Thursday, August 26, 2021

किसी का बुरा मत सोचिए

 किसी का बुरा मत सोचिए।

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      किसी व्यक्ति की उसके सम्मुख उसकी बुराई करना उतना पाप नहीं, जितना अपने मन में उसके प्रति बुरा सोचना। क्योंकि बुराई तो उस व्यक्ति के अवगुणों को देख कर की जाती है, जिसकी आलोचना करना कोई अपराध अथवा पाप नहीं है, परन्तु उसके प्रति अपने मन में बुरे विचार रखना अथवा उसका अनिष्ट चाहना।

       किसी पर कुदृष्टि रखने का अर्थ यह होगा कि आपके मन में पाप है। आप उस व्यक्ति से अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं। आप अपनी आत्मा की पुकार के विरुद्ध कार्य करना चाहते हैं, जो उस परमपिता परमात्मा की दृष्टि में एक महान अपराध है।

       दूसरों का बुरा सोचने में उनका अनिष्ट चाहने में कुछ लाभ भी नहीं होता, अपितु अपनी ही हानि होती है। देखने में हमें कोई कुछ लाभ प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक महान क्षति पहुँचती है।

       किसी व्यक्ति के प्रति बुरी भावना रखने से अपनी ही हानि अधिक होती है। उस व्यक्ति को तो पता तक नहीं होता, कि कोई उसके बारे में बुरे विचार रखता है।

       किसी के प्रति ईर्ष्या भाव हो तो स्वयं ईर्ष्या करने वाले का ही रक्त जलता है तथा मानसिकता, विचारणा ही दूषित होती है। मन अशान्त रहने पर भी दिनचर्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

       दूसरों का अनिष्ट चाहने वाला पहले अपनी ही हानि करता है। कहावत भी है कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, पहले स्वयं ही उसमें गिर जाता है।

       जब हम जानते हैं कि दूसरों से द्वेष करने पर, उनका बुरा सोचने पर एवं उनका अनिष्ट चाहने पर हमको महान क्षति पहुँचेगी, हमारी आत्मा दूषित हो जाएगी, हम ईश्वर की दृष्टि में अपराधी बन जाएँगे, हमें कहीं भी शान्ति न मिलेगी, तो फिर हम दूसरों के प्रति कुविचार क्यों रखें? किसी से द्वेष क्यों करें और यदि हम यह सब जानते हुए भी दूसरों से द्वेष करते हैं उनका अनिष्ट चाहते हैं तो वह एक बड़ी मूर्खता की बात होगी।

       आग जहाँ रखी जाती है, पहले उस स्थान को गर्म करती है और जलाती है। तेजाब यदि साधारण धातु के बर्तन में रखा गया है तो पहले उसे ही नष्ट करेगा। इसी प्रकार द्वेष और दुर्भाव,पाप और कुविचार जिसके मन में रहते हैं, पहले उसी का अनिष्ट करते हैं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना अक्टूबर 2012 पृष्ठ 24

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