सुखों की भाँति ही दुःख को भी सहन कीजिए।
***********************
सुखों के समान दुःख भी जीवन में आते ही हैं। दुःखों से सर्वथा रहित होना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। सुख के उपभोग के लिए मन पहले से ही तैयार रहता है। कोई सुख मिले, सफलता प्राप्त हो, लाभ हो, यश और वैभव बढ़े, तो इन सम्पदाओं को स्वीकार करने में किसी को कोई अड़चन नहीं होती, जब भी जिस समय भी यह मिले, उसी समय उन्हें प्रसन्नता पूर्वक शिरोधार्य कर लिया जाता है।
पर यह बात दुःख के सम्बन्ध में नहीं होती। दुःख की बात सुनते ही घबराहट होती है, डर लगता है, कष्ट होता है और वैसा अप्रिय अवसर सामने आते ही मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है।
कई बार तो यह हड़बड़ी इतनी अधिक होती है, कि विचार शक्ति ही कुण्ठित हो जाती है। क्या करें? क्या न करें? यह सूझ नहीं पड़ता। ऐसी स्थिति में कई बार मनुष्य ऐसे निर्णय या काम कर बैठता है, जो आपत्ति को और भी बढ़ा देते हैं तथा जिनके लिए पीछे बहुत पश्चाताप करना पड़ता है।
इसलिए मनोभूमि की स्वस्थता इसी में मानी गई है, कि मनुष्य दुःखों के लिए भी वैसे ही कटिबद्ध रहे, जैसे सुखों के लिए तैयार रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि जानबूझकर दुःखों को बुलाया जाय या उन्हें हटाने का प्रयत्न न किया जाय।
ऐसा तो करना ही होता है। यह मनुष्य का स्वभाव है। इसके लिए किसी शिक्षा की जरूरत नहीं है। आपत्ति से बचने और दुःखों को हटाने के लिए कीट-पतङ्ग तक प्राप्त करते हैं, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है? वह पूरी चतुरता के साथ इस दिशा में काम करता ही है और अपनी बुद्धिमत्ता से अनेकों आपत्तियों को हटा भी लेता है।
इतना होते हुए भी यह किसी के लिए भी सम्भव नहीं है, कि वह पूर्ण रुप से दुःखों से बचा रहे। लाख प्रयत्न करने पर भी उनके प्रयत्नों में अपूर्णता रहेगी ही, क्योंकि व्यक्ति अपूर्ण है।
इस अपूर्णता के कारण दुःखों को हटाने का प्रयत्न भी पूर्णतया सफल न होगा। उसमें कहीं न कहीं त्रुटि रह ही जायेगी और अभाव एवं कष्टों का किसी मात्रा में सामना करना ही पड़ेगा।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1961 पृष्ठ 14
No comments:
Post a Comment