Friday, November 12, 2021

बच्चों में सद्गुणों के बीज बोएँ

 बच्चों में सद्गुणों के बीज बोएँ।

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       व्यक्ति जो भी बचपन में सीखता है, वह उसके साथ तब तक रहता है, जब तक वह जीवित रहता है। वह ज्ञान, आदतें, दृष्टिकोण, स्वभाव और व्यवहार जो एक व्यक्ति एक वयस्क के रूप में प्रदर्शित करता है, वास्तव में वह सब बचपन से ही उसके द्वारा आत्मसात् की जाने लगती है।

       एक वयस्क मनुष्य बचपन की आदतों, संस्कारों, विचारों, मनोभाव आदि का परिणाम है, जिसे वह बचपन से ही विकसित करने लगता है।

       सचमुच जैसे छोटे से बीज में भविष्य का वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही एक बच्चे में भविष्य का मनुष्य छिपा होता है। यदि बीज उन्नत किस्म का है, तो उसका असर उस बीज से निकलने वाले वृक्ष पर पड़ेगा ही। सही जलवायु पाकर एक बीज से ही विराट् वटवृक्ष निकल आता है, वैसे ही एक छोटे से, नन्हे से नौनिहाल में, बच्चे में से एक विराट् व्यक्तित्व बाहर निकल आता है।

       बच्चा एक ऐसी कली की तरह से है, जो हजारों संभावनाओं का प्रतीक है। जैसे कली में फूल का भाग्य निहित होता है, वैसे ही भविष्य का मनुष्य अपने बचपन में ही आकार लेने लगता है।

       बचपन वयस्क के व्यक्तित्व को पहले से दर्शाता है अर्थात् बचपन भविष्य के मनुष्य को दिखाता है, वैसे ही जैसे सुबह दिन को दिखाती है। एक बच्चे का आचरण और व्यवहार उस बच्चे के अन्दर विकसित हो रहे भविष्य के मनुष्य को दिखाता है।

        पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों के कारण भी व्यक्ति बुरी आदतों, व्यवहार, दृष्टिकोण व विभिन्न प्रकार की बुराइयों के प्रति सहज ही आकर्षित होने लगते हैं। इसके साथ ही बुरी सङ्गति के कारण भी बच्चे बुरी आदतें सीखने लगते हैं। बच्चों को ऐसे वातावरण की आवश्यकता होती है जिसमें वे बुरी आदतों के प्रति आकर्षित न हो सकें।

       साथ ही यह प्रयास करें कि उनमें अच्छी आदतों, संस्कारों के बीज बोए जा सकें। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे उर्वर भूमि में बीज सहज ही उग आते हैं, पर बंजर भूमि में ऐसा सम्भव नहीं होता। उस बंजर भूमि को विशेष प्रयास से उर्वर बनाना होता है। 

      उसी प्रकार एक अभिभावक को भी एक कुशल किसान की तरह बच्चों की बंजर मनोभूमि को उर्वर बनाकर उनमें सद्गुणों व शुभ संस्कारों, आदतों, अभ्यासों के बीज बोने पड़ते हैं और उनकी सिंचाई व देखभाल करनी पड़ती है।

       बच्चा गीली मिट्टी के समान है। उसे मनचाहा आकार देना हो, तो उसके बचपन में ही उसे उसमें शुभ भावनाओं, विचारों, संस्कारों के बीज बोए जाने चाहिए। उसमें ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी और बहादुरी के बीज बोए जाने चाहिए। उसको करुणा, प्रेम, सेवा, सम्वेदना आदि मानवीय भावनाओं को कहानियों, कथाओं, कविताओं, सत्सङ्ग, स्वाध्याय, वृत्तचित्रों व स्वयं के आचरण से भरा जाना चाहिए।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति नवम्बर 2021 पृष्ठ 15

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