अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं।
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मनुष्य का जीवन दुःखों से भरा दिखाई पड़ता है। इनसे निवृत्ति के लिए, जीवन में सुख की प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य अनगिनत प्रयास करते भी दीखते हैं।
विडम्बना यह है कि सुख, गिने-चुने लोगों को ही मिलता है, शेष की झोली तो अतृप्ति, असफलता, असन्तोष, अभाव व दुःखों से ही भरी मिलती है।
लोग भटकते सुख की प्राप्ति के लिए हैं, पर मिलता है दुःख। हर व्यक्ति की यही पीडा़ है, यही वेदना है। सुख की तलाश में भटकते लोग यह भूल जाते हैं कि दुःख कहीं बाहर से नहीं आता, बल्कि हमारे ही भीतर से आता है।
चाहे हम कितना भी दुःखों के कारण को कहीं बाहर ढूँढ़ना चाहें, किसी व्यक्ति में, किसी परिस्थिति में, किसी घटना में तलाशना चाहें, दुःखों का मूल, हमारे भीतर है। बाहर ढूँढ़ने से कारण तो पर्याप्त मिल सकते हैं, पर समाधान नहीं मिल सकता।
समाधान, परिस्थितियों को बदलने से नहीं, मनःस्थिति को बदलने से आता है। दुःखों से मुक्ति पाने के लिए इस दृष्टिकोण को गहरे में आत्मसात् करना होगा, कि इनके लिए मैं जिम्मेदार हूँ। बाहर जो घटता दीखता है, वो मात्र अन्दर की छाया है।
इसलिए स्वयं पर जिम्मेदारी लेते ही हम जीवन को समग्रता में स्वीकार लेते है़ं। दुःख हो या सुख, आनन्द हो या विषाद, सम्मान मिले या अपमान सबको समान रूप से स्वीकारने के लिए, अपनी परिस्थितियों की जिम्मेदारी हमें स्वयं पर लेनी होगी, क्योंकि वे हमारे ही द्वारा किए गए कर्मों का परिणाम हैं।
स्वयं पर जिम्मेदारी लेते ही न केवल हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है, बल्कि हमारे भीतर दुःखद परिस्थितियों से लोहा लेने की ताकत का भी उदय होता है। क्रान्ति उन्हीं के जीवन में घटती है, जो जिम्मेदारी लेना जानते हैं।
दूसरों पर जिम्मा थोपने वाले, कभी स्वयं को बदलने की शुरुआत नहीं कर सकते। ये तो उन्हीं के द्वारा सम्भव है, जो दुःख का कारण बाहर नहीं, भीतर तलाशते हैं और परिस्थितियों को नहीं, मनःस्थिति को बदलने का प्रयास करते हैं।
हमारा दृष्टिकोण बदलते ही जीवन, समाधान स्वयं प्रस्तुत कर देता है।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति
जनवरी 2018 पृष्ठ-3
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