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🛑परोपकार एक महान दैवीय व आध्यात्मिक गुण है। । यह कुछ और नहीं वरन देवत्व की अभिव्यक्ति है। । साथ ही यह करुणा,, प्रेम,, पवित्रता एवं संवेदना की परम अभिव्यक्ति भी है। । दूसरों की पीड़ा देखकर किसी पाषाण हृदय में भले ही कोई हलचल न हो पर करुणा,, प्रेम व संवेदना से भरे हृदय में कोई हलचल न हो ऐसा कदापि संभव नहीं। । परोपकार पावन हृदय की एक अलौकिक पुकार है,, एक आकुल पुकार है। । सच कहें तो ऐसी आकुल पुकार ईशकृपा से ही किसी के हृदय में उठती है। ।परसेवा,, परोपकार हेतु हृदय की आकुल पुकार सचमुच एक दिव्य अनुदान है,, वरदान है,, अनुग्रह है जो प्रभुकृपा से ही हम पर बरसती है। ।
🛑अपने संकल्प मात्र से कोटि कोटि ब्रह्माण्डों की रचना व संहार करने वाले प्रभु सर्वसमर्थ हैं,, शक्तिशाली हैं,, सर्वज्ञ हैं और सर्वव्यापी भी।। संसार में उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं पर उन करुणानिधान की जरा करुणा तो देखिए कि वे स्वयं किसी पर अपनी करुणा बरसाना चाह रहे हैं,, किसी की पीड़ा हरण करना चाह रहे हैं पर वे इस पुनीत कार्य को हमारे इन नन्हे हाथों से ही कराना चाह रहे हैं। । हमारे हाथों से ही किसी का भला कराना चाह रहे हैं। । परमात्मा किसी पर अपना अनुग्रह बरसाना चाह रहे हैं पर इस हेतु हमें अपना माध्यम बना वे यह श्रेय हमें देना चाहते हैं। ।
🛑जब भी हमें किसी की सेवा,, सहयोग का अवसर मिले तो इसे प्रभु इच्छा समझ हमें अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।। कौन जाने फिर यह अवसर अपने हाथ लगे न लगे।। कौन जाने किस वेश में स्वयं प्रभु हमारी सेवा पाने,, हमारे घर आन बैठें।। यदि हम सचमुच परोपकार के माध्यम से प्रभु की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपने हृदय की कोठरी तो साफ तो साफ करना जरूरी है। । स्नेहसलिला माता भगवती देवी शर्मा हमें पावन सीख देती हैं -- स्वार्थ में लेन देन तो सभी करते हैं,, बदले में कुछ पाने की इच्छा से सेवा सहयोग करने वालोँ की कहाँ कमी है?? पर परोपकार एक परमपवित्र भावना है। इसमें पाने,, पाने की नहीं,, सिर्फ देने,, देने की चाहत है। । परोपकार तो हृदय के प्रेम सिंधु,, करुणा सिंधु में उठ रही वे लहरें हैं जो नररूपी नारायण व जीवरूपी शिव का अभिषेक करना चाहती हैं। । ऐसे सहृदय लोग तो सृष्टि के कण कण में,, हर जीव में अपने शिव को देखते हैं,, आराध्य को देखते हैं। । अब तो सम्पूर्ण सृष्टि ही उनके लिए शिवालय है,, देवालय है और हर जीव शिव की प्रतिमाएं हैं। । अब तो वे इसी देवालय में,, शिवालय में बैठकर पर सेवा,, परोपकार कर अपने आराध्य की अभ्यर्थना,, आराधना करना चाहते हैं। । अब उनके द्वारा की गई औरों की हरेक सेवा ही ईश पूजा है,, ईश उपासना है पर ऐसी उपासना करने वाले विरले ही होते हैं इसलिए संत कबीर कह रहे हैं--
जो कोई परस्पर लेता देता है तो ये सब स्वार्थ है पर दूसरों से कुछ न पाने पर भी दूसरों की भलाई में जो तत्पर है वो ही वास्तव में शूरवीर है। । निस्संदेह परोपकार परमात्मा का साक्षात पूजन है। । यह स्वयं में बहुत बड़ी साधना है जिसे सच्चे व निष्काम भाव से करते रहने पर व्यक्ति को वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो बड़ी बड़ी दुर्लभ साधनाओं से ही प्राप्त कर पाना संभव है। । यहाँ तक कि मुक्ति का द्वार भी इसी माध्यम से खुल जाता है। । गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के माध्यम से जटायु को यही संदेश देते हैं-- जिनके मन में दूसरों का हित बसता है,, समाया रहता है उनके लिए जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है,, वे मेरे परमधाम के निवासी होते हैं। । सचमुच कितनी अद्भुत है परोपकार की महिमा। । इसलिए हमें इसी पथ का पथिक बनना चाहिए। ।
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