समस्या हमारी- समाधान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के
(भाग2)
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कोई कार्य बहुत अच्छा हो, सफलता की सम्भावना भी हो, लेकिन उसमें कठिनाइयाँ अधिक हो, तो क्या ऐसे कार्य को हाथ में लेना चाहिए?
समाधान:-
किसी भी कठिन से कठिन कार्य को सफल बना लेने की एक वैज्ञानिक विधि यह है कि उसे शीघ्र ही प्रारम्भ कर दिया जाय।
कोई कार्य तभी तक कठिन मालूम पड़ता है, जब तक कि इसे हाथ में नहीं लिया जाता। हाथ में आते ही उसकी कठिनता कम हो जाती है और वह वैसे ही सरल लगने लगता है, जैसे कोई अन्य काम।
कठिनाई के भय से किसी काम को स्थगित कर देने का स्वभाव मनुष्य की कार्य क्षमता को नष्ट कर देता है, उसमें उत्साहहीनता और निराशा का भाव उत्पन्न कर देता है।
ऐसे निराश और उत्साहहीन व्यक्ति को कठिनाइयाँ अपना शिकार बना कर समाप्त कर देती है, किन्तु जो उत्साहपूर्वक इनका सामना करने के लिए कटिबद्ध रहते हैं, उनके लिए कठिनाइयाँ उन्नति की ओर अग्रसर होने में सहायक बन कर बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।
कठिनाइयों की परवाह न करके जो व्यक्ति इस निश्चय से कार्य में जुटे रहते हैं, कि उन्हें अमुक कार्य पूरा करना ही है, उसके लिए कितना ही उद्योग एवं परिश्रम क्यों न करना पड़े, वे अपने निर्धारित लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेते हैं।
जिसने काम को करने का दृढ़ संकल्प कर लिया होता है, उसके मार्ग में बाधाएँ उसी प्रकार नहीं ठहर पाती, जिस प्रकार वेगवती सरिता के प्रवाह में पड़कर बबूले के ढेर नहीं ठहर पाते।
उद्योगहीन व्यक्ति ही कठिनाइयों को दुर्भाग्य अथवा विपत्ति मानकर उनके सामने परास्त हो जाते हैं।
पुरुषार्थी व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ता है और उन्हें बलपूर्वक पीछे ढकेलता हुआ पहाड़ के बीच में भी रास्ता बना लेता है।
सफलता के लिए उद्योग करने वाले वालों के सम्मुख कठिनाइयों का आना स्वाभाविक है। मनुष्य को चाहिए कि उससे घबराना छोड़कर अपने उद्यम-उद्योगशक्ति में अटूट विश्वास रखें।
अडिग विश्वास और अदम्य साहस द्वारा ही लक्ष्य प्राप्त होता है तथा सुनियोजित कार्यक्रम के साथ काम करने से सृजन सम्भव होता है।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
(संकलित व सम्पादित)
सरस, सफल जीवन का केन्द्र बिन्दु उत्कृष्ट चिन्तन पृष्ठ 48-49
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