Tuesday, November 23, 2021

सत्य को जीवन में उतारने, आचरण में ढालने वाले के कार्य सफल होते हैं।

 सत्य को जीवन में उतारने, आचरण में ढालने वाले के कार्य सफल होते हैं।

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       गाँधी जी ने जिस सत्य को अनुभूत किया और आचरण में उतारा, उसके बलबूते वे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला सके। अन्यथा गाँधी जी से पहले भी कितने ही लोग सत्य बोलते और महात्मा भी थे।

       सत्य दैवी सम्पदा और ईश्वर के समतुल्य है, जिन्हें यह विश्वास होता है, अटूट श्रद्धा होती है, ऐसा सत्य जीवन में फलदायी भी होता है।

       सत्य बोलना, सत्य आचरण करना और प्रत्येक कार्य को सत्य की कसौटी पर कसकर करना, यह तीनों बातें भिन्न हैं। सत्य बोलना आसान है और कितने ही लोग प्रतिदिन सत्य बोलते हैं, किन्तु आचरण सत्य से भिन्न होने के कारण उनके जीवन में न कोई फल निकलता है, न उनके सत्य का कोई चमत्कार उनके जीवन में उन्हें दिखाई देता है, क्योंकि मन, वचन और कर्म में सदैव भिन्नता बनी रहने से योग नहीं बनता और कोई फल नहीं निकलता।

       जिन्होंने सत्य को जीवन में उतारा है, आचरण में ढाला है, उन्हीं के कार्य सफल हुए हैं। जिन्होंने जीवन भर अहिंसा व्रत का आचरण किया है, ऐसे लोगों के प्रति लोग बैरभाव छोड़ देते हैं।

       जीवन में अस्तेय का व्रत जिन्होंने लिया है, उन्हें धनाभाव कभी नहीं रहा। जिस प्रकार ब्रह्मचारी का वीर्यवान बनना आवश्यक है, उसी प्रकार सत्याचरण अपनाने वाले का ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी होना स्वाभाविक है।

       कहा गया है कि सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। शास्त्र वचन है कि सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। प्रतिफल मिलने में देर हो सकती है, पर ऐसा नहीं है कि उत्कृष्ट आचरण अपनाने वाले को हेय स्थिति में पड़ा रहना पड़े।

       व्यक्तित्व विकास के लिए मन, वाणी और कर्म की एकता सधनी चाहिए, किन्तु मन, वाणी और कर्म में एषणा और लोभ आदि अनेकों ऐसे विग्रह उत्पन्न करते हैं, जो व्यक्तित्व का विकास नहीं होने देते।

       सत्य को वाणी का तप कहा गया है। इसका तात्पर्य है, उसमें मन की चोरी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। जिनके मन, वाणी और कर्म की अभेदता सध चुकी है, उन्हें सत्य का साक्षात्कार अवश्य होता है।

(संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति फरवरी 1989 पृष्ठ 20

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