अपने श्रम की कमाई खाएँ
**********************
मित्रो! ईमानदारी का कमाया हुआ धान्य, परिश्रम से कमाया हुआ धान्य हराम का धान्य नहीं हैं। ध्यान रखें, हराम की कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। जुए की कमाई, लॉटरी की कमाई, सट्टे की कमाई और बाप दादाओं की दी हुई कमाई को भी मैंने चोरी का माना है। हमारे यहाँ प्राचीनकाल से ही श्राद्ध की परंपरा है। श्राद्ध का मतलब यह था कि जो कमाऊ बेटे होते थे, बाप -दादों की कमाई को श्राद्ध में दे देते थे, अच्छे काम में लगा देते थे, ताकि बाप की जीवात्मा, जिसने जिदंगीभर परिश्रम किया है, उसकी जीवात्मा को शांति मिले! हम तो अपने हाथ पाँव से कमाकर खाएँगे। ईमानदार बेटे यही करते थे ।। ईमानदार बाप यही करते थे कि अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए उसे इस लायक बनाकर छोड़ा करते थे कि अपने हाथ- पाँव की मशक्कत से वे कमाएँ खाएँ।
अपने हाथ की कमाई, पसीने की कमाई खा करके कोई आदमी बेईमान नहीं हो सकता, चोर नहीं हो सकता, दुराचारी नहीं हो सकता, व्यभिचारी नहीं हो सकता, कुमार्गगामी नहीं हो सकता। जो अपने हाथ से कमाएगा, उसे मालूम होगा कि खरच करना किसे कहते हैं। जो पसीना बहाकर कमाता है, वह पसीने से खरच करना भी जानता है। खरच करते समय उसको कसक आती है, दर्द आता है, लेकिन जिसे हराम का पैसा मिला है, बाप- दादों का पैसा मिला है, वह जुआ खेलेगा, शराब पीएगा और बुरे से बुरा कर्म करेगा। कौन करेगा पाप? किसको पड़ेगा पाप? बाप को ?? क्यों पड़ेगा? मैं इसे कमीना कहूँगा, जिसने कमा- कमाकर किसी को दिया नहीं। बेटे को दूँगा, सब जमा करके रख गया है दुष्ट कही का। वह सब बच्चों का सत्यानाश करेगा। मित्रों! हराम की कमाई एक और बेईमानी की कमाई दो, दोनों में कोई खास फर्क नहीं है, थोड़ा सा ही फर्क है। ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति हराम की और बेईमानी की कमाई नहीं खाते......
प.श्रीराम शर्मा आचार्य
No comments:
Post a Comment