Saturday, September 25, 2021

गायत्री मंत्र का बहुत बड़ा महत्व है।

 हमारे साथ मंत्र बोलें,


ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


देवियो और भाइयो,


प्रातः मामूली-सी बातें हुई थीं। गायत्री उपासना आरम्भ करने की बात बतायी थी, परन्तु साधना के विधि-विधान के न होने से उपासना अधूरी रह जाती है। बिना विधि-विधान के उद्देश्य पूरे नहीं होते। बिना विधि ली हुई औषधि बीमारी को दूर करने में समर्थ नहीं होती। कई ऐसे भी होते हैं, जो दुनियां को विधि बताते हैं, पर स्वयं विधि का प्रयोग कर लाभ नहीं उठाते।


गायत्री मंत्र का बहुत बड़ा महत्व है। इस मंत्र में अपार शक्ति है। महर्षि विश्वामित्र ने इस मंत्र की शक्ति से नयी सृष्टि का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण जगत् में गायत्री मंत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं। सभी महापुरुषों ने गायत्री की साधना की। मुझे पुराना इतिहास सुनाने दीजिये और उस पुराने इतिहास में देखेंगे कि उसमें गायत्री मंत्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं।


इन पिछले दो हजार वर्षों में हमारी स्थिति बिगड़ गयी। हम संकीर्ण बन गये। मेढ़क की तरह अपने तालाब को संसार समझने लग गये। मुसलमान आज से करीब हजार वर्ष पहिले भारतवर्ष में आये थे। जब वे आये तब केवल वे 1500 की संख्या में थे और एक हजार वर्ष तक शासन करते रहे, यह समर्थता मुसलमानों की नहीं थी, यह कमजोरी हमारी मतिभ्रम की थी। हमारी आत्माएं कमजोर हो गयी थीं और यही वजह थी कि यहां जो भी आया शासन करता रहा। कोई भी कौम यहां से खाली हाथ नहीं गयी। जो भी आये, राज्य करते गये। एक देश जापान भी है, वह भी दस वर्ष गुलाम रहा, पर पुनः स्वतंत्र हो गया। जर्मन युद्ध में दो बार पराधीन हुआ, पर साधन सम्पन्न होकर पुनः स्वतंत्र और उन्नत हो गया। दुनियां का इतिहास बताता है कि जीवित कौमों पर विदेशी हुकूमत नहीं कर सकता। हम एक हजार वर्ष तक गुलाम रहे। ऐसा कलंक दुनियां में किसी भी जाति व देश को नहीं लगा। यह कलंक जयचन्द और मीर जाफरों की देन नहीं, यह आरोप उन पर नहीं कि वे दुश्मन के साथ मिल गये जिससे हमारी यह गति हो गयी। मित्रो! यह दोष केवल हमारे मति विभ्रम का है। आज हमारे समाज में आयी निराशा उसी मति विभ्रम का रूप है।


आज हम कहते हैं चीन का हमला क्यों हुआ? यह तो भगवान की इच्छा थी। पाकिस्तान का हमला क्यों हुआ? यह भी भगवान की इच्छा थी। हिन्दुस्तान में गौवध क्यों होता है? यह भी भगवान की इच्छा है, पाकिस्तान का निर्माण किसने करवाया? यह भी भगवान की मर्जी थी। ऐसी गन्दी फिलॉसफी हमें ले डूबी। क्या भगवान ऐसा गन्दा काम कर सकता है? मित्रो! कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। इस तरह के निराशा के विचार गुलामी आने के सौर वर्ष पहले यहां आये और हम गुलामी में जर्जरित हो गये। हमारे जीवन की क्रान्ति नष्ट हो गयी। मुसलमान आये, उन्होंने सोमनाथ, कृष्ण जन्मभूमि मथुरा, राम जन्मभूमि अयोध्या के मन्दिरों को रौंद डाला। हमारे कमजोर भाइयों को बलात् अपने धर्म में दीक्षित कर लिया और हम भगवान की इच्छा मानकर चुपचाप बैठे रहे। जो कौम अपने विचारों को खो बैठती है, उसका यही हाल होता है। लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे अध्यात्म की एक फिलॉसफी थी, पर एक अभागा समय ऐसा आया कि उसने अनेक सम्प्रदाय दिये, अनेक धर्म दिये, अनेक जातियां दीं फलस्वरूप हम मति विभ्रम हो गये।


मित्रो! मैं पुरानी कथा सुनाता जा रहा हूं। हम पहले क्या थे? कितने महान थे? आज जाति और मजहब के नाम पर हम बंटे बैठे हैं। हम आज एक एकादशी के व्रत का निर्णय नहीं कर सकते, हम आज कृष्ण जन्माष्टमी एक दिन नहीं मना सकते। कोई कहते हैं कि भगवान जिस रात्रि जन्मे उसी दिन जन्माष्टमी, कोई गोकुल पहुंचने वाले दिन को, तो कोई द्वारिका पहुंचने वाले दिन को उनका जन्म मानते हैं। शास्त्रों में जन्माष्टमी मनाने की अलग-अलग बातें लिखी जाती हैं। जैसा मन में आया, वैसा लिख दिया। ऐसी अतार्किक गन्दी परम्परा बनाकर हमें बर्बाद कर दिया।


एक जमाना था, जब एक महान राष्ट्र अपना था, एक महान धर्म अपना था, एक महान संस्कृति अपनी थी। तभी अपना देश जगद्गुरु के सिंहासन पर विराजमान था, एक महान आध्यात्मिक उपासना थी और वह थी—गायत्री उपासना।


गायत्री महामंत्र की उपासना ब्रह्मा से प्रारम्भ हुई। यह मंत्र उन्हें परमात्मा की वाणी से प्राप्त हुआ था। उन्होंने इस मंत्र को दो रूप में बनाया—एक सावित्री के रूप में और दूसरा गायत्री के रूप में। सावित्री को सांसारिक निर्माण के लिए प्रयोग किया और गायत्री को ज्ञान तत्व के रूप में बताया। इस ज्ञान तत्व रूपी गायत्री साधना को ही हमारे ऋषि-महर्षियों ने समझा और उपासना की। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि, दुर्वासा आदि सभी ऋषियों ने गायत्री उपासना की। हर महान व्यक्ति के साथ गायत्री उपासना जुड़ी रही। आप जानते ही हैं कि भगवान राम को महर्षि वशिष्ठ ने गुरु दीक्षा में गायत्री मंत्र दिया। महर्षि संदीपन ने भगवान कृष्ण को गायत्री उपासना करने का निर्देश किया। सारी महिमा गायत्री की ही है। गायत्री उपासना से मानव देवता बन सकता है। पर आप कहेंगे गुरुजी हम को लाभ क्यों नहीं मिला? गुरुजी हमें तीन माह जप करते हो गये, हमारे अन्दर विलक्षण शक्ति क्यों नहीं आती? मित्रो! मैं यही बात बताना चाहता हूं और वह बात यह है कि बिना विधि सफलता प्राप्त नहीं होती। ठीक उसी प्रकार जैसे बिना विधि औषधि स्वास्थ्य लाभ नहीं करती। दवा का अलग विधान है। हर गृहस्थी का अलग विधान है। समाज की सेवा संस्कृति का अलग विधान है। ठीक उसी प्रकार गायत्री उपासना का भी अलग विधान है, उसके अपने तौर-तरीके हैं।


गायत्री उपासना आरम्भ करने के दो विधान हैं। उनमें एक है—कर्मकाण्ड और दूसरा है भावना। कर्मकाण्ड की विधि यह है कि माला किस प्रकार से जपनी चाहिए, आसन कैसा होना चाहिए, मुख किधर रहना चाहिए, माला से कौन-सी उंगली लगनी चाहिए और मन्त्र कैसे बोलना चाहिए। यह कर्मकाण्ड उपासना का कलेवर है, प्राण नहीं। उपासना का प्राण भावना से आता है। वे अधिक सफल होते हैं, जो साधना के साथ भावना रखते हैं। बिना भावना के फल नहीं मिलता, केवल कर्मकाण्ड कुछ नहीं दिला सकता। बेचारे से पण्डित-पंडे सब कुछ कराते हैं, सब कुछ करते हैं, पर स्वयं भूखों मरते हैं। श्रीसूक्त का पाठ करने से सेठ के यहां लक्ष्मी आ जाती है और पण्डित उसके पाठ कर-कर के सेठ को लक्ष्मीपति बना देता है, पर वह स्वयं धनवान बनने के लिए श्रीसूक्त का पाठ नहीं करता। मित्रो! उसकी भावना नहीं है, वह विश्वास रखता तो दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए करता। मित्रो! यह दाल में काला है।


एक मच्छर था। उसने शहद की मक्खियों के छत्ते के पास जाकर कहा— हम आपको संगीत सिखाना चाहते हैं। सभी मधुमक्खियों ने कहा—हम जरूर सीखेंगे संगीत, पर हम अपनी रानी जी से पूछ आयें। मच्छर ने कहा—हां-हां जरूर। वे मक्खियां रानी जी के पास गयीं और रानी से सम्पूर्ण विवरण कहा। रानी ने सोचा, क्या कारण है यह संगीतज्ञ बिना बुलाये हमें संगीत सिखाने आया है तो उसने एक मक्खी को बुला कर कहा—जा मास्टर जी से पूछकर आ, महाराज आप हमें संगीत क्यों सिखाना चाहते हैं? मक्खी ने मच्छर से यही बात पूछी तो उसने उत्तर दिया—ऐ मक्खी तुम अपनी रानी से कह दो हम तुम्हें संगीत सिखायेंगे और तुम हमें शहद खिलाना। रानी ने जब यह सुना तो कहा— कोई संगीत नहीं सीखेगा। इस मास्टर के मस्तिष्क में संगीत के प्रति आस्था कहां? यह तो शहद का भूखा है। मित्रो! ठीक उसी तरह यह पण्डित उस श्रीसूक्त के उपासक नहीं यह तो इनकी दुकानदारी है। एक हजार वर्ष तक निरन्तर उपासना करने वाला भी बिना भावना के कुछ नहीं पा सकता और भावना युक्त होने से एक सेकेंड में सब कुछ पा सकता है।

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