पात्रता विकसित की जाय तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है।
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गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अपने भीतर के संकल्प को अपनी पात्रता को परिष्कृत करने का पर्व है। प्रतिभा जिधर को मुड़ती है, उधर की परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लेती है।
समय का व संसाधनों के अभाव का रोना कुपात्र रोते हैं। सुपात्र तो वे होते हैं, जो सब कुछ विपरीत होते हुए भी अपने लिए राहें बना ही लेते हैं।
सच पूछा जाय तो सुपात्र होना, पात्रता का होना ही वह सम्पदा है जो व्यक्ति के जीवन में तेज,ओज व वर्चस के नाम से प्रकट होती है।
यदि इस पात्रता को विकसित किया जा सके तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है। इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा पर स्वयं के भीतर ही संकल्प को उभारने की जरूरत है।
मन का संकल्प व दैवी संरक्षण पर भरोसा, उनके माध्यम से कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि जिसे देखकर दाँतो तले उँगली दबाने को विवश होना पड़ता है। यह प्राणवान संकल्प मात्र उनके व्यक्तित्व की शोभा बनता है जो सुपात्र होते हैं।
गुरु यदि शिष्य से किसी एक गुण की अपेक्षा करते हैं तो वह पात्रता ही है। यही पात्रता आगे बढ़कर उत्कृष्टता जुटाने का कारण बनती है। जो कुपात्र होते हैं उन्हें पूर्वकृत कर्मवश कुछ उपलब्धि मिल भी जाए, परन्तु वह कभी भी दैवी सहयोग को पाने के उत्तराधिकारी नहीं बन पाते हैं।
जो कुपात्र होते हैं उनके व्यक्तित्व के छिद्र, उनके व्यक्तित्व की दुर्बलताएँ उन्हें बार-बार तकलीफों-परेशानियों में डालते हैं।
बरसात होने पर पानी गड्ढों में भरता है, चट्टानों पर तो बूँदें भी ढँग से नहीं टिक पाती। जो अपनी पात्रता विकसित कर लेते हैं वे भगवान के अनुग्रह को बरसाती गड्ढों में भरे पानी की तरह बटोर लेते हैं और जो अपनी अहन्ता की चट्टान बनकर पड़े रहते हैं, उनको भगवान की उपस्थिति भी महसूस नहीं हो पाती।
भीष्म की प्रतिज्ञा के आगे भगवान सूर्य को झुकना पड़ा था। सत्यवान के प्राणों को वापस करने के सावित्री के संकल्प के आगे यमराज को झुकना ही पड़ा था। अर्जुन के तीर के आगे पाताल को गङ्गा का प्रवाह छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था। यह ताकत उनके व्यक्तित्व की ताकत का प्रमाण है।
परिष्कार की प्रक्रिया में हमें आत्मनिरीक्षण, आत्मसमीक्षा, आत्म सुधार एवं आत्म विकास जैसे चरणों से गुजरना होता है। इन पदों से गुजरने वाले ही अपने व्यक्तित्व को उस योग्य बना पाते हैं कि जिनकी सहायता करने को भगवान सदा संकल्पित नजर आते हैं।
फिर स्वयं के व्यक्तित्व को प्रामाणिक बना देने वाले स्वयं का ही कल्याण नहीं करते बल्कि अनेकों के लिए एक आदर्श उदाहरण बनकर प्रस्तुत होते हैं।
( संकलित व सम्पादित) अखण्ड ज्योति जुलाई 2019 पृष्ठ 85
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