Wednesday, November 3, 2021

समय ही जीवन है!

 समय ही जीवन है!

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जीवन क्या है? इसका उत्तर एक शब्द में अपेक्षित हो तो कहा जाना चाहिए—‘समय’। समय और जीवन एक ही तथ्य के दो नाम हैं। कोई कितने दिन जिया? इसका उत्तर वर्षों की काल गणना के रूप में ही दिया जा सकता है। समय की सम्पदा ही जीवन की निधि है। उसका किसने किस स्तर का उपयोग किया, इसी पर्यवेक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसका जीवन कितना सार्थक अथवा निरर्थक व्यतीत हुआ।


शरीर अपने लिए ढेरों समय खर्च करा लेता है। आठ-दस घण्टे सोने सुस्ताने में निकल जाते हैं। नित्य कर्म और भोजन आदि में चार घण्टे से कम नहीं बीतते। इस प्रकार बाहर घण्टे नित्य तो उस शरीर का छकड़ा घसीटने में ही लग जाते हैं जिसके भीतर हम रहते और कुछ कर सकने के योग्य होते हैं। इस प्रकार जिन्दगी का आधा भाग तो शरीर अपने ढांचे में खड़ा रहने योग्य बनने की स्थिति बनाये रहने में ही खर्च हो लेता है।


समय जितना कीमती और फिर न मिलने वाला तत्व है उतना उसका महत्व प्रायः हम लोग नहीं समझते। हममें से बहुत से लोग अपने समय का सदुपयोग बहुत ही कम करते हैं। आज का काम कल पर टालते और उस बचे हुए समय को व्यर्थ की बातों में नष्ट करते रहते हैं। जबकि समय ही ऐसा पदार्थ है जो एक निश्चित मात्रा में मनुष्य को मिलता है, लेकिन उसका उतना ही अपव्यय भी होता है। संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असंभव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है, लेकिन समय ही एक ऐसी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कहीं नहीं पाया जा सकता। एक बार हाथ से निकला हुआ वक्त फिर कभी हाथ नहीं आता। कहावत है—‘‘बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द वापिस नहीं बुलाये जा सकते।’’ काल को महाकाल कहा गया है। वह परमात्मा से भी महान है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षत्कार कई बार किया जा सकता है किन्तु गुजरा हुआ वक्त पुनः नहीं मिलता।


समय ही जीवन है, क्योंकि उससे ही जीवन बनता है। उसका सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना और दुरुपयोग करना जीवन को नष्ट करना है। वक्त किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रति क्षण, मिनट, घण्टे, दिन, महीने, वर्षों के रूप में निरन्तर अज्ञात दिशा की ओर जाकर विलीन होता रहता है। उसकी अजस्र धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है और फिर शून्य में विलीन हो जाती है। फ्रेंकलिन ने कहा है—‘समय को बर्बाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।’ इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए मनीषी जैक्सन ने कहा है—‘सांसारिक खजानों में सबसे मूल्यवान खजाना समय का है।’ उसका सदुपयोग करके दुर्बल सबल बन सकता है, निर्धन धनवान और मूर्ख विद्वान बन सकता है। वह ईश्वर प्रदत्त एक ऐसी सुनिश्चित एवं अमूल्य निधि है जिसमें एक क्षण भी वृद्धि कर सकना किसी के लिए भी असम्भव है। वह किसी का दास नहीं वरन् अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखता। मनुष्य के हिस्से में काल का केवल एक छोटा सा अंश ही आया है। जीवन की भांति ही बीते हुए समय को भी वापिस कभी नहीं बुलाया जा सकता।’ निःसंदेह वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं। हमारा कर्तव्य है कि हम समय का पूरा-पूरा सदुपयोग करें।


समय की चूक पश्चात्ताप की हूक बन जाती है। जीवन में प्रगति की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने किसी भी कर्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो गुना हो जायगा, जो निश्चित ही कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जायगा कि वह फिर किसी भी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं जो काम हमें आज करने हैं, वह कल भी उतने ही महत्व के रहेंगे, यह नहीं कहा जा सकता। परिस्थितियां क्षण-क्षण बदलती रहती हैं और पिछड़े कार्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता।

कार्य की उपयोगिता और महत्ता की दृष्टि से कुछ काम पहले किये जा सकते हैं एवं कम महत्व के कामों को बाद में भी किया जा सकता है। किन्तु काम को आगे के लिए टालना, जी चुराना, बचना बुरी आदत है। वस्तुतः आलस्य और अकर्मण्यता का संशोधित रूप काम को टालना है, जिससे सफलता और प्रगति के आकांक्षी प्रत्येक व्यक्ति को बचना ही चाहिए।

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