Sunday, October 3, 2021

भारतीय बालकों की शानदार परम्परा

 भारतीय बालकों की शानदार परम्परा 

(भाग 2)

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        (1) कम्पाउण्डर क्लोरोफॉर्म सूँघाने लाया कि रोगी के अँगूठे की खाल कड़ी है और वहाँ जो ऑपरेशन करना है, वह भी बड़ा है। तनिक से हिल जाने से नस कट सकती है और खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए बेहोश करके ऑपरेशन करने की ही डॉक्टर की राय है।

       रोगी ने कहा - "इसकी कुछ भी जरूरत नहीं है। डॉक्टर बिना डरे अपना काम करें, हिलने के कारण कोई खतरा होने की नौबत न आयेगी।"

       अन्त में ऑपरेशन बिना सुंघाये ही हुआ। रोगी शान्त भाव से बैठा रहा। उसने उफ तक नहीं किया। डॉक्टर चकित थे, कि इतने बड़े ऑपरेशन में भी रोगी कैसे अपना धैर्य रख सका? इस धैर्यवान रोगी का नाम था- चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, जो आगे चलकर भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।

      (2) गोपाल कृष्ण गोखले जब स्कूल में पढ़ते थे, तब एक दिन एक लड़के की मदद से गणित का प्रश्न पत्र हल किया। उत्तर ठीक बन पड़े तो उन्हें अध्यापक ने पुरस्कार दिया।

       बालक पुरस्कार लेने से प्रसन्न होने के अपेक्षा रोने लगा। अध्यापक ने इसका कारण पूछा तो उसने सच बात कह दी, कि प्रश्नपत्र मैंने दूसरों से पूछ कर हल किया है, ऐसी दशा में मुझे सजा मिलनी चाहिए न कि पुरस्कार।

       अध्यापक उसकी सच्चाई से बहुत प्रभावित हुए। उसने बच्चे को बहुत प्यार किया और यह पुरस्कार देते हुए कहा - "यह प्रश्न पत्र हल करने का नहीं, तुम्हारी सच्चाई का पुरस्कार है।

      (3) एक लड़का बहुत ही मन्दबुद्धि था। उसे पढ़ना-लिखना कुछ न आता था। बहुत दिन पाठशाला में रहते हुए भी उसे कुछ न आया तो लड़कों ने उसकी मूर्खता के कारण उसे वरधराज अर्थात् 'बैलों का राजा' कहना शुरू कर दिया। घर बाहर सब जगह उसका अपमान ही होता।

       एक दिन बाद बालक बहुत दुःखी होकर पाठशाला से चल दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। वह एक कुएँ के पास पहुँचा और देखा कि किनारे पर रखे हुए जगत के पत्थर पर रस्सी खींचने की रगड़ से निशान बन गए हैं।

       लड़के को सूझा कि जब इतना कठोर पत्थर रस्सी की लगातार रगड़ से घिस सकता है, तो क्या मेरी मोटी बुद्धि लगातार परिश्रम करने से न घिसेगी?

       वह फिर पाठशाला लौट आया और पूरी तत्परता और उत्साह के साथ पढ़ना आरम्भ कर दिया। उसे सफलता मिली। वह व्याकरण शास्त्र का उद्भट विद्वान हुआ। लघु सिद्धान्त कौमुदी नामक ग्रन्थ की रचना उसी ने की।

       उनके नाम में थोड़ा सुधार किया गया। वरधराज की जगह फिर उसे वरदराज कहा जाने लगा।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति मार्च 1946 पृष्ठ 40

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