Tuesday, November 2, 2021

शरीर के देवता का चमत्कार

 शरीर के देवता का चमत्कार

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बेटे, मैं शरीर के देवता की करामात कहता हूँ, जिसका मूल्य आप समझते नहीं हैं और मारे-मारे फिरते हैं। कोई चामुण्डा पर मारा-मारा फिरता है, कोई संतोषी माता के पास जाता है। कोई भवानी के पास, तो कोई चंडी देवी के पास मारा-मारा फिरता है और जो देवी अपनी धुन में बैठी हुई है और दोनों हाथों में वरदान लिए बैठी है, उस देवी के पास भी नहीं जाता। इस देवता के पास भी नहीं झगड़ा जाता, पर भैरों जी के पास और फलाने के पास न जाने कहाँ-कहाँ मारा-मारा डोलता है? और जो देवता वरदान उठाए बैठा है, उसके पास भी नहीं फटकता।


मित्रो! पिसनहारी का नाम तो मुझे नहीं मालूम, पर वह हमारे मथुरा क्षेत्र की रहने वाली थी। चौदह वर्ष की उम्र में विधवा हो गई थी। माँ-बाप ने कहा कि दोबारा ब्याह कर लो, हम मरने वाले हैं। उसने कहा कि हम ब्याह क्यों करेंगे? हमारा एक देवर है और एक है जेठ, दोनों हमारी सहायता करेंगे। बाप ने पूछा—कौन है तेरा देवर और जेठ? उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और कहा कि ये हैं हमारे देवर और जेठ। इनमें से एक हमारा देवर है और एक हमारा जेठ है। हमारे दोनों हाथ काम करेंगे। हमें ब्याह करने की क्या जरूरत है? हमारे पास किसी बात की क्या कमी है? उसने चक्की से अनाज पीसना शुरू किया।


उस जमाने में मंदी थी। दो आने, तीन आने की मजदूरी कर लेती थी। सात पैसे में गुजारा कर लेती थी और एक-दो पैसे रोज के हिसाब से बचा लेती थी। जब बुड्ढी हुई, तो उसने गाँववालों को बुलाया और कहा—मैंने एक-दो पैसा बचाकर, ढेरों पैसा जमा कर लिया है। इसे अच्छे काम में लगा दीजिए। लोगों ने एक कुआँ बनवा दिया।


मित्रो! हमारे सारे इलाके में सभी कुओं का पानी खारा है। हमारे गायत्री तपोभूमि का भी पानी खारा है। बहुत मेहनत के बाद 80 फीट गहरा खोदने के बाद एक हैंडपंप लगाया। उसका पानी मीठा है। मथुरा के सारे क्षेत्र में पानी खारा है।। वह एक कुआँ, जो पिसनहारी के पैसे से बना, जो दिल्ली जाने वाले मार्ग में बना हुआ है, उसका पानी मीठा है। सारे इलाके के कुएँ देखने के बाद आपको उसी एक कुएँ में मीठा पानी मिलेगा।


लोगों का ख्याल है कि उस कुएँ के पानी को पीने से तपेदिक ठीक हो जाती है। तरह-तरह की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं। दूर-दूर से लोग आते हैं और पानी भरकर ले जाते हैं और मरीजों को पिलाते हैं। आने-जाने वाली बरातें, वहीं पिसनहारी के कुएँ के पास ठहरती हैं। इतना शानदार कुआँ, इतनी बड़ी धर्मशाला है। ईमानदारी के साथ मशक्कत और उसमें भावना मिली हुई थी। अगर आदमी ऐसी मेहनत करना भी सीख जाए, तो कमाल हो जाए। पर हम क्या कर सकते हैं? चिराग तले अँधेरा दिखाई पड़ता है। हमारे भीतर, हमारा देवता प्यासा बैठा हुआ है। हमारा देवता हाथ जोड़े बैठा हुआ है। इस देवता से वरदान लेने के बजाय हम न जाने कहाँ-कहाँ मारे-मारे फिरते हैं? यह जिंदगी बेहतरीन कस्तूरी के हिरण से भी गई-बीती है। अगर हमने कस्तूरी को अपनी नाभि में देखा होता, तो हम निहाल हो गए होते।

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