ऋषि चिंतन
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*आनंद अपनी ही मुट्ठी में भरा पड़ा है*
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👉 परिणाम को आनंद का केंद्र न मानकर *यदि "काम" को, "उत्कृष्टता" को,* प्रश्न बनाया जाए और उसका स्तर ऊँचा रखने में प्रयत्न किया जाए तो सदा उत्साह बना रहेगा और साथ ही आनंद भी । *हम किसी काम को छोटा न मानें वरन जो भी काम हाथ में है उसे इतने मनोयोग के साथ पूरा करें कि उसमें कर्ता का व्यक्तित्व बोलने लगे ।* ऐसे कार्य अपने कर्त्ता के लिए श्रेय और सम्मान का कारण बनते हैं, भले ही वे अधिक महत्वपूर्ण न हों ।
👉 मनस्वी रस्किन की उक्ति है -- *"काम के साथ अपने को तब तक रगड़ा जाए जब तक कि वह संतोष की सुगंध न बिखेरने लगे ।"*
👉बल्टियर ने लिखा है ---- *"किसी काम का मूल्यांकन उसकी बाजारू कीमत के साथ नहीं, वरन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसके पीछे कर्त्ता का क्या दृष्टिकोण और कितना मनोयोग जुड़ा रहा है ।"*
👉 अब्राहम लिंकन का यह कथन कित'ना तथ्यपूर्ण है, जिसमें उन्होंने क़हा था -- *"हम जिस काम में जितना रस लेते हैं और मनोयोग लगाते हैं, वह उतना ही अधिक आनंददायक बन जाता है ।"*
👉 आनंद के लिए वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं, न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है । वह अपनी भीतरी उपज है । *परिणाम में "संतोष" और कार्य में "उत्कृष्टता" का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिणाम में पाया जा सकता है ।*
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