Friday, October 1, 2021

विश्वामित्र की तपस्या

विश्वामित्र की तपस्या

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्


विश्वामित्र ने अनेक वर्षो तक तप करके अपनी देह के सब छिद्रों को स्वच्छ निर्मल बना लिया था| उन्होंने अपनी बुद्धि शक्ति को पारदर्शक बनाया था| भीतर का, बाहर का किसी प्रकार का मैल उनमें शेष नहीं रह गया था| विश्वामित्र की देह तपे हुए स्वर्ण के समान प्रकाशवान थी| अब उनकी देह अपनी नहीं रही थी| वह पंच भूतों की बनी देव सर्वभूतों सब प्राणियों से बने समाज के लिए भेंट कर दी गयी थी| वह विश्व के साथ एकता स्थापित कर चुकी थी| विश्वामित्र ने वास्तविक रूप में विश्व का मित्र बनकर अपना नाम सार्थक कर दिया था| 


साधना के पथ में आगे बढ़ते-बढ़ते विश्वामित्र अपना व्यक्ति-भाव भूल गये थे| विश्व की समस्त अनुभूतियाँ उनकी अपनी बन चुकी थीं| वे जो कुछ प्रयत्न कर रहे थे वे अपने लिए नहीं वरन अन्य, अनेकों के लिए, समाज के लिए कर रहे थे| पहले उनको अपने अंत:करण से प्रेरणा मिलती थी पर अब उनको प्रत्यक्ष प्रेरणा सविता-नारायण से मिल रही थी| इसी के प्रभाव में एक स्वर्णमय प्रभात में उनको एक दिव्य दर्शन हुआ| उस दर्शन में जो प्रकाश था वह सूर्य और सविता का ही था पर वह केवल प्रकाश ही नहीं था उसमें ज्योति और चेतना भी थी| 


विश्वामित्र के अंतराल से एक नाद शब्द प्रकट हो रहा था- 'भर्ग' यह 'भर्ग' परम तेज, परम प्रकाश सविता नारायण का सर्वोत्तम तत्व था| इसी प्रसंग में विश्वामित्र को अपने गुरुदेव का स्मरण हो आया, उनका नाम 'भृगु' ऋषि था| उन्हीं की परम कृपा से यह परम-प्रेरणा, यह समाज कल्याण की भावना, यह विश्व हित की चेतना प्राप्त हुए थी| इसलिए अपने गुरुदेव तथा अपने को प्राप्त हुए परम तेज का नाम 'भर्ग' सब प्रकार से उचित ही था| 


मुनिवर विश्वामित्र को जब इस परम तत्व का दर्शन हुआ तो उसी समय उनको एक मंत्र की स्फुरणा हुई| उनके अंतराल में एक नाद जागृत हुआ, जिससे उनका हृदय नाच उठा| ऐसा जान पड़ता था कि कोई अन्तर्यामी उनके हृदय में प्रवेश करके दिव्य मंत्र का उपदेश दे रहा है| तपश्चर्या करके और परम तत्व स्वरुप सविता नारायण का दर्शन करके उनको जो परम चेतना और प्रेरणा मिली थी उसके प्रभाव से उनका मुख मंडल प्रकाशित हो रहा था| उनके मुख से सविता नारायण की महिमा गाने वाले तीन मंत्र निकले जिनमें प्रथम यही था- 


तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, 

धियो यो न: प्रचोदयात् || 


ऋग्वेद के दस मंडल हैं| उनमें से तीसरे मंडल के ६१७ मंत्रों के द्रष्टा विश्वामित्र ऋषि हैं| उन सब मंत्रों का दर्शन उनकी अंत:प्रेरणा में हुआ है और उन सब मंत्रों में सबसे उत्तम यही मंत्र माना गया है| तीसरे मंडल में ६१ सूक्त हैं| उनमें यह मंत्र अंतिम सूक्त का दसवां है| 


गायत्री महाविज्ञान - युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

No comments:

Post a Comment