दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक विपत्ति के समान हैं।
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भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। लेकिन जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं। यदि कोई बड़ी भूल भी होती है, तो उसे हँसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं। यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।
लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती, जितनी हमारी दृष्टि। दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाय, तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रङ्गीन काँच का चश्मा पहन लिया जाय, तो हर चीज उसी रङ्ग की दिखाई देगी।
कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते, सुने जाते हैं। दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है। ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं। पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप में बाहर निकलते रहते हैं।
दुर्भावनायुक्त ओछे आदमियों के मुख से निन्दा, बुराई, दोष-दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रभावित होती रहती है। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं करते। उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष-दृष्टा ही कहा जाएगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता और दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।
इस प्रकार दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाए नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है, कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जाएँ तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है, कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उनके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही है, वह भी शत्रुता करेगा।
इस प्रकार उस दोषदर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जाएँगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे, वह उतना ही चिन्तित, परेशान एवं आपत्ति-ग्रस्त रहेगा।
उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएँ आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले की अधिक होंगे। ऐसी स्थिति में अपने लिए संकट उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमत्ता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाए रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।
- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1960 पृष्ठ 4
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