बाहरी परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुख या दुःख नहीं दे सकती।
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जीवन वृक्ष की जड़ मन के अन्दर है। अक्सर बाहर की परिस्थितियाँ जीवन से मेल नहीं रखती, तब बड़ा दुःख होता है।
पिता की मृत्यु हो गई, हम बालकों की तरह फूट-फूट कर रोते हैं। धन चोरी चला गया, हम दुःख से व्याकुल हो जाते हैं। शरीर अस्वस्थ हो गया, हमें चारों ओर मृत्यु ही नाचती नजर आती है। कार्य में सफलता नहीं मिली, हम चिन्ता की चिता में जल उठते हैं। दूसरे लोग कहना नहीं मानते, हम क्रोध से क्षुब्ध हो जाते हैं।
इनमें से एक ही परिस्थिति जीवन को दुःखमय बना देने के लिए पर्याप्त है, फिर यदि कई घटनाएँ एक साथ मिले, तो कहना ही क्या? जीवन में दुःख शोकों की भट्टी जलने लगती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ नहीं आती, फिर भी हम उनकी कल्पना करके अपने को दुःखी बनाते रहते हैं।
संसार के निर्बाधित क्रम के अनुसार जो घटनाएँ घटित होती रहती है, उनसे हम बच नहीं सकते। हम कितना ही प्रयत्न क्यों न करें? प्रियजनों की मृत्यु होगी ही, दान, भोग के बाद बचा हुआ धन नष्ट होगा ही।
बेशक मनुष्य बहुत शक्तिशाली है, प्रयत्न करने पर परिस्थितियों को बहुत कुछ अपने अनुकूल कर सकता है, परन्तु यह न भूलना चाहिए, कि मनुष्य-मनुष्य ही है। आज की परिस्थिति में वह ईश्वर नहीं है।
घटनाएँ संसार के क्रम के साथ है, वह होती है और होंगी। उनके प्रवाह से भगवान राम और योगीराज कृष्ण भी नहीं बच सके। परिस्थितियों से कोई बच नहीं सकता।
परिस्थितियों का मुकाबला मनुष्य कर सकता है। वह अपना पथ स्वयं निर्माण कर सकता है। दुःख में से सुख खोज सकता है और अपने जीवन में नरक-तुल्य दिखाई देने वाली वेदनाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती है, जो संसार क्रम के साथ सम्बन्धित हैं, उनको सहन करने की शक्ति विवेक द्वारा प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार अपने को विवेकपूर्वक ठीक स्थिति पर रखकर हम संसार के समस्त दुःखों से छुटकारा पा सकते हैं।
यही अध्यात्म पथ है। बाहरी परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुख या दुःख नहीं दे सकती। यदि ऐसा होता, तो समस्त धनी सुखी और सब गरीब दुःखी हुए होते, परन्तु वास्तव में बात इससे उल्टी है। निकट से परीक्षा करने पर अधिकाँश गरीब सुखी और अधिकाँश धनी दुःखी ही मिलेंगे।
अध्यात्म पथ प्रकाश का मार्ग है। वास्तविकता प्रकाश में ही मालूम हो सकती है। प्रकाश की जड़ें आत्मा में है। आत्म-स्वरूप का दर्शन करके ही सारे दुःख-शोकों को जाना और त्यागा जा सकता है।
आत्मा सुखों का मूल है। जीवन का वास्तविक आनन्द उसी से प्राप्त हो सकता है। श्रुति कहती है- "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो। पाठकों! अध्यात्म पथ की ओर चलो!
( संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति फरवरी 1941 पृष्ठ 4
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