अन्नमय कोश की साधना
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मित्रो! ये पाँच देवता कौन हो सकते हैं? ये हैं आपके पंचकोश। पहला है—अन्नमय कोश। अन्नमय कोश के बारे में मैं कल भी आपको समझा चुका हूँ। अगर आप अन्नमय कोश की साधना करना शुरू करें, तो इसके सत्परिणाम देखकर आप हैरान रह जाएँगे। साधना का अर्थ है—साध लेना, काबू में ले आना। अपने वश में कर लेना। अन्नमय कोश को आप अपने काबू में ले आ सकें, अपने वश में कर सकें, तो आपको मैंने क्या बताया था?
मैंने आपको बताया था कि अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार है—जिह्वा यानि मुख। इसको अगर आप काबू में ले आवें, तो आपकी गई हुई सेहत फिर से ठीक हो जाएगी। मैंने आपको चंदगीराम का हवाला दिया था, सैंडो पहलवान का मैंने हवाला दिया था। गाँधी जी का मैंने हवाला दिया था। उनकी सेहत खराब हो गई थी तब उन्होंने एक देवता की उपासना आरंभ की थी। वह देवता कौन था? अन्नमय कोश था।
उन्होंने जीभ की उपासना की और जबान की उपासना की, जिसकी वजह से उनको दीर्घ जीवन मिला। शरीर को साधा जा सके और इंद्रियों पर काबू रखा जा सके। ईमानदारी को अपने मन से मिलाया जा सके, और इसके लिए शरीर के साथ ईमानदारी से श्रम की व्यवस्था की जा सके, तो कमाल हो सकता है और गजब हो सकता है।
मित्रो! यह शरीर हमारे लिए कमाल कर सकता है। क्या-क्या कर सकता है? शरीर के अंगों का इस्तेमाल करना जरूरी है। आलस्य में पड़े हुए, प्रमाद में पड़े हुए नब्बे फीसदी लोग जिंदगी को बरबाद करते रहते हैं।। आपने जो काम किया है, उसका लेखा-जोखा बताएँ, तो बताऊँगा कि आपने मुश्किल से दो घंटा रोज का काम किया है, जिसमें आप कहते हैं कि आठ-दस घंटे काम किया, पर ईमानदारी की बात यह है कि सारे-के-सारे काम को जो आप अभी करते हैं, वह एक समझदार आदमी मन से काम करने वाले, तन से काम करने वाले, मेहनत करने वाले आदमी का काम दो घंटे के काम के बराबर है, जिसे आप दस-बारह घंटे में करते हैं।
आप जो मेहनत करते हैं, उस मशक्कत के साथ में मुहब्बत मिली हुई नहीं होती। उसके साथ में तन्मयता मिली हुई नहीं होती; मनोयोग मिला हुआ नहीं होता है; मुस्तैदी मिली हुई नहीं होती; दिलचस्पी मिली हुई नहीं होती। अगर आपके काम में दिलचस्पी मिली हुई होती, तो कल्याण हो जाता।
आप कालिदास के तरीके से बेअकल और बेवकूफ होते तो भी आप सम्पन्न बन जाते। परंतु आपने इन्हें कभी मिलाया ही नहीं। मशक्कत की तो बेमन से। मन लगाया तो मन नहीं लगा? शरीर कहीं लगा और मन कहीं लगा। दोनों को आपने एक साथ मिला दिया होता, तो वे जीवन में चमत्कार दिखाते। आपकी उन्नति होती और सफलता मिलती।
मित्रो! इतना मरने-खटने के बाद भी आपके घरवाले आपसे खुश नहीं हैं। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप मन लगा करके काम करने के अभ्यस्त हो जाएँ, तो आपकी योग्यता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाएगी। आपको मास्टर की जरूरत नहीं है कि मास्टर मिलेगा तो समझदारी से पढ़ाएगा, समझाएगा। आप तबीयत लगाकर काम कीजिए, मन लगाकर काम कीजिए। मन लगाकर काम करते जाएँगे, तो आप अपने काम में इतने माहिर, इतने पारंगत होते चले जाएँगे कि समझदारी भी आपकी बढ़ती चली जाएगी। आप मन लगाकर तो काम कीजिए। मन लगाकर काम नहीं किया बेटे, इसलिए हमारी अन्नमय कोश की उपासना बेकार चली गई। अन्नमय कोश की उपासना अगर हमने की होती, तो हमने नवनिधियाँ पा ली होतीं।
मित्रो! एक और बात मैं आपसे यह कहता हूँ कि अगर आपने अपने कार्य में, क्रियाकलाप में कदाचित् ईमानदारी शामिल कर दी होती, तब बस, फिर आप समझ लीजिए कि त्रिवेणी बन जाती। पहला—श्रम, दूसरा—मनोयोग और तीसरा—ईमानदारी तीनों को मिला देते, तो फिर देखते कि कैसा कमाल होता है; कैसा गजब होता है; कैसे चमत्कार उत्पन्न होते हैं; और आप इसी जिंदगी में, गई-गुजरी जिंदगी में किस तरीके से उन्नति करते हुए चले जाते हैं। सफलता प्राप्त करते हुए चले जाते हैं और दूसरे आदमी जो आपके साथ रहने वाले तमाशा देखते रहते हैं और कहते रहते हैं कि हमारा तो भाग्य नहीं खुला।
आप अपने आस-पास रहने वालों को देखिए कि उनकी मान्यता कैसी है? बया पक्षी का उदाहरण मैं प्रायः देता रहता हूँ। बया का घोंसला आप कंपटीशन में बैठा दीजिए। बाकी सब पक्षियों को एक तरफ रखिए और बया को एक कोने में बैठा दीजिए। तबीयत, मेहनत और मनोयोग से बनाया गया घोंसला कितना खूबसूरत और अच्छा है। उसके बच्चे चैन से अपना दिन गुजार लेते हैं। बारिश हो तो क्या, हवा चले तो क्या, शोर-गुल हो तो क्या? रास्ता चलते हुए लोग कहते हैं कि देखिए यह घोंसला कितना सुंदर है। यह बया का घोंसला है। बया का घोंसला देखकर के लोगों की आँखों में इतनी खुशी होती है, जो गुलाब का फूल देखकर के भी नहीं होती। उसकी कलाकारी की सब तारीफ करते हैं। यह प्रेस्टिज प्वाइंट है।
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