Monday, October 25, 2021

संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है।

 संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है।

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       बर्ट्रैंड रसेल का मत है कि- " विचारों में जैसी फलदायी शक्ति है, वैसे ही किसी भी वस्तु में नहीं है। जो व्यक्ति उपकार और उन्नति के सम्बन्ध में कल्पना या मनन करते रहते हैं, वे अदृश्य रूप से संसार की बड़ी सेवा करते हैं।"

       संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु विचार है। कोई भी विचार अपने अच्छे या बुरे प्रभाव से खाली नहीं है। हृदय में घृणा के विचारों का उदय होने से शरीर में से एक प्रकार का विष निकलने लगता है, जो चारों ओर फैलता है और पास रहने वालों को हानि पहुँचाता है। इसी भाँति जब प्रेम, कृपा या उदारता के विचारों का उदय होता है, तो अपने निकटवर्ती प्राणियों में सन्तोष और शान्ति फैलाते हैं।

       गर्मी से पानी भाप बनकर आकाश की ओर जाते हुए दिखाई नहीं देता, परन्तु फिर भी इस बात को सब जानते हैं। इसी तरह विचारों को खुली हुई आँखों से नहीं देखा जा सकता, परन्तु उनकी भी पानी और हवा के समान तरङ्गे बहती है।

       जो लोग बुरे विचार करते हैं, वे सचमुच कुछ ही समय में बहुत बुरे बन जाते हैं। एक महापुरुष का कथन है कि- "जब तुम कहते हो कि मैं जीव हूँ, तब जीव हो और जब कहते हो कि मैं शिव हूँ तो शिव हो।" उसके कथन का तात्पर्य ही है, कि जैसा तुम अपने को समझते हो, वैसे विचार करते हो, वैसे ही बन जाते हो।

       विचारों की लहरों में एक बड़े गजब की ताकत यह है, कि वह अपने समान अन्य विचारों को बड़ी शीघ्रता से खींचकर इकट्ठा कर लेती है।

       पाप, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और निराशा की विचार तरङ्गों में एक प्रकार के प्राणघातक सुक्ष्म जन्तु होते हैं, जो मनुष्य की जीवनी शक्ति को खा डालते हैं। फलस्वरुप मनुष्य बीमार पड़ते हैं, दुखी होते हैं और अल्पायु में ही मर जाते हैं।

       इसके विपरीत प्रेम, उदारता, परोपकार और प्रसन्नता में बिल्कुल दूसरी ही बात है। वह न केवल निरोग रखते हैं, वरन् दूसरे सद्गुणों की वृद्धि करके दीर्घ जीवन प्रदान करते हैं।

        उत्तम विचार करने वाले मनुष्य का रक्त शुद्ध रहेगा और उसकी बुद्धि ऐसी निर्मल रहेगी, कि स्वल्प परिश्रम से ही बहुत ज्ञान सम्पादित कर लेगी।

       आध्यात्मिक चिकित्सक अपने विचारों द्वारा ही दूसरों के रोग दूर कर देते हैं। वे रोगी के हृदय में पवित्रता, उत्साह और प्रसन्नता के भाव उत्पन्न करते हैं, जिससे उनका रक्त के विषैले कीटाणु नष्ट होने लगते हैं और निर्बल अङ्ग फिर से जागृत होकर अपनी क्रियाएँ करने में समर्थ हो जाते हैं।

( संकलित व सम्पादित)

 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1941 पृष्ठ 17

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