विश्वास एक मानवीय रत्न है, उसे वास्तव में योग्य, सत्पात्रों को सौंपना चाहिए।
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यह संसार सदैव से बड़ा विचित्र रहा है और आज तो और भी विचित्र हो गया है। इसमें विश्वास तथा आत्मीयता का शोषण करने की कला बहुत बढ़ गई है। लोग विश्वास पाकर ही धोखा देते हैं, आत्मीयता जताकर ही उल्लू सीधा करते हैं। कमजोरी पकड़ कर ही लाभ उठाते हैं।
भावातिरेकी पात्र, कुपात्र देखे बिना ही, उनको जाँचे और परखे बिना अपनी दुर्बलता के कारण ही अपने यह अमूल्य रत्न किसी को भी सौंप देते हैं, जिसके फलस्वरूप कटु अनुभव के बाद खिन्नता तथा पश्चाताप के भागी बनते हैं।
इसके विपरीत भी भावातिरेकी जिसके प्रति घृणा अथवा द्वेष की भावना बना लेता है, फिर उसे जल्दी बदलता ही नहीं। उसके लिए यह भावना पत्थर की लीक हो जाती है, फिर चाहे उसका यह भाव किसी भ्रम अथवा भूल से ही क्यों न बन गया हो?
अपने उद्देश्य अथवा घृणा पात्र के प्रति उसका विरोध इस सीमा तक बढ़ जाता है, कि उसकी चर्चा, उसका नाम तक विष की तरह अखरने लगता है और यहाँ तक कि जहाँ उसकी चर्चा होती है, वहाँ या तो ठहरता ही नहीं अथवा चर्चा करने वाले से भी घृणा करने लगता है।
भावातिरेकी हर बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखता है। तनिक सी कठिनाई, जरा सी अप्रियता अथवा साधारण सी प्रतिकूलता आने पर वह इतना वेदना विभोर हो उठता है, मानो संसार का सारा कष्ट, क्लेश उन्हीं पर आ टूटा हो।
दिन-रात चिन्ता तथा कुण्ठा में गला करता है। अभाव की एक अभिव्यक्ति पर ही इतना तड़प उठता है, कि संसार का निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी उसे अपने से सुखी तथा सम्पन्न दीखता है।
आपत्ति का एक झोंका उन्हें सूखे पत्ते की तरह उड़ा देता है और वे निराशा के अन्धकार में आकण्ठ मग्न हो जाते हैं। सारा संसार उन्हें सूना और जिन्दगी नीरस तथा निःसार दीखने लगती है।
आत्मीयता अच्छी बात है, विश्वास बुरी चीज नहीं है, तथापि यह दोनों वस्तुएँ मूल्यवान हैं और यूँ ही गली-कूचे लूटाने, बरसाने वाली चीजें नहीं है। यह एक मानवीय रत्न है, इसे उन्हीं सत्पात्रों को सौंपना चाहिए, जो वास्तव में इसके योग्य हों।
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1971 पृष्ठ 25
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