Monday, August 23, 2021

गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है

 गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है।

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गायत्री की साधना का चमत्कार अवर्णनीय है। एक समय अकबर के महामंत्री मानसिंह को अकबर ने बुलाया एवं कहा कि हमारा प्रयाग का किला अठारह बार ढह गया उसका कोई उपाय करो ताकि वह सुरक्षित रह सके। अकबर के आदेश को पाकर मानसिंह निकले और गंगा तट पर भ्रमण करने लगे। उन्होंने देखा कि इस वीरान स्थान पर एक महात्मा तप कर रहे हैं। वे उनके पास पहुँचे। उस समय वे ध्यानावस्था में थे। उन्होंने देखा कि एक अजगर उधर से आया और उन्हें निगलने का प्रयास करने लगा, परन्तु वह तपस्वी को निगल न सका। थोड़ी देर में उस तपस्वी का ध्यान टूटा और उन्होंने अपने तपबल से उस अजगर से अपने को मुक्त कर लिया। यह सब तमाशा देखने के बाद मानसिंह वहाँ पहुँचे। थोड़ी देर बैठने के बाद महात्माजी, जिनका नाम देवमुरारी बाबा था, ने उनका कुशल समाचार पूछा। उन्होंने कहा कि मैं अकबर का महामंत्री मानसिंह हूँ और एक विकट समस्या के हल हेतु आपके पास आया हूँ। उस महात्मा ने पूछा कि आप निःसंकोच अपनी समस्या को बतलावें। हम उसके समाधान हेतु प्रयास करेंगे। मानसिंह ने बतलाया कि महात्मन! प्रयाग के किले का निर्माण महाराज ने 18 बार कराया, परन्तु पता नहीं किस कारण से या कोई देवी के अभिशाप के कारण वह बन नहीं पा रहा है तथा बार-बार वह ढह जाता है। महात्माजी थोड़ी देर मौन रहे और अपनी ध्यान अवस्था में चले गये। उसके बाद मानसिंह के हाथ पर कुछ रख दिया। उन्होंने कहा कि इसे आप नींव में डाल देंगे और उसके बाद निर्माण करेंगे तो किले का कुछ नहीं होगा। उन्होंने वैसा ही किया और किला तैयार हो गया। वह वस्तु जो मानसिंह की हथेली पर महात्माजी ने रखी थी, वह उन्होंने तुलसी की मंजरी दी थी। देवमुरारी बाबा गायत्री के बहुत बड़े उपासक उस जमाने में रहे हैं तथा उनका चमत्कार सर्वविदित था। सभी लोग उनके पास आते और वे सिद्ध की हुई मंजरी सबको दे देते थे।

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