Saturday, November 27, 2021

विचार परिवर्तन में मनुष्य का अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है।

 विचार परिवर्तन में मनुष्य का अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है।

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       गर्म लोहे पर घन की चोट ठीक पड़ती है और उसे उचित आकार में मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, किन्तु जब वह ठण्डा होता है, तब उसकी स्थिति कठोर होती है। वैसी दशा में उसे अनुकूल आकृति में बदलने के लिए कहा या जब भी लोहे को मोड़ा जाएगा, उसे नरम बनाने की प्रक्रिया अपनानी ही पड़ेगी। इस प्रयोग में भूल करने पर बात बनती नहीं बिगड़ती है।

       विवाद करने से चिढ़ बढ़ती है‌, ईर्ष्या का उद्भव होता है। शत्रुता पनपती है। बात यहीं समाप्त नहीं होती, वरन् जिसने उसके अहंकार को चोट पहुंँचाई या उस प्रकार की चुनौती दी है, उसे नीचा दिखाने, चोट पहुंँचाने के लिए ऐसे षड्यंत्र रचता है, जिनके पीछे औचित्य का नाम भी नहीं होता।

       सांँप को छेड़ देने से वह प्राण का ग्राहक हो जाता है। सिंह-व्याघ्र जैसे हिंसक जानवरों को किसी यात्री का आंँख से आंँख मिलाना सहन नहीं होता। भले ही कोई नीचे आंँख करके उधर से दबे पांँव निकल जाय।

       विचार परिवर्तन का जहांँ तक संबंध है, वहांँ सबसे अधिक आड़े आता है, मनुष्य का अहंकार। यह है तो षड्-रिपुओं में से एक, किन्तु व्यक्तित्व के साथ इतना अधिक घुला होता है, कि सूक्ष्मदर्शी विवेकशीलों के अतिरिक्त अन्य लोग उसे छोड़ने योग्य बुराई के रूप में देखते नहीं, वरन् स्वाभिमान, आत्मसम्मान का नाम देकर उस दुराग्रह को हठ पूर्वक अपनाये ही रहते हैं।

       ऐसी दशा में व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तित्व की हेटी होने देता है और न अपनी मान्यताओं में अन्तर करना चाहता है। यह उसकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। दुराग्रह की-उसे छोड़कर यथार्थता अपनाने की बात उसके गले उतरती ही नहीं।

( संकलित व सम्पादित) 

युग निर्माण योजना अप्रैल 1987 पृष्ठ 7

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