दीपक प्रकाशित करने का रहस्य
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मित्रो! हम दीपक जलाते हैं। दीपक जलाने का मतलब यह नहीं है कि भगवान की आँखों की रोशनी कम हो गई है। जब आदमी को कम दिखाई पड़ता है, तो माइनस और प्लस के चश्मे लगाने पड़ते हैं। भगवान जी को मोतियाबिंद हो गया, यह मतलब नहीं है। भगवान जी की आँखें सही हैं। भगवान जी के आँखों को धरती पर रखी किताब पढ़ने में और अख़बार पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आती। उनकी आँखें सही हैं। फिर दीपक जलाने से क्या मतलब है?
हमको तो दीपक जलाने की जरूरत होती है; क्योंकि दिन में जब अँधेरा हो जाता है और बादल छा जाते हैं और प्रकाश कम होता है, तो बत्ती जलानी पड़ती है। ठीक है आँखें कमजोर हैं, इसलिए बत्ती जलानी पड़ती है। लेकिन भगवान जी की आँखें कमजोर नहीं हैं। भगवान जी की आँखों के आगे दीपक जलाएँ या न जलाएँ, उन्हें कोई दिक्कत होने वाली नहीं है। फिर दीपक जलाने की आवश्यकता क्या है? दीपक जलाने की जरूरत केवल यह है कि हम अपने जीवन में एक तरह की भावना का विकास करें कि भगवान को दीपक प्यारा है। भगवान दीपक को मुहब्बत करते हैं।
दीपक वह, जिसके मन में जलने की तमन्ना है। दीपक के पेट में प्यार भरा हुआ है। प्यार स्नेह-सत्कार को कहते हैं और स्नेह का दूसरा अर्थ घी भी होता है, तेल भी होता है। जिसके पेट में स्नेह भरा हुआ पडा़ है, वह है दीपक और जिसने यह नीति अख्तियार कर ली है कि मैं दुनिया में उजाला फैलाऊँगा और अँधेरे में उजाला करूँगा। इसके लिए मैं जलने के लिए तैयार हूँ।
दीपक की तरह प्रकाश देने वाले बनें
जो आदमी उजाला करने के लिए जलना मंजूर करता है, वह आदमी उन सितारों के तरीके से है, जो रात के समय जब चारों ओर अँधेरा छाया रहता है और उस अँधेरे से जो मुसाफिर रास्ता भूल सकते थे, भटक सकते थे; उनको अपनी छोटी-सी समझदारी के द्वारा रास्ता दिखाता रहता है। बच्चे गाते रहते हैं—"ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार, हाऊ आई वंडर व्हाट यू आर।"
मित्रो! इस तरीके से छोटा वाला मनुष्य अपनी छोटी छोटी प्रवृत्तियों के कारण इस संसार में प्रकाश कैसे फैला सकता है। दूसरों को रास्ता दिखाने वाली जिंदगी कैसे जी सकता है। हम रास्ता दिखाने वाली जिंदगी जी सकते हैं। रास्ता दिखाने वाली जिंदगी गरीब आदमी भी जी सकते हैं और हजारों मनुष्यों को रास्ता दिखा सकते हैं।
काश! हमने ऐसी जिंदगी जी हो। ऐसी जिंदगी का जीना भगवान की भक्ति का, दूसरे कर्मकाण्डों, पूजा का उद्देश्य, भगवान का उद्देश्य पूरा कर सकता है। हमारे मन में केवल कर्मकाण्ड की क्रिया समझ में आए और उद्देश्य समझ में आए, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। तब हम अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएँगे कि नहीं, यह कहना मुश्किल है।
इसलिए मित्रो! मेरे गुरुदेव ने मुझे बताया कि हमको जो आध्यात्मिकता के सहारे, पूजा के सहारे, गायत्री महामंत्र के सहारे हमें अपने आप का, अपनी जीवात्मा का विकास करना चाहिए और अपनी विचारणाओं, अपनी भावनाओं का परिष्कार करना चाहिए।
भावनाओं और विचारणाओं का परिष्कार जहाँ कहीं भी जिन व्यक्तियों ने शुरू किया छोटे-छोटे, नगण्य-से-नगण्य, गरीब-से-गरीब मामूली आदमी महानतम व्यक्ति होते हुए चले गए। भगवान का अनुग्रह, कृपा और वरदान प्राप्त करने के लिए उन्हें इंतजार नहीं करना पड़ा। उन्होंने वह सब कुछ प्राप्त किया, जिसकी मामूली आदमी ख्वाब में कल्पना भी नहीं कर सकता। ऐसी चीजों का हकदार आप में से हर आदमी बन सकता है।
अगर आप लोगों को यह ख्याल आए कि आप लोगों को अपना मन, आपको अपनी नीयत, आपको अपना चाल-चलन, आपको अपनी रीति-नीति और आपको अपनी जिंदगी की गिरी हुई स्थिति ठीक कर लेनी चाहिए। इतनी छोटी-सी बात अगर आपकी समझ में आ जाए, तो मजा आ जाए। आपको भगवान का प्यार और भगवान की कृपा मिलती हुई चली जाए।
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