Tuesday, October 19, 2021

भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है!

 👉 भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है!

********************************

🔶 प्रायः टालस्टाय कहा करते थे- “भाग्य बनाना तो हमारे हाथ की बात है। ईश्वर ने हमारे शरीर, हमारे मस्तिष्क और हमारी आत्मा में वे अद्भुत शक्तियाँ भर दी हैं जिनका हमें कुछ ज्ञान नहीं है। यदि हम इन अद्भुत शक्तियों के विकास में लग जायें, तो भाग्य की लकीरों को निश्चय ही बदल सकते हैं।” एक नहीं अनेकों व्यक्तियों ने भाग्य बदला है।


🔷 एक बार घोड़ा हाँकने वाले ने अपना भाग्य बदला था। क्या आपको उसकी कहानी मालूम है। यदि नहीं तो लीजिये उसे तरोताजा कर लीजिये-


🔶 उसका नाम लावेल था। फूटे नसीब को चुनौती देकर वह फ्राँस का प्रधान सचिव बन गया था।


🔷 गरीबी से उसके पाँव जकड़े थे। अभाव उसे चारों ओर से बाँधे हुये थे। रोटी- कपड़े और पढ़ने की समस्त असुविधाएँ उसके पास थी। उन्नति के कोई भी साधन उसके पास नहीं थे।


🔶 जब वह छोटा था, तो एक दिन पिता ने बाग में घूमते हुये एक सुन्दर फल को दिखा कर उससे कहा था,


🔷''देखो पुत्र ! उस सुन्दर पुष्प को देखो। पूरे उद्यान में उसका सौरभ और सौन्दर्य फैल रहा है। दिशाएँ सुगंध से जैसे भर गई हैं। मन उसकी ओर खिंचा जाता है। क्या तुम्हें मालूम है कि पूर्ण विकसित स्थिति में आने लिये इस पुष्प को कितने कष्ट उठाने पड़े, कितनी एक से एक बड़ी तकलीफें सहनी पड़ी ?? उसके चारों ओर काँटे ही काँटे हैं। तनिक सी हवा चलते ही इसका शरीर काँटों सेविंध जाता है। हिलने तक के लिये स्थान नहीं है। लेकिन फिर भी यह फूल अपना सौन्दर्य और सौरभ बिखेर रहा है। तुमको भी इसी प्रकार जीवन में एक दिन खिलना है, एक दिन गरीबी, अभावों, विषमताओं, विरोधों के नुकीले काँटों में बढ़ना है। सफलता प्राप्त करना है। इस सफलता के लिये हर प्रकार के काँटों का आलिंगन करना है। हमेशा याद रखना है कि जीवन क सफल निर्माण पुष्पों की शय्या पर नहीं होता, बल्कि काँटों की सेज पर होता है। भाग्य बदलने का एकमात्र उपाय उन्नति के लिये हर प्रकार का सच्चा और निरन्तर संघर्ष ही है।''


🔷 बालक लावेल पर इन शब्दों का जादू जैसा असर हुआ। उसने निरन्तर भाग्य के चक्र को बदल डालने के लिये सतत प्रत्यन किया। अब उसके जीवन का एक नया अध्याय खुला।


🔶 वह घोड़ा हाँकता, पर साथ ही पुस्तकें रखता। जो भी थोड़ा- सा अवकाश मिलता, उसी में पुस्तकें पढ़ने बैठ जाता। एक ओर घोड़ा की सेवा और जीविका उपार्जन का कुटिल वक्त, दूसरी ओर अध्ययन और भाग्य को बदल डालने का दृढ़ प्रयत्न, उसके लिये सतत उद्योग। उसकी रोजी कम होने लगी। पढ़ने लिखने में लगे रहने से ताँगे की कमाई में कमी आना अवश्यम्भावी था।


🔷 इधर उसे पढ़ाई में मजा आने लगा था। उसे फाके मस्ती करना मंजूर था, पर अध्ययन छोड़ना मंजूर न था। कभी- कभी वह तांगा हांकने की छुट्टीकर देता, पास के पैसे घोड़े पर व्यय कर देता। स्वयं पूरे दिन उपवास कर डालता। रात में पढ़ने के लिये रोशनी का प्रबन्ध न होता। विवश होकर उसे सड़क की लालटेन के नीचे पढ़ना पढ़ा। पुस्तक खरीदने के लिये उसके पास पैसा नहीं था। वह उन्हें उधार माँगता और पढ़ कर लौटा देता। जब तक एक पुस्तक याद न कर लेता, तब तक उसे न छोड़ता ।। कभी -कभी बारिश के पानी में भी पड़ता ही रहता ।। तूफान या ठन्ड से भी न डरता। वर्षों परिश्रम करते- करते वह विद्वान बन गया और अपनी विद्वत्ता के बल पर सफलता की उच्चतम मंजिल पर पहुँचा।


अखंड ज्योति जनवरी 1961 से

No comments:

Post a Comment