साधना से सिद्धि
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साधना की गई, पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेक शब्दों की विकलता यही है।*
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसे ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विफलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिए। उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा, _"गुरुदेव मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान मुझसे इतना रूठे क्यों हैं?"_ महायोगी हँसे और कहने लगे, _"कल मैं बगीचे में गया था। वहां कुछ दूसरे युवक भी थे उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएं में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम करना पड़ा, लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हंसने लगे।_*
मैंने देखा, बस वह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएं में गई, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो, पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष-दुर्गुणों को दूर करो। पहले संयम, तब साधना, फिर सिद्धि- यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, तृप्ति नहीं मिलती। भगवान कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इंकार नहीं है।"*_
आइए साधना से सिद्धि प्राप्त करने के लिए अपने मन रूपी बाल्टी को ठीक करें!
अखंड ज्योति, मई 2003, पृष्ठ- 03
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