सूर्य षष्ठी व्रत कथा :-
छठी मइया दिहा आशीष
पौराणिक कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था, राजा प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी। इससे राजा और उनकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गई।
जब राजा को संतान प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मृत पुत्र प्राप्त हुआ। इसकी जानकारी मिलने पर राजा प्रियव्रत को बहुत दुःख हुआ। संतान शोक से दुखी होकर राजा ने आत्म हत्या का मन बना लिया, परंतु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।
देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्ठी देवी हूँ, लोगों को पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य प्रदान करती हूँ। जो भी सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण करती हूँ। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया।
राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की आराधना के साथ देवी षष्ठी की पूरे विधि -विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई, तभी से सूर्यषष्ठी का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
जितेन्द्र रघुवंशी
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