अध्यात्म को बदनाम ना करें!
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गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो!
मित्रो! बात को समझिए। समझेंगे नहीं, तो हमारा अध्यात्म बदनाम होता चला जाएगा, नाश होता चला जाएगा और हर आदमी नास्तिक होता चला जाएगा। यह नास्तिकता की निशानी है। नहीं साहब! क्रिया करने से यह फायदा हो जाता है। आध्यात्मिकता का यह सस्तापन नास्तिकता की निशानी है। अगर इतना सस्ता अध्यात्म को बनाएँगे, तो आप निराश होंगे। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि हम जब देवी-देवताओं के सामने पूजा करते हैं, तो उस पूजा करने के पीछे शिक्षण है, मार्गदर्शन है, प्रेरणा है। हम देवता के सामने फूल चढ़ाते हैं। फूल चढ़ाने से क्या फायदा होता है? आपके हिसाब से देवता एक ऐसा आदमी है, जिसको हमेशा गंदगी में रहना पड़ता होगा, जैसे मच्छर, मक्खी गंदगी में रहते हैं।
देवता माने गंदगी में रहने वाला, जिसको कभी खुशबू नहीं मिली, तो साहब! लीजिए, फूल लीजिए। क्या बात है आपने फूल खिला दिया? जिंदगी भर तो हमारे बाप दादाओं ने फूल नहीं देखे थे, यह आपकी व्याख्या है। फूल को पाकर के देवता को प्रसन्न होना चाहिए और फिर ले वरदान, ले वरदान। आपकी इस वाहियात सोच, वाहियात कसौटी के हिसाब से देवता को शक्कर की गोलियाँ खानी चाहिए। देखिए साहब! हमको तो बीस साल से शक्कर की गोली नहीं मिली। आपके बराबर दयालु और दानी और कोई नहीं है। अच्छा, तो लीजिए वरदान। शक्कर की सात गोली और सात वरदान—आपकी मान्यता तो यही है न?
मित्रो! हनुमान जी के पास दीपक जलाइए और वरदान पाइए। क्यों साहब! क्या माँगना है? दीपक क्यों ले आए? अरे साहब! हम यहाँ अँधेरे में पड़े थे। रास्ता पता नहीं था कि कहाँ, किधर जाएँ, कहाँ पानी पिएँ? हम घुप्प अँधेरे में पड़े थे। आपने दीपक जला दिया, बहुत मेहरबानी आपकी। अब आप दीपक जलाने का वरदान लीजिए, पर मैं बहुत नाराज हूँ कि आप देवताओं की ऐसी मिट्टी पलीद करते हैं। ये परिभाषाएँ नहीं हैं, जो अपने आप सोच रखी हैं। फिर क्या परिभाषाएँ हैं?
इसकी परिभाषा यह है कि पूजा के प्रतीक जब हम देवता के सामने रखते हैं, तो वह नसीहत देता है, मार्गदर्शन करता है। फूल हमारा मार्गदर्शन करता है। उस साइंस के हिसाब से जिसका अर्थ होता है—अपने आप को बदलना। फूल हमको बताता है कि वह एक किताब है। फूल एक गुरु है, फूल एक व्याख्यान है, फूल एक कथा है। फूल यह बताता है कि देवता के समीप जाना है, देवता का प्यार पाना है, तो आपको फूल जैसा जीवनक्रम बनाना चाहिए। फूल जैसी सुगंध, फूल जैसा कोमल, फूल जैसा शालीन, फूल जैसा परोपकारी, फूल जैसा हँसने और हँसाने वाला होना चाहिए।
अगर आप फूल से यह शिक्षण प्राप्त कर सकते हों, तो आपका फूल चढ़ाना सार्थक है। क्यों? क्योंकि उस सार्थकता से आपको प्रेरणा मिलेगी, प्रकाश मिलेगा। आप चाहे जहाँ उसका उपयोग करें। हमारी जिंदगी में क्या परिवर्तन होना चाहिए और हमें अपना क्या विकास करना चाहिए? अगर फूल चढ़ा दिया, तो उसके गुण हमको ध्यान रखने चाहिए कि हमें अपनी जिंदगी में क्या करना है? हमें क्या करना है? यह बिना बोलने वाला फूल अपनी मूकवाणी से सिखाता है।
मित्रो! दीपक से क्या मतलब है? दीपक से यह मतलब है कि हमारा दिल स्नेह-प्यार से लबालब भरा हुआ हो। स्नेह क्या है? चिकनाई। तेल, घी को भी स्नेह कहते हैं और प्यार को भी स्नेह कहते हैं। स्नेह से हमारा दीपक, हमारा मिट्टी का कटोरा, हमारा हृदय लबालब भरा हो और हमारी संपदा, हमारी प्यार की संपदा जलती रहे। हम स्वयं जलते रहें, हम स्वयं प्रकाशवान हों और दूसरों को प्रकाश फैलाएँ। अपने आप को जला करके दूसरों को रोशनी देता है, यह दीपक अपने आप में फिलॉसफी है। दीपक अपने आप में दर्शन है। दीपक अपने आप में शिक्षण है। दीपक अपने आप में एक पुस्तक है।
दीपक अपने आप में एक व्याख्यान है। इस व्याख्यान को आप सुनें और समझें, तत्पश्चात यह विचार करें कि क्या यह हमारे लिए संभव है कि दीपक जैसी जिंदगी जिएँ, क्या हमारे जीवन में दीपक जैसे सद्भावों का समावेश संभव है। यदि आप विचार कर सकें और दीपक आपको प्रेरणा देने में समर्थ हो सके और आप दीपक से प्रेरणा ग्रहण कर सकें और प्रेरणा ग्रहण करने के बाद में अपने जीवन में कुछ हेर-फेर बदलाव कर सकें, तो आपका दीपक जलाना सार्थक है। दीपक का यह महत्त्व बिलकुल सही है। दीपक जलाने का माहात्म्य बिलकुल सही है, पर शर्त सिर्फ यही है कि आप दीपक की फिलॉसफी को समझें। फिलॉसफी को समझें ही नहीं, वरन उससे प्रेरणा और प्रकाश लेकर के अपने आप को बदलना शुरू करें, तो आपका दीपक जलाना ठीक है।
मित्रो! हम भगवान को शक्कर की गोलियाँ अर्पित करते हैं, शक्कर की गोलियाँ खिलाते हैं। शक्कर की गोलियाँ खिलाने का तात्पर्य है कि भगवान मिठास को प्यार करते हैं। हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे व्यवहार में मिठास हो, हमारे आचरण में मिठास हो। हम चारों ओर शहद बिखेरते फिरें, ताकि हर आदमी हमारी ओर आकर्षित हो। शहद हमारी वाणी, शहद हमारा व्यवहार हो। शक्कर की गोलियाँ भगवान को प्यारी लगती हैं। भगवान शक्कर खाना पसंद करते हैं। भगवान को और कोई जायका पसंद नहीं है। सिर्फ एक ही जायका पसंद है, वो है शक्कर—मिठास।
भगवान जी! आप मिर्च का अचार खा लीजिए। नहीं साहब! हम नहीं खाएँगे मिर्च का अचार, अच्छा तो कचौड़ी का भोग लगा लीजिए। नहीं, कचौड़ी नहीं, हलुआ का प्रसाद बँटेगा। नहीं साहब! हलुआ नहीं, हम तो दालमोंठ बाँटेंगे। नहीं बेटे! शक्कर का ही बाँटना। क्यों साहब! यह क्या मामला है? शक्कर खाते-खाते महादेव जी के दाँतों में कैविटी हुई कि नहीं? दाँत खराब हुए कि नहीं हुए? ज्यादा शक्कर खाने से दाँतों में कीड़े लग जाते हैं और बच्चों के दाँत खराब हो जाते हैं।
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