*हम विश्वात्मा के घटक*
*अमेरिका के पागलखानों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगी अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं, जबकि अमावस के दिन यह दौर सर्वाधिक कम होता है। विक्षिप्त ही नहीं, सामान्य मनुष्यों की चित्त-दशा पर भी चन्द्रकलाओं के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ना सामूहिक मनश्चेतना का ही द्योतक है।*
वनस्पति विज्ञानी वृक्षों के तनों में बनने वाले वर्तुलों द्वारा वृक्षों के जीवन का अध्ययन करते हैं। देखा गया है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृन्त बनता है, जोकि उसके द्वारा छोड़ी गई छाल से विनिर्मित होता है। *हर ग्यारहवें वर्ष यह वृन्त सामान्य वृन्तों की अपेक्षा बड़ा बनता है।* अमेरिका के रिसर्च सेन्टर आफ ट्री रिंग ने पता लगाया कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण वृन्त बड़ा बनता है। *स्पष्ट है कि सूर्य और चन्द्र के परिवर्तनों से मनुष्यों एवं पशु-पक्षी तथा पेड़ पौधे भी प्रभावित होते हैं।* तब क्या मात्र मनुष्यों में ही सामूहिक मनश्चेतना न होकर सम्पूर्ण सृष्टि में ही कोई एक समष्टि चेतना विद्यमान है, *यह प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने खड़ा उन्हें आकर्षित कर रहा है।*
*डा. हेराल्ड श्वाइत्जर के नेतृत्व में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के प्रभावों का निरीक्षण-परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सामान्य कीट-पतंग भी विचित्र आचरण करने लगते हैं।*
अनेक पक्षी सूर्यग्रहण के चौबीस घण्टे पूर्व ही चहचहाना बन्द कर देते हैं। चींटियां सूर्यग्रहण के आधा घण्टे पूर्व से भोजन की खोजबीन बन्द कर देती हैं और व्यर्थ ही भटकती रहती है। *सदा चंचल बंदर वृक्षों को छोड़कर जमीन पर आ बैठता है। वुड लाइस, बीटल्स, मिली पीड्स आदि ऐसे कीट-पतंग जो सामान्यतः रात्रि में ही बाहर निकलते हैं, वे भी सूर्यग्रहण के दिन बाहर निकले देखे जाते हैं।* दिशा-विज्ञान में दक्ष चिड़ियां चहकना भी भूल-सी जाती हैं।
*जापान के प्रख्यात जैविकीविद् तोनातो के अनुसार हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य पर होने वाले आणविक विस्फोटों के समय पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में अम्ल तत्व बढ़ जाते हैं और उनका रक्त पतला पड़ जाता है।*
.... *क्रमशः जारी*
✍🏻 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९५*
*परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी*
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