकता है, उसी प्रकार जीवन में भी बहादुरी की आवश्यकता है।
संग्राम में जैसे विपक्षी धोखा देने की कोशिश करता है, उसी प्रकार दुनियाँ में भी लोग धोखा देने की कोशिश करते हैं। इसलिए संग्राम में और जीवन में चौकन्ना रहने की जरूरत है।
संग्राम में जैसे संगठन और अनुशासन जरूरी है, उसी प्रकार जीवन में भी संगठन और अनुशासन बहुत जरूरी है।
इन या ऐसी ही बातों के कारण जीवन संग्राम है, पर जीवन की संग्रामता का यह मतलब नहीं है कि यह मनुष्य-मनुष्य का युद्ध है। वास्तव में यह मनुष्य और शैतान का युद्ध है।
जीवन एक खेल है।
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खेल पराजय के लिए नहीं खेला जाता, प्रसन्नता के लिए खेला जाता है। जीवन भी प्रसन्नता के लिए है, इसमें हार जीत का कोई सवाल नहीं है। खिलाड़ी लड़ते हैं पर वे प्रेम नहीं तोड़ते। जीवन से लड़ो और प्रेम न तोड़ो।
खेल में बेईमानी करने से जो कुछ मिलता है उससे कई गुना गुम जाता है, खेल का प्राण ही निकल जाता है। जीवन में भी यही बात है। जो जीवन को खेल समझ सकते हैं। वही मुक्त हैं।
(संकलित व सम्पादित)
- अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1949 पृष्ठ 2
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