अपराधों और बुराइयों को रोकना भी प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
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बाजार में हैजा फैले तो स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले भी उसकी चपेट में आते हैं। मोहल्ले में आग लगे तो अपना छप्पर भी उसकी लपटों में आता है।
गन्दे लोगों के मुहल्ले में रहने वाले सफाई पसन्द व्यक्ति का भी कल्याण कहाँ है? चारों ओर गन्दगी सड़ रही होगी, बदबू उठ रही होगी, तो अपने एक घर की सफाई रखने से भी क्या काम चलेगा? दूसरों के द्वारा उत्पन्न की हुई गन्दगी हवा के साथ उड़ कर उस स्वच्छ प्रकृति के मनुष्य को भी प्रसन्न न रहने देगी।
बुरे लोगों के बीच रहते हुए सज्जनों को भी कष्ट ही होता है। जहाँ नरबलि चढ़ाने की प्रथा है, उन निर्दय, अविवेकी, जङ्गली, असभ्य लोगों की बस्ती में रहने वाले भले मानुष को भी अपनी सुरक्षा कहाँ अनुभव होगी? बेचारा डरता ही रहेगा कि किसी दिन मेरा ही नम्बर न आ जाए?
यदि किसी की आँखों के आगे हत्या, लूट, चोरी, बलात्कार आदि निःशंस कृत्य होते रहें और वह मौन पत्थर की तरह चुपचाप खड़े देखते रहें, कोई प्रतिरोध न करें तो यह निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता भी कानूनन अपराध मानी जाएगी और न्यायाधीश इस जड़ता के लिए भी दण्ड देगा। इसे कायरता और मानवीय कर्तव्यों की उपेक्षा माना जाएगा।
महात्मा इमर्शन जैसे लोग उन उँगलियों में गिनने लायक ही होते हैं, जो यह दावा कर सके कि- "मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वहाँ भी स्वर्ग बना लूँगा।"
असभ्य समाज में अविवेकी लोगों में रहने वाला कोई श्रेष्ठ व्यक्ति भी शान्ति लाभ नहीं कर सकता। कोई असाधारण मनुष्य उन्हें सुधारने में अपनी असाधारण प्रतिभा व्यय करते हुए कुछ अनुकूलता तो उत्पन्न कर सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि सर्पों के लिपटे रहने पर भी अप्रभावित रहने वाले चन्दन वृक्ष की तरह अपनी मानसिक शान्ति को स्थिर रख सके, पर ऐसा होता कम ही है, कोई विरले ही लोग इस उच्च स्थिति के होते हैं।
( संकलित को सम्पादित)
अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 29
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