बातचीत की कला हमें जीवनभर कुछ न कुछ सिखाती है।
***********************
जीवन में ऐसे कई क्षण आते हैं, जो हमें कुछ-न-कुछ सीख दे देकर जाते हैं। हम अपनी बोलचाल से जहाँ दूसरों के मन पर छा जाते हैं, तो वहीं अपनी बोलचाल से किन्ही लोगों के मन पर घाव भी कर देते हैं और ज्यादातर हम बातचीत से उन्हीं लोगों के दिलों को दुःखाते हैं जो हमारे अपने होते हैं और ऐसा होने पर हमारे रिश्तो में कड़ुआहट घुलने लगती है।
छोटी-छोटी बातें ही बिगड़कर इतनी बड़ी बन जाती है, कि उनके कारण लड़ाइयाँ हो जाती है या फिर नाराजगी हो जाती है, बातचीत तक बन्द हो जाती है।
बोलचाल की अच्छी आदतें जहाँ हमें उन्नति के शिखर पर पहुँचाने में मदद करती है, तो वही बोलचाल की बुरी आदतें हमारे उन्नति के शिखर पर पहुँचने में बाधा पहुँचाती है।
बोलचाल हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है, हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न भाग है। बोलचाल के माध्यम से ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का स्तर प्रदर्शित करता है। कोई व्यक्ति कैसा है? उसके बातचीत के ढँग से ही बहुत कुछ पता चल जाता है।
बोलचाल के माध्यम से जहाँ हम बिगड़ी हुई बातों को सुधार सकते हैं, तो वहीं बनी हुई बातों को बिगाड़ भी सकते हैं। बातचीत की कला ऐसी है, जो जीवन भर हमें कुछ न कुछ सिखाती है।
हमारी बातचीत व व्यवहार हमेशा एक जैसे नहीं रहते, हमारी मनःस्थिति के अनुसार यह बदलते रहते हैं। सब लोगों के प्रति हमारा व्यवहार व नजरिया भी एक जैसे नहीं होता। इसीलिए सब के प्रति अलग दृष्टिकोण के कारण सबके प्रति हमारी बोलचाल भी भिन्न-भिन्न होती है।
कभी-कभी हम बहुत अच्छे से बातचीत करते हैं, तो कभी-कभी हमारी बातचीत में नाराजगी घुली होती है। कभी हमारी वाणी में गुड़ की मिठास होती है, तो कभी मिर्ची सा तीखापन। कभी हमारे शब्दों से फूल बरसते हैं तो कभी उनसे काँटों की बौछार होती है।
इसलिए किस तरह की वाणी का हमें कहाँ प्रयोग करना है? यह समझने की बेहद जरूरत है। यदि वाणी का गलत प्रयोग किया जाए तो वह लक्ष्य को न भेदकर अन्य किसी को आहत कर सकती है और हमारा नुकसान कर सकती है।
इसीलिए हमें बातचीत करने की अच्छी आदतों को अपनाना चाहिए और हमें अच्छी बातचीत केवल बाहर वालों से ही नहीं बल्कि अपनों के साथ भी करनी चाहिए।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति फरवरी 2020 पृष्ठ 50
No comments:
Post a Comment