Friday, November 19, 2021

दूसरों की आँखों में अपनी शान जमाने की सोचना व्यर्थ है।

 दूसरों की आँखों में अपनी शान जमाने की सोचना व्यर्थ है।

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        दूसरे लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं या क्या सोचेंगे? इस बात पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। क्योंकि किसी के कुछ भी सोचने में अपना कुछ बनता-बिगड़ता नहीं।

       लोगों की स्मरणशक्ति इस संबंध में बड़ी दुर्बल है। वह देखी या सुनी घटनाओं के विलक्षण होने पर ही सुनने या देखने के लिए तनिक-सा ध्यान बँटाते हैं। इसके साथ अपने काम में लग जाते हैं। इसके उपरान्त वे अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि जो-जो देखा या सुना था, उसे फिर से स्मरण करने के लिए व्यस्तता के बीच गुजरते हुए अवकाश ही नहीं निकाल पाते।

       जैक फ्राक्सन कहते थे कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते होंगे, यह चिन्ता सताती है, किन्तु इसके बाद जब परिपक्वता आने लगती है, तो यह परवाह नहीं रहती, कि कोई हमारे बारे में क्या सोचता और कहता है?

        लोगों को मात्र अपनी समस्याओं में रस है। वे उसमें इतने व्यस्त रहते हैं, कि दूसरों की सराहना या निन्दा करने के लिए उनके पास समय ही नहीं रहता। ऐसी दशा में जिस-तिस की आँखों में बड़ा आदमी बनने का आडम्बर बनाना व्यर्थ है।

       लोगों को रिझाने के लिए एवं सस्ती वाहवाही लूटने के लिए सज-धज करने और ठाट-बाट बनाने में अपना पैसा और समय खर्च करना बेकार है। लोगों की आँखों में अपनी शान जमाने की बात सोचना व्यर्थ है।

       इसी प्रकार अपने को अधिक विद्वान, धनवान, गुणवान बताने और अपनी सफलताओं का ढिंढोरा पीटना भी व्यर्थ है। इस शेखीखोरी के जमाने में औसत आदमी अपनी वस्तु स्थिति से बढ़-चढ़कर बातें करता है, ताकि उसे अधिक गुणवान, सौभाग्यवान मानकर सराहा जा सके, पर होता ठीक इसके विपरीत है। जो अपनी जाँच-पड़ताल में खरा नहीं उतरा है, उसे मात्र किसी की बकवास के आधार पर कोई सही मानने लगेगा, इसकी आशा किसी से भी नहीं की जानी चाहिए।

       अपने संबंध में डींंगे हाँकने के संबंध में भी यही बात है। अक्सर दुर्गुणी और बचकाने लोग ही अपनी शेखी बघारते और दूसरों के द्वारा वाह-वाही लेने के लिए उन्हें रिश्वत देते रहते हैं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना जनवरी 1987 पृष्ठ 8

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