आलोचना करने का अभ्यास अपने आप से करें।
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आलोचना करना अच्छी बात है। इससे छिपे हुए दुर्गुण उभरकर ऊपर आते हैं। जब वे प्रकट होते हैं, तो निन्दा होने लगती है, फिर छोड़ देने में ही खैर दिखाई देती है।
आलोचना करने का अभ्यास अपने आप से करना चाहिए। इससे अपने दुर्गुण सूझ पड़ते हैं और उन्हें बुहारने के प्रयत्न चल पड़ते हैं। स्वच्छता हो जाने पर निर्मल बना व्यक्ति प्रामाणिक और प्रशंसा का पात्र बनता है। उसे साहसी भी माना जाता है।
जो अपनी आलोचना कर सके और जो अपने को धो सके, वह पराक्रमी है। किन्तु अपनी बुराइयों को छिपाकर जो दूसरों की निन्दा करता है, वह अपमान का भागी बनता है। समझा जाता है कि द्वेषवश बुराई की जा रही है।
व्यक्ति इसमें अपना अपमान समझता है और चिढ़कर चुनौती देता है कि देखें कोई क्या कर लेगा? हम तो ऐसी ही बुराइयाँ अपनाये रहेंगे, जिसे रोकना हो रोके।
इस प्रकार कलह बढ़ता है और साथ ही द्वेष भी। विग्रह खड़ा होता है और एक के बदले चार नई समस्याएँ खड़ी होती है। अच्छा यह है कि जो कार्य हम दूसरों के लिए हितकर समझते हैं, उन्हें अपने लिए करें।
बुराई से बचना, उसे त्यागना अच्छी बात है, तो यह प्रयोग अपने आप से क्यों न किया जाय? दूसरे की गलती पकड़ने में भ्रम या भूल भी हो सकती है, पर अपनी बातें तो अपने को विदित होती है।
जो त्रुटियाँ सूझ पड़े, उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। प्रयत्न चालू रहेंगे तो यह निश्चित है कि एक-एक करके दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा मिल जायेगा। जिसने अपने को सुधार लिया है, उसे दूसरे से कहने या सुधारने का अधिकार मिल जाता है।
( संकलित व सम्पादित)
युग निर्माण योजना जनवरी 1987 पृष्ठ 16
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