ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
महानता की पहचान है सादगी
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सादगी में महानता छिपी होती है।सादा जीवन जीने वाले व्यक्तियों का रहन सहन भले ही सामान्य दीखता हो, लेकिन उनके कार्य विशेष होते हैं। जो व्यक्ति अपने रहन सहन एवं पहनावे में सादगी नहीं अपनाते,हर पल दूसरों को आकर्षित करने हेतु प्रयासरत रहते हैं, वे कभी भी विशेष कार्य नहीं कर पाते। देश में जो भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने सादगी को अपनाया है, सादा जीवन जीकर, सरल बने रहकर बड़े और महान कार्य किए हैं और महान बने हैं। सच ही है कि व्यक्ति की पहचान उसके वस्त्रों से नहीं, उसके कार्यों एवं आचार-विचार से होती है।
उन दिनों स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे। एक दिन वे पगड़ी बांधे, चादर डाले शिकागो की एक गली में घूम रहे थे। उनकी वेशभूषा को देखकर एक महिला ने अपने पुरुष मित्र से कहा- " जरा इन महाशय को देखो। कैसी अनोखी पोशाक है। " स्वामी जी ने हेय दृष्टि से देख रही उस महिला से कहा - " बहन! मैं जिस देश से आया हूं, वहां पर वस्त्र नहीं, चरित्र सज्जनता की कसौटी माना जाता है। " उनके इस उत्तर ने महिला को हतप्रभ कर दिया। ऐसी ही एक घटना उन दिनों की है, जब स्वामी जी की ख्याति न सिर्फ अमेरिका में, बल्कि पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। एक दिन स्वामी जी के एक अमेरिकी शिष्य ने उनसे कहा- " मैं आपके गुरु को देखना चाहता हूं। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर कैसा होगा वह व्यक्ति, जिसने आप जैसे शिष्य को तैयार किया ? " स्वामी जी ने उस अमेरिकी शिष्य को स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का फोटोग्राफ दिखाया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के फोटोग्राफ को देख कर वह बोला-" मुझे ऐसा लगता था कि आपके गुरु अत्यंत विद्वान और सभ्य होंगे, परन्तु फोटोग्राफ से मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता है। " शिष्य की बात सुनकर स्वामी विवेकानंद बोले - " तुम्हारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण एक दरजी करता है, जबकि हमारे देश में सभ्य पुरुषों का निर्माण आचार-विचार करते हैं।इस कसौटी पर कसकर बताओ कि तुम्हारे मुल्क के सूट-बूटधारी जेन्टलमैन सभ्य हैं या मेरे गुरु परमहंस? " वह अमेरिकी शिष्य स्वामी जी की इस व्याख्या को सुनकर निरुत्तर हो गया। उसने स्वीकार किया कि स्वामी जी के उदाहरण से उसे व्यक्तियों को परखने की नई दृष्टि मिली।
अक्सर हम लोगों की पहचान उनकी वेशभूषा, पहनावे के ढंग आदि से करते हैं, विशेष पहनावे वाले व्यक्ति को विशेष मानते हैं और सामान्य ढ़ंग के पहनावे वाले व्यक्ति को सामान्य व्यक्ति समझते हैं, लेकिन विशेष व्यक्ति वे होते हैं, जो पहनावे को महत्व न देकर कार्य को महत्व देते हैं, उनके सामने उनका कार्य इतना महत्वपूर्ण होता है कि वे अपने पहनावे पर ध्यान ही नहीं दे पाते, और सादा जीवन जीते हैं।
✍️ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖पृष्ठ संख्या-१२,अखण्ड ज्योति,नवंबर-२०१५
Very Inspiring!🙏
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