सत्य को छिपाकर असत्य बोलने से उसके खुल जाने का भय बना रहता है।
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कोई भी सत्य अपने में एक स्वाभाविक प्रवाह रखता है और अनायास ही अन्दर से बाहर को वह निकलना चाहता है। किन्तु असत्यवादी व्यक्ति उसे बाहर आने से रोकते हैं।
बलपूर्वक उसे अन्दर ही दबाये रहते हैं। यह अस्वाभाविक प्रयत्न बहुत कष्टकर होता है। इसमें मनुष्य शक्ति की बहुत बड़ी मात्रा नष्ट हो जाती है। एक मनगढ़ंत की रचना करने के लिए वह मस्तिष्क पर दूसरा दबाव डालता है।
वह मस्तिष्क से ऐसी दिशा में काम लेता है, जो उसे जरा भी सहन नहीं होता, लेकिन दबाव के कारण उसे विवश होकर वैसा करना पड़ता है।
इस प्रकार सत्य के स्थान पर असत्य गढ़ देने के बाद एक दूसरा दायित्व शुरू होता है, वह यह कि- ऐसा प्रयत्न करते रह जाए, जिससे उसके मनगढ़ंत प्रसंग की पोल न खुलने पाये।
इस सजगता में झूठे व्यक्ति को निरन्तर सशंक और संत्रस्त रहना पड़ता है। संयोग सम्भावनाओं से निपटने के लिए असत्य अनुसत्य की परम्परा निर्माण करनी पड़ती है।
एक झूठ छिपाने के लिए सैकड़ों झूठ रचने पड़ते हैं। इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण वितर्कनाएँ मनुष्य को सनकी तक बना देती है।
सत्य को छिपाकर असत्य बोलने में न केवल उसके खुल जाने के भय का संत्रास रहता है, अपितु हमारी अन्तरात्मा में एक चोरवृत्ति का भी विकास हो जाता है।
असत्यवादी का स्वभाव इतना तस्कर हो जाता है, कि प्रायः यह अपने से भी सच्चाई को छिपाने लगता है। इसके अतिरिक्त उसकी सरल आत्मा से जब तक कि वह पूरी तरह मर नहीं जाती, उस चोरवृत्ति का संघर्ष चलता रहता है।
यह संघर्ष मनुष्य में अंतर्द्वन्द को जन्म देता है। अन्तर्द्वन्द वह अस्थाई ज्वाला होती है, जो मनुष्य की सारी शान्ति जलाकर भस्म कर देती है।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति मई 1973 पृष्ठ 23
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